रामराज्य: क्योंकि रावण राम का शत्रु नहीं, वैरी था...

उपन्यास में वर्णित राम और कैकेयी संवाद में लेखक ने रामराज और रामराज्य के अंतर को बहुत ही रोचक और प्रेरक शैली में समझाया है. उसकी बातें उस समय के राजतंत्र ही नहीं आज के लोकतंत्र पर भी लागू होती दिखती हैं. बल्कि राम की व्याख्या से उनका राजतंत्र भी लोकतंत्र जैसा लगता है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 25, 2020, 4:30 PM IST
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रामराज्य: क्योंकि रावण राम का शत्रु नहीं, वैरी था...
विभीषण जब राम से कहते हैं कि रावण की नाभि में अमृत कुंड है तब रावण क्या है इसकी बहुत सुंदर व्याख्या करते हुए राम विभीषण से करते हैं (pic credit: instagram/officialrajputanaking)
राम ने एक मनोहारी मुस्कान से विभीषण की ओर देखते हुए कहा, "मित्र विभीषण, रावण मेरा शत्रु नहीं मेरा वैरी है." विभीषण पुनः अचम्भित से राम को देखते हुए बोल पड़े, "ये दोनों तो एक ही होते हैं राम."
"नहीं महराज विभीषण, जो अंतर अर्पण और समर्पण में होता है वही अंतर शत्रु और वैरी में होता है. शत्रु अपने संपूर्ण भावों में से कुछ बचाकर अपने पास रख लेता है किंतु वैरी अपने हृदय में संचित भावों को पूरा का पूरा अपने प्रतिपक्षी को समर्पित कर देता है. अर्पण में प्राप्ति की इच्छा होती है और समर्पण में समाप्ति का भाव, इसलिए समर्पण के भाव से भरे हुए मनुष्य का जीवन मृत्यु को नहीं, अंत को प्राप्त होते हुए अनंत में विलीन हो जाता है."

राम के मुख से रावण के मनोभावों और उससे अपने संबंधों की ऐसी अद्भुत व्याख्या की है अक्सर खलनायक की भूमिका निभाने वाले सिने जगत के जाने माने अभिनेता आशुतोष राना ने अपने उपन्यास 'रामराज्य' में. ग्यारह सर्गों का यह उपन्यास इस मामले विचित्र तो है ही कि यह रामकथा के खलनायकों के कार्यों के पीछे कोई श्रेष्ठ उद्देश्य सिद्ध करता है लेकिन उससे भी खास बात यह है कि सुंदर सरस और बोधमय भाषा से गुंथा हुआ यह उपन्यास रामराज्य की एकदम अलग ही व्याख्या करता है.

राम ने विभीषण को बताया अमृत का अर्थ
विभीषण जब राम से कहते हैं कि रावण की नाभि में अमृत कुंड है तब रावण क्या है इसकी बहुत सुंदर व्याख्या करते हुए राम विभीषण से करते हैं. वे कहते हैं , "अमृत का अर्थ होता है जिसे धारण करने से हम मरें नहीं. जिन कामनाओं, वासनाओं को हम अपनी मृत्यु का कारण मानते हैं वे ही हमें जीवित रखती हैं. जब तक लेशमात्र भी इनका अस्तित्व हमारे अंदर वर्तमान रहता है तब तक हम जीवित रहते हैं. हमारी कामनाएं, वासनाएं, इच्छाएं, हमारा पुरुषार्थ, हमारा ध्येय ही है जो हमें मरने नहीं देता. जिसे आप अमृतकुंड कह रहे हैं वे रावण की वही अतृप्त इच्छाएं, वासनाएं हैं जो तृप्त होना चाहती हैं. .......विगत नौ दिनों से यह वनवासी राम वे सारे उद्यम कर रहा है जिससे रावण अपने अंदर वर्तमान ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिहिंसा, काम क्रोध, मद, लोभ, मोह, माया, मत्सर रूपी सभी वासनाओं से मुक्त हो सके. "

रावण की ऐसी व्याख्या से अभिभूत होते हुए विभीषण कहते हैं कि राम जिस रावण को वह भाई होकर भी नहीं समझ सके उसे उन्होंने शत्रु होकर समझ लिया. शायद युद्ध कौशल और प्रतिस्पर्धा का यही नियम भी है कि आप अपने साथियों की क्षमता को तो पहचानें ही लेकिन उससे ज्यादा अपने प्रतिपक्षी की क्षमता, कौशल और उसके मनोभावों का अध्ययन करें.


