अबूझे छंद का सिनेमा

दुनिया का तमाम सिनेमा किसी गद्य कृति की तरह पढ़ा जा सकता है — अपनी रूह में कथात्मक, लगभग औपन्यासिक.

Source: News18Hindi Last updated on: August 30, 2020, 6:57 PM IST
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अबूझे छंद का सिनेमा
'इवेन रेड कैन बी सेड' का एक दृश्य. (तस्वीरः सोशल मीडिया से)
रामकुमार के चित्रों के रंग अरसे तक धूसरित-स्लेटी या बड़े धुँधलाए हुआ करते थे. जब वह चटख लाल और हरे की तरफ़ आए, प्रयाग शुक्ल ने उनसे पूछा: “लगता है आपके चित्रों से अवसाद जा रहा है.” रामकुमार बोले: “लाल भी उदास हो सकता है.”

यह वाक़या अमित दत्ता की फ़िल्म ‘इवेन रेड कैन बी सैड’ में दर्ज है जो उन्होंने रामकुमार पर बनाई है. शिमले को हिंदी में निर्मल वर्मा का शहर माना जाता है. रामकुमार के शिमले की कथा कहती यह फ़िल्म इस शहर की हमारी साहित्यिक स्मृति को दृश्य देती है. वह शिमला जिसकी पहाड़ी पर रोशनियाँ पूरी रात किसी दीर्घ अलाप में सिहरती हैं, जिसकी धुँध अबूझी माया की तरह आपका रास्ता रोकती है. इस शिमले को अमित का कैमरा किसी प्रतीक्षारत साधक की तरह दर्ज करता है. सृष्टि को समझने की आकांक्षा लेकिन अधीरता क़तई नहीं. आप रियाज़ में बैठे रहें, प्रकृति आप ही उतर आएगी.

अमित ने अपनी किसी किताब में सिनेमा को उसकी आत्म-छवि से मुक्त कराने पर जोर दिया है. दुनिया का तमाम सिनेमा किसी गद्य कृति की तरह पढ़ा जा सकता है — अपनी रूह में कथात्मक, लगभग औपन्यासिक. अमित अपनी सिनेमा को कला की विभिन्न विधाओं से सींचते हैं. चित्रकला और संगीत की उर्वर भूमि पर, रंग और स्वर के सम्भोग से उनका सिनेमा काव्य-पाठ करता है. चूँकि वह सिनेमा के प्रचलित आख्यान से परे चले जाते हैं, उनकी फ़िल्मों को सुविधाजनक रूप से वृत्तचित्र भी कह दिया जाता है. दरअसल वृत्तचित्र का भ्रम कराती उनकी फ़िल्में किसी अबूझे छंद में रची कविताएँ हैं जिनके ज़रिए वह सिनेमा की फ़ॉर्म का विस्तार करते हैं.

विविध विधाओं में इस फ़िल्मकार की पहुँच उसके सिनेमा को समृद्ध करती है. शतरंज के माहिर खिलाड़ी, अमित साहित्य की अनेक विधाओं में भी साधिकार दख़ल रखते हैं. एक उपन्यास, गोंड चित्रकार जनगढ़ सिंह श्याम पर किताब, कई कविताओं के बाद अब वह शतरंज को केंद्र में रख एक बड़ा उपन्यास लिख रहे हैं.
अमित उन विरले फ़िल्मकारों में हैं जिन्होंने दुनिया भर के तमाम अवॉर्ड हासिल करने के बाद, अनेक महोत्सवों में सिंहावलोकन के बाद भी अपनी फ़िल्में कभी किसी सार्वजनिक प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं दी. सोशल मीडिया और किसी भी क़िस्म के आत्मप्रचार से दूर रहे. पिछले दो दशकों से उनका सिनेमा फ़िल्म महोत्सवों या चुनिंदा दोस्तों के लिए रहा आया. हाल ही उन्होंने मूबी को अपनी कई फ़िल्मों के अधिकार दिए, तब यह विलक्षण सिनेमा आम दर्शक के पास आया.

मेरी दो सर्वप्रिय फ़िल्में हैं — अठारहवीं सदी के एक चित्रकार की कथा ‘नैणसुख’ और हालिया ‘विटगेंसटाइन प्लेज़ चेस विद मार्सेल दूशाँ’.

