अपना शहर चुनें

States

नए जन्म को बेचैन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

भारतीय संविधान निर्माण का इतिहास लिखने वाले ग्रेनविल आस्टिन बहुत सुंदर ढंग से परिभाषित करते हैं. उनका कहना है कि भारत के संविधान निर्माण का दृश्य देखने लायक था. राजेंद्र प्रसाद, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद और डा भीमराव आंबेडकर यही पांच लोग सरकार और संविधान सभा में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे और इनमें डा आंबेडकर को छोड़ दिया जाए तो वही चार लोग कांग्रेस पार्टी में भी प्रमुख भूमिका निभा रहे थे. यानी पार्टी और सत्ता एक तरह से शिव और पार्वती या शब्द और अर्थ की तरह मिले हुए थे.

Source: News18Hindi Last updated on: September 2, 2020, 10:39 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
नए जन्म को बेचैन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
फाइल फोटो
इतिहास को रैखिक विकास की अवधारणा मानने वालों के लिए कांग्रेस पार्टी ने अपना चक्रीय इतिहास उपस्थित कर दिया है. आज से 100 साल पहले जो कांग्रेस पार्टी असहयोग आंदोलन के माध्यम से भारत के राजनीतिक क्षितिज पर छा गई थी और उसे अगले 28 वर्षों तक संचालित करने के लिए महात्मा गांधी जैसा नेता मिल गया था वह पार्टी आज अपने सांगठनिक अस्तित्व और नेतृत्व के महासंकट से जूझ रही है. उससे भी बड़ी विडंबना यह है कि कांग्रेस ने स्वाधीनता संग्राम के लंबे संघर्ष में अपने जिस ढांचे और उससे जुड़ी राजनीतिक-सामाजिक वैधता का विकास किया था वह अब उसके पास से खिसक कर भारतीय जनता पार्टी के पास पहुंच गई है. प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री प्रोफेसर रजनी कोठारी ने साठ के दशक में जिस कांग्रेस प्रणाली के सिद्धांत को प्रतिपादित किया था वह आज पलट कर भारतीय जनता पार्टी पर लागू होने लगा है. कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र बहाली, अध्यक्ष का चुनाव और राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर तक सांगठनिक ढांचा खड़ा करने की मांग करने वाले 23 राष्ट्रीय नेताओं के पत्र ने सांगठनिक नौकरशाही बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है. कांग्रेस को संजीवनी देने के लिए पार्टी को यह काम करना ही होगा. पत्र में यह भी कहा गया है कि कांग्रेस का कमजोर होना भारतीय लोकतंत्र का कमजोर होना है. इसके बावजूद इस पत्र में किसी जनांदोलन का आह्वान नहीं है. सांगठनिक ढांचे को सुधारना तो चुनौती है ही एक बड़े जनांदोलन को खड़ा करना उससे भी बड़ी चुनौती है. क्योंकि कांग्रेस का जन्म राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तरह सांगठनिक ढांचे से नहीं बल्कि आंदोलन से हुआ है. उसका सांगठनिक ढांचा आंदोलन के दौरान विकसित हुआ है.