उधर, इस बात को रावण भी समझ गया था इसीलिए रुद्राभिषेक संपन्न होने के बाद मंदोदरी से रावण कहता है, "राम मात्र एक चतुर नायक ही नहीं हैं वे परम चैतन्य को उपलब्ध चेतना हैं. उन्होंने इन नौ दिनों में मेरी समस्त दमित कामनाओं, इच्छाओं ऐष्णाओं का मुझसे साक्षात्कार करवाया; मुझसे ही उसका शमन करवाया; मुझे संतुष्ट करते हुए शांत किया व मुझे अर्पण से समर्पण की भावदशा में प्रतिष्ठित करके शिव के प्रति मेरे द्वैत भाव को समाप्त करके अद्वैत में रूपांतरित करते हुए मुझे शिवमय कर दिया."शास्त्रों का संबंध ज्ञान से
शक्ति के स्रोत को पहचानते हुए रावण मंदोदरी से कहता है, "राम ने अत्यंत कुशलता से मुझे बता दिया कि देह की शक्ति भोजन से नहीं, भजन से मिलती है, तभी तो कंद मूल फल खाने वाले राम और उसकी सेना ने संसार के श्रेष्ठतम मांस का भक्षण करने वाली रावण की अत्यंत शक्तिशाली सेना का नाश कर दिया. राम ने मुझे सिखा दिया की शास्त्रों का संबंध सूचनाओं से होता है ज्ञान से नहीं होता. ज्ञान, ग्रंथों को पढ़कर नहीं अपने मन की ग्रंथियों से जुड़कर ही प्राप्त किया जा सकता है. तभी तो संसार के सभी शास्त्रों को कंठस्थ करने वाले प्रकांड पंडित रावण को अपने अहंकार का ज्ञान ही नहीं हो पाया."

जब रावण कहता है कि महादेव वे रावण जैसे हठी शिष्य को राम जैसे व्रती से जोड़ दिया और यह उसके जीवन की श्रेष्ठ उपलब्धि है, तब मंदोदरी प्रश्न करती है कि सारी दुनिया देख रही है कि आप राम के घनघोर वैरी हैं, उनसे युद्ध कर रहे हैं तो आप अपने को उनसे जुड़ा हुआ कैसे कह सकते हैं ? इस प्रश्न का जवाब देते हुए रावण कहता है, "देवी कुछ लोग जुड़कर लड़ते हैं तो कुछ लोग लड़कर जुड़ते हैं. किसी से जुड़कर लड़ना विनाश का कारक होता है किंतु किसी से लड़कर जुड़ना विसर्जन के सृजन का कारण है. रावण को परास्त करके ही तो राम नर से नारायण की प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे."


कैकेयी, सुपर्णा-शूर्पणखा, पंचवटी, लंका, पंचवटी, लंका, हनुमान, विजयपर्व-कुंभकर्ण, विजयपर्व-विभीषण, विजयपर्व-रावण, सीता परित्याग जैसे ग्यारह सर्गों में विभाजित इस उपन्यास में घटनाओं से ज्यादा उनके पीछे के कारणों की व्याख्या है. वह व्याख्या अपने में कुछ नवीनता लिए हुए है. जैसे कैकेयी महज मंथरा के कहने पर राम को वनवास और भरत को अयोध्या का राज देने का वर नहीं मांगती , बल्कि ऐसी स्वयं राम की इच्छा थी कि वे अपने सिर यह महाकलंक लेकर राम को जगत का कल्याण करने का अवसर प्रदान करें. इसी तरह सुपर्णा काम मोहित होकर ही नहीं बल्कि रावण के पिता विश्रवा ऋषि की इस इच्छा का सम्मान करते हुए राम से वैर लेती है कि उसे रावण का नाश करवाना है. वह राम और रावण के बीच वैर पैदा करके जगत का कल्याण करना चाहती है और अपने पति विद्युजिह्वा की हत्या का रावण से प्रतिकार भी लेना चाहती है.

रामराज्य और रामराज में अंतर
एक प्रकार से उपन्यासकार आशुतोष राना नायक और खलनायक के बीच के भेद को मिटाते हुए लीला का भाव सृजित करते हैं. उससे भी आगे बढ़कर वे रामराज्य और रामराज का अंतर स्पष्ट करते हैं और रामराज्य की एकदम नवीन व्याख्या करते हैं जो आज के संदर्भ में ज्यादा चर्चा करने लायक है. आज जबकि देवता और दैत्य का विभाजन तीव्र हो गया है तब रचनाकार अपने इस उपन्यास के भीतर वह आख्यान लेकर उपस्थित होता है जिससे वह द्वैत भाव मिटता है.

लेखक कहता है कि हम श्रीराम को तो मानते हैं लेकिन उनकी नहीं मानते. हमने उनके चरणों को तो पकड़ा हुआ है लेकिन उनके आचरणों को ग्रहण करने में हमसे चूक हो जाती है. इसलिए अगर रामराज्य सही अर्थों में स्थापित करना है तो उनके आचरण को अपनाना होगा. राम का आचरण क्या है इसे स्पष्ट करते हुए लेखक कहता है, "मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का विश्वास साधनों में नहीं साधना में है. वे साधन संपन्न होने की चाह से नहीं साधना संपन्न होने की चाह से भरे हैं. वे शासन के नहीं अनुशासन के पक्षधर हैं. वे संसार को जीतने और नियंत्रित करने में नहीं स्वयं को जीतने और नियंत्रित रखने में विश्वास करते हैं."


