West Bengal Election: तृणमूल कांग्रेस को दो तिहाई बहुमत मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं

पश्चिम बंगाल विधान सभा के चुनौतीपूर्ण चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को दो तिहाई बहुमत मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं है. दूसरी ओर, भाजपा के 80-85 सीट तक पहुंचने का अर्थ है कि वह अब वहां एक बड़ी ताकत हो गई है और उसके ऐसा बनने में कांग्रेस और वामपंथ का सफाया हो गया है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 2, 2021, 5:14 PM IST
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West Bengal Election: तृणमूल कांग्रेस को दो तिहाई बहुमत मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं
भाजपा यह नहीं समझ पाई कि उत्तर प्रदेश और बिहार की तरह पश्चिम बंगाल में महिलाओं को कमतर नहीं समझा जाता. (फाइल फोटो)
पश्चिम बंगाल विधान सभा के बेहद चुनौतीपूर्ण चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को दो तिहाई बहुमत मिलना किसी भी चमत्कार से कम नहीं है. यह चुनाव इतना अनिश्चित हो चुका था कि ममता बनर्जी के राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी स्वयं लड़खड़ाने लगे थे. उन्होंने भाजपा की व्यूह रचना का लोहा मान लिया था. देश के ज्यादातर लोग कह रहे थे कि मामला बराबर का रहेगा और भाजपा, तृणमूल कांग्रेस को तोड़कर सरकार बना लेगी. अब पश्चिम बंगाल की जनता ने ऐसा निर्णय दिया है कि अब किसी प्रकार की तिकड़म और खरीद फरोख्त की गुंजाइश फिलहाल नहीं दिखती. इस फैसले के पीछे एक बड़ा कारण बांग्ला राष्ट्रवाद का समावेशी चरित्र है जिसने हिंदुत्व के आक्रामक स्वरूप को अभी स्वीकार नहीं किया है.

पश्चिम बंगाल के चुनाव में भाजपा के 2016 की तीन से 80-85 सीट तक पहुंचने का अर्थ यह है कि भाजपा अब वहां एक बड़ी ताकत हो गई है और उसके ऐसा बनने में कांग्रेस और वामपंथ का सफाया हो गया है. लेकिन इससे एक बात साफ है कि वहां लगभग 39 प्रतिशत वोट हासिल करके भी भाजपा मुख्य रूप से यूपी-बिहार के हिंदी भाषी लोगों की पार्टी ही है.

पश्चिम बंगाल में जो डेढ़ से दो करोड़ हिंदी भाषी हैं उनका रुझान तेजी से भाजपा की ओर गया था और उसी वजह से लग रहा था कि भाजपा सत्ता में आ जाएगी. ऐसा लगने के पीछे पीछे संचार माध्यमों का शोर और एक राष्ट्रीय पार्टी के पक्ष में बना झुकाव भी था. भाजपा किसी भी चुनाव को हल्के नहीं लेती और फिर पश्चिम बंगाल तो उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण राज्य था. इस राज्य को जीतने के लिए मतुआ समुदाय का वोट चाहिए था और उसे खुश करने के लिए भाजपा ने पूरा जोर लगाया. लेकिन लगता है कि ममता बनर्जी ने बाहरी और भीतरी का जो मामला उठाया वह वहां की बांग्लाभाषी जनता के दिल को छू गया. उसके बाद भाजपा के शीर्ष नेताओं ने जिस तरह ममता बनर्जी के शासन काल के साथ उनको निजी तौर पर निशाना बनाया वह भी ममता बनर्जी के पक्ष में गया.

