Bihar Election Result 2020: 10 प्वाइंट में समझें बिहार 2020 के जनादेश का संदेश

राजद नेता तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) ने अपनी राजनीतिक योग्यता और नेतृत्व क्षमता के जरिये साबित किया है कि अब वे नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के बाद बिहार में दूसरा सबसे बड़ा चुनावी चेहरा हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: November 11, 2020, 5:26 PM IST
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Bihar Election Result 2020: 10 प्वाइंट में समझें बिहार 2020 के जनादेश का संदेश
बिहार में एनडीए के नेतृत्व में सरकार बनने जा रही है.
2020 के जनादेश से बिहार की राजनीति में कई नये तथ्य स्थापित हुए हैं. ऐसा रोमांचक चुनावी मुकाबला बिहार में पहले कभी नहीं हुआ था. बिहार विधानसभा चुनाव में आखिर तक बहुमत को लेकर सस्पेंस बना रहा. पेश है इस चुनाव की 10 प्रमुख बातें.

तेजस्वी बिहार का दूसरे सबसे बड़ा चुनावी चेहरा
31 साल के तेजस्वी ने इस चुनाव के जरिये अपनी राजनीतिक योग्यता और नेतृत्व क्षमता को साबित किया. अब वे नीतीश कुमार के बाद बिहार में दूसरा सबसे बड़ा चुनावी चेहरा हैं. अक्सर ये सवाल पूछा जाता था कि बिहार में नीतीश का विकल्प क्या है ? अब इसका जवाब मिल गया है. तेजस्वी ने यह मुकाम लालू यादव की गैरमौजूगी में हासिल किया है इसलिए इसका महत्व और भी अधिक है. इसके पहले राजद के सहयोगी दल भी तेजस्वी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाते थे. अब इस बात पर पक्की मुहर लग गई कि महागठबंधन से तेजस्वी की सीएम चेहरा हैं. नीतीश कुमार जैसे तपेतपाये नेता को हार के कगार पर पहुंचा देना एक युवा नेता की बहुत बड़ी उपलब्धि है.

नीतीश कुमार ढलते हुए सूरज
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने राजनीतिक जीवन के चरम उत्कर्ष से अब ढलान पर हैं. इसके पहले तीन चुनावों में उन्होंने जिस आत्मविश्वास से जीत हासिल की थी वो 2020 में दिखायी नहीं पड़ी. आधे से अधिक सीटों पर हारना नीतीश के राजनीतिक सूरज के ढलने की निशानी है. ये सच है कि लोजपा की वजह से जदयू को बहुत नुकसान हुआ लेकिन जनता में नीतीश के खिलाफ नाराजगी भी थी. नीतीश सरकार के काम का सिक्का चलता तो उनकी पार्टी के पांच मंत्री चुनाव नहीं हारते. जनता में नाराजगी थी तभी उनको अतिपिछड़े समुदाय का समर्थन नहीं मिला. अगर मिला होता तो जदयू की ऐसी हार न होती. लोकसभा चुनाव के समय अतिपिछड़ों के रूप में नीतीश के साथ एक बड़ा तबका जुड़ा था. लेकिन कोरोना और बाढ़ के कारण लोगों को जो तकलीफ झेलनी पड़ी उससे इनके वोट के फैसले पर असर पड़ा. नीतीश ने धमदाहा की चुनावी सभा में पारी समाप्ति की घोषणा यूं ही नहीं की थी. अब लगता है नीतीश कुमार ने अपने मन बात कही थी.