कांग्रेस प्रणाली के सबसे गंभीर अध्येता राजनीति शास्त्री प्रोफेसर रजनी कोठारी मानते हैं कि कांग्रेस अपने में एक आमसहमति की पार्टी रही है. कांग्रेस ने अपने आंदोलनों से जिस व्यापक राजनीतिक आमसहमति का निर्माण किया था उसी सहमति को उसने अपने संगठन के भीतर जगह दी. वह दरअसल अपने में अनगिनत गुटों की एक श्रृंखला रही है. लेकिन वह गुटों के आपसी टकराव, मध्यस्थता, सौदेबाजी और सहमति की अभ्यस्त रही है. इसी दौरान उसने भारतीय लोकतंत्र को गढ़ा और उसे परिभाषित किया. वे कांग्रेस की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि कांग्रेस एक राजनीतिक पार्टी के रूप में सत्ता में नहीं आई. बल्कि वह स्वाधीनता संग्राम और सामाजिक राजनीतिक सुधार के आंदोलन के रूप में सत्ता में आई. लेकिन वह धीरे धीरे धीरे भारतीय राज्य व्यवस्था का पर्याय बन गई. इस बात को भारतीय संविधान निर्माण का इतिहास लिखने वाले ग्रेनविल आस्टिन बहुत सुंदर ढंग से परिभाषित करते हैं. उनका कहना है कि भारत के संविधान निर्माण का दृश्य देखने लायक था. राजेंद्र प्रसाद, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद और डा भीमराव आंबेडकर यही पांच लोग सरकार और संविधान सभा में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे और इनमें डा आंबेडकर को छोड़ दिया जाए तो वही चार लोग कांग्रेस पार्टी में भी प्रमुख भूमिका निभा रहे थे. यानी पार्टी और सत्ता एक तरह से शिव और पार्वती या शब्द और अर्थ की तरह मिले हुए थे.

इसलिए गुटबाजी कांग्रेस की कमजोरी नहीं उसकी ताकत रही है. वह अपने भीतर तमाम गुटों को लेकर चलने में कुशल रही है और इसके अलावा बाहर के विद्रोही गुटों को अपने भीतर समाहित करने में भी निपुण रही है. राजनीतिक समूहों के इसी रूप को परिभाषित करते हुए रजनी कोठारी कहते हैं कि कांग्रेस प्रणाली के प्रभुत्व के काल में एक तरफ आमसहमति की पार्टी रही है तो दूसरी ओर दबाव समूहों का दल रहा है. दबाव समूहों का दल कभी सत्ता का पर्याय नहीं बन पाया. वे ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रीय दबाव और विपक्ष की भूमिका निभाते थे.

लेकिन आज स्थिति उल्टी हो चली है. आज कांग्रेस की जगह भाजपा ने आमसहमति के दल का रूप ले लिया है और कांग्रेस और उसके साथ सुर मिलाने वाली पार्टियां दबाव समूह की पार्टियां बन गई हैं. आज वैसे ही तमाम दल डर कर भाजपा की छतरी के नीचे आते जा रहे हैं जैसे वे कभी कांग्रेस के समूह के नीचे आते थे. कांग्रेस प्रणाली के समय भारत में विपक्ष लंबे समय तक क्षेत्रीय परिघटना रहा है. आज भाजपा प्रणाली के समय भी वही स्थिति उत्पन्न हो गई है. लेकिन उस समय दबाव समूहों के दलों ने कांग्रेस के लिए इतना खतरा पैदा कर दिया था कि वे उनके एजेंडे को अपने भीतर शामिल करते रहते थे. आज भाजपा के सामने वैसी मजबूरी भी नहीं है. तब कांग्रेस इतनी ताकतवर थी कि वह कामराज योजना को लागू कर सकती थी और तमाम सत्ताधारी नेताओं को संगठन में भेज सकती थी और सांगठनिक नेताओं को सत्ता में. आज जब कांग्रेस के भीतर एक कामराज योजना की जरूरत है तो उसमें वैसा करने का साहस नहीं है.
लेकिन इससे पहले कांग्रेस को अपने सौ साल पुराने इतिहास में जाना होगा और देखना होगा कि उसका उत्थान किस प्रकार हुआ. कांग्रेस संगठन जो पहले बौद्धिकों का आंदोलन हुआ करता था 1920 और 1930 के दौरान जनांदोलन में परिवर्तित हुआ. आज कांग्रेस अगर तात्कालिक रूप से जनांदोलन में नहीं बदल सकती तो उसे एक बौद्धिक आंदोलन के रूप में अपने को खड़ा करना होगा. वह अहिंसक राष्ट्रवाद की पार्टी रही है और दुनिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र खड़ा करने वाली पार्टी रही है. वह कम्युनिस्ट पार्टियों की तरह से ऊपर से नीचे तक नौकरशाही का मजबूत ढांचा बनाकर आंदोलन करने और सत्ता पर काबिज होने वाली पार्टी नहीं रही है.

