Bengal Election 2021: पश्चिम बंगाल की हिंसा का भसान कैसे होगा

West Bengal Assembly Elections 2021: आज पश्चिम बंगाल के युवा और वरिष्ठ जन वहां बढ़ रहे तनाव और हिंसा को लेकर चिंतित हैं. उन्हें एक बार फिर अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का बोध हो रहा है और उन्हें डर है कि उन्होंने लंबी अवधि में जो आधुनिकता और विविधता की धारणा और रहन सहन हासिल किया था वह नष्ट होने जा रहा है. यह भय पश्चिम बंगाल के भद्रलोक का भी हो सकता है और उसके आम जन का भी.

Source: News18Hindi Last updated on: April 17, 2021, 11:49 AM IST
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Bengal Election 2021: पश्चिम बंगाल की हिंसा का भसान कैसे होगा
पश्चिम बंगाल ने इस देश को बहुत कुछ दिया है. देश को भी उसे बहुत कुछ देना चाहिए. (फोटो: PTI)
वैसे तो देश के पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव संपन्न हो रहे हैं लेकिन सर्वाधिक हिंसक वातावरण पश्चिम बंगाल में ही दिखाई पड़ रहा है. अगर ममता बनर्जी की उस बात को मान लिया जाए कि वाममोर्चा शासन के दौरान उन्हीं की पार्टी के नेता शुभेंदु अधिकारी और उनके परिवार के लोगों ने साजिश करके नंदीग्राम में हिंसा करवाई थी तो यह कहा जा सकता है कि हिंसा के जिस मार्ग से ममता बनर्जी सत्ता में आई थीं शायद उसी मार्ग से उनकी विदाई भी हो जाए. खैर चुनाव का परिणाम चाहे जो हो असली सवाल उन साधनों का है जिनके माध्यम से सत्ता हासिल की जाती है या की जा रही है.

आज पश्चिम बंगाल के युवा और वरिष्ठ जन वहां बढ़ रहे तनाव और हिंसा को लेकर चिंतित हैं. उन्हें एक बार फिर अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का बोध हो रहा है और उन्हें डर है कि उन्होंने लंबी अवधि में जो आधुनिकता और विविधता की धारणा और रहन सहन हासिल किया था वह नष्ट होने जा रहा है. यह भय पश्चिम बंगाल के भद्रलोक का भी हो सकता है और उसके आम जन का भी. कूच बिहार के सितालकुची इलाके में केंद्रीय बलों की फायरिंग में जो लोग मारे गए वे सामान्य लोग थे. उन्हें भी डर है कि हिंसा आगे बढ़ेगी. पश्चिम बंगाल में हिंसा का आरोप तो भाजपा 2016 से ही लगा रही है जबसे ममता बनर्जी दोबारा चुनकर आई हैं. इस बीच सांप्रदायिक दंगों के बहाने हिंसा हुई भी है और इलाका दखल की लड़ाई में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों के कार्यकर्ता मारे भी गए हैं.

हिंसा क्यों होती है इसके कारणों के बारे में नृतत्वशास्त्री गणेश देवी ने 'काउंटरिंग वायलेंस' में जिन कारणों को गिनाया है. वे हैं-जाति, इलाका, भाषा और धर्म. यह चारों कारण ऐसे हैं जिनके चलते मानव इतिहास नरसंहारों से भरा हुआ है.
लोग अपनी जाति की शुद्धता बनाए रखने के लिए दूसरी जाति का नाश करने लगते हैं, तो जमीन या इलाका हथियाने के लिए तरह तरह के बहाने तैयार करते हैं. वास्तव में टकराव और हिंसा इसीलिए होती है क्योंकि जमीन का संसाधन सीमित है और लोगों की संख्या ज्यादा है. उसी तरह भाषा जो कि अलग अलग भौगोलिक इलाकों में संवाद के लिए खोजी गई वह जब पहचान से जुड़ जाती है तो आपसी टकराव का कारण बनती है. लेकिन इन सबमें सर्वाधिक हिंसा जिस कारण हुई है वह है धर्म. एक समुदाय अपनी धार्मिक और ईश्वरीय अवधारणाओं और पूजा पद्धतियों को दूसरे पर थोपने के लिए हिंसा करता है. यह मानव इतिहास में नियमित होने वाली हिंसा है.

