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विपक्षः कांग्रेस को कोसें या समाजवादियों को

कांग्रेस के भीतर ठंडे पड़े ग्रुप-23 के एक प्रमुख सदस्य कपिल सिब्बल ने बिहार में कांग्रेस की बुरी हार के बहाने आत्मावलोकन और संगठन के पुनर्गठन का मुद्दा फिर उठा दिया है.

Source: News18Hindi Last updated on: November 17, 2020, 8:19 AM IST
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विपक्षः कांग्रेस को कोसें या समाजवादियों को
अस्तित्‍व से जूझ रहा है विपक्ष.
वर्ष 2014 में जो विपक्ष अपनी पराजय को एक संयोग मान रहा था और सत्ता में वापसी के लिए आसानी से आश्वस्त था, वह अब पराजय को अपनी नियति बनाता जा रहा है और अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है. जब ऐसी स्थिति हो तो संतुलित विचार विमर्श होने की बजाय एक दूसरे को कोसने की प्रवृत्ति हावी हो जाती है. वही इस समय विपक्ष की स्थिति हो गई है. कांग्रेस के भीतर ठंडे पड़े ग्रुप-23 के एक प्रमुख सदस्य कपिल सिब्बल ने बिहार में कांग्रेस की बुरी हार के बहाने आत्मावलोकन और संगठन के पुनर्गठन का मुद्दा फिर उठा दिया है. बिहार में कांग्रेस को ज्यादा सीटें दिए जाने से राजद के संस्थापक लालू प्रसाद भी नाराज बताए जाते हैं. इस बीच पुराने समाजवादियों ने यह दलील तेज कर दी है कि कांग्रेस को अपनी जमीनी हैसियत को भूलना नहीं चाहिए और उतनी ही चादर पसारनी चाहिए जितनी लंबी सौर है. इस दलील में गैर कांग्रेसवाद का सिद्धांत भी छुपा हुआ है जिसे बहुत सारे समाजवादियों ने अभी तक छोड़ा नहीं है. यह दलील वामपंथियों की ओर से भी आ रही है कि अगर कांग्रेस ने बिहार में 70 की बजाय 50 सीटें ली होतीं और वामपंथी दलों को ज्यादा सीटें दी होतीं तो महागठबंधन की सरकार बन गई होती. इस बीच राजद के नेता शिवानंद तिवारी के इस बयान पर बवाल मचा है कि कांग्रेस नेतृत्व ने बिहार के चुनाव को गंभीरता से नहीं लिया.

एक धर्मनिरपेक्ष समाजवादी और लोकतांत्रिक विपक्ष की तलाश में जो मंथन चल रहा है उसका एक ध्रुव कांग्रेस पार्टी को हर कीमत पर सही बताने की दिशा में जाता है और ज्यादातर भाजपा के उभार का सारा ठीकरा समाजवादियों के सिर फोड़ता है. दूसरा ध्रुव समाजवादियों का है जो मानता है कि दोष उन समाजवादी नेताओं का नहीं है जिन्होंने कांग्रेस की गलतियों के जवाब में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राजनीतिक संगठन जनसंघ और भाजपा से गठजोड़ किया. दोष तो कांग्रेस का है जिसका नेतृत्व और संगठन लगातार कमजोर होता गया और जिसने भाजपा को उभरने का मौका दिया. यह बहस इतनी तीखी होती गई है कि एक ओर समाजवादी बौद्धिक पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को खलनायक मानते हैं तो दूसरी ओर डॉ. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी पुरोधाओं को भारत में सांप्रदायिकता के उदय के लिए मूल रूप से जिम्मेदार ठहराया जाता है. कहा जाता है कि अगर उन लोगों ने साथ न दिया होता तो संघ परिवार के संगठन राजनीतिक रूप से अछूत बने रहते.

रोचक बात यह है कि यह बहस दलीलों को भविष्य में ले जाने की बजाय अतीत में ले जाती है और इस बात पर जोर देती है कि पहले इतिहास की गलतियों को माना जाए तब बात आगे बढ़े.