इस उपन्यास में वर्णित राम और कैकेयी संवाद में लेखक ने रामराज और रामराज्य के अंतर को बहुत ही रोचक और प्रेरक शैली में समझाया है. उसकी बातें उस समय के राजतंत्र ही नहीं आज के लोकतंत्र पर भी लागू होती दिखती हैं. बल्कि राम की व्याख्या से उनका राजतंत्र भी लोकतंत्र जैसा लगता है. कैकेयी को अपने वनवास का प्रस्ताव रखने और महाराज दशरथ से दो वर मांगने को सहमत करने के लिए राम उनसे ज्ञानवर्धक संवाद करते हुए कहते हैं, "किसी का राज होने और किसी का राज्य होने में अंतर होता है मां. राजा की उपस्थिति में सब ठीक रहना राजा की राज करने की कुशलता का प्रमाण है. किंतु उसकी अनुपस्थिति में भी उसकी प्रजा सबल, सुरक्षित, सृजनशील, संपन्न और सकारात्मक हो, यह उसकी राज्य की सफलता का प्रमाण होता है. राज में राजा का महत्व होता है , किंतु राज्य में प्रजा महत्वपूर्ण हो जाती है. राज की धारणा निर्भरता की पोषक है तो राज्य की अवधारणा आत्मनिर्भरता को पल्लिवत करती है."
इसके बाद फिर राम कैकेयी से अपने वनगमन का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहते हैं, "मैं रामराज को नहीं रामराज्य को स्थापित करना चाहता हूं. जहां व्यक्ति से अधिक महत्व विचार का, व्यवस्था का हो. जहां प्रजा के रक्षण और पोषण का कार्य कोई व्यक्ति नहीं अपितु विचार करते हों. प्रजा व्यक्ति पूजक नहीं विचारपूजक हो. वह हुतात्माओं के चरणों को नहीं उनके आचरणों को धारण करे."

जब कैकेयी उनसे कहती हैं कि वे यह कार्य तो अयोध्या जैसे नगर या राजधानी में भी रह कर सकते हैं तो राम कहते हैं कि संस्कृति को पुष्पित पल्लवित करना चाहते हैं और संस्कृति रूपी जड़ जो संपूर्ण मानवता का आधार है वह नगरों में नहीं ग्रामों में बसती है." राम भौतिकवाद और अध्यात्म के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहते हैं संसार में दो संस्कृतियां हैं. एक तो संपत्ति को ही संस्कृति मानती है और दूसरी संस्कृति को ही संपत्ति मानती है.

निश्चित तौर पर बिना घटनाओं के कोई कथा या उपन्यास आगे नहीं बढ़ता इसलिए हर सर्ग में भरा हुआ संदेश रोचक कथा में गुंथा हुआ है. लेकिन उन सर्गों में कथा की डोरी नहीं विचारों के पुष्प ही भारी पड़ते हैं. कभी कभी तो लगता है कि विचारों के पुष्प से कथा की डोरी टूट जाएगी. इसी तरह की एक कथा राम और रावण के सामने आने पर होती है. हनुमान की तरफ कनखियों से देखते हुए रावण बोला,"राम, मैं तो शिव का भक्त ही नहीं उनका दास भी हूं. मुझे मात्र महादेव ही प्रिय हैं, किंतु मैं तो देख रहा हूं कि मेरे आराध्य महादेव तो तुम्हारे भक्त हैं और तुम उन्हें अत्यंत प्रिय हो. मेरे निदान के लिए उन्होंने तुम्हारा चयन किया है."
श्रीराम ने कहा, "महात्मन यह सब कुछ आप राम से मित्रता करके भी प्राप्त कर सकते थे. फिर मेरे प्रति आपके शत्रु भाव का कारण क्या है? " यह सुनकर रावण मुस्कुराते हुए बोला, "राम तुम्हारी मित्रता मुझे ज्ञान से भर देती, किंतु रावण को ज्ञान नहीं ज्ञान से मुक्ति चाहिए."

कुल मिलाकर 320 पृष्ठों का यह उपन्यास बेहद रोचक और विचार व कल्पना से परिपूर्ण है. यह के रामराज्य के नारे को नया संदर्भ देता है और रामकथा की नवीन और मनभावन व्याख्या से हृदय को निर्मल कर देता है. आशुतोष राना इस उपन्यास की प्रेरणा के पीछे अपने गुरुदेव गृहस्थ संत परमपूज्य पंडित देवप्रभाकर जी शास्त्री उर्फ दद्दाजी को श्रेय देते हैं. बड़े संत प्रेय को श्रेय में बदलने की क्षमता रखते हैं और सचमुच इस कथा के पीछे आशुतोष ने वही प्रेरणा पाई है. कौटिल्य बुक्स ने उसे प्रकाशित करके हिंदी और रामकथा के अनुरागी पाठकों का बड़ा उपकार किया है.
(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.) 
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

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First published: October 25, 2020, 4:29 PM IST
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