विलोम: अभाव का रूपक- बिहार

बिहार शायद देश का अकेला राज्य होगा जिसके शहरों का संबंध अपनी राजधानी के बजाय दूर प्रदेशों के महानगरों से कहीं सघन और जीवंत है. दिल्ली या पंजाब जाने के लिए बिहार के अनेक छोटे शहरों मसलन कटिहार, पूर्णिया, बेतिया और छपरा से सीधी रेलगाड़ियां हैं लेकिन पटना के लिए एक भी क़ायदे की रेल नहीं है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 27, 2020, 12:00 PM IST
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विलोम: अभाव का रूपक- बिहार
नीतीश के शासन को बेनक़ाब करते वक़्त पुष्यमित्र के लेखन में राजनीति या राजनेताओं के प्रति घृणा नहीं उमड़ती.
दिल्ली या पंजाब जाने के लिए बिहार के अनेक छोटे शहरों मसलन कटिहार, पूर्णिया, बेतिया और छपरा से सीधी रेलगाड़ियां हैं लेकिन इन शहरों से सूबे की राजधानी पटना के लिए एक भी क़ायदे की रेल नहीं है. बिहार शायद देश का अकेला राज्य होगा जिसके शहरों का संबंध अपनी राजधानी के बजाय दूर प्रदेशों के महानगरों से कहीं सघन और जीवंत है. इस विचित्र परिघटना को कैसे समझा जाए?

जवाब पुष्यमित्र अपनी हालिया किताब ‘रुकतापुर’ में देते हैं: 'दरअसल बिहार की तमाम ट्रेनें पलायन एक्सप्रेस हैं. यह ट्रेनों के नाम से ही पता चल जाता है. ये रेलगाड़ियां पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली जैसे विकसित राज्यों को सस्ते मजदूर सप्लाई करने के लिए चलाई जाती हैं. बिहार वालों की सुविधा के लिए नहीं.' यह स्थिति बिहार को एक अबूझ पहेली बनाती है. कभी ज्ञान (गया), शिक्षा (नालंदा) और सत्ता (मगध) की राजधानी रहा बिहार स्वतंत्र भारत के तमाम अभावों और अव्यवस्थाओं का रूपक बन गया है.

रुकतापुर, जहां हर गाड़ी रुक जाती है. लेखक-पत्रकार पुष्यमित्र इसी रुकी हुई गाड़ी के इंजन को टटोलते हैं. यह किताब इस अभाव की वजह तो नहीं बतलाती, लेकिन इसके अनेक चेहरों को उघाड़ देती है. पत्रकारों द्वारा अपनी ‘बीट’ पर लिखी किताबें उनकी प्रकाशित ख़बरों का किंचित विस्तृत रूप हो जाने का जोखिम लिए रहती हैं. ‘रुकतापुर’ इस संकट से प्रायः मुक्त है. यह एक पत्रकार की व्यक्तिगत नोटबुक है, उनकी प्रकाशित खबरों की उत्तर-कथा भी, और बतौर नागरिक उनके सरोकारों का सूचक भी.

निर्जीव योजनाएं
बिहार में हर साल बाढ़ तबाही मचाती है. देश का 16.5 बाढ़-ग्रस्त इलाक़ा और 22.1 बाढ़-प्रभावित आबादी इस राज्य में है. 1954 में बिहार के कुल 94.16 लाख हेक्टेयर भू-क्षेत्र में क़रीब 25 लाख हेक्टेयर बाढ़-प्रभावित था. इसके बाद कोसी नदी पर तटबंध बना बाढ़ को रोकने की परियोजना शुरू हुई. अगले पचास वर्षों में बिहार की नदियों पर कुल 3454 किमी तटबंध निर्मित हो गए लेकिन बाढ़-प्रभावित भूमि तिगुनी से भी अधिक यानी 73 लाख हेक्टेयर हो गयी.

क्यों? पुष्यमित्र जल विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र को उद्धृत करते हैं कि तटबंधों ने नदियों को अधिक उग्र बना दिया, वे नए इलाक़ों में जा विध्वंसक हो गयीं. नदियां गाद से भी भर गईं, तटबंधों की देख-भाल पर हरेक साल सैकड़ों करोड़ अलग खर्च होने लगा.

इस अध्याय को पढ़ते वक़्त मुझे याद आया कि कई बरस पहले मैंने अनुपम मिश्र से पूछा था: 'बाढ़ क्यों आती है?' 'पानी की अपनी स्मृति होती है. आप उसे अपनी जगह से हटायेंगे, वह वापस लौट आएगा.'
बिहार की नदियों पर बने ये तटबंध भारतीय विकास योजनाओं की जड़ता साबित करते हैं. पुष्यमित्र अपनी किताब में सात मसलों को उठाते हैं — बेरोज़गारी, बाढ़, कुपोषण और अकाल मृत्यु, भूमिहीनता, पिलपिली शिक्षा व्यवस्था इत्यादि. एक समूचा अध्याय स्त्रियों के प्रतिरोध की कथा कहता है.

