OPINION: आखिर शासकों की पुलिस कब बनेगी जनता की पुलिस

पुलिस सुधारों के लिए दस साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर सुप्रीम कोर्ट से जीतने वाले और पिछले 14 सालों से उससे लागू करवाने के लिए संघर्ष कर रहे प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने लिखा था , `सुप्रीम कोर्ट ने जिन पुलिस सुधारों का आदेश दिया था वे आज भी अधर में लटके हुए हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: October 8, 2020, 12:27 AM IST
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OPINION: आखिर शासकों की पुलिस कब बनेगी जनता की पुलिस
2006 में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के लिए आदेश दिए थे
हाथरस की घटना पर छिड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बहस के बीच पुलिस सुधार का सवाल फिर अहम हो गया है. यह सवाल सिर्फ इसलिए नहीं प्रासंगिक है, क्योंकि पिछले दिनों देश भर के 90 से ज्यादा रिटायर आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि राष्ट्र के रूप में हमारा प्रशासन निरंतर वंचना और संवेदनहीनता के गर्त में गिरता जा रहा है. उन्होंने उत्तर प्रदेश की पिछले साढ़े तीन सालों की घटनाओं का हवाला देते हुए उसमें की गई प्रशासनिक कार्रवाई को पक्षपाती बताया है. उनका कहना है कि इस सरकार और प्रशासन में कानून के राज के प्रति कोई सम्मान नहीं है. लेकिन पुलिस सुधार का सवाल सिर्फ इतने से ही प्रासंगिक नहीं हुआ है. यह मसला लंबे समय से उठता रहा है.

यहां तक कि जब योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद की शपथ लिए हुए छह महीने भी नहीं बीते थे तभी भाजपा के ही नेता अनिल सिंह ने लोक अधिकार मंच के तत्वाधान में पुलिस सुधार पर 12 सितंबर 2017 को एक सेमिनार आयोजित किया. उस सेमिनार के लिए शुभकामना संदेश देते हुए मुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई थी, `मुझे विश्वास है कि संगोष्ठी में होने वाले विचार विमर्श से व्यावहारिक सुझाव प्राप्त होंगे.’ उस सेमिनार की स्मारिका में हिंदी के प्रसिद्ध विद्वान सूर्य प्रसाद दीक्षित ने लिखा था, `खाकी वर्दी पर तमगों से ज्यादा कलंक के धब्बे लगे हुए हैं. लोग पुलिस से खौफ खाते हैं और उसे अपना सहायक या मित्र मानने के बजाय प्रतिपक्षी मानते हैं.’ इसलिए उन्होंने शुद्ध संस्कारों वाली पुलिस तैयार करने का सुझाव देते हुए उम्मीद जताई थी कि उससे शुद्ध वैध कार्यवाही की अपेक्षा की जाती है.

पुलिस सुधारों के लिए दस साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर सुप्रीम कोर्ट से जीतने वाले और पिछले 14 सालों से उससे लागू करवाने के लिए संघर्ष कर रहे प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने लिखा था , `सुप्रीम कोर्ट ने जिन पुलिस सुधारों का आदेश दिया था वे आज भी अधर में लटके हुए हैं. निहित स्वार्थ के लोग चाहते हैं कि यथास्थिति कायम रहे, लेकिन ऐसा करते हुए वे पुलिस को उल्टी दिशा में ले जा रहे हैं. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य ने थोड़े थोड़े दिनों के लिए डीजीपी नियुक्त करके उस संस्था का मजाक बनाकर रख दिया है......सत्तरह राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बचने के लिए कानून पास कर दिए हैं. राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के फैसले में केंद्र और राज्य की ओर से तैयार किए जाने वाले और संसद व विधानसभा से पास होने वाले मॉडल पुलिस कानून के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं.
......लोकतांत्रिक ढांचा ढह जाएगा अगर हम अपराधियों को सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने से नहीं रोक सके. इसलिए आज हमारे पास जो शासकों की पुलिस है उसकी जगह पर हमें जनता की पुलिस की आवश्यकता है.’
प्रकाश सिंह की याचिका पर 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के लिए जो आदेश दिए थे, उसमें कई संस्थाओं के बनाए जाने का सुझाव था. उनसे पुलिस पर राजनीतिक नियंत्रण कम हो जाता और पुलिस बिना राजनीतिक दबाव के कानून के राज की रक्षा करते हुए जनता की पुलिस की तरह काम करती. उनमें राज्य सुरक्षा आयोग बनाने, डीजीपी, एसपी और एसएचओ का कार्यकाल कम से कम दो साल करने, जांच और कानून व्यवस्था के काम को अलग अलग करने, पुलिस स्थापना बोर्ड बनाने, राज्य और जिला स्तर पर पुलिस शिकायत प्राधिकरण बनाने और केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग गठित करने जैसे महत्त्वपूर्ण कदम थे. सन 2006 के बाद उत्तर प्रदेश में पहले बसपा की सरकार आई फिर सपा की और उसके बाद भाजपा की. लेकिन किसी ने इस दिशा में पहल नहीं की.

जाहिर है सभी राजनीतिक दलों को निष्पक्षता से भय लगता है और वे पुलिस को अपने विरोधियों और आम जनता के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहते हैं.

