गांधी की वो तालीम, जो हमें हिंसा, घृणा और बेरोजगारी से निजात दिला सकती है

ऐसी नई तालीम पर इस दौर में भी रोचक चर्चा होनी चाहिए. जब किसानों के मुद्दे पर नई बहस छिड़ी हो, खेती के साथ देश को आत्मनिर्भर बनाने की बात हो, नई शिक्षा नीति को लागू करने की प्रक्रिया चल रही हो, बेरोजगारी चरम पर हो, तब यह सवाल उठता है कि क्या इस दौर में भी शिक्षा के लिए गांधी की वह व्यावहारिक दृष्टि जिसके भीतर पर्यावरण और समाज के लिए एक अहिंसक मानव बनाने की योजना छुपी हो, कुछ काम की हो सकती है?

Source: News18Hindi Last updated on: October 2, 2020, 5:46 AM IST
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गांधी की वो तालीम, जो हमें हिंसा, घृणा और बेरोजगारी से निजात दिला सकती है
(फोटो साभारः Getty Images)
इक्कीसवीं सदी में बीसवीं सदी की गांधी की नई तालीम किस काम की? यह सवाल अक्सर उठाया जाता है. वेबिनार और डिजिटल कक्षाओं के इस युग में भला कैसे कोई तकली कातने, बढ़ईगीरी, लोहारगीरी और मोचीगीरी के माध्यम से शिक्षा देने का दावा कर सकता है. हालांकि भाजपा नीत एनडीए सरकार गांधी की कुछ अच्छी चीजों को पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए उत्सुक दिखती है. नई शिक्षा नीति में मातृभाषा में शिक्षा और शिक्षा में निजीकरण के माध्यम से नए प्रयोग करने की छूट दो ऐसे गलियारे हैं जहां पर गांधी की नई तालीम की छाया पड़ती हुई दिखती है. इसके अलावा व्यावसायिक शिक्षा को भी गांधी की नई तालीम से प्रेरित होने का दावा किया जा रहा है.

इसलिए आज यह जानना जरूरी है कि महात्मा गांधी ने 22/23 अक्तूबर 1937 को वर्धा में नई तालीम का जो मसविदा पेश किया था वह क्या था और आज के दौर में उसकी कितनी प्रासंगिकता है. नई तालीम की एकदम आधुनिक संदर्भ में व्याख्या करते हुए विनोबा भावे ने कहा था कि अगर नई तालीम को व्यवस्था में कैद किया जाएगा तो वह मर जाएगी. उनके अनुसार यह कोई किसी खांचे में बंद प्रणाली नहीं है. न ही यह सिर्फ ग्रामीण जनता के लिए है. यह सीखने और जीवन जीने का एक दर्शन है. यह नई राजनीति, नई अर्थव्यवस्था, नई आध्यात्मिकता और एक नया अहिंसक समाज बनाने का कुतुबनुमा है. इसलिए उसे आज के संदर्भ में निरंतर सुधारने और हर किसी को अपने ढंग से परिभाषित करने की जरूरत है. यहां शिक्षा जीवन का अंग नहीं बल्कि जीवन शिक्षा के भीतर है.

विनोबा इसे सत, चित और आनंद से जोड़ते हुए कहते हैं कि सत तो कर्म है जिसके बिना जीवन में गति नहीं है, चित ज्ञान है जिसके बिना जीवन में स्वतंत्रता नहीं है और आनंद के बिना जीवन बेस्वाद है. उनका कहना था कि आज की शिक्षा स्कूल, अच्छे नंबर, डिग्री, अच्छा पैकेज, ज्यादा भौतिक वस्तुएं और खुशी के रूप में परिभाषित होती है और यह हमें वैश्विक अर्थव्यवस्था का गुलाम बनाती है. जबकि नई तालीम हमें शारीरिक श्रम का महत्व समझाते हुए यह कहती है कि अगर हम श्रम नहीं करते तो दूसरों की पीठ पर बोझ हैं और इससे जो जीवन बनेगा वह हिंसा पर आधारित होगा.