जिस कांग्रेस की गुटबाजी पर पाल आर ब्रास जैसे अमेरिकी राजनीतिशास्त्री ने जमकर लिखा है उस कांग्रेस पार्टी को गुटबाजी से डरने की जरूरत नहीं है. क्योंकि वह गुटों से खेलते हुए ही बड़ी हुई है. कांग्रेस को डर तब लगना चाहिए जब भाजपा की तरह उसमें गुटों का स्वर खामोश हो जाए या उसके भीतर विपक्ष के विद्रोह को समाहित करने की क्षमता खत्म हो जाए.

भारत ही नहीं दुनिया के राजनीतिक इतिहास में कांग्रेस का मुख्य योगदान यह रहा है कि उसने यह साबित किया है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज जिसमें हिंदू बहुसंख्यक है वहां लोकतंत्र कायम हो सकता है और वह चल सकता है. एक तरह से कांग्रेस ने जिन्ना ही नहीं डा आंबेडकर की आलोचना को भी सुना, समझा और उसका रचनात्मक जवाब दिया. आंबेडकर हिंदू समाज की जातिगत संरचना को लोकतंत्र के प्रतिकूल मानते थे लेकिन कांग्रेस ने उसे बदलते हुए लोकतंत्र को कायम किया. जिन्ना ने कहा था कि भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक रहेंगे इसलिए उनके अधिकार सुरक्षित नहीं रहेंगे लेकिन कांग्रेस ने अपने संविधान से लेकर नागरिक जीवन तक उसे सुरक्षित रखने की कोशिश की.आज भारत और हिंदू समाज दोनों के सामने हिंदुत्व ने बड़ी चुनौती उपस्थित कर दी है. उसने हिंदू समाज को अनुदार बनाने के साथ भारतीय लोकतंत्र को भी अनुदार बनाया है. इस तरह डा आंबेडकर और जिन्ना दोनों की आशंकाएं सही साबित हो रही हैं. हिंदुत्ववादी यह कहते हुए नहीं अघाते कि किसी मुस्लिम देश में लोकतंत्र नहीं कायम हो सकता, लेकिन अब वे अपने राजनीतिक आचरण से यह सिद्ध कर रहे हैं कि हिंदू बहुल देश में भी लोकतंत्र का चल पाना आसान नहीं है.

यही समय कांग्रेस के पुनर्जन्म का है. कांग्रेस के पास भले करिश्माई नेतृत्व नहीं है लेकिन उसके पास गौरवशाली लोकतांत्रिक विरासत के साथ देश के उदारपंथियों की सदिच्छा है. वह दबाव समूह का दल बन गई है और यही वजह है कि उसकी आवाज सुनी नहीं जा रही है. उसकी राष्ट्रीय पहचान भले हो लेकिन राष्ट्रीय हैसियत नहीं है. वह क्षेत्रीय हैसियत में सिमटती जा रही है. कांग्रेस को पार्टी आफ प्रेशर से पार्टी आफ कनसेन्शस बनना होगा. भले इसके लिए पहले वह बौद्धिकों का आंदोलन बने और तब जनांदोलनों की पार्टी बने. देखना है कि इस बार कांग्रेस, कांग्रेस प्रणाली के रूप में सफल होती है या कांग्रेस पार्टी के रूप में. अगर प्रणाली के रूप में आएगी तो भाजपा सिमट कर पार्टी आफ प्रेशर बन जाएगी और अगर पार्टी के रूप में आएगी तब इस देश में दो दलीय व्यवस्था का विकास हो सकता है. हालांकि भारतीय राजनीतिक प्रणाली अभी अस्थिर है और वह आगे क्या रूप लेगी कहा नहीं जा सकता. लेकिन इतना तय है कि भारतीय समाज के विकल्प फेंकने की क्षमता समाप्त नहीं हुई है और वह कोई न कोई कमाल जरूर करेगा. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: September 2, 2020, 10:37 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर