क्या हमें नवरात्रि में देवियों की पूजा करने का हक है?

क्या हम महिलाओं, कन्याओं को सम्मान सिर्फ साल के 18 दिन ही देंगे. 9 दिन शारदीय नवरात्र के और 9 दिन चैत्र नवरात्र के. बाकि दिनों में उनके दामन में कभी न निकलने वाले कांटे चुभाएंगे या घाव देंगे जिसे वह चाहे भी तो दिमाग से न निकाल सकें. हाथरस, दिल्ली में निर्भया और ऐसी ही अनगिनत घटनाएं हैं जो हमें शर्मसार करती है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 17, 2020, 5:57 AM IST
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क्या हमें नवरात्रि में देवियों की पूजा करने का हक है?
जिस देश में महिलाओं को देवी मानकर पूजा की जाती हैं वहां आज ये सवाल जेहन में आता है कि क्या वाकई हम नवरात्रि के पावन दिनों में या आम दिनों में ही माता को पूजने के काबिल हैं?
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नवरात्रि (Navratri 2020) के पहले दिन हर घर में माता की मूर्ति स्थापित की जाएगी. लाल चुनरी, नारियल, कलेवा, कई तरह के मिष्ठान से माता को प्रसन्न करने की कोशिश की जाएगी. माता को प्रसन्न करने वाले हम घर की देवी को ही भूल जाते हैं. जिस देश में महिलाओं को देवी मानकर पूजा की जाती है वहां आज ये सवाल जेहन में आता है कि क्या वाकई हम नवरात्रि के पावन दिनों में माता को पूजने के काबिल हैं? परंपरा, पूर्वजों की कृपा, 33 करोड़ देवी-देवाओं का आशीर्वाद न जानें किन-किन बहानों से कन्या के रूप में पूजी जाने वाली बच्चियां अपने घर में ही सुरक्षित नहीं हैं तो कैसे हम नवरात्रि मनाने के काबिल हो गए? 


या यूं कहें कि हम महिलाओं, कन्याओं को सम्मान सिर्फ साल के 18 दिन (9 दिन शारदीय नवरात्र के और 9 दिन चैत्र नवरात्र के) ही देंगे. बाकी दिनों में उनके दामन में कभी न निकलने वाले कांटे चुभाएंगे या यूं कहें कि वो घाव देंगे जिसे वो चाहे भी तो दिमाग से न निकाल सकें. हाथरस की गुड़िया, दिल्ली में निर्भया और न जानें कितनी ही ऐसी घटनाएं हैं जो हमें शर्मसार करती हैं. मीडिया या सोशल मीडिया पर बात उठती है तो पीड़ित परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद नजर आती है, लेकिन अफसोस तो इस बात का है कि हमारे यहां ज्यादातर मामलों में शिकायत दर्ज ही नहीं होती है तो मुद्दा उठेगा कैसे? 

 अगर उठ भी गया तो क्या न्याय मिलेगा? एक लड़की की आबरू को सरेआम तार-तार करने वालों को तो सज़ा कई सालों बाद मिली थी, वो भी तब जब दिल्ली से लेकर मुंबई तक में प्रदर्शन हुए. जंतर-मंतर पर कई महीनों तक धरना दिया गया. लाखों रुपये की कैंडल जलाई गईं, कोर्ट में केस लड़ा गया. तो जिन लड़कियों के साथ जघन्य अपराध हुए अगर उनके सपोर्ट में ये सब नहीं हुआ तो न्याय तो छोड़िए पीड़ित परिवार की एफआईआर भी दर्ज नहीं हो पाएगी. लोकलाज के कारण भी ऐसे मामलों को पीड़िता के परिजनों द्वारा दबा दिया जाता है. 

अब जब बात निकली है तो दूर तक जाएगी. महिला अपराध का आंकड़ा भी हमारे देश में कुछ ऐसा ही है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि महिलाओं को देवी के रूप में पूजने वाले भारत में 2019 में रोजाना औसतन 87 दुष्कर्म के मामले सामने आए. एनसीआरबी की ओर से 29 सितंबर को जारी 'भारत में अपराध-2019' (Crimes in India-2019) नामक यह रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 7.3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. साल 2019 में प्रति एक लाख की आबादी पर दर्ज महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर 62.4 फीसदी रही. साल 2018 में यह दर 58.8 फीसदी थी.


खास बात ये है कि भारत में महिला अपराध के जितने भी मामले दर्ज किए जाते हैं उन्हें करने वाले 70 फीसदी मित्र, पारिवारिक सदस्य या कोई जान-पहचान का व्यक्ति ही होता है.
भारत में जिस तरह महिला अपराध के आंकड़े बढ़ रहे हैं उसे देखकर अगर ये कहा जाए कि वो दिन दूर नहीं जब हर घर में एक प्रताड़ित स्त्री मिलेगी तो गलत नहीं होगा. वो प्रताड़ना चाहे शारीरिक हो, दहेज की हो या फिर किसी अन्य से संबंधित हो. 


ऐसा नहीं है कि हमारे यहां देवी तुल्य महिलाओं के हक में कानून नहीं बनाए गए हैं. भारतीय महिलाओं को अपराधों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करने, उनकी आर्थिक और सामाजिक दशाओं में सुधार करने हेतु ढेर सारे कानून बनाए गए हैं. इनमें अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956, दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, कुटुंब न्यायालय अधिनियम 1984, महिलाओं का अशिष्ट-रुपण प्रतिषेध अधिनियिम 1986, गर्भाधारण पूर्व लिंग-चयन प्रतिषेध अधिनियम 1994, सती निषेध अधिनियम 1987, राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1990, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006, कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध, प्रतितोष) अधिनियम 2013 समेत कानून में कई ऐसी धाराएं हैं जिन्हें जमीनी स्तर पर लागू किया जाए तो रावण, सीता हरण तो दूर उनके पास जाने से पहले भी 100 नहीं बल्कि 200 बार सोचेगा. 


दरअसल, हमारे देश में महिलाओं के उत्पीड़नकर्ताओं के मन में सजा का भय नहीं है. यही वजह है कि रेप, यौन उत्पीड़न के मामलों का ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है. हम घर में लड़कियों को कैसे रहना, किस तरह के कपड़े पहनना ये तो सिखा रहे हैं, लेकिन लड़कों को लड़कियों से कैसे व्यवहार करना चाहिए ये नहीं सिखा पा रहे हैं. एक लड़की अगर पलट कर जवाब देती है तो उसका घर से बाहर जाना बंद करवा दिया जाता है, लेकिन एक लड़का अगर ये काम करता है तो ज्यादातर माता-पिता उसे टोकने के बजाय शह देते हैं. आज हमें समाज के हर शख्स को ये सिखाने की नौबत आ गई है कि सिर्फ 18 दिन के लिए महिलाएं देवी नहीं होती है, वो हर वक्त देवी है. जिस लाल चुनरी से माता को प्रसन्न किया जाता है उसे अब सिर पर बांधने की जरूरत है, ताकि सोच बदली जा सके. जब तक यौन उत्पीड़न के मामले में शत-प्रतिशत गुनाहगारों को सजा नहीं मिलेगी तब तक ऐसे दुष्कृत्य थमने वाले नहीं हैं. जिस दिन हमारे यहां सोच बदलेगी, महिलाओं को सामान नहीं बल्कि हर तरफ से सम्मान मिलेगा उसी दिन हम असल मायनों में नवरात्रि मनाने और माता के स्वरूपों के रूप में कन्या को पूजन का हक रख पाएंगे. (डिसक्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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First published: October 17, 2020, 5:57 AM IST
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