भाजपा के सुर में सुर मिलाती कांग्रेस और विपक्ष को तलाशता लोकतंत्र

अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास पर उम्मीद के मुताबिक मुस्लिम संगठनों ने अपने ढंग से चेतावनी दी, जिससे कांग्रेस समेत मध्यमार्गी विपक्षी दल बचते नजर आए हैं. अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड का बयान तो आक्रामक और विवाद को बढ़ाने वाला भी है. 

Source: News18Hindi Last updated on: August 6, 2020, 5:58 PM IST
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भाजपा के सुर में सुर मिलाती कांग्रेस और विपक्ष को तलाशता लोकतंत्र
देश में अभी विपक्ष की अगुवाई राहुल और सोनिया गांधी के कंधे पर रहती आई है.
पांच अगस्त को अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत और राजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास के नेतृत्व में राम मंदिर के लिए हुए भूमि पूजन के बाद भगवान राम के आदर्शों के अनुरूप नए भारत के निर्माण का जो लक्ष्य रखा गया उस पर विपक्षी दलों की सतर्क और सावधानी भरी प्रतिक्रियाएं भारत में किसी उदार और धर्मनिरपेक्ष वैकल्पिक राजनीति के उभरने की उम्मीद नहीं जगातीं. उनकी टिप्पणियां भाजपा के ही सुर में सुर मिलाने वाली हैं. बल्कि प्रधानमंत्री और सरसंघलाचक के भाषणों से ही लगता है कि अगर किसी भी तरह की उदारता की आशा करनी है तो उसके लिए भी उन्हीं की शरण में जाना व्यावहारिक है. उदारता और कट्टरता दोनों के लड्डू संघ परिवार के ही हाथ में है और वे समय और सुविधा के अनुसार उसका प्रसाद देते रहेंगे. इससे यह उम्मीद बढ़ सकती है कि अगर भाजपा के भीतर कोई अन्य नेतृत्व या गुट उभरे तो वह कभी-कभी थोड़ी असहमति के विचार प्रकट कर सकता है क्योंकि एनडीए के भीतर तो वह संभावना समाप्त हो गई है.

अपने को स्थायी वैचारिक विपक्ष मानने वाले वामपंथी दलों के इस बयान को छोड़ दिया जाए कि भूमि पूजन ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस को कानूनी वैधता प्रदान की और एक धर्म को सरकारी दर्जा दे दिया तो कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस या दूसरे दलों के बयान एक प्रकार से उस पूरे घटनाक्रम में संवैधानिक मूल्यों के अवमूल्यन को फिलहाल स्वीकार करने वाले ही हैं या फिर नरम हिंदुत्व की दुशाला ओढ़कर अपनी पार्टी की रक्षा करने के प्रयास हैं. उम्मीद के मुताबिक मुस्लिम संगठनों ने अपने ढंग से चेतावनी दी है, जिससे मध्यमार्गी विपक्षी दल बचते नजर आए हैं. इनमें अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड का बयान तो आक्रामक और विवाद को बढ़ाने वाला भी है. जबकि इंडियन यूनियन ऑफ मुस्लिम लीग ने प्रियंका गांधी के एकता और भाईचारा बढ़ाने की आशा करने वाले बयान से असहमति जताई है और एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने इसे हिंदू राष्ट्र की आधारशिला बताकर कड़ी चेतावनी दी है.

