विलोम: असहनीय अभाव का साहित्य

जमैका के उपन्यासकार मार्लन जेम्स ने अपने हालिया उपन्यास में लिखा है कि अगर आपको उस मनुष्य का नाम नहीं मालूम जिससे आप बदला ले रहे हैं, तो आप ईश्वर पर हमला करने का जोखिम उठाते हैं. इस ईश्वर को बचाने का दायित्व जितना सैनिक का है, उतना ही पत्रकार और लेखक का भी.

Source: News18Hindi Last updated on: June 20, 2020, 4:29 PM IST
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विलोम: असहनीय अभाव का साहित्य
जॉर्ज फ्लॉयड की मौत से कई सवाल खड़े हुए हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
अमेरिका में जॉर्ज फ़्लॉयड की मृत्यु के बाद मुझे अफ़्रीकी मूल की एक अमेरिकी स्त्री की वह कथा याद आई जो नोबेल पुरस्कार लेते वक़्त अपने भाषण में टोनी मोरिसन ने सुनाई थी. ग़ुलाम बस्ती में रह रही उस अंधी लेकिन विद्वान स्त्री का अपने इलाक़े में बहुत सम्मान था. एक दिन कुछ गोरे आदमी उसे अपमानित करने के लिए उसके पास आते हैं. उनमें से एक पूछता है: 'मेरे हाथ में एक चिड़िया है. यह जीवित है या मर चुकी है?' वे जानते हैं कि वह उत्तर नहीं दे सकती. वह उन आदमियों को नहीं देख सकती, चिड़िया तो दूर की बात है. उसके लम्बे मौन पर जब आगंतुक हंसने लगते हैं तो वह जवाब देती है -'यह तुम्हारे हाथ में है'- और इस तरह ज़िम्मेदारी आगंतुकों पर आ जाती है.

अगर इस रूपक को साहित्य पर लाएं तो चिड़िया-रूपी भाषा काफ़ी हद तक उन लेखकों के पास रही है जिनके लेखकीय संविधान में अनेक समुदायों को बहुत कम जगह मिली है. इसलिए जॉर्ज फ़्लॉयड पर हो रहे विमर्श में यह प्रश्न भी शामिल करना चाहिए कि क्या हमारी भाषाएं अपने वर्तमान स्वरूप में उन समुदायों की पीड़ा व्यक्त कर सकती हैं जो इन भाषाओं के हाशिए पर जीते रहे हैं, साहित्य में अक्सर तिरस्कृत हुए हैं, लेकिन पिछली शताब्दी में अचानक साहित्य के दरवाज़े पर आ खड़े हुए हैं? ऐसे समुदायों की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है-अफ़्रीकी, दलित, आदिवासी, स्त्री इत्यादि.

सदियों से पुरुष लेखकों ने इस तरह भाषा को बरता है कि वह स्त्री और उसके सरोकारों का लगभग विलोम बन गई है. सैंड्रा गिल्बर्ट और सूज़न गूबर अपनी विलक्षण किताब ‘द मैडवुमन इन द ऐटिक’ में लिखती हैं कि कलम पुरुष का लिंग है जिसके ज़रिए स्त्री को दरकिनार करते हुए पितृसत्ता की साहित्य में स्थापना होती है. 'अगर कलम वाक़ई पुरुष का लिंग है तो स्त्री आख़िर अपने किस अंग से लिखेगी?' सैंड्रा पूछती हैं.

