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जयंती विशेष: नेताजी का इस्तेमाल न तो गांधी को हराने के लिए हो सकता है और ना ही नेहरू को

यह जानना रोचक है कि जिस नेताजी का जन्मदिन `देशप्रेम दिवस’ के रूप में मनाया जाता था उसे अब भाजपा `पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाना चाहती है. इसी के साथ यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि नेताजी के संदर्भ में पराक्रम महत्त्वपूर्ण है या देशप्रेम?

Source: News18Hindi Last updated on: January 23, 2021, 6:31 PM IST
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जयंती विशेष: नेताजी का इस्तेमाल न तो गांधी को हराने के लिए हो सकता है और ना ही नेहरू को
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को हुआ था.
वैसे तो नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने जीवन में ही किंवदंती बन गए थे और जब दूसरी बार दुर्घटना में वे गायब हुए तो तमाम लोग कहते थे कि वे उसी तरह फिर वापस आएंगे जैसे कि पहली बार गायब होकर वापस आए थे. यह संभावना उनकी मां को पत्र लिखकर महात्मा गांधी ने भी व्यक्त की थी. वे एक अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व थे और अपना राष्ट्रीय प्रभाव तो रखते ही थे लेकिन इस बात का अंदाज शायद ही किसी को रहा होगा कि अपनी 125 वीं जयंती के मौके पर वे पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव में प्रासंगिक हो जाएंगे. यह जानना रोचक है कि जिस नेताजी का जन्मदिन `देशप्रेम दिवस’ के रूप में मनाया जाता था उसे अब भाजपा `पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाना चाहती है. इसी के साथ यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि नेताजी के संदर्भ में पराक्रम महत्त्वपूर्ण है या देशप्रेम?

नेताजी का पराक्रम विवादित है लेकिन उनका देशप्रेम निर्विवाद है. पराक्रम पराजित हो सकता है विफल हो सकता है लेकिन देशप्रेम पराजित नहीं होता और न ही विफल होता है. जब नेताजी के बारे में गांधी जी से एक चर्चा में जाने माने अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर ने कहा कि आप हिटलर और तोजो के साथ खड़े होने वाले सुभाष चंद्र बोस का कैसे समर्थन कर सकते हैं? आप उन्हें स्टेट्समैन कैसे कह सकते हैं? इस पर गांधीजी ने कहा कि आपको नहीं मालूम सारे स्टेट्समैन ऐसे ही होते हैं. मैं उनकी देशभक्ति के कारण उन्हें पसंद करता हूं. अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुभाष बाबू की प्रशंसा करने के कारण गांधी की आलोचना होती थी तो राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की अध्यक्षता के मुद्दे पर नेताजी का विरोध करने के कारण गांधी निशाने पर लिए जाते हैं. यह सही है कि गांधी के विरोध के बावजूद नेताजी कांग्रेस के दूसरी बार अध्यक्ष बने लेकिन वे काम नहीं कर पाए और इस्तीफा देकर राष्ट्रीय राजनीति से बाहर निकल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हो गए. इसीलिए गांधी की कड़ी आलोचना भी होती है और आज भी बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो इस वजह से गांधी को माफ नहीं कर पाए हैं.


