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...और इस तरह गांधी के लिए कस्तूरबा हो गईं जगदम्बा

तकरीबन 31 साल पहले 1913 में जब दक्षिण अफ्रीका के सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय विवाहों को गैरकानूनी घोषित कर दिया था तो कस्तूरबा को सत्याग्रह के लिए तैयार करते समय गांधी ने कहा था, "तुम जेल में अगर मर जाओगी तो मैं तुम्हें जगदम्बा की तरह पूजूंगा."

Source: News18Hindi Last updated on: August 9, 2020, 5:53 PM IST
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...और इस तरह गांधी के लिए कस्तूरबा हो गईं जगदम्बा
दक्षिण अफ्रीका में नहीं तो भारत में आजादी के लिए लड़ते हुए कस्तूरबा ने जेल में मृत्यु का वरण किया.
भारत छोड़ो आंदोलन में 9 अगस्त 1942 को गिरफ्तार की गई कस्तूरबा गांधी की मृत्यु 22 फरवरी 1944 को पूना के आगा खान महल में हुई. वह शिवरात्रि का अवसर था और उस रात पूर्णमासी का चांद अपनी पूरी चांदनी बिखेर रहा था. बा का सिर अपने पति महात्मा गांधी की गोद में था और देवदास गांधी, प्रभावती, मनु गांधी और डा सुशीला नैयर आसपास थे. तकरीबन 31 साल पहले 1913 में जब दक्षिण अफ्रीका के सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय विवाहों को गैरकानूनी घोषित कर दिया था तो कस्तूरबा को सत्याग्रह के लिए तैयार करते समय गांधी ने कहा था, "तुम जेल में अगर मर जाओगी तो मैं तुम्हें जगदम्बा की तरह पूजूंगा."आखिर में गांधी की बात सच निकली और दक्षिण अफ्रीका में नहीं तो भारत में आजादी के लिए लड़ते हुए कस्तूरबा ने जेल में मृत्यु का वरण किया. निश्चित रूप से उन्हें वह दर्जा हासिल हो गया जो गांधी उन्हें देना चाहते थे.

नौ अगस्त की सुबह जब गांधी, महादेव, मीरा बेन और सरोजिनी नायडू समेत उनके कई सहयोगियों को बंबई के बिड़ला भवन से गिरफ्तार कर लिया गया तो कस्तूरबा ने तय किया कि शाम को वे सभा को संबोधित करेंगी. लेकिन वे सभा करें कि उससे पहले उन्हें और सुशीला नैयर को एक साथ गिरफ्तार कर लिया गया. सरकार ने इतनी रियायत जरूर की कि उन्हें पूना के उसी आगा खान महल में ले जाने का निर्णय किया गया जहां पर महात्मा गांधी और उनके दूसरे साथियों को रखा गया था. रास्ते में जब उन्हें और सुशीला नैयर को एक रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में रखा गया तो उन्होंने देखा कि सब कुछ पहले जैसा ही चल रहा है. गांधी जी की गिरफ्तारी से लोगों के जीवन व्यापार पर बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है. उन्होंने दुखी होकर सुशीला नैयर से पूछा, "सुशीला सब कुछ पहले जैसा चल रहा है जैसे कुछ हुआ ही नहीं. बापू कैसे सुराज जीतेंगे? "

गांधी ने बा के भीतर दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का साहस पैदा किया
निश्चित तौर पर भारत छोड़ो आंदोलन का यह भी एक पक्ष है. देश अलग-अलग खेमों में बंटा था और सभी खेमे गांधी के साथ आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे. फिर भी गांधी और उनके प्रभाव में बा के भीतर आजादी और उसके लिए लड़ने का जज्बा कायम था और वे उसे लोगों के भीतर जगाए रहना चाहते थे. गांधी ने बा के भीतर दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का साहस पैदा किया था. उसकी कहानी भी बड़ी रोचक है. जब वहां के सुप्रीम कोर्ट ने भारतीयों का विवाह अवैध घोषित कर दिया तो यह तय किया गया कि कस्तूरबा को सत्याग्रह के लिए तैयार किया जाए तो आंदोलन जोर पकड़े. लेकिन गांधी उन पर किसी तरह का दबाव नहीं डालना चाहते. वे यह तो चाहते थे कि वे आंदोलन करें लेकिन वे अपने मन से तैयार होकर आएं तो ज्यादा सही.
गांधी ने कस्तूरबा के रसोई में जाकर कहा, " तुम्हें कुछ पता चला?"
"क्या" कस्तूरबा ने जिज्ञासा से पूछा.
"आज तक तुम मेरी विवाहिता स्त्री थी; लेकिन अब तुम मेरी विवाहिता स्त्री नहीं रही." गांधी ने हंसते हुए उत्तर दिया.कस्तूरबा ने कहा, "यह और किसने कह दिया. आप तो रोज नई नई समस्याएं ढूंढ निकालते हैं."
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जब गांधी उन्हें बताते हैं कि अब तो भारतीय लोगों की पत्नियां रखैल मानी जाएंगी तो कस्तूरबा गुस्सा हो जाती हैं. लेकिन जब गांधी उन्हें और अन्य स्त्रियों को जेल जाने का सुझाव देते हैं तो वे कहते हैं, "क्या कहते हैं मैं जेल जाऊं! स्त्री से कहीं जेल में जाया जाता है?" तब गांधी उन्हें हरिश्चंद्र- तारामती, राम-सीता और नल-दमयंती जैसे तमाम प्रसंगों का उदाहरण देते हैं जिसके जवाब में कस्तूरबा कहती हैं कि वे सब देवता थे.

'तुम जेल में अगर मर जाओगी तो मैं तुम्हें जगदम्बा की तरह पूजूंगा'
आखिर में जब कस्तूरबा तैयार होती हैं तो उन्हें एक ही दिक्कत लगती है कि क्या जेल का भोजन उन्हें माफिक आएगा? इस पर वे पूछती हैं कि, "जेल में सरकार फलाहार देगी?” गांधी कहते हैं कि फलाहार न दे तब तक उपवास करना." बा कहती हैं, "अच्छा तो आपने मुझे मरने का रास्ता बताया है. जेल जाऊंगी तो मैं जरूर मर जाऊंगी." गांधी जी कहते हैं, "हां, हां मैं भी यही चाहता हूं. तुम जेल में अगर मर जाओगी तो मैं तुम्हें जगदम्बा की तरह पूजूंगा." कस्तूरबा ने दृढ़ता से कहा, "अच्छा तब तो मैं जेल जाने को तैयार हूं." बा का यह प्रसंग इस बात का प्रतीक है महात्मा गांधी ने किस तरह से महिलाओं को स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बनाया और उनके भीतर बैठे हुए जेल के भय को तोड़ा.

कस्तूरबा जेल तो कई बार गईं लेकिन जेल में मरने की गांधी की कामना भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अस्थायी जेल आगा खान महल में पूरी हुई. हालांकि उससे पहले जब गिरफ्तार होने के चंद दिनों के बाद ही महादेव देसाई की मृत्यु हो गई तो बा बहुत विचलित हो गईं. बा ने गांधी से कहना शुरू किया, "मैंने आपसे कहा नहीं था कि इस सरकार से झगड़ा न मोल लो. .....आप क्यों चाहते हैं कि अंग्रेज यहां से चले जाएं. यह देश बहुत बड़ा है. उन्हें भी यहां रहने दीजिए न." उनकी इस आपत्ति पर गांधी ने कहा कि अंग्रेज यहां रहें उन्हें भी कोई आपत्ति नहीं है. पर वे शासक की तरह से नहीं भाई की तरह से रहें. गांधी की इस बात से बा सहमत हो गई थीं.

गांधी को रहा इस बात का अफसोस
लेकिन जब एक बार गांधी ने कहा कि क्या वे चाहती हैं कि हम अंग्रेज सरकार से माफी मांग लें तो नाराज हो गईं. इस पर उनका कहना था, "अब कुछ करने का नहीं. बल्कि आपने जो कुछ किया है उसका परिणाम भुगतने का है. हम सब आपके साथ कष्ट झेलने को तैयार हैं और पीछे नहीं हटेंगे. ....महादेव मर गए और अब मेरी बारी है." गांधी आगा खान महल जेल में आखिरी दिनों में बा को पढ़ा रहे थे. बा पढ़ी लिखी नहीं थी. गांधी को इस बात का अफसोस रह गया था कि वे उन्हें पढ़ा नहीं सके. आखिरी दिनों में वे पंजाब की नदियों के नाम, अक्षांस, देशांतर, भूमध्य रेखा की जानकारी दे रहे थे. इस बीच बा ने गुजराती की चौथी जमात की किताब से दो कविताएं भी याद कर ली थीं.

बा की तबीयत तब भी खराब थी जब गांधी ने फरवरी 1943 में 21 दिन के अनशन का फैसला लिया. लेकिन इस दौरान वे गांधी के साथ पूरे साहस से डटी रहीं और उन्होंने उन्हें किसी भी तरह से रोका नहीं बल्कि ढांढस ही बंधाया. इसी साल बा की तबीयत ज्यादा बिगड़ने लगी. उन्हें सितंबर 1943 में तीन बार दिल का दौरा पड़ा. उनकी सेवा के लिए मनु गांधी भी आ गई थीं. जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती और डॉ सुशीला नैयर तो साथ थी हीं. यहां बा की मृत्यु और उनके इलाज के तरीके को लेकर भी एक विवाद है.

आयुर्वेद के विशेषज्ञ पंडित शिव शर्मा और प्राकृतिक चिकित्सा के विशेषज्ञ डा दिनशा मेहता उनका इलाज कर रहे थे. लेकिन ज्यादा लाभ नहीं हो रहा था. इस बीच देवदास गांधी ने अंग्रेज सरकार के सहयोग से सेना के किसी अस्पताल से पेंसलीन का इंतजाम किया. पेंसलीन जब तक पहुंची तब तक उनकी हालत और भी खराब हो चुकी थी. गांधी ने कहा कि पेंसलीन देने से बा को कष्ट ज्यादा होगा और उनके बचने की कोई उम्मीद भी नहीं है. इसलिए इंजेक्शन न दिया जाए. उन्होंने देवदास से पूछा कि क्या वे अब भी पेंसलीन देना चाहेंगे. देवदास भी न देने पर राजी हो गए. हालांकि गांधी के परिवार में ही इस बात पर विवाद है कि गांधी का यह फैसला कितना सही था. कुछ लोगों ने लिखा है कि अपनी एलोपैथी विरोधी जिद के कारण गांधी ने बा की जान ले ली. उस समय बा की उम्र 75 साल थी.

इन विवादों के बीच यह तो कहा ही जा सकता है कि बा स्वाधीनता संग्राम में लड़ते हुए शहीद हुईं और उन्हें जेल में मरते देख कर जगदम्बा की तरह पूजने की गांधी की कामना पूरी हो गई.
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

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First published: August 9, 2020, 5:53 PM IST
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