तो इसलिए डॉ. आंबेडकर ने अपनाया था बौद्ध धर्म

डॉ. आंबेडकर ने 12 मई 1956 को कहा था कि जब मैं बौद्ध धर्म को अपनाने की बात करता हूं तो मुझसे दो सवाल पूछे जाते हैं कि मैं बौद्ध धर्म को क्यों पसंद करता हूं? दूसरा सवाल यह है कि मौजूदा विश्व में यह धर्म किस तरह से प्रासंगिक है?

Source: News18Hindi Last updated on: October 14, 2020, 2:40 PM IST
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तो इसलिए डॉ. आंबेडकर ने अपनाया था बौद्ध धर्म
बाबा साहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने सन 1956 में 14 अक्तूबर को हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपनाया था.
बाबा साहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने सन 1956 में 14 अक्तूबर को हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया था. इसकी एक वजह तो यही बताई जाती है कि उन्होंने हिंदू धर्म के वर्णाश्रम धर्म और जाति व्यवस्था के अन्याय और असमानता से तंग आकर बौद्ध धर्म स्वीकार किया था. इससे पहले उन्होंने हिंदू धर्म में सुधार के तमाम प्रयास किए और अंत में उन्हें लगा कि इस धर्म में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हो सकता. कम से कम वह काम तो नहीं हो सकता जिसकी कल्पना उन्होंने की थी. उनकी नई कल्पना उनके 1936 के उस लेख में जाहिर है जिसे 'एनीहिलेशन आफ कास्ट' या 'जातिभेद का समूल नाश' कहा गया है. इस बात को उन्होंने 13 अक्तूबर 1935 को येओला में कहा था, 'मैं हिंदू के रूप में पैदा हुआ हूं लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं, कम से कम यह तो मेरे वश में है.'

सिर्फ यही कारण नहीं है जिसके चलते आंबेडकर ने यह फैसला लिया, क्योंकि इसे पलायनवाद, अलगाववाद और नकारात्मकता कहा जा सकता है. उनके हिंदू धर्म छोड़ने के पीछे सकारात्मक कारण हैं और वह पूरी मानवता के संदर्भ में है. उनका दूसरा कारण साम्यवाद के विकल्प के तौर पर भी बुद्ध धर्म को प्रस्तुत करना था. उन्होंने देखा था कि उन दिनों साम्यवाद की चुनौती के कारण धर्म के अस्तित्व पर ही संकट है. जबकि मनुष्य का काम धर्म के बिना चल नहीं सकता. इसलिए उसे एक ऐसा धर्म चाहिए जो तर्क और नैतिकता पर आधारित हो और ऐसा धर्म सिर्फ बुद्ध धर्म ही है. हालांकि भारत में बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान का समय अट्ठारहवीं सदी के मध्य से शुरू होता है और वह भी यूरोपीय विद्वानों के द्वारा. वरना उससे पहले बोध गया जैसे अहम तीर्थस्थल की बड़ी उपेक्षा थी.

डॉ. आंबेडकर ने 12 मई 1956 को कहा था कि जब मैं बौद्ध धर्म को अपनाने की बात करता हूं तो मुझसे दो सवाल पूछे जाते हैं कि मैं बौद्ध धर्म को क्यों पसंद करता हूं? दूसरा सवाल यह है कि मौजूदा विश्व में यह धर्म किस तरह से प्रासंगिक है?


इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा था कि मैं बौद्ध धर्म को इसलिए चुन रहा हूं क्योंकि यह तीन सिद्धातों को एक साथ प्रस्तुत करता है जिसे कोई और धर्म नहीं प्रदान करता. बौद्ध धर्म प्रज्ञा प्रदान करता है, करुणा प्रदान करता है और समता का संदेश देता है. प्रज्ञा का अर्थ है अंधविश्वास और परालौकिक शक्तियों के विरुद्ध समझदारी. करुणा का अर्थ है प्रेम और पीड़ित के लिए संवेदना. समता जाति, धर्म, नस्ल और लिंग के आधार पर बने नकली विभाजन से अलग मानवीय बराबरी में विश्वास करने का सिद्धांत है. उनका कहना था कि दुनिया में अच्छे और सुखी जीवन के लिए यह तीनों चीजें जरूरी हैं.
उन्हें चिंता थी कि दक्षिण पूर्व एशिया में साम्यवाद तेजी से फैल रहा है. जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया में वे देश हैं जहां कभी बौद्ध धर्म का बोलबाला रहा है. वहीं, साम्यवाद में धर्म के लिए कोई स्थान नहीं है. इससे पूरी धार्मिक प्रणाली के अस्तित्व पर ही संकट है. जबकि साम्यवाद इस बात को समझता नहीं है कि सारी सेक्युलर प्रणाली का आधार किसी धार्मिक शास्ति पर ही है. वह चाहे जितनी परोक्ष क्यों न हो. उन्हें दक्षिण- पूर्व एशियाई देशों में बढ़ते साम्यवाद पर हैरानी थी इसीलिए वे उन्हें यह बताना चाहते थे कि बुद्ध के दर्शन में मार्क्स के दर्शन का पूरा का पूरा जवाब या विकल्प है.

वे रूसी साम्यवाद से सचेत करते हुए कहते हैं कि वह तो खूनी क्रांति लाने का संकल्प करता है जबकि बुद्ध का साम्यवादी दर्शन रक्तहीन मानसिक क्रांति लाता है. इसलिए जो लोग साम्यवाद अपनाना चाहते हैं वे जान लें कि बुद्ध धर्म का संघ अपने में साम्यवादी संगठन है. वहां निजी संपत्ति की कोई अवधारणा नहीं है. यह सोच किसी हिंसा के माध्यम से नहीं हासिल की गई थी. यह तो मानस बदलने से आई थी और 2500 साल से चली आ रही है. हालांकि उसमें क्षरण हुआ है लेकिन वह अवधारणा तो आज भी जिंदा है. वे दक्षिण- पूर्व एशिया के देशों को सचेत कर रहे थे कि वे रूसी जाल में न फंसें. वे बुद्ध के दर्शन को पढ़ें, समझें और नई व्याख्या करें.

