बराबरी के बिना बेकार हो जाते हैं मौलिक अधिकार

अगर न्यायपालिका हर किसी के लिए जीवन और निजी स्वतंत्रता का वही पैमाना अपनाती है जो उसने अर्नब गोस्वामी के लिए अपनाया तो बहुत सारे विचाराधीन कैदी मुक्ति का आकाश देखेंगे और देश में नागरिक स्वतंत्रता की क्रांति आ जाएगी.

Source: News18Hindi Last updated on: November 19, 2020, 11:27 PM IST
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बराबरी के बिना बेकार हो जाते हैं मौलिक अधिकार
नागरिकों की बराबरी और उनके जीवन और निजी स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की बहस तेज हो गई है. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)
जब से सुप्रीम कोर्ट ने रिपब्लिक टीवी के हाई प्रोफाइल संपादक और एंकर अर्नब गोस्वामी को अंतरिम जमानत दी है तब से नागरिकों की बराबरी और उनके जीवन और निजी स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की बहस तेज हो गई है. अर्नब गोस्वामी को जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जो सवाल उठाए हैं वह हमारी न्यायपालिका की उदात्त दृष्टि को प्रमाणित करते हैं. उससे सभी को उम्मीद जगती है कि जब भी उन पर संकट आएगा तो देश की सबसे बड़ी अदालत उनके हक के लिए खड़ी होगी. यही उम्मीद और उसकी जमीनी हकीकत हमारी न्यायपालिका और लोकतंत्र के गले में अटक गई है. अगर न्यायपालिका हर किसी के लिए जीवन और निजी स्वतंत्रता का वही पैमाना अपनाती है जो उसने अर्नब गोस्वामी के लिए अपनाया तो बहुत सारे विचाराधीन कैदी मुक्ति का आकाश देखेंगे और देश में नागरिक स्वतंत्रता की क्रांति आ जाएगी. तब शायद सुप्रीम कोर्ट की स्थिति राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और पीयूसीएल जैसी हो जाएगी.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट जानता है कि ऐसा करने के जोखिम हैं. अगर वह ऐसा करता है या देश के सारे हाई कोर्ट भी उदार तरीके से संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 32 का उपयोग होने देंगे तो उन्हें देश की कार्यपालिका ही नहीं विधायिका से भी टकराना पड़ेगा. ऐसा करने में उनकी अपनी गरिमा और स्वायत्तता संकट में पड़ सकती है. इसलिए वह मौलिक अधिकारों की छूट कुछ बहुचर्चित लोगों को देते हुए बाकी लोगों को उससे वंचित रखने में सुविधा महसूस करता है. लेकिन सवाल उठता है कि अगर मौलिक अधिकार कुछ विशिष्ट लोगों के ही उपलब्ध हैं और उनके लागू करने के दौरान कानून के समक्ष बराबरी के सिद्धांत का ध्यान नहीं रखा जाता तो कानून के राज का मतलब क्या रह जाएगा?

पांच साल पहले एक फिल्म आई थी जिसका नाम था एन.एच. 10. अनुष्का शर्मा के प्रोडक्शन की इस फिल्म में गुड़गांव की बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाला एक सुखी दंपत्ति शहर के पुलिस अधिकारियों से अपने संपर्क के कारण बहुत निश्चिंत रहता है. वह एक दिन जब शहर की परिधि से बाहर निकलता है तो आनर किलिंग की घटना को अपनी आंखों से देखता है और उससे भीषण तरीके से टकराता है. तब उसे अहसास होता है कि कानून का राज और मौलिक अधिकार सिर्फ दिल्ली और उससे सटे कुछ शहरों में चलने वाली कहानियां ही हैं. अपने घायल पड़े पति की जान बचाने के लिए संघर्ष कर रही अनुष्का शर्मा से टकराने वाला एक पुलिस अधिकारी कहता है कि मैडम संविधान और कानून यह सब दिल्ली के दायरे में रहते हैं. उसके बाहर की हकीकत यही है जिसका आप सामना कर रही हैं. लेकिन आज स्थिति उससे भी अलग है जब बड़ी अदालतों में भी कानून और न्याय हर मामले में अलग अलग और भेदभाव वाली व्याख्याओं का सामना कर रहा है.