जदयू से बड़ी पार्टी भाजपा
नीतीश कुमार अब बिहार में सबसे बड़ा चुनावी चेहरा नहीं रहे. ‘ब्रांड नीतीश’ अब पहले की तुलना में बेअसर दिखा. उनका चेहरा जीत की गारंटी नहीं. नीतीश की तुलना में ‘ब्रांड मोदी’ ज्यादा मजबूती से स्थापित हुआ. 2015 में नरेन्द्र मोदी, लालू-नीतीश के आगे फीके पड़ गये थे, लेकिन 2020 में मोदी ने बताया कि अब बिहार में वे एनडीए का सबसे बड़ा चेहरा है. भाजपा ने बिहार के चुनावी इतिहास में अब तक का दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. 2010 में भाजपा ने 91 सीटों जीती थीं तो 2020 में उसने 74 सीटों पर कब्जा जमाया. यानी भाजपा अब बिहार का दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है. राजद केवल एक सीट के अंतर से नम्बर एक पर है. इस तरह से भाजपा अब बिहार में एक बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरी है. जटिल जातीय व्यवस्था वाले बिहार की राजनीति के लिए यह एक बहुत बड़ा बदलाव है.लोजपा का अवसान
लोजपा प्रमुख चिराग पासवान ने जो रिवेंज गेम खेला था उससे उनकी पार्टी का वजूद खत्म होने के कगार पर पहुंच गया. जदयू को नुकसान पहुंचाने की नकारात्मक राजनीति से चिराग की पारी जमने से पहले ही लड़खड़ा गयी. उन्हें रामविलास पासवान ने बड़ी उम्मीदों से लोजपा की कमान सौंपी थी. लोजपा प्रमुख के रूप में ये उनका यह पहला विधानसभा चुनाव था. उन्हें बड़ा हिस्सा लेने के लोभ में वह भी गंवा दिया जो उनके पास मौजूद था. इस हार से चिराग को अंदाजा मिल गया कि अकेली लोजपा की बिहार में क्या हैसियत है. ऐसा नहीं है कि चिराग के कारण केवल जदयू को नुकसान हुआ बल्कि भाजपा को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ी है. चिराग ने भाजपा को भागलपुर और राघोपुर विधानसभा सीट पर हरवा दिया. अगर कहा जाए तो चिराग के कारण ही तेजस्वी और तेजप्रताप यादव इतनी आसानी से जीत गये. गलत फैसले की वजह से अब चिराग पासवान की केन्द्रीय राजनीति पर भी प्रभावित होगी.

लाल झंडे को संजीवनी
2015 के चुनाव में वामपंथ के नाम पर केवल भाजपा माले का विधानसभा में प्रतिनिधित्व था. सीपीआई या सीपीएम तो बिहार की राजनीति में कब का मृतप्राय हो चुकी थी. एक समय था जब बिहार में वामपंथी दल भी मजबूत थे. 1995 के चुनाव में सीपीआई के 26 विधायक चुने गये थे. सीपीएम को भी दो सीटें मिलीं थीं. लेकिन पिछले 20 साल ये हाशिये पर चली गयीं. 2020 में अचानक इन्हें संजीवनी मिल गयी. राजद से तालमेल का सबसे अधिक फायदा भाकपा माले को मिला. 2015 में उसके तीन विधायक थे. 2020 में माले को बारह सीटों पर जीत मिली है. उसे नौ सीटों का फायदा हुआ. 2020 में सीपीआई और सीपीएम को भी दो-दो सीटें मिलीं.

बिहार में तीसरे या चौथे मोर्चे के लिए जगह नहीं
2020 के विधानसभा चुनाव में पूर्व सांसद पप्पू यादव ने चार दलों के गठबंधन से प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक एलायंस बनाया था, लेकिन पप्पू यादव खुद अपने गढ़ मधेपुरा में हार गये. उनके गठबंधन का एक भी उम्मीदवार नहीं जीता. इसी तरह उपेन्द्र कुशवाहा ने असदुद्दीन ओवैसी और मायावती के साथ मिल कर एक और गठबंधन बनाया था. बसपा ने एक सीट और ओवैसी की पार्टी ने पांच सीटें जीत कर कुछ तो अपनी लाज रखी लेकिन उपेन्द्र कुशवाहा की रासलोसपा का खाता तक नहीं खुला. कुशवाहा को सीएम उम्मीदवार बनने की बहुत तमन्ना थी. वो तो पूरी हो गयी लेकिन इस तमन्‍ना में उनकी पार्टी की हैसियत भी सामने आ गयी. पप्पू यादव और उपेन्द्र कुशवाहा की नाकामी से ये साबित हो गया कि बिहार की राजनीति सिर्फ दो ध्रुवीय है. एनडीए और महागठबंधन के अलावा किसी अन्य गठबंधन के लिए कोई गुंजाइश नहीं.