उम्मीद की जा रही थी कि आधुनिक राष्ट्र राज्य की स्थापना के साथ इन तमाम आधारों पर होने वाले टकराव टाले जा सकेंगे और हिंसा को रोका जा सकेगा. अधिनायकवादी शासन पद्धतियों ने इन्हें नागरिक अधिकारों का दमन करते हुए रोका है तो लोकतांत्रिक देशों में चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल इन्हीं तत्वों का इस्तेमाल कर रहे हैं. एक तरह से वे इनसे खेलते रहते हैं. यही कारण है कि भारतीय राजनीति के गंभीर अध्येता प्रोफेसर रजनी कोठारी चुनाव के खेल को सांप्रदायिकता के लिए जिम्मेदार मानते हैं. वे मानते हैं कि संस्थाओं के क्षरण के कारण सांप्रदायिकता का जहर बढ़ा है.
दिक्कत यही है कि राज्य नामक जिस संस्था का आविष्कार व्यक्तिगत और सामुदायिक हिंसा को रोकने के लिए किया गया था वह व्यक्तिगत हिंसा को ही एक हद तक रोकने में कामयाब हुआ है. जहां तक सामुदायिक हिंसा को रोकने का सवाल है तो उसे राज्य रोकने की बजाय एक पक्ष बनकर उभरता है. ज्यादातर सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में राज्य का चरित्र पक्षपाती ही रहता है. दरअसल आधुनिक विधि शास्त्र हिंसा के लिए व्यक्ति की जिम्मेदारी निर्धारित करता है. वह लूट और आगजनी जैसी घटनाओं में सामूहिक जवाबदेही मानता है लेकिन उसकी भी एक सीमा है. अगर किसी समाज के लाखों लोग कुछ सैकड़ा लोगों के विरुद्ध हिंसा पर आमादा हैं तो राज्य वहां पर लाचार हो जाता है. वह लाखों लोगों पर कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकता. बल्कि वे लाखों लोग राज्य पर कब्जा करके अपने मनमाने कानून बनाने लगते हैं.

राज्य के मौजूदा स्वरूप का वर्णन करते हुए जीएन देवी लिखते हैं, ‘अगर भारत को हिंसा की समस्या का जड़ से समाधान करना है तो उसे राज्य के उस स्वरूप पर विचार करना होगा जो उसने चुना है. राज्य के स्वरूप में वह बदलाव हिंसा के माध्यम से नहीं लाया जा सकता. उसके लिए शांतिपूर्ण तरीका अपनाना होगा. वह राज्य के चरित्र को मर्दाना नहीं जनाना चरित्र देने से आएगा. राज्य का मौजूदा चरित्र किसी शिल्प का नहीं बल्कि सठता का है. वह प्रेम की बजाय घृणा पैदा करता है. वह हिंदू और मुसलमान में विभाजन पैदा करता है, वह गरीब अमीर का विभाजन पैदा करता है, वह बड़ी जाति और छोटी जाति का विभाजन पैदा करता है और वह गांव और शहर का विभाजन पैदा करता है. वह लोगों में भक्तिभाव पैदा करने की बजाय सत्ता के प्रति एक खास किस्म की वफादारी पैदा करता है.’