अगर सभी धर्मों से समान दूरी बरतने का संकल्प रखने वाले भारतीय गणराज्य के प्रधानमंत्री के एक धार्मिक आयोजन में प्रमुखता से भाग लेने पर आपको आपत्ति नहीं है तो उनके भाषण की भाषा और भाव निश्चित तौर पर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाला था. इस समय देश में विपक्ष का कोई नेता वैसा बोलने की क्षमता नहीं रखता है और अगर कुछ लोग वैसा बोल सकते हैं तो देश उन्हें सुनने को तैयार नहीं है. धर्म और राजनीति का जो घालमेल कांग्रेस पार्टी धीरे-धीरे कर रही थी, उसे संघ परिवार ने तेजी से और पूरी ढिठाई के साथ करते हुए न सिर्फ खिचड़ी की तरह पका दिया है, बल्कि फेंट और घोंट भी दिया है. सवाल यह है कि क्या विपक्ष इस मिलावट को अलग-अलग कर पाएगा या फिर अपनी तरह की कोई खिचड़ी बनाएगा और दावा करेगा कि यह देश के सामाजिक और राजनीतिक स्वास्थ्य के लिए ज्यादा उपयोगी है. हालांकि उस तरह के अन्न जल इस देश की मिट्टी में हैं लेकिन विपक्ष यह काम तभी कर सकता है जब जनता संघ परिवार के इस घालमेल के स्वाद से ऊबे, अपनी सेहत और जरूरत के लिहाज से किसी और व्यंजन की मांग करे और विपक्ष उसे समझाने में कामयाब हो सके.

निश्चित तौर पर विपक्ष की राजनीति सत्ता की राजनीति से ज्यादा कल्पनाशीलता, रचनात्मकता और संघर्ष की मांग करती है. कांग्रेस को अगर विपक्ष की राजनीति सीखनी है तो स्वतंत्रता से पहले का आदर्श तो उसके समक्ष है ही लेकिन आजाद भारत में डॉ. राम मनोहर लोहिया और फिर जयप्रकाश नारायण उसके सबसे सशक्त प्रतिमान हैं. डॉ. लोहिया ने न सिर्फ रचनात्मक मुहावरे और नारे दिए, बल्कि हजारों युवाओं में ऐसे साहस का संचार किया कि वे उनके आह्वान पर अभय होकर सड़क पर उतर आते थे. अगर महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन के मौके पर पूरे भारत को अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध अभय होने का संदेश दिया तो लोहिया ने आजाद भारत में नेहरू सरकार और कांग्रेसी सत्ता के विरुद्ध निर्भय होने का मंत्र दिया. `जेल, फावड़ा, वोट’ या `दाम बांधो काम दो’ या `समाजवादियों ने बांधी गांठ- पिछड़ा पावै सौ में साठ’ जैसे नारे ऐसे हैं जो आज तक गूंजते हैं. बाद में अपनी सरलता और साख से उसी राजनीति को जयप्रकाश नारायण ने अंजाम दिया और इंदिरा गांधी की ताकतवर सत्ता को उखाड़ फेंका. विपक्ष की राजनीति का दूसरा उदाहरण राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व उसके राजनीतिक संगठन जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी ने प्रस्तुत किया. उसने हिंदुत्व के अपने मूल विचार को बचाए रखते हुए विपक्ष की किसी भी राजनीति में शामिल होने और उसका फायदा उठाने का अवसर हाथ से जाने नहीं दिया. हालांकि, जनसंघ शुरू से ही मुक्त व्यापार के सिद्धांत पर चलने वाला दल था लेकिन उसने मौके की नजाकत देखते हुए इंदिरा गांधी के जमींदारी उन्मूलन और प्रिवी पर्स छीने जाने और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किए जाने जैसे वामपंथी नीति का विरोध करने की बजाय ऐसा करने वाले बलराज मधोक को ही त्याग दिया. बाद में अयोध्या आंदोलन के माध्यम से उसने मंडल आयोग का विरोध करते हुए भी उसे अपना लिया और राष्ट्रवाद का वह आख्यान रच दिया जिसे आजादी के बाद जनता ने ठुकरा दिया था. विपक्ष की राजनीति का कम्युनिस्टों का अपना तरीका था और वह पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में इसलिए कामयाब हो सकी क्योंकि उन्होंने जमीन के शोषणकारी संबंधों को बदलने के लक्ष्य को दृढ़ता से थामा. लेकिन भारतीय समाज की जातीय संरचना को वर्गीय आधार पर देखते रहने के कारण उसे उत्तर भारत के हिंदी क्षेत्र या मध्य भारत में कामयाबी नहीं मिली. इसी तरह द्रमुक सामाजिक विपक्ष के रूप में खड़ा होकर एक परिवर्तनकारी राजनीति का वाहक बना और उसे अपने ढंग से कामयाबी मिली.
सवाल उठता है कि क्या अपने को हमेशा सत्तारूढ़ पार्टी मानने वाली कांग्रेस जो अब विपक्ष के स्थान से भी बेदखल हो चुकी है, अतीत की विपक्षी राजनीति से सबक लेना चाहेगी? क्या उसके नेता उसी तरह सभी क्षेत्रीय और दूसरे छोटे दलों से तालमेल का प्रयास करेंगे, जिस तरह से कभी जनसंघ और भाजपा ने किया. भाजपा के रामराज्य के सशक्त आख्यान और नरेंद्र मोदी जैसे ओजस्वी वक्ता और संघ परिवार जैसे ताकतवर संगठन के बरअक्स क्या भारत के गैर भाजपाई दल किसी आकर्षक विपक्षी आख्यान, नेता और विपक्षी एकता का निर्माण कर सकते हैं?  और अगर कर सकते हैं तो कैसे?

सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर विपक्ष के पास दो प्रमुख मुद्दे हैं और वे उसकी मृत देह में प्राण फूंक सकते हैं. पहला मुद्दा है लोकतंत्र की हिफाजत और दूसरा मुद्दा है आर्थिक और सामाजिक समता. इसी के साथ देश के भाईचारे की रक्षा भी उनकी तीसरी लेकिन गंभीर जिम्मेदारी है. भारत के ज्यादातर दलों ने कश्मीर में लोकतांत्रिक अधिकारों के मुल्तवी किए जाने से पल्ला झाड़ कर बहुत बड़ी गलती की है. अगर सत्तारूढ़ दल और उसकी सहायक शक्तियां यह आख्यान खड़ा कर रही हैं कि राष्ट्रवाद और लोकतंत्र एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं तो उन्हें यह साबित करना होगा कि वे एक दूसरे के पूरक हैं. भारत का राष्ट्रीय आंदोलन लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना को लक्ष्य करके ही चलाया गया. डॉ. भीमराव आंबेडकर जो आंदोलन से ज्यादा कानून निर्माण में यकीन करते थे उनका भी लक्ष्य लोकतंत्र ही था. यही वजह थी कि आरंभ में उन्हें देशद्रोही कहने वालों ने उन्हें राष्ट्रवादी और देशभक्त कहना शुरू किया. लोकतंत्र का मामला अपनी पार्टी और उसके नेता और कार्यकर्ता तक सीमित नहीं होता. उसका दायरा सामान्य जन के नागरिक अधिकारों की रक्षा तक जाता है. राजनीतिक दलों का यह फर्ज बनता है कि वह काम संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से हो तो उससे करें और अगर उससे न हो सके तो आंदोलन के माध्यम से करें. उनका यह काम विभिन्न राजनीतिक दलों को एकजुट करेगा और जनता के भीतर अभय के साथ एक विश्वास बहाल करेगा.

विपक्षी दल दूसरा बड़ा काम सामाजिक और आर्थिक असमानता के विरुद्ध अभियान चलाकर कर सकते हैं. गांधी और आंबेडकर के विवाद के दौरान गांधी ने एक बात कही थी जिस पर ध्यान देने लायक है. उन्होंने कहा था कि आरक्षण पर ही भरोसा करके बैठे रहने से समाज सुधार का काम रुक जाएगा और सामाजिक समता नहीं आएगी. आज लगता है कि उनकी इस चेतावनी में दम था. अगर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को देखें तो वह अपनी अनुदारता के भीतर भी कहीं न कहीं सामाजिक हस्तक्षेप करता रहा है. उसी का परिणाम है नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाना और रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाना. विपक्ष के पास मौका है कि वह सामाजिक हस्तक्षेप से जातिवाद फैलाने की बजाय सामाजिक समता लाने की पहल करे. इसे ही डॉ. आंबेडकर ने जाति व्यवस्था का समूल नाश कहा था.तीसरा, लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण काम है आर्थिक विषमता और बेरोजगारी के विरुद्ध अभियान. कई उत्साही युवा सोचते हैं कि सिर्फ इसी मुद्दे पर क्यों नहीं विपक्ष का उत्थान हो सकता. वास्तव में भारत में सिर्फ आर्थिक मुद्दे पर आंदोलन नहीं खड़ा होता. उसके साथ जाति, संप्रदाय या स्थानीयता के स्वाभिमान का कोई मुद्दा जुड़ा होना चाहिए. कोरोना महामारी के दौरान राममंदिर के भूमिपूजन के बाद दीए जलाने, बल्ब की लड़ियां और गुब्बारे लगाने वाले जरूर दिखे लेकिन ऐसा नहीं कि देश के गांव-गांव और हर झुग्गी झोपड़ी में दीवाली मन गई. दीवाली मनाने वाले चहारदीवारी वाले अपार्टमेंट के निवासी या कोठियों वाले थे. यह सब इस बात का संकेत है कि युवा मन कितना उदास है. जिन युवाओं की नौकरियां बची हैं, वे वर्क फ्राम होम में वे 18 -18 घंटे काम कर रहे हैं. उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया है. वे चिड़चिड़े हो गए हैं. अगर विपक्ष इन युवाओं के पास जाएगा तो कोई वजह नहीं कि वे उनकी बात नहीं सुनेंगे.