इस स्तंभकार ने सन 2016 में उत्तर प्रदेश के तत्काल डीजीपी जवीद अहमद से बात की थी. उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था,`पुलिस को समाज में शांति कायम करने से ज्यादा कानून का राज कायम करना चाहिए. समाज में जाति संघर्ष को हर हाल में दबाना उचित नहीं है. जो जातियां वर्षों से दबी रही हैं वे उठकर आगे आ रही हैं इसलिए समाजशास्त्रीय दृष्टि से जाति का संघर्ष एक रोचक परिघटना है. इससे लगता है कि समाज में मंथन हो रहा है. समाज संक्रमण के काल से गुजर रहा है. जब पुलिस कानून के राज के तहत कार्रवाई करेगी वह उनके विरुद्ध काम करेगी जिसने कानून के खिलाफ काम किया है.’ लेकिन उनका (दो साल का) कार्यकाल पूरा हो इससे पहले ही वहां सरकार बदल गई और उन्हें हटा दिया गया. उनके बाद भी आने वाले डीजीपी को भी टिकने नहीं दिया गया.दुष्यंत कुमार ने कहा था `यहां तक आते आते सूख जाती हैं कई नदियां, मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा.’ इसलिए ऐसा नहीं है कि देश और प्रदेश में पुलिस सुधार का विचार नहीं आया और उसके लिए प्रयास नहीं हुए. लेकिन इस देश के राजनीतिक दलों और नेताओं ने अपने निहित स्वार्थवश उनमें से प्राप्त सुझावों को लागू नहीं होने दिया. तमाम राज्य पुलिस आयोग बने, लेकिन उनकी रपटें धूल फांक रही हैं. राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशें भी उपेक्षित हैं. इस बारे में गोरे समिति, रिबेरो समिति, पद्मनाभैया समिति, मलिनाथ समिति, बोहरा समिति की सिफारिशें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. प्रकाश सिंह जैसी साख वाले पुलिस अधिकारी ने हरियाणा में 2016 में हुए आरक्षण के दंगों की जांच की थी. वे जब उसका वर्णन सुनाते हैं तो सिहरन दौड़ उठती है. एक तरह से वहां की जातिवादी पुलिस ने विद्रोह कर दिया था और राज्य में करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ था और कई लोगों की जान गई थी. पर वास्तव में किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. उनकी रिपोर्ट लागू होने का इंतजार कर रही है. उत्तर प्रदेश पुलिस के सांप्रदायिक चरित्र पर पूर्व पुलिस अधिकारी विभूति नारायण राय ने जो अपना शोध प्रबंध प्रस्तुत किया है, उसमें उसके सांप्रदायिक चरित्र की ओर इशारा किया है. वे मेरठ और मलियाना जैसे दंगों के साक्षी रहे हैं और उन्होंने उन अनुभवों के आधार पर अपनी बात कही है.

इस बीच जनवरी 2020 में जब उत्तर प्रदेश सरकार ने नोएडा और लखनऊ में कमिश्नर प्रणाली लागू की तो सरकार की तरफ से बड़े जोरशोर से प्रचार किया गया कि वहां पुलिस में बड़ा सुधार किया गया है. मीडिया ने उसे बहुत बड़ा कदम बताया. लेकिन वह तो ऊंट के मुंह में जीरे जैसा कदम था. एक तो वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहीं विशेष रूप से अपेक्षित नहीं है. पुलिस अपनी छवि को मैनेज करने की जितनी कोशिशें करती है स्थिति उतनी ही बिगड़ती जा रही है. मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की गई.

किसी भी घटना पर व्हाटसैप और फेसबुक पर पक्षपातपूर्ण बहस करने वाले मध्यवर्ग के अलावा ऐसे लोग सभी दलों में हैं जो चाहते हैं कि 22 करोड़ आबादी वाले इस प्रदेश की छवि सुधरे और उसके पास बेहतरीन पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था हो. आखिरकार प्रकाश सिंह, विभूतिनारायण राय या जवीद अहमद जैसे पुलिस अधिकारी तो उसी प्रदेश के काडर के हैं. लेकिन राजनीतिक दलों का नेतृत्व और असुरक्षित राजनेता नहीं चाहते कि वैसा हो. वे वैसी पुलिस चाहते हैं जो 1861 के पुलिस अधिनियम के तहत काम करे और उन सारे हथकंडों को अपनाए जो अंग्रेज अपनाते थे. पिछले दिनों सीएए एनआरसी पर चले विरोध के दौरान जब यूपी सरकार ने आंदोलकारियों की संपत्तियां जब्त करनी शुरू कीं तो गांधी के नमक आंदोलन का प्रसंग याद आ गया. इरविन से चली वार्ता के दौरान गांधी ने यह शर्त रखी थी कि जिन आंदोलनकारियों की संपत्तियां जब्त हुई हैं वह उन्हें वापस कर दी जाएं. इरविन कह रहे थे कि संपत्तियां तो नीलाम कर दी गईं इसलिए उन्हें नीलामी में लेने वालों से कैसे वापस लिया जाए. जबकि गांधी उस पर अड़े हुए थे. इसलिए वार्ता लंबी खिंच रही थी. यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि तमाम अंग्रेज वायसरायों में इरविन बहुत अच्छे माने जाते थे. इसलिए देश के इस सबसे बड़े राज्य की पुलिस को अगर शासकों की पुलिस का चोला उतार कर जनता की पुलिस का चोला पहनना है तो वहां सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप सुधारों की मांग उठनी चाहिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
अरुण कुमार त्रिपाठी

अरुण कुमार त्रिपाठीवरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है. कई समाचार पत्रों में मुख्य संपादक रहे हैं.

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First published: October 8, 2020, 12:27 AM IST
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