यही कारण है कि प्रसिद्ध सर्वोदयी विचारक शंकर त्रयंबक धर्माधिकारी यानी दादा धर्माधिकारी कहते हैं कि राजनीतिक दल तो संगठित गिरोह हो गए हैं. उनका उद्देश्य न तो वोट को सार्थक बनाना है और न ही राज्य के चरित्र में मानवीय परिवर्तन लाना है. उनका मकसद राज्य पर कब्जा करके एक प्रकार की लूट मचानी है जिसे अपने लोगों में बांटा जा सके. उनके लिए वोट कोई राजनीति नहीं है वोट नागरिकत्व की पहचान है. वह नागरिकत्व की अभिज्ञा है. नागरिकत्व की यह अभिज्ञा स्वातंत्र्य की है न कि सत्ता की. तभी दादा कहते हैं कि सत्ता और स्वातंत्र्य में जानी दुश्मनी है. जिस प्रमाण में सत्ता चलेगी उसी परिमाण में स्वातंत्र्य का दम घुटेगा. महात्मा गांधी के लिए स्वराज का अर्थ ब्रिटिश सुरक्षा बलों की जगह पर भारतीय सुरक्षा बलों को मजबूत करना नहीं था, न ही विदेशी पूंजी की जगह पर देशी पूंजी का आधिपत्य कायम करना. हिंसा अगर किसी चीज को सर्वाधिक हानि पहुंचाती है तो वह व्यक्ति स्वातंत्र्य को. इसीलिए गांधी ने सदैव साधन की पवित्रता पर ही जोर दिया. उन्होंने श्रीमद भगवतगीता से भी यही सीखा था और अपने जीवन में उसका प्रयोग भी किया. उनका मानना था कि अगर आपके साधन पवित्र हैं तो कोई वजह नहीं है कि पवित्र साध्य की प्राप्ति न हो.पश्चिम बंगाल की हिंसा की बड़ी वजह यह भी है कि उसने स्वाधीनता संग्राम में भी अहिंसा को साधन के रूप में सबसे कम महत्व दिया. भारत के विभाजन के समय हुए दंगों पर छोड़े गए प्रभाव के अलावा गांधी बंगाल पर सबसे कम प्रभाव डाल पाए थे. आजादी के अमृत महोत्सव की तैयारी में लगे देश को उन मूल्यों पर फिर से चर्चा करनी चाहिए जिन्होंने आजादी के आंदोलन को संचालित किया. गांधी दक्षिण अफ्रीका से ही यह संकल्प लेकर आए थे कि सत्याग्रह के माध्यम से पराए देश में सफलता हासिल की जा सकती है तो अपने देश में क्यों नहीं. जबकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे कांग्रेस के नेताओं का मानना था कि अहिंसक तरीके से एक हद तक ही अंग्रेजों पर दबाव बनाया जा सकता है उन्हें हटाने के लिए हिंसा का रास्ता अपनाना ही होगा. क्रांतिकारियों का तो मानना ही था कि हिंसा से ही औपनिवेशिक दासता से मुक्ति मिलेगी.

विभाजन की भयानक हिंसा से निकले पश्चिम बंगाल में अगर 1974 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने केंद्रीय बलों के दमन और हिंसा के बूते पर जीता तो 1977 में सत्ता में आने के साथ वाममोर्चा ने भी नक्सलियों का जिस क्रूरता पूर्वक दमन किया वह भी राज्य की हिंसा का एक नमूना है.
ममता बनर्जी ने अगर वाममोर्चा को सत्ता से हटाने के लिए किसानों की और माओवादी हिंसा का सहारा लिया और बाद में उन्हें भी हिंसा से ही कुचल दिया तो आज उन्हें हटाने के लिए भाजपा भी उसी रास्ते पर चल रही है.

पोरिवर्तन और क्रांति के रोमांटिक खयालों में रहने वाला पश्चिम बंगाल का भद्रलोक स्वयं भले ही शांतिपूर्वक बहस करते करते बिना हाथ उठाए चार दिन बिता दे लेकिन वह हिंसा को देखकर उत्साहित होता है. हालांकि वह यह भूल जाता है कि हिंसा की उत्पत्ति संवाद टूटने से ही होती है. समाज के विभिन्न तबकों के बीच और विशेष तौर पर राजनीतिक दलों के बीच संवाद की मध्यस्थता तो उचित है लेकिन हिंसा की मध्यस्थता घातक है. वह हिंसा इस चुनाव में, संवाद में और एक्शन में भी दिख रही है. कोई जरूरी नहीं कि चुनाव परिणाम स्पष्ट हों. ऐसे में राजनीतिक अनिश्चितता फिर हिंसा की ओर ही ले जाएगी. अगर परिणाम स्पष्ट भी हुए तो हर हाल में जीतने की जो राजनीतिक इच्छा है वह अनुचित साधनों के प्रयोग को प्रोत्साहित करती रहेगी.

पश्चिम बंगाल ने इस देश को बहुत कुछ दिया है. देश को भी उसे बहुत कुछ देना चाहिए. लेकिन बंगाल को जो भी मिले उसकी कीमत कटुता और रक्तपात नहीं होनी चाहिए. इसलिए गाजे बाजे के साथ हो रहे देश के इस सबसे लंबे विधानसभा चुनाव के भसान (विसर्जन) के साथ ही हिंसा के प्रतीकों और उपायों का विसर्जन भी बहुत जरूरी है. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

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First published: April 17, 2021, 7:11 AM IST
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