चौथा मोर्चा है भाईचारे का. विपक्षी दलों को यह सिद्ध करना होगा कि राष्ट्रीय एकता की रक्षा भाईचारे से ही हो सकती है. भाईचारे की बलि चढ़ाकर कोई देश नहीं चलता. विशेषकर भारत जैसे विविधता वाले देश में आपसी वैर के इतने मुद्दे हैं कि उन्हें हिंदू मुस्लिम टकराव बढ़ाकर और हिंदू एकता का अभियान चलाकर खत्म नहीं किया जा सकता है. हिंदू एकता न तो जातिवाद मिटने की गारंटी हो सकती है और न ही हिंदू मुस्लिम सौहार्द की गारंटी. अगर हिंदू मुस्लिम सौहार्द घटता है तो इस बात की क्या गारंटी है कि वह सिखों या दूसरे धर्मों के साथ नहीं घटेगा. यहां 1931 में कानपुर दंगों की रपट के बाद आई भगवान दास कमेटी की रपट के सुझावों से काफी कुछ मदद मिल सकती है. विपक्षी दलों का दायित्व है कि वे बिना इस बात से डरे कि अल्पसंख्यकों के पास जाने से उनके हिंदू वोट कट जाएंगे, साझी विरासत को जिंदा रखने और भाईचारे को बढ़ाने का प्रयास करते रहें.

अंत में व्यावहारिक रूप से अस्सी और नब्बे के दशक में संघवाद की रक्षा के लिए उभरी गठबंधन की राजनीति से कांग्रेस और दूसरे गैर भाजपाई दल काफी कुछ प्रेरणा ले सकते हैं. बस उन्हें अस्सी के दशक में कांग्रेस की जगह पर भाजपा को रखना होगा. इसी के साथ कांग्रेस को भी ऐसी राजनीति करनी होगी जिससे छोटे दलों में उसके प्रति आशंका की बजाय विश्वास कायम हो. यह कहना कि अयोध्या में मंदिर बन जाने से विपक्ष के पास मुद्दों की कमी हो गई है, एक गलत निष्कर्ष है. उल्टे भाजपा के हाथों से एक मुद्दा चला गया है, जबकि विपक्ष के पास मुद्दों की भरमार है. जरूरत है उसके लिए नया आख्यान रचने की और उस पर पहल करने की. अब विपक्ष चाहे तो रामराज्य की लोकतांत्रिक और धर्मनिरेपेक्ष व्याख्या को बढ़ा सकता है और रामराज्य के नाम पर बढ़ते अधिनायकवाद को लोकतांत्रिक बना सकता है. वह कोशिश करे तो तुलसीदास से ही प्रेरणा लेकर `बोले राम सकोप तब, भय बिनु होई न प्रीति’ के सिद्धांत की जगह `परहित सरिस धरम नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई’ के दर्शन को आचरण में ला सकता है. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

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First published: August 6, 2020, 5:58 PM IST
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