आज भी इस देश में दक्षिणपंथ और वामपंथ में ऐसे कट्टर लोग हैं जो कहते हैं कि गांधी ने पहले भगत सिंह के साथ अन्याय किया, फिर भीमराव आंबेडकर के साथ, फिर सुभाष बाबू के साथ और आखिर में सरदार पटेल के साथ.
लेकिन नेताजी के बारे में महात्मा गांधी क्या सोचते थे यह अपनी हत्या के सात दिन पहले प्रार्थना सभा में दिए गए उनके बयान से जाहिर होता है. 23 जनवरी 1948 को यानी नेताजी के जन्मदिन के मौके पर गांधी प्रार्थना सभा में उनका उल्लेख इस प्रकार किया :-
किसी ने मुझे याद दिलाया कि आज सुभाष बाबू का जन्मदिन है. सुभाष बाबू हिंसा के समर्थक माने जाते हैं और मैं अहिंसा का पुजारी हूं. पर इससे क्या फर्क पड़ता है? मैं जानता हूं कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें दूसरे के गुणों से सीखना चाहिए...हमें उनके गुणों की नकल करनी चाहिए और उनकी कमियों को भूल जाना चाहिए. सुभाष महान देशभक्त थे. उन्होंने देश के लिए अपना जीवन कुर्बान कर दिया. वे स्वभाव से योद्धा नहीं थे लेकिन वे एक सेना के कमांडर बने और उन्होंने एक विशाल साम्राज्य के विरुद्ध हथियार उठाया.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस को पुष्पांजलि अर्पित करते पीएम मोदी (फाइल फोटो)
आखिर सुभाष बाबू के भीतर देशभक्ति के अलावा वे कौन से गुण थे जिनके महात्मा गांधी कायल थे. वह गुण था सांप्रदायिक सद्भाव का और इस बात का उल्लेख गांधी ने अपनी उसी प्रार्थना सभा में किया. हालांकि गांधी जापानी साम्राज्यवाद और हिंसा के विरोधी थे लेकिन उन्होंने आजाद हिंद फौज के गठन में अपनाई गई विविधता की प्रशंसा की और बाद में आजाद हिंद फौज के सैनिकों की रक्षा के लिए खड़े हुए. गांधी ने कहा, उस फौज(आजाद हिंद फौज) में हिंदू, मुस्लिम, पारसी और ईसाई शामिल थे. उन्होंने अपने को महज बंगाली कभी नहीं समझा. उनमें न तो संकीर्णता थी और न ही जातिगत भेदभाव. उनकी नजर में सभी भारतीय थे और भारत के सेवक. वे सभी को बराबर मानते थे. उन्होंने ऐसा व्यवहार कभी नहीं किया कि वे कमांडर हैं तो उन्हें ज्यादा महत्व मिलना चाहिए और दूसरों को कम. इसलिए सुभाष बाबू को याद करते समय हमें उनके महान गुणों को याद करना चाहिए और दिल से कलुष को निकाल देना चाहिए.

यह जानना रोचक है कि गांधी जिन्हें सुभाष बाबू का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी या दुश्मन माना जाता है वे सुभाष बाबू के गुणों की प्रशंसा कर रहे हैं और उनमें बंगाली संकीर्णता के दर्शन नहीं कर रहे हैं. जबकि आमतौर पर हिंसा में विश्वास करने के कारण भगत सिंह को सुभाष बाबू के साथ रखा जाता है लेकिन वे सुभाष बाबू को एक भावुक बंगाली बताते हुए जवाहर लाल नेहरू को उनकी तुलना में श्रेष्ठ क्रांतिकारी बताते हैं.


भगत सिंह ने 21 साल की उम्र में `किरती’ में लेख लिखा जिसका शीर्षक था— नए नेताओं के अलग अलग विचार. भगत सिंह के उस लेखक का तात्कालिक संदर्भ कुछ दिनों पहले बंबई की एक सभा का था, जिसकी अध्यक्षता नेहरू कर रहे थे और जिसमें सुभाष बाबू ने भाषण दिया था. भगत सिंह ने उस लेख में कहा था कि हालांकि दोनों नेता पूर्ण स्वराज के हिमायती हैं लेकिन बोस स्वतंत्रता, ग्राम स्वराज, समाजवाद, राष्ट्रवाद सभी की उत्पत्ति भारत में देखते हैं. उनकी तुलना में नेहरू अंतरराष्ट्रीयतावादी हैं और भारत की आजादी इसलिए चाहते हैं ताकि यहां सामाजिक परिवर्तन किया जा सके. इसलिए पंजाबी युवकों को बोस की तुलना में नेहरू के पीछे चलना चाहिए.