एक ओर कांग्रेस पार्टी से जुड़े बौद्धिक पंडित जवाहर लाल नेहरू के प्रति फैलाई जा रही घृणा का जवाब देते हुए उनके समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत को पूरी तरह से सही बताते हैं और कहते हैं कि समाजवादी पहले लोहिया और जेपी की गलतियों को स्वीकार करें तब जाकर कोई वैचारिक संवाद संभव है. समाजवादी आंदोलन के एक गंभीर अध्येता हिंदुत्व के उदय का सारा ठीकरा जेपी और लोहिया के सिर फोड़ते हुए कहते हैं कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों कहा कि अगर संघ फासीवादी है तो वे भी फासिस्ट हैं या डॉ. लोहिया इस जिद तक क्यों गए कि वे कांग्रेस को हराने के लिए शैतान से भी हाथ मिला सकते हैं. कहने का मतलब सारी दिक्कत तभी हुई जब समाजवादी आंदोलन ने गैर कांग्रेसवाद को एक सैद्धांतिक जामा पहना दिया और हिंदुत्ववादियों ने उस तंबू में घुसकर उसका इस्तेमाल किया.
यह बहस यहीं नहीं थमती बल्कि समाजवादियों पर इस बात का भी दोष लगाया जाता है कि उन्होंने पहले संविधान सभा का बायकाट करके और बाद में पंडित जवाहर लाल नेहरू का साथ छोड़कर बड़ी गलती की. वही वजह थी कि दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी न सिर्फ कांग्रेस के भीतर हावी हुए बल्कि बाद में समाजवादियों के प्राप्त सैद्धांतिक वैधता के आधार पर पूरे देश पर छा गए.

इस बहस में समाजवादियों का पक्ष भी सुनने लायक है. उनका कहना है कि कांग्रेस के भीतर दक्षिणपंथी तत्व इस कदर हावी थे कि वहां समाजवादियों के लिए काम करना मुश्किल था. यहां तक कि जनवरी 1948 में नेहरू और पटेल ने गांधी से यह कहकर चौंका दिया था कि डा लोहिया सशस्त्र विद्रोह कराकर उन लोगों का सफाया करना चाहते हैं. संविधान सभा भी जनता से चुनकर नहीं आई थी इसलिए समाजवादी उसमें शामिल नहीं हुए. गांधी की हत्या के बाद समाजवादियों ने साफ तौर पर तत्कालीन सरकार को लापरवाह और जिम्मेदार बताया था. उनका कहना था कि अगर गांधी की ठीक से सुरक्षा की गई होती और जगह जगह सांप्रदायिक संगठनों को रैलियां करने का मौका न दिया गया होता तो देश का सांप्रदायिक माहौल इतना नहीं बिगड़ता और न ही गांधी की हत्या होती.

समाजवादियों की एक पंरपरा आचार्य नरेंद्र देव से भी जुड़ती है. आचार्य नरेंद्र देव न सिर्फ अपनी बौद्धिकता और अकादमिक ज्ञान में भारी हैं बल्कि वे एक प्रकार से नैतिकता के मानदंड हैं. उनकी विरासत ऐसी है जिसे समाजवादी ही नहीं कम्युनिस्ट भी स्वीकार करते हैं. उनका डेमोक्रेटिक सोशलिज्म का सिद्धांत आज भी लोगों को अपील करता है. इसलिए ऐसा कहने वाले भी कम नहीं हैं कि असली हिंदुत्ववादी तो कांग्रेस पार्टी के भीतर बैठे हुए थे जिन्होंने 1948 में सारे छल कपट करके आचार्य नरेंद्र देव को अयोध्या से उपचुनाव हरवाया. उसके लिए कांग्रेस पार्टी ने एक विद्वान और प्रतिबद्ध स्वतंत्रता सेनानी के मुकाबले बाबा राघव दास जैसे संन्यासी को चुनाव लड़वाया. इस योजना में गोविंद बल्लभ पंत, पुरुषोत्तम दास टंडन और स्वयं सरदार बल्लभ भाई पटेल भी शामिल थे. इसलिए समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को पराजित करने की लड़ाई में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जनसंघ तो बाद में सक्षम हुआ, उसकी शुरुआत कांग्रेस के भीतर से ही हुई थी. वही काम संघ परिवार आज कर रहा है.कांग्रेस की इसी दक्षिणपंथी परंपरा ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद परिसर में पहले रामलला की मूर्ति रखवाई, चालीस साल बाद ताला खुलवाया और फिर राममंदिर का शिलान्यास करवाया. कभी मुसलमानों, तो कभी सिखों के मुकाबले हिंदू राष्ट्रवाद का जिन्न खड़ा करने का श्रेय पहले इंदिरा गांधी और फिर उनकी हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी को भी जाता है.

कांग्रेसियों और समाजवादियों के बीच एक दूसरे को कोसने की इस होड़ का कोई अंत नहीं है. जब जब उनकी राजनीति सत्ता पाने और चुनाव जीतने की तिकड़म तक सिमट जाएगी तब तब यह कटुता बढ़ती जाएगी. हालांकि कांग्रेस के प्रति सहानुभूति रखने वाले नेशनल मूवमेंट फ्रंट जैसे संगठन ने इस बहस को अलग दिशा देने की कोशिश की है. उसकी प्रतिस्थापना है कि राष्ट्रीय स्तर पर एक पार्टी के रूप में कांग्रेस की ही उपस्थिति है इसलिए उसके अस्तित्व को इनकार करके कोई विपक्ष नहीं खड़ा हो सकता. लेकिन भारतीय राजनीति सही मायने में तभी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बनेगी जब हम लोग आजादी के पहले वाली कांग्रेस के माडल को समझें और अपनाएं.