ममता बनर्जी ने अपने पैर पर प्लास्टर चढ़वा कर और व्हीलचेयर पर बैठकर चाहे जितना नाटक किया हो और प्रधानमंत्री की तुलना पौराणिक खलनायकों से की हो लेकिन एक महिला को ‘दीदी ओ दीदी’ कह कर संबोधित करने की शैली पश्चिम बंगाल के भद्र लोगों को जंची नहीं. दरअसल पश्चिम बंगाल में भाजपा जिस आधार पर अपनी जीत का अनुमान लगा रही थी वह था वहां के शासक वर्ग में बदलाव.
शासक वर्ग के इस बदलाव को सर्कुलेशन आफ इलीट कहते हैं. समाज शास्त्र की इस थ्योरी को जर्मन समाज शास्त्री ने मैक्स बेबर ने सबसे पहले दिया था और अब उसे पूरी दुनिया में होते हुए देखा जाता है. उनका मानना था कि समाज में एक शासक वर्ग रहता है और जब वह कुछ दिन शासन कर लेता है तो दूसरा तबका उठकर आता है और उसे अपदस्थ कर देता है. भाजपा देश के कई राज्यों में इस रणनीति पर काम रही है और इसमें सफल भी रही है. यह दरअसल पहले से सत्ता पर काबिज एक खास तबके की जगह पर नए तबके को सत्ता पर बिठाने की योजना का हिस्सा है.

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार में भी भाजपा ने अति पिछड़ा तबके को अपने साथ जोड़कर ऐसा ही किया है. इसी रणनीति पर भाजपा पश्चिम बंगाल में भी काम कर रही थी. एक ओर वह वहां के हिंदी भाषियों को साध रही थी तो दूसरी ओर अति पिछड़ा तबके को भी अपनी ओर खींच रही थी. इन अति पिछड़ों में मतुआ समुदाय तो प्रमुख था लेकिन अन्य कई समुदायों में भी चलने वाले संघ परिवार के काम से इनकार नहीं किया जा सकता. इसी के साथ उसे यह उम्मीद थी कि उसकी ओर सत्ता जाते देखते ही बंगाल का भद्रलोक भी उसकी तरफ उसी तरह आ जाएगा जिस तरह 2011 में वह वाम मोर्चा को छोड़कर तृणमूल कांग्रेस की ओर आ जाएगा.

भाजपा की हिंदी भाषी क्षेत्रों की यह रणनीति पश्चिम बंगाल में स्थानीय अस्मिता के आगे हार गई. बांग्ला राष्ट्रवाद के चरित्र में आधुनिकता और लोकतंत्र के मूल्य ज्यादा हैं. अगर उसमें सनातन मूल्य हैं तो वह उसी रूप में हैं कि सभी को अपने देवी देवता पूजने और अपने ढंग से खाने और पहनने का हक है किसी को उसके लिए न तो दंडित किया जा सकता है और न ही निर्देशित किया जा सकता है. बंगाल के भद्रलोक को भाजपा के कुछ नेताओं की यह बात शायद अच्छी नहीं लगी कि अगर उनकी पार्टी की सरकार आई तो वहां लव जेहाद का कानून लाएंगे, आपरेशन मजनूं और गोरक्षा का कार्यक्रम चलाएंगे. ये नेता यह नहीं समझ पाए कि आपरेशन मजनूं उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में तो चल सकता है लेकिन बंगाल में उसे चलाने में काफी विरोध का सामना करना पड़ेगा.बंगाल में वैसे भी जो युवक प्रेम नहीं कर पाता उसे बहुत असामाजिक या अंतर्मुखी ही माना जाता है. बल्कि वह हीनता बोध से ग्रसित रहता है. वरना वहां प्रेम करना, पार्कों में बैठना, विक्टोरिया मेमोरियल मध्यवर्गीय युवा जीवन का एक हिस्सा है. वहां दुर्गापूजा के दौरान हजारों जोड़े बनते हैं और वे ही बाद में विवाह में परिवर्तित हो जाते हैं. इसलिए दुर्गापूजा बनाम मुहर्रम की बहस से ध्रुवीकरण तो हुआ लेकिन लव जेहाद और आपरेशन मजनूं का एलान वहां के युवकों को अच्छा नहीं लगा. बंगाल के बहुत लोग मांसाहारी हैं. वहां दुर्गापूजा के दौरान भी मछली और मांस खाया जाता है. अगर वहां खानपान पर पाबंदी लगाने की घोषणा करते हुए कोई पार्टी शासन करना चाहती है तो उसे स्वीकार कर पाना सभी के लिए संभव नहीं होगा.