रोजगार बड़ा चुनावी मुद्दा
तेजस्वी की पहल ने बिहार की राजनीति में रोजगार को एक बड़ा मुद्दा बना दिया. महागठबंधन को सत्ता तो नहीं मिली लेकिन इस मुद्दे की धमक ने एनडीए की मजबूत जमीन को हिला दिया. माना जा रहा है कि अगड़ी जाति के युवा वोटरों की एक बड़ी तादाद ने महागठबंधन को वोट दिया है. उम्र दराज सवर्ण वोटरों ने भले 10 लाख रोजगार के वादे की अनदेखी की लेकिन युवा वोटर इस वायदे से प्रभावित दिखे. कोरोना संकट के समय दूसरे राज्यों से श्रमिक लौटे थे उनको भी तेजस्वी ने लुभाया. बिहार में अब सकारात्मक मुद्दे प्रभावी हो रहे हैं, यह राजनीति के लिए शुभ संकेत है.

महिला वोटरों ने बचायी नीतीश की साख
नीतीश कुमार के लिए महिला वोटरों का समर्थन संजीवनी साबित हुआ. अगर महिला वोटरों का साथ नहीं मिला होता तो शायद नीतीश आज सत्ता से बाहर होते. पंचायती राज संस्थाओं में पचास फीसदी आरक्षण, सिपाही बहाली में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत आरक्षण, कन्या उत्थान योजना के तहत पढ़ने वाली लड़कियों को दस हजार से लेकर 25 हजार तक का वजीफा और शराबबंदी जैसे काम से बिहार की आधी आबादी नीतीश कुमार की मुरीद है. जब नीतीश चुनावी संकट में फंसे तो इस नारी शक्ति ने उन्हें उबार लिया. हर समुदाय की महिलाओं ने नीतीश को भरपूर समर्थन दिया.

नीतीश को संदेश
इस चुनाव में जनता ने नीतीश कुमार के प्रति तो नाराजगी दिखायी लेकिन भाजपा को बख्श दिया. दरअसल शासन की बागडोर नीतीश कुमार के हाथों में केन्द्रित है. भाजपा शासन में भागीदार तो है लेकिन वह स्वतंत्र फैसले नहीं ले सकती. शासन की नाकामी के लिए जनता ने सिर्फ नीतीश कुमार को जिम्मेवार माना. इसलिए खिलाफ में वोट भी किये. अब नीतीश कुमार को सैद्धांतिक बातों की जगह हकीकत की जमीन पर उतर कर शासन करना होगा. उन्होंने वायदे के मुताबिक बाहर से आये श्रमिकों को बिहार में काम नहीं दिया. इसकी नतीजा ये हुआ कि बिहार से लोग फिर पलायन करने लगे. चुनावी नतीजों ने नीतीश कुमार को ये संदेश दिया है अब अपने शासन की खामियों को पहचान कर उसका निराकरण करें.

भाजपा से तालमेल जरूरी
जंगलराज की वापसी का डर दिखा कर बहुत दिनों राजनीति हुई. इस बार भी एक हद तक फायदा मिला. लेकिन अब ये घिसापिटा फार्मुला आगे नहीं चलने वाला. नीतीश कुमार को भाजपा से तालमेल बना कर फिर 2005 का दौर लाना होगा जब सच में गुड गवर्नेंस की कोशिश हुई थी. चुनाव के आखिरी लम्हों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपील कि थी, मुझे फिर नीतीश सरकार चाहिए. इस अपील ने तीसरे चरण की चुनावी बाजी पलट दी थी. नीतीश कुमार को इस अपील की लाज रख कर अब भाजपा से समन्वय बना कर सुखद नतीजे देने होंगे. इसके पहले दोनों दलों के बीच रह-रह कर खटपट होती थी जिससे जनता में गलत संदेश जाता था. अब टकराव से बचना होगा.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
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First published: November 11, 2020, 5:26 PM IST
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