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फ्रीडम, लिबर्टी और स्वराजः गांधी बनाम आंबेडकर

आकाश सिंह राठौर की किताब ‘आंबेडकर’स प्रीयंबलः ए सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया’ यह सिद्ध करती है कि संविधान की मूल अवधारणाओं को गढ़ते समय डाॅ आंबेडकर की सारी कोशिश इस बात की थी कि कहीं भी उस पर महात्मा गांधी की छाया न पड़ जाए.

Source: News18Hindi Last updated on: August 15, 2020, 2:12 PM IST
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फ्रीडम, लिबर्टी और स्वराजः गांधी बनाम आंबेडकर
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स्वाधीनता दिवस की 74वीं सालगिरह पर यह याद करना बहुत जरूरी है कि आजादी का मतलब क्या था? उसका कौन सा नाम किसे प्रिय था और आजादी के आंदोलन और संविधान निर्माण के माध्यम से हम उसमें कौन सा अर्थ  भर पाए और उसकी आगे की यात्रा के लिए हमने कौन सा संकल्प पत्र तैयार किया. पिछले दिनों एक रोचक पुस्तक हाथ लगी. सन 2020 में प्रकाशित हुई इस पुस्तक का नाम हैः—आंबेडकर’स प्रीयंबलः ए सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया (आंबेडकर की उद्देशिकाः भारत के संविधान का गुप्त इतिहास). पुस्तक आकाश सिंह राठौर ने लिखी है जो अपने को अंतरराष्ट्रीय स्तर का दार्शनिक बताते हैं और आठ पुस्तकों के लेखक हैं. वे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, टोरंटो, हमबोल्ट विश्वविद्यालय और रोम के लुइस विश्वविद्यालय में पढ़ा चुके हैं. इस पुस्तक की सराहना में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन, हाउस आफ लार्ड्स के सदस्य भीखू पारीख, प्रोफेसर उपेंद्र बख्शी और योजना आयोग की पूर्व सदस्य सैयदा हमीद ने अंतिम पेज पर अपनी टिप्पणियां लिखी हैं.

पुस्तक संविधान की उद्देशिका में दिए गए विभिन्न दार्शनिक शब्दों के महत्त्व और उनके साथ जुड़ी अवधारणाओं पर चर्चा करती है और उसमें डाॅ भीमराव आंबेडकर की भूमिका और संविधान सभा की बहसों का उल्लेख करती है. हालांकि भारत के संविधान निर्माण के इतिहास पर अमेरिकी इतिहासकार ग्रैनविल आस्टिन ने –'द इंडियन कांस्टीट्यूशनः कार्नरस्टोन ऑफ ए नेशन' जैसी प्रसिद्ध किताब लिखकर काफी कुछ संतुलित तरीके से बताया है. लेकिन आकाश सिंह राठौर की यह पुस्तक यह सिद्ध करती है कि संविधान की मूल अवधारणाओं को गढ़ते समय डाॅ आंबेडकर की सारी कोशिश इस बात की थी कि कहीं भी उस पर महात्मा गांधी की छाया न पड़ जाए. गांधी के प्रति आंबेडकर की आक्रामकता सर्वविदित है. माना जाता है कि संविधान निर्माण के काम में आंबेडकर को जोड़ा जाना उस आक्रामकता को कम करने और सुलह की एक कोशिश भी थी. आंबेडकर ने अपने पहले व्याख्यान से ही सबका दिल जीत लिया था. लेकिन राठौर अपनी इस पुस्तक में गांधी और आंबेडकर विवाद को और भी तीखा बनाकर प्रस्तुत करते हैं.