देश की जमीनी हकीकत और सुप्रीम कोर्ट की ओर से मौलिक अधिकारों का चुनिंदा क्रियान्वयन देखकर संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर की वह बात याद आती है जो उन्होंने हैदराबाद प्रोग्रेसिव ग्रुप की ओर से 24 मई 1950 को बोट क्लब पर आयोजित एक बैठक में कही थी. उन्होंने कहा था कि यह सही है कि हमारे मौलिक अधिकार पूर्ण नहीं हैं. उन पर तमाम तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं ताकि राज्य की सुरक्षा हो सके. इसके बावजूद इस बात का ध्यान रखा गया है कि मौलिक अधिकारों पर लगाई गई पाबंदियों के कारण व्यक्तिगत स्वतंत्रता अनुचित तरीके से प्रभावित न हो. उन्होंने कहा था कि मौलिक अधिकारों की सर्वश्रेष्ठ गारंटी यही हो सकती है कि संसद में अच्छा विपक्ष हो ताकि सरकार सही तरीके से व्यवहार कर सके. दूसरी सुरक्षा कानूनी हो सकती है. मान लीजिए सीआईडी की रपट के आधार पर एक मंत्री ने कार्रवाई करते हुए एक व्यक्ति को निवारक नजरबंदी कानून के तहत जेल में डाल दिया. तब सवाल उठता है कि क्या सीआईडी की रपट सही थी?
यह कठिन सवाल है. ऐसे में कानूनी विदग्धता ऐसी होनी चाहिए कि मंत्री के अधिकारों पर अंकुश लगाए. ताकि सही रिपोर्ट आ सकें और गलत रिपोर्ट पर कार्रवाई करने पर रोक लगे. तीसरी सुरक्षा सुप्रीम कोर्ट से मिल सकती है. लेकिन उससे पहले उन्होंने उम्मीद जताई थी कि इस देश के लोग पांच दस साल में मौलिक अधिकारों का अर्थ समझ जाएंगे. क्योंकि जब अमेरिका का संविधान बना तब वहां के लोग भी मौलिक अधिकार के बारे में नहीं जानते थे. मौलिक अधिकारों की जैसे जैसे वहां की अदालतें व्याख्या करने लगीं लोगों को उनका मतलब समझ में आने लगा.

लेकिन भारत में स्थिति कुछ विकट हो रही है. आपातकाल झेलने के बाद लोग मौलिक अधिकारों के प्रति जितने सचेत हुए थे आज उतने ही लापरवाह होते जा रहे हैं. जिस मध्यवर्ग को मानवाधिकारों (मौलिक अधिकारों) के बारे में सबसे ज्यादा सचेत और मुखर होना चाहिए था वह उसका सबसे ज्यादा विरोधी हो गया है. विचित्र सी बात है कि भारत का मध्यवर्ग अगर संस्कृति और परंपरा की रक्षा के नाम पर एक ओर मनुस्मृति के समर्थन में उतरता जा रहा है तो दूसरी ओर वह आतंकवाद से लड़ने के नाम पर सारे निवारक नजरबंदी कानूनों का समर्थक हो गया है.

उसी मध्यवर्ग की यह मानसिकता सत्तारूढ़ दल में परिलक्षित होती है तो हमारी न्यायपालिका के फैसलों में भी दिखाई पड़ती है. अगर हमारी न्यायपालिका को विपक्ष के दबाव का डर होता या देश के मध्यवर्ग की आलोचना का भय होता या उसकी वकीलों के समुदाय की विदग्धता की चुनौती होती तो शायद ही वह कानून के समक्ष समानता और जीवन और निजी स्वतंत्रता के अधिकार की इतनी अनदेखी करता. इसी वातावरण में काम करने वाला मीडिया भी पुलिस और सेना को किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का संगठन कह कर संबोधित करता है. ऐसा कहते हुए वह भूल जाता है कि लोकतंत्र किसी व्यक्ति के राज का नाम नहीं है बल्कि यहां कानून का राज होता है.ब्रिटिश न्यायविद अलबर्ट वेन डायसी ने 1855 में इंट्रोडक्शन टू द स्टडी ऑफ लॉ आफ कांस्टीट्यूशन(Introduction to the study of law of Constitution) में कानून के राज के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए कहा था कि अगर कोई व्यक्ति किसी कानून का उल्लंघन नहीं करता है तो उसे न तो शरीर की स्वतंत्रता से वंचित किया जाएगा और न ही उसकी संपत्ति को कोई नुकसान पहुंचाया जाएगा. ऐसी व्यवस्था में कानून सबसे ऊपर होता है और कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं होता. एक तरह से कानून हमारी सरकार से भी ऊपर है. कानून के राज के इसी सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण तत्व है कानून के समक्ष समानता. इसीलिए यह विवाद भी चलता रहता है कि संसद बड़ी या संविधान? कई फैसलों से मान्यता यही बनी है कि संविधान सबसे ऊपर है.