कुछ फ़िल्मकार त्रासदी के स्वभाव और अनिवार्यता को परखते हैं, कोई मानव अस्तित्व का संधान करता है. अमित का सिनेमा उल्लास या अवसाद से परे का सिनेमा है. अनुभूति की अवस्था जो सुख या पीड़ा के द्वैध और उमंग या कुंठा के भेद से परे है. यह शांत रस का सिनेमा है. उनके किरदार तलाश में तो हैं, लेकिन लक्ष्य से दूरी या असंभाव्यता उन्हें नहीं कचोटती. इस सिनेमा को देखते वक़्त आप मद्धिम होते जाते हैं. किसी चीज़ का साक्षात करता कोई इंसान अचम्भित हो ठिठक गया है. जिस तरह किसी पेंटिंग को थोड़ा पीछे हट देखते हैं, उसी तरह यह इंसान दृश्य को थोड़ा दूर से एकटक देख रहा है. उसके भीतर कुतूहल तो है लेकिन दृश्य में हस्तक्षेप की कोई आकांक्षा नहीं.सिनेमा में दृश्य की रचना और स्वभाव कैमरे और विषय के अंर्तसंबंध से तय होते हैं. अमित का कैमरे विषय के साथ बड़ा निस्संग संबंध बनता है. वह विषय को अबोध-अबोली भाषा में ख़ुद को व्यक्त करने का स्पेस देते हैं. हैरान रह जाइए कि वह इस प्रशांत भाव को अक्सर चटख रंगों से हासिल करते हैं. मसलन वह दृश्य जब नैणसुख हरी घास के अंतहीन मैदान के बीच बिछी बारीक भूरी पगडंडी पर चलता जा रहा है.

लेकिन क्या महान कला पीड़ा के बग़ैर सम्भव है? वह पर्दे पर न भी नज़र आए, कहीं दूर से डोरियाँ खींचती है. एक घटना याद आती है. अमित ने बहुत पहले रॉबर्ट ब्रेस्सों की ‘मूशेटे’ देखी थी जिसमें बच्ची की आत्महत्या के दृश्य ने उन्हें सिनेमा विधा की तरफ़ खींच लिया था. यह उनकी चेतना पर सिनेमा की पहली दस्तक थी. बरसों बाद एक दूसरी आत्महत्या घटित हुई,जब अमित पुणे के फ़िल्म संस्थान में थे, जनगढ़ सिंह श्याम ने खुद को जापान में ख़त्म कर दिया था. इस घटना ने उन्हें बीसवीं सदी की भारतीय कला और आधुनिकता के अंतर्संबंध को परखने पर प्रेरित किया जिस पर उन्होंने बाद में एक बेहतरीन किताब भी लिखी.

इन दिनों अमित कृष्ण बलदेव वैद पर अपनी फ़िल्म को अंतिम रूप दे रहे हैं. वैद से न्यूयॉर्क में लिए लम्बे साक्षात्कार पर बनी इस फ़िल्म को अंत का इंतज़ार करते एक वयोवृद्ध लेखक के आख़िरी क़लाम बतौर भी पढ़ा जा सकता है.

मृत्यु कितने रूप में, कितने आसमानों से गुजरती कलाकार के पास आती है शायद इसका अंदाज़ा उसे भी नहीं होता.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
आशुतोष भारद्वाज

आशुतोष भारद्वाजलेखक, पत्रकार

गद्य की अनेक विधाओं में लिख रहे गल्पकार -पत्रकार-आलोचक आशुतोष भारद्वाज का एक कहानी संग्रह, एक आलोचना पुस्तक, संस्मरण, डायरियां इत्यादि प्रकाशित हैं। चार बार रामनाथ गोयनका सम्मान से पुरस्कृत आशुतोष 2015 में रॉयटर्स के अंतर्राष्ट्रीय कर्ट शॉर्क सम्मान के लिए नामांकित हुए थे। उन्हें भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, और प्राग के 'सिटी ऑफ़ लिटरेचर' समेत कई फेलोशिप मिली हैं. दंडकारण्य के माओवादियों पर उनकी उपन्यासनुमा किताब, द डैथ स्क्रिप्ट, हाल ही में प्रकाशित हुई है.

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First published: August 30, 2020, 6:57 PM IST
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