लेकिन सुभाष बाबू भगत सिंह की ओर से की गई इस आलोचना से बेखबर थे. या यूं कह सकते हैं कि उन्होंने उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी. उन्होंने 5 अप्रैल 1931 को कांग्रेस के कराची अधिवेशन को संबोधित करते हुए कहा, ऐसे बहादुर बनो जैसे भगत सिंह और उनके साथी. उन्होंने क्षमा याचना नहीं की. अपना सर्वस्व त्याग देने की ठान ली ताकि भारत स्वतंत्र हो जाए, लेकिन सारा देश चाहता था कि उनका जीवन बचाया जा सके. यदि कांग्रेस औपचारिक रूप से भगत सिंह और साथियों के मृत्युदंड के लघुकरण की मांग रखती तो इससे उसे किसी प्रकार की हानि नहीं होती, बल्कि वह दुनिया की नजरों में ऊंची उठ जाती और भगत सिंह की जीवन रक्षा भी कर सकती थी. भले सरकार इस मांग को नामंजूर कर देती, लेकिन कांग्रेस को यह संतुष्टि तो होती कि उसने अपने दायित्व का निर्वाह कर किया.

यह सही है कि सुभाष बाबू में भगत सिंह के लिए आदर और प्रेम था लेकिन जहां तक उनके समाजवाद पर भगत सिंह की आलोचना है वह एक हद तक सही है. सुभाष बाबू समाजवाद को भारतीय राष्ट्रीयता से जोड़ने के हिमायती थे. जहां वे विभिन्न जातियों के रक्तमिश्रण और विभिन्न संस्कृतियों के अंतरावलंबन से नए राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे वहीं वे समाजवाद की ओर संकेत करते हुए यह भी कहते थे कि कोई भी सिद्धांत या `इज्म’ आप अपनाएं लेकिन यदि उसे सार्थक बनाना है तो अतीत के इतिहास की धारा और परिवेश को ध्यान में रखकर काम करना होगा. वे इस दृष्टि को भ्रामक मानते हैं कि सोशलिज्म या रिपब्लिकनिज्म पश्चिम की धारणा है. उनका मानना था कि इसकी झलक भारत में थी. इसी के साथ वे यह भी कहते हैं, ये सभी सिद्धांत या संप्रदाय न प्राच्य हैं, न पाश्चात्य वे विश्वमानव की संपत्ति हैं. भारत यदि आज तन मन से सोशलिज्म ग्रहण करने का संकल्प ले तो वह विदेशी संस्कार में पड़ जाएगा मैं ऐसा नहीं मानता.’

दरअसल सुभाष बाबू को समझने के लिए न तो मार्क्सवादी सिद्धांत समुचित है और न ही हिंदुत्ववादी. वे न तो महात्मा गांधी के पूरी तरह विरोधी हैं और न ही उनके समर्थक. उनका इस्तेमाल न तो गांधी को पीटने के लिए किया जाना चाहिए और न ही नेहरू को
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उनको लेकर एक सीमा से ज्यादा हिंसा और अहिंसा की बहस भी उचित नहीं है. उनका इस्तेमाल लंबे समय तक उत्तर भारत में चमत्कार करने और प्रभाव कमाने के लिए किया गया है, वह भी ठीक नहीं है. एक बार तो बाबा जयगुरुदेव ने कानपुर के फूलबाग में अपने को नेताजी घोषित कर दिया था. उसके बाद अयोध्या के एक गुमनामी बाबा को सुभाष बाबू कहा गया. इसी तरह से पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी नेताजी के नाम पर राजनीति करना ठीक नहीं है.

सुभाष बाबू वास्तव में भारत की महान क्रांतिकारी परंपरा के वाहक हैं. वे विश्व इतिहास के ज्ञान और उसकी प्रेरणाओं को भारत के वर्तमान से जोड़कर एक ओर तो युवाओं में विक्षोभ जगाना चाहते हैं तो दूसरी ओर आदर्श के प्रति एक आकर्षण. सुभाष बाबू ने अपनी क्रांति का जो मॉडल लिया था, वह दरअसल 1857 का था. उस मामले में वे भगत सिंह के बहुत करीब थे. जिस तरह भगत सिंह ने `दस मई का वह शुभ दिन’ लिखकर सत्तावन की क्रांति के फिर होने का आह्वान किया था वैसा ही आह्वान सुभाष बाबू का भी था. उनमें भी सत्तावन जैसे सांप्रदायिक सद्भाव और अन्याय से लड़ने का जज्बा था. दिल्ली चलो का नारा उन्होंने सत्तावन की क्रांति से ही लिया था. तभी आजाद हिंद फौज में गांधी, नेहरू ब्रिगेड के साथ जफर ब्रिगेड, झांसी की रानी ब्रिगेड बनाई गई थी.

