गांधी का रामराज्य और आज का लोकतंत्र

दूसरी ओर महात्मा गांधी के रामराज्य में एक तरफ सांप्रदायिक रूपक देखने वाले वामपंथी बौद्धिक हैं तो दूसरी ओर दलित विरोधी और स्त्री विरोधी स्वर सुनने वाले लोग भी हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: August 1, 2020, 2:35 PM IST
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गांधी का रामराज्य और आज का लोकतंत्र
(फाइल फोटो)
उत्तर प्रदेश में जब से योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार गठित हुई है तबसे वह दावा कर रही है यहां रामराज्य आ गया है. अब जबकि आगामी पांच अगस्त को अयोध्या में प्रधानमंत्री के नेतृत्व में राममंदिर के लिए भूमि पूजन होने वाला है तब यह दावा और जोरशोर से होगा कि रामराज्य को मजबूती देने का ठोस प्रयास किया जा रहा है. चूंकि संघ परिवार आजकल महात्मा गांधी का नाम भी खूब लेने लगा है और रामराज्य को सही साबित करने के लिए उनका सहारा लेता है, इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि आखिर संघ के रामराज्य और महात्मा गांधी के रामराज्य में कितना फर्क है और उसे लेकर कितनी गलतफहमी फैलाई जा रही है.

दूसरी ओर महात्मा गांधी के रामराज्य में एक तरफ सांप्रदायिक रूपक देखने वाले वामपंथी बौद्धिक हैं तो दूसरी ओर दलित विरोधी और स्त्री विरोधी स्वर सुनने वाले लोग भी हैं. इसी के साथ यह भी जानना जरूरी है कि लोकतंत्र जैसी व्यवस्था के इस दौर में वह रूपक कितना लोकतांत्रिक है और कितना अधिनायकवादी.

पहली बात तो यह है कि गांधी का रामराज्य स्वराज का समानार्थी है. दूसरी चीज यह है कि उनके रामराज्य में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है. वहां न तो किसी व्यक्ति को हिंसा की अनुमति है और न ही राज्य को संगठित हिंसा की. उनकी कल्पना का राज्य सत्य पर आधारित होगा और उस सत्य को प्राप्त करने के लिए अहिंसा का मार्ग ही अपनाना होगा. इसीलिए गांधी के रामराज्य में राज्य बहुत कमजोर रूप में उपस्थित है. वहां हैं तो बस राम ही राम और उनके राम दशरथ के पुत्र और अयोध्या के राजा से ज्यादा सत्य के प्रतीक हैं. जबकि रावण लंकापति होने से ज्यादा असत्य का प्रतीक है. गांधी कहते हैं कि राज्य एक आत्माविहीन मशीन है. वह संघनित और संगठित रूप में हिंसा का प्रतीक है. इसीलिए वे राज्य की संप्रभुता की नहीं व्यक्ति और समाज की संप्रभुता की बात करते हैं.

गांधी लोकतांत्रिक राज्य के हिमायती हैं लेकिन उसका आधार सेना और पुलिस की दमनकारी शक्ति नहीं है. न ही उसके पाए झूठ के भरमाने वाले माहौल पर टिके होंगे. उसका आधार नैतिक शक्ति है. सन 1920 में वे अपने सपनों के स्वराज की व्याख्या करते हुए कहते हैं, `मेरा स्वराज फिलहाल संसदीय प्रणाली पर आधारित होगा. वहां कमजोर से कमजोर व्यक्ति के पास भी वही अवसर होगा जो कि ताकतवर व्यक्ति के पास होगा और यह लोकतंत्र अहिंसा से ही हासिल किया जा सकता है.’’
उनके लिए रामराज्य का अर्थ था, 'ऐसा मुकम्मल लोकतंत्र जहां पर साधन संपन्नता और साधनहीनता, रंग, नस्ल, पंथ और लिंग के आधार पर जो भी असमानताएं हैं वे मिट जाएंगी.’’ गांधी का रामराज्य धर्मआधारित राष्ट्रवाद से टकराकर लोकतंत्र को कमजोर नहीं करता था. दरअसल वे जब भी हिंदू मुहावरों का प्रयोग करते थे तो उनका अर्थ संकुचित नहीं होता था और वह अस्मिता से कम और दर्शन से ज्यादा जुड़ा होता था. उनके राष्ट्रवाद में सभ्यताओं के संघर्ष की बजाय सभ्यताओं के बीच मेलमिलाप होता था. इसीलिए उनका राष्ट्रवाद लोकतंत्र का सच्चा हितैषी था.

गांधी रामराज्य के बारे में क्या सोचते थे इस पर उनके प्रामाणिक कथन का उल्लेख करने से पहले यह जानना जरूरी है कि उनकी नजर में हिंदू क्या था. वे लिखते हैं, `मेरे हिंदूवाद में वह सब शामिल है जो कुछ इस्लाम और ईसाइयत में श्रेष्ठ रूप में है. मेरे हिंदूवाद में सभी संस्कृतियों को स्थान दिया जाता है......वह पूरी तरह से समावेशी है. वह सहनशील है.’’