यहां स्वाधीनता संग्राम के मौके पर लिबर्टी यानी स्वतंत्रता शब्द पर हुई बहस और उसके विश्लेषण पर विशेष रूप से ध्यान देने लायक है. संविधान का दूसरा पाठ 15 नवंबर 1948 को शुरू हुआ और 17 अक्बटूर 1949 तक चला. प्रीयंबल यानी उद्देशिका पर आखिरी दिन बहस हुई. इसमें पहले फ्रीडम (Freedom) शब्द उल्लिखित था, जिसे आंबेडकर के कहने पर लिबर्टी (Liberty) किया गया. पहले 12 प्रकार की स्वतंत्रताएं (Freedom) दी गई थीं, जिन्हें बाद में पांच तक सीमित कर दिया गया. अब जिन स्वतंत्रताओं का उल्लेख उद्देशिका में किया गया है उनमें विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और पूजा शामिल हैं. बाकी को इसलिए हटाया गया क्योंकि वे मजदूर और वामपंथी आंदोलन से जुड़ी सामाजिक स्वतंत्रताएं थीं और उन्हें लागू किया जाना आसान नहीं था. संविधान में `फ्रीडम’ शब्द को हटाकर `लिबर्टी’ शब्द इसलिए रखा गया क्योंकि `लिबर्टी’ लैटिन शब्द है और `फ्रीडम’ जर्मन. फिर चूंकि आंबेडकर ने `फ्रैटर्निटी’ यानी भ्रातृत्व शब्द पहले रख लिया था इसलिए फ्रांसीसी क्रांति से निकले मंत्र को पूरा करने के लिए या उसका `इक्वैलिटी’ के साथ सुरताल मिलाने के लिए लिबर्टी को चुना गया.

लेकिन असली परेशानी गांधी के `स्वराज’ शब्द से थी. एक तरफ तो गांधी के अनुयायी और जमनालाल बजाज के रिश्तेदार श्रीमननारायण अग्रवाल ने गांधी से निर्देश लेकर एक संविधान तैयार कर दिया था. उसमें ग्राम केंद्रित समाज और सरकार की रूपरेखा थी, जिसे डाॅ आंबेडकर ने नेहरू के समर्थन से सख्ती से खारिज किया. हालांकि संविधान सभा के सत्र की शुरुआत 4 नवंबर 1948 को महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने के साथ हुई थी और यह कामना की गई थी कि उनकी आत्मा हम सबको राह दिखाती रहेगी. लेकिन आंबेडकर को लगातार इस बात से आपत्ति थी कि अगर संविधान में स्वराज और गांधी के अहिंसा शब्द का प्रयोग किया गया तो वह बहुसंख्यक हिंदुओं की आध्यात्मिक अवधारणा को वैधता प्रदान करना होगा जो कि समाज के दलित वर्गों को प्रताड़ित करने वाला होगा.
लेखक कहते हैं कि आंबेडकर को शुरू से ही `स्वराज’ और `फ्रीडम’ शब्द से आपत्ति थी. इसीलिए उन्होंने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के उस प्रसिद्ध कथन पर भी चुटकी ली थी जिसमें तिलक ने कहा था कि -स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. उसका प्रतिकार करते हुए आंबेडकर ने कहा था कि अगर तिलक अछूत परिवार में पैदा हुए होते तो वे स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है न कहते, बल्कि यह कहते कि, `अस्पृश्यता निवारण हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.’

यहीं पर आकाश सिंह राठौर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि हमें मालूम है कि संविधान की उद्देशिका में दी गई `लिबर्टी’ किसका जन्मसिद्ध अधिकार है और `स्वराज’ किसका जन्मसिद्ध अधिकार है. यानी स्वराज सवर्णों का जन्मसिद्ध अधिकार है और लिबर्टी दलितों का. आंबेडकर कहते भी थे कि गांधी जी की यह बात मानी जाए कि साम्राज्यवाद के तहत भारत अंग्रेजों का गुलाम है तो अछूत समुदाय गुलामों का गुलाम है. इसीलिए वे कहते भी थे कि स्वराज तभी आए जब पहले दलितों का स्वराज आ जाए.