प्रदेश भर में घूमकर अर्जित की कथाओं से पुष्यमित्र अपना आख्यान रचते, आंकड़ों से पुष्ट करते हैं. बाढ़ की तरह चमकी बुख़ार हर साल बिहार को अपनी चपेट में लेता है. 2019 में हुए 225 परिवारों के सर्वेक्षण ने बताया कि बुख़ार से प्रभावित 27.8 प्रतिशत बच्चे महादलित परिवारों से थे, 10.1 प्रतिशत दलित, 16.3 अति पिछड़ा समुदाय, 10 प्रतिशत मुस्लिम, और सामान्य श्रेणी के सिर्फ़ 3.5 प्रतिशत.
इन बच्चों में सिर्फ़ 15.2 प्रतिशत स्कूल जाते थे, 81.5 प्रतिशत परिवारों के पास आयुष्मान कार्ड नहीं था, 34 प्रतिशत बच्चों को इलाज के बाद कई अन्य क़िस्म की दैहिक और मानसिक समस्याओं ने जकड़ लिया. बीमारी भी ग़रीबी और जाति देखकर अपने शिकार चुनती है. हाल ही केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमन ने चुनावी घोषणापत्र में मुफ़्त कोरोना वैक्सीन देने का वायदा किया है. उनकी सरकार ने अगर चमकी बुख़ार की वैक्सीन दिलवा दी होती, उन पर भरोसा करना आसान होता.

नीतीश का कार्यकाल
बिहार के इतिहास में तीन सरकारें क़रीब पंद्रह बरस चली हैं. अप्रैल 1946 से 1961 तक श्रीकृष्ण सिंह, लालू यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी, और नीतीश कुमार. तिहत्तर वर्ष में से कुल 45 वर्ष मज़बूत सरकारें रहीं हैं. श्रीकृष्ण सिंह के कार्यकाल की समाप्ति पर बिहार तमाम सूचकांकों में भारतीय औसत के क़रीब था, लेकिन उसके बाद पिछड़ता गया. 1960 में बिहार की प्रति व्यक्ति औसत आय 215 रुपए थी, देश की 249. आज देश की औसत आय 103870 है, बिहार की 35590.

लालू से निराश होकर जनता ने नीतीश को चुना था. पंद्रह वर्ष बड़ी अवधि है लेकिन नीतीश कोई बड़ा परिवर्तन नहीं कर पाए हैं, उलटे कई जगहों पर स्थिति बदतर हुई है.


2006-07 में बिहार के अस्सी प्रतिशत किसान सीमांत थे, 2015-16 में यह संख्या बढ़कर 91.1 हो गयी, यानी खेती और किसान डूबते गए हैं. यह उल्लेखनीय है कि नीतीश के शासन को बेनक़ाब करते वक़्त पुष्यमित्र के लेखन में राजनीति या राजनेताओं के प्रति घृणा नहीं उमड़ती. उनका स्वर तटस्थ लेकिन करुणा में डूबा रहता है. इस संवेदनशील किताब में लेकिन अंग्रेज़ी शब्दों की बेवजह आवृत्ति अखरती है. सही है कि कई अंग्रेज़ी शब्द हिंदी में सहज प्रयोग किए जा सकते हैं लेकिन यहां नहीं.

मसलन ये उदाहरण: 'प्लेटफ़ॉर्म के वेंडर से बारगेनिंग करते हैं', 'जज इस तरह के मुक़दमों को एंटरटेन कहां करते हैं', 'सरकार ने उनकी ज़मीनें एक्वायर कर ली हैं'. बिहार चुनाव के दौरान आई इस किताब को अपने साथ रखने पर पत्रकार और विश्लेषक को मदद मिल सकती है. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
आशुतोष भारद्वाज

आशुतोष भारद्वाजलेखक, पत्रकार

गद्य की अनेक विधाओं में लिख रहे गल्पकार -पत्रकार-आलोचक आशुतोष भारद्वाज का एक कहानी संग्रह, एक आलोचना पुस्तक, संस्मरण, डायरियां इत्यादि प्रकाशित हैं। चार बार रामनाथ गोयनका सम्मान से पुरस्कृत आशुतोष 2015 में रॉयटर्स के अंतर्राष्ट्रीय कर्ट शॉर्क सम्मान के लिए नामांकित हुए थे। उन्हें भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, और प्राग के 'सिटी ऑफ़ लिटरेचर' समेत कई फेलोशिप मिली हैं. दंडकारण्य के माओवादियों पर उनकी उपन्यासनुमा किताब, द डैथ स्क्रिप्ट, हाल ही में प्रकाशित हुई है.

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First published: October 27, 2020, 11:58 AM IST
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