इतना सब स्पष्ट कहने के बावजूद गांधी के हिंदू प्रतीकों पर विवाद और गलतफहमी होती रही है. विशेष तौर पर मुस्लिम लीग जो कांग्रेस को एक हिंदू पार्टी और गांधी को एक हिंदू नेता के रूप में प्रस्तुत करती थी वह इन प्रतीकों को विवाद के लिए लपक लेती थी. मुस्लिम समाज में बन रही गलतफहमी को दूर करने के लिए गांधी और आगे आते हैं और 1929 में लिखते हैः-
'मैं अपने मुस्लिम दोस्तों को सचेत करता हूं कि रामराज्य शब्द के मेरे प्रयोग को लेकर गलफहमी न पालें. मेरे रामराज्य का मतलब हिंदू राज्य नहीं है. मेरे लिए रामराज्य का मतलब ईश्वरीय राज्य यानी ईश्वर का साम्राज्य है. मेरे लिए राम और रहीम एक ही है और एक ही देवता हैं. मैं सच्चाई और नियमबद्धता के अलावा किसी अन्य ईश्वर को नहीं मानता. मेरी कल्पना के राम कभी धरती पर आए थे या नहीं, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि रामराज्य का प्राचीन आदर्श निस्संदेह वास्तविक लोकतंत्र है. ऐसा लोकतंत्र जहां पर सबसे सामान्य नागरिक को भी इंतजार और धन खर्च किए बिना शीघ्रता के न्याय मिलेगा.’’


हालांकि गांधी ने जिस रामराज्य की चर्चा 1920 से तेज की और उसकी एक अवधारणा 1909 में हिंद स्वराज में पेश की थी उसे उन्हें जीवन के आखिरी दिनों में भी स्पष्ट करते रहना पड़ा. इसीलिए उन्हें 1946 में हरिजन अखबार में स्पष्ट करना पड़ा कि वे रामराज्य के मुहावरे का प्रयोग क्यों करते हैं और वह वास्तव में मुस्लिम और ईसाई भाइयों से किसी तरह का कोई भेद नहीं उत्पन्न करता. वे लिखते हैं, `यह एक सुविधाजनक और जीवंत मुहावरा है जिसके विकल्प में अगर कोई दूसरा शब्द इस्तेमाल किया जाए तो वह देश के लाखों लोगों को इतना समझ में नहीं आएगा. जब मैं सीमांत प्रांत में जाता हूं या मुस्लिम बहुल सभा को संबोधित करता हूं तो मैं उन्हें अपनी बात का अर्थ समझाने के लिए खुदाई राज शब्द का प्रयोग करता हूं. जब मेरी सभा में ईसाई बंधु होते हैं तो मैं उसे धरती पर ईश्वर का राज्य कहता हूं.’’

गांधी एक बार फिर हरिजन के संपादकीय में स्वतंत्रता का अर्थ समझाते हुए कहते है, 'मेरे लिए स्वतंत्रता का अर्थ रामराज्य है. वह तभी स्थापित हो सकता है जब स्वतंत्रता राजनीतिक आर्थिक और नैतिक हो.’’ गांधी के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ अंग्रेजी सेना के नियंत्रण से मुक्ति था. जबकि आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ अंग्रेज पूंजीपतियों के साथ ही भारतीय पूंजीपतियों से भी मुक्ति था. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण थी उनकी नैतिक स्वतंत्रता की परिभाषा. उस परिभाषा के तहत सशस्त्र बलों से मुक्ति आवश्यक शर्त है. वे मानते हैं कि जो देश अपनी राष्ट्रीय सेना से नियंत्रित होता है वह नैतिक रूप से कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता.


गांधी कोई राजनीतिक शास्त्री नहीं थे. वे एक संत और राजनेता थे और उनके विचार उनके राजनीतिक संघर्ष और रचना के साथ विकसित हो रहे थे. इसके बावजूद उन्होंने भारत में न तो जर्मनी की तरह नाजीवाद लाने का समर्थन किया था और न ही सोवियत संघ की तरह सर्वहारा की तानाशाही. उनका लोकतंत्र नागरिक स्वतंत्रता की अवधारणा पर खड़ा था जिसमें सेना और सशस्त्र बलों का नियंत्रण न्यूनतम था. दिक्कत यह हुई है कि गांधी को या तो अराजकतावादी कह कर खारिज कर दिया गया या फिर उनके रामराज्य को धार्मिक मुहावरा मानकर उससे पीछा छुड़ा लिया गया. अब जनता को समझाने के लिए कथित धर्मनिरपेक्ष दलों के पास कोई लोकप्रिय मुहावरा है ही नहीं. उल्टे उस मुहावरे को संकीर्ण सोच ने लपक लिया है और जनता उस पर लट्टू है. इस बीच कुछ लोगों ने संकीर्ण और कट्टरपंथी लोगों के लिए भक्त शब्द का प्रयोग शुरू कर दिया है. वह और भी गलत प्रयोग है जिससे अनुदार लोगों को अपने को सही साबित करने का मौका मिलता है. आज जरूरत इस बात की है कि जब गांधी और राम की अवधारणा को लेकर तमाम तरह की गलतफहमी फैलाई जा रही है और उसे लोकतंत्र के विरुद्ध खड़ा किया जा रहा है तब उसे और भी स्पष्ट किया जाए और बताया जाए कि उसमें कितनी लोकतांत्रिक चेतना है.
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

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First published: August 1, 2020, 2:28 PM IST
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