भारत को देखें तो मालूम होता है कि इतने विशाल बहुभाषी साहित्य में दलित-कथा की दस्तक पिछले दशकों में ही दर्ज हुई है. इस साहित्य के पास अपने अस्तित्व और सत्य की तलाश में डूबे मनुष्य की विराट कथाएं हैं. इन भाषाओं के रूपक और मुहावरे एक ख़ास वर्ग की आकांक्षाओं को व्यक्त करते आए हैं. हमारे साहित्य के पास दलित की पीड़ा को व्यक्त करने का  न अधिक अनुभव है, न तो स्मृति ही. इसकी काया पर उस इंसान के घाव दर्ज नहीं हुए हैं. इस असहनीय अभाव से इक्कीसवीं सदी के भारतीय लेखक का संघर्ष साहित्य और समाज की नियति तय करेगा.
इस पखवाड़े की दूसरी बड़ी ख़बर है भारतीय सीमा में चीन की अनाधिकृत-अन्यायपूर्ण घुसपैठ. इस मसले पर बेहिसाब फ़र्ज़ी ख़बरों के आक्रमण से निबटने के लिए यह भी याद होना चाहिए कि कॉन्फ़्लिक्ट ज़ोन रिपोर्टिंग यानी युद्धक़ालीन पत्रकारिता का शब्द-संसार में बड़ा स्थान है. इतिहास में सिर्फ दो पत्रकारों को साहित्य का नोबेल सम्मान मिला है. एक ने विलक्षण कथाएं भी लिखीं थीं, लेकिन दोनों ने ही युद्ध पर बेमिसाल पत्रकारिता की थी.

रणभूमि में दिग्गज भी फिसल जाते हैं. युधिष्ठिर ने जीवन में सिर्फ एक अर्ध-सत्य बोला था, युद्ध के दौरान, लेकिन वह गुरु-हत्या के लिए पर्याप्त था. पिछले साल बालाकोट हवाई हमले के बाद अनेक भारतीय पत्रकार यूं उछल पड़े थे मानो वे खुद किसी सेना का हिस्सा थे जिसने शत्रु की राजधानी पर झंडा फहरा दिया हो. एक नागरिक अपनी भूमि से प्रेम करता है लेकिन हर कोई इसके लिए हथियार उठा लड़ नहीं सकता, उसी तरह युद्ध पर रिपोर्टिंग सबके बस की नहीं.

अगर महान पत्रकारिता अपने प्रेम और पूर्वाग्रह से संघर्ष करते हुए जन्म लेती है, तो ऐसे युद्ध के बारे में लिखना जिसे आपके देश की सेना लड़ रही हो उस संघर्ष की शायद चरम अवस्था है. अपने सैनिक का लहू देख आवेग काबू में रख पाना मुश्किल होता है, शब्द अक्सर लड़खड़ा जाते हैं. ताज़े लहू पर पत्रकारिता शब्द के प्रति निष्ठा की परम कसौटी है. अगर किसी राष्ट्र को अपनी सीमा की सुरक्षा के लिए सैनिक चाहिए, तो उस युद्ध का अनुवाद करने के लिए उत्कृष्ट पत्रकार भी.जमैका के उपन्यासकार मार्लन जेम्स ने अपने हालिया उपन्यास में लिखा है कि अगर आपको उस मनुष्य का नाम नहीं मालूम जिससे आप बदला ले रहे हैं, तो आप ईश्वर पर हमला करने का जोखिम उठाते हैं. इस ईश्वर को बचाने का दायित्व जितना सैनिक का है, उतना ही पत्रकार और लेखक का भी.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
आशुतोष भारद्वाज

आशुतोष भारद्वाजलेखक, पत्रकार

गद्य की अनेक विधाओं में लिख रहे गल्पकार -पत्रकार-आलोचक आशुतोष भारद्वाज का एक कहानी संग्रह, एक आलोचना पुस्तक, संस्मरण, डायरियां इत्यादि प्रकाशित हैं। चार बार रामनाथ गोयनका सम्मान से पुरस्कृत आशुतोष 2015 में रॉयटर्स के अंतर्राष्ट्रीय कर्ट शॉर्क सम्मान के लिए नामांकित हुए थे। उन्हें भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, और प्राग के 'सिटी ऑफ़ लिटरेचर' समेत कई फेलोशिप मिली हैं. दंडकारण्य के माओवादियों पर उनकी उपन्यासनुमा किताब कई भाषाओं में शीघ्र प्रकाश्य है।

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First published: June 20, 2020, 3:02 PM IST
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