यह एक विडंबना जरूर है कि जिस बंगाल के महान सांस्कृतिक नायक रवींद्र नाथ टैगोर ने `घरे बायरे’ जैसा उपन्यास लिखकर स्वदेशी संकीर्णता का विरोध किया था, उसी बंगाल में ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह को बहिरागत कह कर चुनाव जीत लिया. यह एक तरह से बंगाल नवजागरण के विचारों को संकीर्ण बनाने जैसा ही हुआ. लेकिन बंगाल की जनता को हिंदुत्व की संकीर्णता और बांग्ला राष्ट्रवाद की संकीर्णता में से एक को चुनना था और उन्होंने दूसरी संकीर्णता चुना क्योंकि पहले वाली उन्हें ज्यादा खतरनाक और पराई लग रही थी.

भाजपा यह नहीं समझ पाई कि हिंदी भाषी प्रदेशों की तरह पश्चिम बंगाल में महिलाओं को कमतर नहीं समझा जाता. वहां के आंशिक मातृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की इज्जत कुछ ज्यादा ही है. वहां का साहित्यकार व्यक्ति के अधिकारों और स्त्री अधिकारों पर ज्यादा शिद्दत के साथ लिखता है और वह राजनेताओं के पीछे चलने वाला चाकर नहीं बल्कि राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है.

यह महज संयोग नहीं है कि वहां पर नवशारदीय के मौके पर विभिन्न पत्रिकाओं में तीन सौ उपन्यास प्रकाशित होते हैं. वे सब प्रेम, संघर्ष और मानवीय रिश्तों के ताजा आख्यानों से भरे होते हैं. यह बात हिंदी भाषियों को हैरान करने वाली लगेगी लेकिन सच है कि कभी ज्योति बसु और उसके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य और बाद में ममता बनर्जी जैसे मुख्यमंत्री महाश्वेता देवी का चरण स्पर्श करते थे. वहां के साहित्यिक सांस्कृतिक समाज के विद्रोह के बाद ही वाममोर्चा का सफाया हो गया था और ममता बनर्जी सत्ता में आई थी. लगता है बुद्धिजीवियों का मजाक उड़ाने वाली भाजपा उस सांस्कृतिक समाज को समझ नहीं पाई.

बंगाल के साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों ने अपने लंबे संघर्ष से एक मध्यवर्गीय समाज निर्मित किया है जिसके ड्राइंगरूम में महज टीवी और अच्छे सोफे ही नहीं होते कुछ रवींद्र, बंकिम, शरद और महाश्वेता देवी का साहित्य भी होता है. वहां की हर लड़की किसी न किसी रूप में डांस और संगीत सीखती है. इसलिए बांग्ला राष्ट्रवाद प्रकट रूप से हिंदी भाषियों से झगड़ा भले न करता हो लेकिन वह उसे छातू खोर और गमछा पहनने वाला कहता है. वहां का बडा़ वर्ग मानता है कि हिंदी भाषियों के पास वैसी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत नहीं है जैसी बंगालियों के पास है. हालांकि हिंदी भाषी बंगालियों को आलसी मानते हैं और कहते भी हैं कि अगर बंगाली मेहनत करते होते तो हम लोग यहां थोड़े ही टिक पाते.

एक विचार यह भी है कि बांग्ला राष्ट्रवाद एक तरह से आहत राष्ट्रवाद है. नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजाद भारत का नेतृत्व नहीं कर पाए. भारत की राजधानी कोलकाता से हटकर दिल्ली आ गई. कोई बंगाली देश का प्रधानमंत्री नहीं बन पाया. स्वतंत्र भारत में कोलकाता का आर्थिक विकास भी नहीं हो सका. इन सारे जख्मों के बावजूद एक बंगाली अपनी सांस्कृतिक विरासत के सहारे जीवन काट लेता है क्योंकि उसे मालूम है कि साल में एक बार वह दुर्गापूजा देखने जाएगा तो नए कपड़े पहनेगा, खूब घूमेगा और वहीं प्रेम और रोमांस भी करेगा. उसे डर लगा कि भाजपा के शासन में उसकी यह विरासत भी छिन जाएगी और जो कुछ मिलने वाला है उसका कोई भरोसा नहीं है. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

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First published: May 2, 2021, 4:55 PM IST
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