इसी सिलसिले में वे निरंतर स्वाधीनता संग्राम की विरासत को जिंदा करने में लगे हुए हैं. वे बार बार उन लोगों को याद करते रहते हैं जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम में न सिर्फ संघर्ष किया बल्कि नए भारत का विचार भी प्रस्तुत किया.


आज कांग्रेस पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने को सरकार और शासक दल मानने की बजाय अपने को एक बौद्धिक और राजनीतिक आंदोलन बनाने की है. यह तभी हो सकता है जब कांग्रेस क्षेत्रीय दलों की अस्मिता को समझे और चुनावों में उतनी ही सीटें मांगें जितनी उसकी क्षमता है. इस आंदोलन का दायरा तभी बढ़ेगा जब वह लोहियावादी और आंबेडकरवादी सामाजिक न्याय के आंदोलनों को अपने भीतर आत्मसात करे. कांग्रेसियों का काम अब लोहिया और जेपी को कोसने से नहीं चलेगा. उसकी कोशिश उनके लोकतांत्रिक सिद्धांतों को आत्मसात करने की होनी चाहिए. वह सिद्धांत नारी समानता का है, जातिगत समानता का है, नागरिक अधिकारों का है और सिविल नाफरमानी का है. कांग्रेस को चाहिए कि वह हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों और भारत के सभी धर्मावलंबियों के उदारमना लोगों का एक मंच बने. वह स्त्रियों, दलितों और आदिवासियों के लिए अपने भीतर अधिकतम समावेशिता पैदा करे. यह तभी संभव है जब कांग्रेस हर प्रकार के उदार विचारों का मंच बने और साथ ही कट्टरता से लड़ने का एक उपकरण. कांग्रेस के कई नेता मानते हैं कि उनके भीतर कट्टर और सांप्रदायिक तत्वों की भरमार है. उन्हें उनसे भी लड़ना होगा.

दूसरी ओर यह समाजवादियों का भी फर्ज है कि वे अब गैर-कांग्रेसवाद के पूर्वाग्रह से मुक्त हों. नेहरू और इंदिरा गांधी के प्रति समाजवादियों के भीतर संघियों के कम नफरत नहीं है. उससे न कोई लोकतांत्रिक आंदोलन खड़ा हो सकेगा और न ही विपक्षी एकता की कोई तस्वीर बनेगी. निश्चित तौर पर समाजवादी आंदोलन की विरासत ढो रहे लालू और मुलायम के उत्तराधिकारी न तो अपनी महान परंपरा से परिचित हैं और न ही अपने पिताओं जितना भी नैतिक साहस रखते हैं. हालांकि इस चुनाव में तेजस्वी ने अपनी राजनीतिक क्षमताओं का प्रदर्शन किया है और एक हद तक अखिलेश यादव भी कर चुके हैं. पर आज की चुनौती उससे बड़ी है. इसलिए समाजवादी आंदोलन को जाति और परिवार के कटघरे से बाहर निकालकर एक बौद्धिक और जन आंदोलन का स्वरूप देना होगा. वह तभी हो पाएगा जब यह पार्टियां चुनाव से पहले और बाद में भी सक्रिय रहें और अपने कार्यकर्ताओं के साथ जनता के प्रशिक्षण का कार्यक्रम भी तय करें.

समाजवादी और कांग्रेसी आंदोलनों का मिलन नेहरू और लोहिया की विचारभूमि पर होने की अपनी मुश्किलें हैं. वह अगर हो सकता है तो महात्मा गांधी के विचारमंडल पर ही हो सकता है.


यह बात कांग्रेस और समाजवादियों दोनों को स्वीकार करनी होगी कि महात्मा गांधी न सिर्फ विश्व स्तर के विचारक हैं बल्कि उनके जैसा समन्वयवादी राजनीतिक आचरण विलक्षण है. जिस दिन दोनों ओर के बौद्धिक और राजनीतिक इस बात को समझेंगे उस दिन वे एक सार्थक और समर्थ विपक्ष बनाने में अपना योगदान दे सकेंगे. वरना वे पहले सीटों के तालमेल में गड़बड़ाते रहेंगे फिर चुनाव हारने के बाद एक दूसरे को कोसते रहेंगे. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

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First published: November 17, 2020, 8:19 AM IST
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