दरअसल डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म और दर्शन को पुनर्जीवित करने और उसकी नई व्याख्या करने की कोशिश की थी. इससे पहले भारतीय उपमहाद्वीप में बुद्ध धर्म लगभग बुझ चुका था. 1750 से 1890 के बीच अंग्रेज विद्वानों ने तमाम स्थलों और साहित्य की खोज करके उनके बीच संबंध जोड़े और यह स्थापित किया कि भारत में इतना महान धर्म था. यह धर्म भारत से लुप्त होकर यूरोप के साहित्य में जिंदा था. जिन विद्वानों ने इसे पुनर्जीवित किया उनमें प्रिंसेप, अलेक्जेंडर कनिंघम और जान मार्शल का नाम प्रमुख है. एडविन अर्नाल्ड ने भी बोध गया जैसे स्थल की उपेक्षा के बारे में लिखा था.
डॉ. आंबेडकर की बौद्ध धर्म की व्याख्या को कुछ विद्वान 'इनगेज्ड बुद्धिज्म' यानी सक्रिय बुद्धवाद की संज्ञा में रखते हैं. यह शब्दावली वियतनाम के जैन गुरु पिच नाट ह्न्ह ने प्रदान की है. वहां युद्ध की स्थितियों से तमाम बौद्ध भिक्षु बहुत चिंतित थे. वे विहारों में विपासना करते थे और उसके बाद बाहर निकल कर युद्ध लड़ रहे लोगों की मदद भी करते थे. इस तरह उन्होंने संसार से अलग रह कर धर्म पालन में ही अपने को नहीं लगाया बल्कि संसार के साथ जुड़कर उसे बेहतर बनाने का प्रयास किया.

बौद्ध धर्म के विद्वान डॉ. सिद्धार्थ सिंह के अनुसार डॉ. आंबेडकर का बौद्धवाद यूरोपीय बौद्धवाद से अलग है और वह एक प्रकार का सामाजिक आंदोलन है. जहां यूरोप का बौद्ध धर्म तमाम सामाजिक संगठनों की गतिविधियों को समेटने वाला एक छाता है. वहीं, डॉ. आंबेडकर का बौद्ध धर्म सामाजिक पीड़ा से मुक्ति का एक आंदोलन है. यूरोपीय बौद्ध धर्म पारंपरिक व्याख्या पर आधारित है जबकि आंबेडकर एकदम नई व्याख्या प्रस्तुत करते हैं. वहां वह अभिजात वर्ग का धर्म है जबकि भारत में आंबेडकर ने उसे अछूतों और छोटी जातियों का धर्म बनाने का प्रयास किया. डॉ. आंबेडकर के बुद्ध धर्म में अध्यात्म अनिवार्य रूप से शामिल नहीं है. यह धर्म हिंदूवाद का जबरदस्त आलोचक है.

आज सवाल उठता है कि जब रूस या पूर्व सोवियत संघ का साम्यवाद बिखर गया है और दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देशों में साम्यवाद बचा हुआ है तब बौद्ध धर्म किस प्रकार एक सामाजिक आंदोलन और सक्रिय धर्म की भूमिका निभा सकता है? इस बीच दक्षिण पूर्व एशिया के जातीय झगड़ों के कारण बौद्ध धर्म के विविध रूप सामने आए हैं जिसमें नस्ली घृणा और हिंसा का समर्थन भी शामिल है. इन बातों को दो पुस्तकों ने बहुत गहराई से दर्शाया है. एक पुस्तक है राबर्ट सैक्स की बुद्धा एट वार (Buddha at War). दूसरी पुस्तक है बुद्धिस्ट वारफेयर (Buddhist Warfare) जिसे लिखा है माइकल के जेरीसन और मार्कजुएरजेन्स मेयर ने.इसमें श्रीलंका के बौद्धों से लेकर म्यांमार तक के बौद्धों की हिंसक गतिविधियों का वर्णन है.


यह स्थितियां आज नए संदर्भ में डॉ. आंबेडकर के विमर्श को प्रासंगिक बनाती हैं. आज धर्म फिर कट्टरता की ओर जा रहे हैं. आंबेडकर की चेतावनी से हिंदू धर्म ने अपने भीतर जो सुधार किया था अब वह उस पर उल्टी प्रतिक्रिया कर रहा है. दलित समाज पर अत्याचार कम नहीं हुए हैं. यह बात अलग है कि उनके भीतर भी एक अभिजात वर्ग पैदा हो गया है. जातीय संघर्ष, आतंकवाद , सांप्रदायिकता और उग्र राष्ट्रवाद के साथ खड़े हुए सभ्यताओं के संघर्ष के सिद्धांत ने दुनिया को नए सिरे से उलझा दिया है. सोवियत संघ और कम्युनिस्ट तानाशाही सत्ताओं का पतन भले हुआ लेकिन दुनिया में तानाशाही का खतरा बना हुआ है. इसलिए आज डॉ. आंबेडकर के जीवन और विचार को नए सिरे से पढ़ने की जरूरत है. उनका ग्रंथ 'बुद्ध और उनका धम्म बुद्ध' धर्म की नई व्याख्या करता है. उनका लिखा हुआ संविधान लोकतंत्र और समता की स्थापना करता है. देखना है आज का भारत और दुनिया उन्हें कितना समझ और अपना पाती है. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

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First published: October 14, 2020, 2:40 PM IST
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