राठौर कहते हैं कि आंबेडकर ने पहले गोलमेज सम्मेलन में स्वराज पर हमला बोलते हुए कहते हैं, ` स्वराज का विचार हमारे जैसे तमाम लोगों के मन में उस आतंक, दमन और अन्याय का स्मरण दिला देता है जो अतीत में हम पर होता रहा है और स्वराज के समय फिर हो सकता है.’ पुस्तक के लिबर्टी वाले अध्याय में स्वराज पर समय समय पर व्यक्त की गई आंबेडकर की कई आपत्तियों को दर्ज करते हुए यह निष्कर्ष निकाला गया है कि इन्हीं आपत्तियों के कारण आंबेडकर ने न तो `स्वराज’ शब्द को अपनाया और न ही `फ्रीडम’ को बल्कि उनकी जगह लिबर्टी शब्द को उद्देशिका में जगह दी.संविधान को लेकर यह आख्यान न सिर्फ स्वराज के बारे में समय समय पर व्यक्त की गई गांधी की उदार अवधारणा को खारिज करता है बल्कि स्वाधीनता संग्राम के उस पूरे आख्यान को महत्वहीन बताने का प्रयास करता है जिसमें समाज के विभिन्न तबके के लोग आजादी के लिए अपनी जान की बाजी लगा रहे थे. जरा इस मौके पर शहीदे आजम भगत सिंह के उस पत्र का अवलोकन करें जो उन्होंने विवाह के प्रस्ताव को ठुकरा कर कानपुर रवाना होने से पहले अपने पिता को लिखा था. उन्होंने कहा था, `मेरी जिंदगी मकसदे आला यानी आजादी-ए-हिंद के असूल के लिए वक्फ हो चुकी है. इसलिए मेरी जिंदगी में आराम और बुनियादी खाहशात बायसे कशिश नहीं है. आपको याद है कि जब मैं छोटा था तो बापू (बाबा अर्जुन सिंह) ने मेरी धागा बंधनी (यज्ञोपवीत) के वक्त एलान किया था कि मुझे खिदमते वतन के लिए वक्फ कर दिया गया. लिहाजा मैं उस वक्त के पूरा होने का इंतजार कर रहा हूं. उम्मीद है आप मुझे माफ करेंगे. मेरे दो चाचा आजादी के रास्ते पर चले. अपने पीछे दो विधवाएं छोड़ गए. क्या मैं भी किसी का सुहाग उजाड़ के जाऊं?’

यहां यह भी उल्लेख करना जरूरी है कि सर्वोच्च बलिदान करने वाले भगत सिंह अपनी जेब में गदर पार्टी के युवा शहीद और दलित परिवार से आने वाले करतार सिंह सराभा की फोटू लिए रहते थे. आजादी की लड़ाई के औचित्य पर बार बार सवाल उठाने वाले दार्शनिकों और इतिहासकारों को इस बात का ख्याल रखना होगा कि आजादी की लड़ाई सवर्ण और अवर्ण, हिंदू और मुस्लिम की साझा विरासत थी. गांधी उसके बड़े नेता थे लेकिन उनके अलावा बहुत सारे लोगों के बलिदान की धाराएं कांग्रेस और उसके आंदोलन से असहमत होते हुए भी उसे मजबूत करती थीं.

इसी जज्बे की सबसे स्वीकार्य व्याख्या गांधी स्वराज के रूप में करते थे. इसीलिए 1909 में उन्होंने हिंद स्वराज नामक किताब लिखी जिसे प्रतिबंधित किया गया. समाज के दलित वर्ग की आशंकाओं को खारिज करते हुए गांधी कहते हैं, `जो लोग खुद आजाद होना चाहते हैं वे दूसरों को गुलाम बनाने की बात सोच भी नहीं सकते. आजादी राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक तीनों प्रकार की होनी चाहिए.’