इसीलिए जितना महत्वपूर्ण संविधान का अनुच्छेद 21, 19 और 32 हैं उससे कम महत्वपूर्ण अनुच्छेद 14 नहीं है. कानून के सामने सभी नागरिक बराबर हैं यही इस अनुच्छेद और लोकतंत्र का मूल मंत्र है. अगर हमारे कानून के समक्ष अमीर से अलग व्यवहार होगा, गरीब से अलग व्यवहार होगा, फिल्मस्टार से अलग और पत्रकार से अलग व्यवहार होगा तब तो कानून के राज का मतलब ही खत्म हो जाएगा. हालांकि हो कुछ ऐसा ही रहा है तभी इस समय देश में असंतोष और बेचैनी है. कानून के समक्ष बराबरी का यह अधिकार अपने में एक ऐसा विशिष्ट अधिकार है जो संविधान से पहले इस देश में नहीं था. न्याय व्यवस्था जरूर थी लेकिन उसमें व्यक्ति व्यक्ति में भेदभाव किया जाता था. अनुच्छेद 14 उसी भेदभाव को मिटाने का दावा करता है.

हालांकि इस अनुच्छेद में भी राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे बड़े पदों पर बैठे कुछ लोगों को विशिष्ट अधिकार के साथ अपवाद की श्रेणी में रखा गया है लेकिन वह भी सीमित दायरे में ही है. अगर इसके दूसरे अपवाद के तहत समाज के कुछ वर्गों के लिए विशेष कानून बनाए गए हैं तो उसका उद्देश्य सभी को बराबरी के धरातल पर लाने का ही प्रयास है. ताकि सामाजिक बराबरी का वातावरण बने और समाज के सभी लोगों को कानून के समक्ष समता दी जा सके. वह कोशिश भी गैरबराबरी के लिए नहीं है. अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निवारण कानून इसी दायरे में आता है. लेकिन आज दिक्कत यह है कि रूल आफ ला(Rule of Law) यानी कानून का राज चलाने की बजाय कानून द्वारा शासन(Rule by Law)चलाने का प्रयास किया जा रहा है.

रूल आफ ला यानी कानून के राज का सिद्धांत यह है कि कानून उक्तिसंगत और उचित होना चाहिए न कि अनुचित होना चाहिए. जबकि रूल बाइ ला का मतलब यह है कि जैसा भी कानून बना दिया गया उसी से चलाया जाए. यही स्थिति जीवन और निजी स्वतंत्रता का अधिकार देने वाले अनुच्छेद 21 के साथ भी है. 1971 में जब कम्युनिस्ट नेता एके गोपालन का मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया तो कहा गया कि अगर कानून के तहत किसी की निजी स्वतंत्रता छीनी गई है तो वह उचित है. यहां कानून के उचित होने की परीक्षा नहीं की गई. यह ब्रिटिश न्यायशास्त्र का प्रभाव था. लेकिन जब सात साल बाद 1978 में मेनका गांधी बनाम भारत सरकार का केस आया और मेनका गांधी का पासपोर्ट जब्त किया गया तो अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत आजादी को किसी भी कानून के तहत प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता. वह कानून भी उचित होना चाहिए. सात जजों की पीठ से आया यह एक बड़ा फैसला था और इससे बड़ी उम्मीद जगी थी.

लेकिन आज हमारी न्यायपालिका और लोकतंत्र की अन्य संस्थाएं कानून के समक्ष समानता और कानून की उपयुक्तता के सिद्धांत से मुंह मोड़ रही हैं. अगर ऐसा न होता तो तमाम निवारक नजरबंदी कानूनों पर विचार किया जाता और देखा जाता कि वे कितने संविधान सम्मत हैं. साथ ही कश्मीर की बहुत सारी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर विचार किया जाता, केरल के पत्रकार सिद्दीक कंपन, आनंद तेलतुमड़े, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, बरबरा राव ही नहीं तमाम छोटे छोटे अपराधों में बंद हजारों बेगुनाहों को जमानत देने के बारे में न्यायालय चुस्ती दिखाता. कानून के समक्ष बराबरी और जीवन व निजी स्वतंत्रता के अधिकार सिर्फ संविधान की किताब में लिख देने से नहीं बचने वाले हैं. वे ऐसे पौधे हैं कि अगर समय समय पर खाद पानी डालकर और उनके चारों ओर बाड़ लगाकर उनकी सुरक्षा नहीं की गई तो समाज का कोई भी ताकतवर समूह उन्हें काट कर फेंक सकता है या उन्हें चर सकता है. यह ऐसे पौधे हैं जो सिर्फ धनवान और शक्तिशाली के आंगन में ही नहीं लगने चाहिए. यह वे पेड़ हैं जिनकी कतार हाईवे के किनारे लगनी चाहिए और जिसकी छांव सभी को मिलनी चाहिए. (ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

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First published: November 19, 2020, 10:49 PM IST
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