लेकिन बाहर जापानी सेना की मदद से लड़ाई लड़ते हुए उन्हें यह अहसास था कि देश के भीतर अगर कामयाब होना है तो गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करना पड़ेगा. उधर अहिंसा में विश्वास करते हुए गांधी भी आजाद हिंद फौज के सेनानियों से पूरी सहानुभूति रखते थे. मद्रास में आजाद हिंद फौज के सेवामुक्त सैनिकों ने गांधी जी पूछा, हमने नेताजी के मार्गदर्शन में काम किया था. अब किसके नेतृत्व में काम करेंगे? तभी कैप्टन शाहनवाज ने उन्हें नेताजी के वक्तव्य की याद दिलाई कि `भारत से बाहर रहते हुए हमने आजादी के लिए हथियारों से युद्ध किया तो अब भारत की सेवा अहिंसा से करेंगे.’ शाहनवाज का यह बयान गांधी जी को बहुत भा गया. उन्होंने कहा, ` आजाद हिंद फौज का जादू हम पर छा गया है. नेताजी का नाम सारे देश में गूंज रहा है. वे अनन्य देशभक्त हैं. उनकी बहादुरी के सारे कामों में चमक रही है. उनका उद्देश्य महान था पर वे असफल रहे. असफल कौन नहीं रहा? हमारा काम तो यह देखना है कि हमारा उद्देश्य महान और सही हो.’

दूसरी ओर सुभाष बाबू ने गांधी जी की प्रशंसा और आदर दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधी आगा खां महल में नजरबंद थे तो उन्होंने गांधी की जयंती यानी 2 अक्तूबर 1943 को आजाद हिंद रेडियो से संदेश प्रसारित करते हुए उन्हें जन्मदिन की बधाई दी और राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया.


सुभाष बाबू ने गांधी पर एक किताब लिखी जिसका शीर्षक था `फादर आफ आल नेशन्स’. सुभाष बाबू के विमान हादसे में गायब होने के बाद महात्मा गांधी ने एक लेख लिखा जिसका शीर्षक था– क्या नेताजी जिंदा हैं? उसमें गांधी ने लिखा कि एक समय था कि जब अखबारों में खबर आई थी कि नेताजी का स्वर्गवास हो गया. मैंने उसे मान लिया. बाद में कहा गया कि वह खबर गलत थी. तबसे मुझे लगा कि जब तक उनका स्वप्न सिद्ध नहीं होता है तब तक वह मर नहीं सकते. इसके अलावा मैंने मान लिया था कि अपने दुश्मनों को और अपने कार्य के लिए जगत को भी धोखा देने की उनमें भारी शक्ति थी. उनके जिंदा मानने के सिर्फ यही कारण मेरे पास थे.’

दरअसल गांधी उन्हें पुत्रवत मानते थे. उन्हें इस बात का अफसोस था कि वे उन्हें समझा नहीं सके. जैसे वे अपने बड़े बेटे हरिलाल को नहीं समझा सके थे. या यूं कहें को यह रिश्ता कठोपनिषद के पात्र बाजश्रवा और नचिकेता जैसा था. वाजश्रवा भी अपने पुत्र को नहीं समझा सके और वह मृत्यु के देवता से साक्षात्कार करने चला गया था. यह दो पीढ़ियों का द्वंद्व है जो हर युग में चलता रहता है. लेकिन इससे यह नहीं सिद्ध होता कि वाजश्रवा के मन में नचिकेता के लिए प्रेम नहीं था या नचिकेता वाजश्रवा का आदर नहीं करता था. सुभाष बाबू को समझना उनके समाजवाद और राष्ट्रीय एकता के सपनों को समझना है और यह निश्चित है कि जब तक उनके सपने पूरे नहीं होते तब तक वे मरेंगे नहीं. वे बार बार जीवित ही दिखाई देंगे.

(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

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First published: January 23, 2021, 11:22 AM IST
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