वे राष्ट्रीय स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के रिश्तों को परिभाषित करते हुए कहते हैं, `राष्ट्रीय स्वंतत्रता काल्पनिक वस्तु नहीं है. वह उतनी ही आवश्यक है जितनी कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता. लेकिन अगर यह अहिंसा पर आधारित है तो कभी एक दूसरे के लिए भयोत्पादक नहीं हो सकतीं.’

इससे आगे वे स्वराज को परिभाषित करते हुए कहते हैं, `मेरे लिए स्वराज का मतलब है सर्वाधिक दीनहीन देशवासियों की स्वतंत्रता. ऐसी भारत सरकार जो देश की वयस्क जनसंख्या के बहुमत से कायम की गई हो. वयस्कों में वे स्त्री पुरुष जिनका यहां जन्म हुआ है उनके साथ वे लोग भी शामिल होंगे जो बाहर से आकर यहां बसे हैं. मेरा स्वराज मुट्ठी भर लोगों की सत्ता प्राप्ति से नहीं आएगा. बल्कि सत्ता का दुरुपयोग किए जाने की सूरत में उसका प्रतिरोध करने की जनता की सामर्थ्य से विकसित होगा.’

इससे आगे वे स्वराज की परिभाषा करते हुए कहते हैं, `स्वराज सरकार के नियंत्रण से मुक्त होने का सतत प्रयास है. सरकार चाहे विदेशी हो या देशी. स्वराज एक पवित्र शब्द है. वह वैदिक शब्द है. उसका अर्थ है-स्वशासन, आत्मनिग्रह. वहां संयमों से मुक्ति नहीं बल्कि उसका पालन है. वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता स्वराज की आधारशिला है. अगर यह खतरे में है तो संपूर्ण शक्ति लगाकर इसकी रक्षा की जानी चाहिए.’

इतना ही नहीं, गांधी दलितों और अछूतों के सारे भय और आशंका को भी निर्मूल करते हैं. जब उनसे पूछा जाता  है कि आप भारत में कैसी शासन प्रणाली चाहते हैं तो वे कहते हैं कि हालांकि मेरी सुनता कौन है, लेकिन अगर मेरी चले तो मैं चाहूंगा कि एक अछूत कन्या भारत की राष्ट्रपति बने और उसके मातहत मैं, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल और मौलाना आजाद जैसे लोग काम करें. ब्रिटेन में अगर कोई कन्या वहां की साम्राज्ञी बन सकती है तो भारत में वैसा क्यों नहीं हो सकता. जो लोग भारत पर जातिवाद का आरोप लगाते हैं मैं उन्हें दिखाना चाहता हूं कि हम नए भारत में उसे पलट सकते हैं.

स्वतंत्रता दिवस के इस मौके पर अगर किसी चीज की सबसे ज्यादा आवश्यकता है तो वह कि गांधी और आंबेडकर के राजनीतिक और सामाजिक विचारों और कार्यक्रमों में विभेद ढूंढने की बजाय उनमें साम्य देखा जाए. विभेद ढूंढने वाले न सिर्फ गांधी पर हमला करते हैं बल्कि पूरे स्वाधीनता संग्राम को ऊंची जातियों की लड़ाई बताकर उसमें हुए सर्वोच्च बलिदान और त्याग को खारिज कर देते हैं. ऐसा आख्यान खड़ा करने वाले मानते हैं कि आजादी तो आ ही रही थी उसकी लड़ाई लड़ने की जरूरत क्या थी. जबकि दूसरी ओर लोग कहते हैं कि आजादी आने के बाद जाति तो अपने आप टूट जाती. उसके लिए आजादी आंदोलन के दौरान लड़ाई की क्या जरूरत थी. आजादी के इस मौके पर कम से कम इस आख्यान की दिशा बदलते हुए दोनों का समन्वय किया जाना चाहिए. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

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First published: August 15, 2020, 2:12 PM IST
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