गांधी कोई शिक्षा शास्त्री नहीं थे और उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में काम करते हुए वे इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों को कितना देख पा रहे थे यह कहना कठिन है. उन्होंने अपने बचपन के नैतिक अनुभवों, दक्षिण अफ्रीका के आश्रम के प्रयोगों और चंपारण, साबरमती व सेवाग्राम के प्रयोगों के आधार पर एक अवधारणा प्रस्तुत की थी. कुछ लोग उनकी नई तालीम को एक सनक ही मानते थे.
इस बारे में आचार्य जेबी कृपलानी का कथन मौजूं है. वे कहते थे कि यह बुड्ढा कोई नया शिगूफा छोड़ देता है और लोग उसमें माथापच्ची करते हुए उलझ जाते हैं. यहां जेबी कृपलानी की उस पुस्तिका का जिक्र जरूरी है जो उन्होंने वर्धा शिक्षा योजना का मजाक उड़ाते हुए अंग्रेजी में लिखी थी. उसका शीर्षक था 'दे लेटेस्ट फेड' यानी ताजा पागलपन. उससे भी कम मजेदार वह बात नहीं है जो गांधी ने उसकी प्रस्तावना में लिखी है. गांधी ने लिखा, "यह पुस्तक मैं शुरू से अंत तक देख चुका हूं. अनुभव में आने वाली एक कमी इससे पूरी होती है. जिसे मेरा 'ताजा पागलपन' कहा गया है और वह भी शिक्षा के क्षेत्र में-उसके बारे में जिज्ञासुओं के मन में जो शंकाएं पैदा होती हैं, उन सबका जवाब पुस्तक में देने का प्रयास किया गया है. आचार्य कृपलानी ने कई वर्षों तक शिक्षाशास्त्री के रूप में काम किया है. उन्होंने इस पुस्तक में यह बताने का प्रयास किया है कि इस पागल का दिमाग बिलकुल ठीक है."
ऐसी नई तालीम पर इस दौर में भी रोचक चर्चा होनी चाहिए. जब किसानों के मुद्दे पर नई बहस छिड़ी हो, खेती के साथ देश को आत्मनिर्भर बनाने की बात हो, नई शिक्षा नीति को लागू करने की प्रक्रिया चल रही हो, बेरोजगारी चरम पर हो, तब यह सवाल उठता है कि क्या इस दौर में भी शिक्षा के लिए गांधी की वह व्यावहारिक दृष्टि जिसके भीतर पर्यावरण और समाज के लिए एक अहिंसक मानव बनाने की योजना छुपी हो, कुछ काम की हो सकती है? हमें यह याद रखना होगा कि गांधी ने नई तालीम की योजना पर विचार का बोझ लादने की कोशिश नहीं की. जब उनसे एक अमेरिकी पादरी और दक्षिण भारत में शिक्षा पर काम कर रहे डा जान डी बोअर ने कहा कि यह शिक्षा योजना तो बहुत अच्छी है क्योंकि इसकी जड़ में अहिंसा है. लेकिन यह जानकर आश्चर्य हुआ कि इसमें अहिंसा को बहुत कम जगह दी गई है.

इस पर गांधी का जवाब बहुत रोचक था. उनका कहना था, "सारा कार्यक्रम अहिंसा पर केंद्रित नहीं किया जा सकता. यह जानना काफी है कि यह एक अहिंसक दिमाग से निकली है. समिति के सारे सदस्य अहिंसा को नहीं मानते और न ही एक निरामिष भोजी व्यक्ति का अहिंसक होना जरूरी है. अहिंसा तो सचमुच इस योजना का हृदय है और वह मैं बड़ी आसानी से सिद्ध कर सकता हूं. पर यदि मैं ऐसा करूं तो लोगों का उत्साह बहुत कम हो जाएगा."

काम करते हुए सीखने का जो आग्रह नई तालीम में था वह वास्तव में वोकेशनल एड्यूकेशन में नहीं है. गांधी दस्तकारी का उपयोग शिक्षा देने के लिए करना चाहते थे न कि बुनियादी तालीम में दस्तकारी सिखाना चाहते थे. एक प्रकार से हाथ से मस्तिष्क को शिक्षित करना चाहते थे क्योंकि उनका मानना था कि हम जब भी मस्तिष्क को श्रेष्ठ मानकर हाथ और पैर को गौड़ मानते हैं तो अनर्थकारी स्थिति उत्पन्न होती है.
वे कहते हैं, "सिर्फ शब्दों की शिक्षा के बच्चे का दिमाग थक जाएगा और भटकने लगेगा. फिर हाथ वह काम करेगा जो उसे नहीं करना चाहिए. आंख वह देखेगी जो उसे नहीं देखना चाहिए. कान वह सुनेंगे जो उन्हें नहीं सुनना चाहिए. यानी वह काम नहीं करेंगे जिसके लिए वे बने हैं. ऐसे में जब वे अपने सही काम के लिए प्रशिक्षित नहीं किए जाते तो प्रायः उनकी शिक्षा ही उन्हें बर्बाद कर देती है. जो शिक्षा अच्छे और बुरे और अपने पराए में भेद कर पाने की शिक्षा नहीं देती वह मिथ्या है."पिछली सदी में कहा गया गांधी का यह कथन आज कम्प्यूटर और मोबाइल पर दिन रात लगे युवाओं पर एकदम सटीक बैठता है. गांधी ने नई तालीम से शिक्षा और समाज के यथार्थ के अंतर को पाटने की कोशिश की थी. उनका मानना था कि मैकाले की पद्धति से पढ़े लोग हाथ के काम करने में शर्म महसूस करते हैं. आज ग्रामीण समाज में बैठे बेरोजगार युवाओं को देखकर लगता है कि आजाद भारत में भी मैकाले का ही दबदबा है. दरअसल गांधी की नई तालीम न सिर्फ शिक्षा को उद्योग शास्त्र के माध्यम से दिए जाने की प्रक्रिया थी बल्कि शिक्षा व्यवस्था को आत्मनिर्भर यानी स्वावलंबी बनाने वाली थी.

आज आत्मनिर्भरता का जोर है और इसे शिक्षा और ग्रामीण व्यवस्था पर लागू करना चाहिए. उनकी यह अवधारणा बहुत प्रासंगिक है कि विद्यालयों में काम करने वाले शिक्षक और विद्यार्थी दस्तकारी के माध्यम से ऐसे उत्पाद बनाएंगे जिन्हें सरकार खरीदे और उससे विद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों का खर्च निकले. यह अवधारणा निरंतर प्रासंगिक हो रही है. सरकारी अनुदान या महंगी फीस पर निर्भर शिक्षा लोगों को कंगाल तो बना ही रही है और युवाओं को उसकी तुलना में कुछ देने की बजाय नाकारा बना रही है. वे ज्ञान तो ले लेते हैं लेकिन उसका व्यावहारिक उपयोग नहीं जानते. नतीजतन वह काम करते हैं जिसकी उन्होंने शिक्षा नहीं ली है और इस दौरान नैतिकता को भी ताक पर रख देते हैं, लेकिन यहां गांधी की नई तालीम में एक संशोधन किया जाना चाहिए. गांधी ने अपनी व्यावहारिक शिक्षा में अहिंसा का दर्शन शामिल नहीं किया था. उसे काम करते हुए सीखने पर जोर था. इसी के साथ जो सामुदायिक भावना विकसित होती उससे परोक्ष रूप से जाति व्यवस्था टूटने वाली थी. लेकिन आज न तो जाति व्यवस्था एकदम टूटी और न ही धर्म की संकीर्णता गई. उल्टे धर्म की गलत समझ के कारण समाज में निरंतर तनाव बढ़ रहा है. ग्रामीण समाज पहले के मुकाबले ज्यादा बेईमान हुआ है. वह साफ सफाई और स्वास्थ्य के बारे में प्रकृति से दूर जाते हुए निरंतर उलझता गया है. ऐसे समय में सामाजिक न्याय के फुले, अंबेडकर के दर्शन और स्वराज और आत्मनिर्भरता संबंधी गांधी के अहिंसा दर्शन के साथ नई तालीम को नए सिरे से परिभाषित किया जाना चाहिए. भले ही नई तालीम ग्रामीण समाज के लिए तैयार की गई थी लेकिन उसकी शहर में भी उतनी ही जरूरत है. हालांकि गांधी ने शहर की ओर ध्यान नहीं दिया था लेकिन शहर में भी इसका प्रयोग करने वाले हैं. गुजरात और बिहार में नई तालीम के प्रयोग हुए हैं और राजस्थान के उदयपुर में भी कुछ प्रयोग चल रहे हैं. गांधीजनों को मानवता के सामने उपस्थित नई चुनौती के संदर्भ में नई तालीम पर नए संदर्भ में विचार करना चाहिए.
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

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First published: October 2, 2020, 5:46 AM IST
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