विलोम : दमकते दर्प की कथा

यह लेखक न अपने दलित होने का शोक मनाता है, न समाज या पाठक से सहानुभूति मांगता या अपेक्षा रखता है. जबकि ऐसा एकदम न्यायोचित होता. इस लेखक को अपने ऊपर घनघोर अभिमान है, उसके शब्द इस दर्प से दमकते हैं. यहां डार्क कॉमेडी भी देख सकते हैं, लेकिन यह ऐसे मनुष्य की कथा भी है जो अपने अनुभव की सत्यता और सम्पूर्णता सिर्फ़ इसलिए कमतर नहीं होने देता कि वह ऐसी क्रूर अन्यायी व्यवस्था में दर्ज हुए थे.

Source: News18Hindi Last updated on: July 8, 2020, 1:34 PM IST
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विलोम : दमकते दर्प की कथा
दसेक साल का नायक मुर्दा जानवरों के ऊपर मंडराते गिद्ध भगा रहा है. (सांकेतिक तस्वीर)
"मरे पशुओं के मांस पिंड पर झपट्टा मारते हुए गिद्धों के बीच खड़ा होकर झाड़ियों से उन्हें भगाने में मुझे एक अनोखी कलाकृति का अभिन्न अंग होने जैसी अनुभूति होती थी…अपने वज़न से ज़्यादा मांस पिंड का वज़न उनके पेट में रहता था, इसलिए वे जल्दी उड़ नहीं पाते थे. घंटों तक शांत बैठे ये गिद्ध ऐसा लगता था कि मानो वे मुर्दहिया के भूतों को शोकांजलि देने के लिए विपश्यना कर रहे हों. गिद्ध रात में कुछ भी नहीं खाते थे. इस मायने में वे बौद्ध भिक्षुओं जैसे होते हैं, जो दिन में सिर्फ़ एक बार भोजन करते हैं…गिद्धों का यह सम्पूर्ण माजरा मुझे बार-बार मोहित करता था."

तुलसी राम की विलक्षण आत्मकथा 'मुर्दहिया' की इन पंक्तियों की मिसाल मिलना मुश्किल है. दसेक साल का नायक मुर्दा जानवरों के ऊपर मंडराते गिद्ध भगा रहा है ताकि इनका मांस उसके परिवार के काम आ सके. कई दशक बाद वह अपने बचपन को लिखने बैठता है, आज़मगढ़ की निरक्षर दलित बस्ती बहुत पीछे छूट चुकी है. लेखक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के रूसी अध्ययन विभाग का अध्यक्ष रह चुका है, कई विषयों पर महारत हासिल है, जातिगत शोषण की क्रूरता को बख़ूबी समझा है, लेकिन गिद्ध भगाने के वीभत्स से प्रतीत होते बिम्ब में बौद्ध भिक्षु की उपमा खोज लेता है, उस दृश्य को अनोखी कलाकृति बताता है.

यह लेखक न अपने दलित होने का शोक मनाता है, न समाज या पाठक से सहानुभूति मांगता या अपेक्षा रखता है. जबकि ऐसा एकदम न्यायोचित होता. इस लेखक को अपने ऊपर घनघोर अभिमान है, उसके शब्द इस दर्प से दमकते हैं. यहां डार्क कॉमेडी भी देख सकते हैं, लेकिन यह ऐसे मनुष्य की कथा भी है जो अपने अनुभव की सत्यता और सम्पूर्णता सिर्फ़ इसलिए कमतर नहीं होने देता कि वह ऐसी क्रूर अन्यायी व्यवस्था में दर्ज हुए थे. जहां हैज़े से मरने पर मुर्दे को ज़मीन में गाड़ दिया जाता था, सियार ताज़ा क़ब्र खोदकर लाश नौंचने लगते थे.

किताब इस उद्घोष से शुरू होती है- 'मूर्खता मेरी जन्मजात विरासत थी'. जब तक आप संभल पाएं, अगला पैराग्राफ़ बताता है लेखक के दादाजी का नाम 'जूठन' था और दादी की उम्र इसलिए लम्बी थी क्योंकि 'गांववालों का कहना था दादी ने कौआ का मांस खाया है.' दादी अनसुलझी गुत्थियों की इन्साइक्लोपीडिया थीं, जो नाग-नागिन से बचने के लिए 'जै राम जमेदर' जपने को कहती थी, बाद में लेखक को पता चला कि जमेदार राजा जन्मेजय का देशज रूप था जिन्होंने सांपों को मारने के लिए यज्ञ करवाया था.
तुलसी राम अपने मैट्रिक सर्टिफ़िकेट के अनुसार एक जुलाई को इकहत्तर वर्ष के हो गए होते. हालांकि उनका जन्म शायद इस दिन नहीं हुआ था. घरवालों को जन्म तारीख़ याद नहीं रहती थी. स्कूल के मास्टरजी बरसात में जन्मे बच्चे की तारीख़ एक जुलाई, सर्दियों में हुए बच्चे की एक जनवरी और गरमी में होने पर एक मार्च लिख देते थे.

2010 में आयी 'मुर्दहिया' आज़मगढ़ पर केंद्रित है, 2014 में प्रकाशित आत्मकथा का दूसरा खंड 'मणिकर्णिका' बनारस पर जब वह बीएचयू पढ़ने आ गए थे. नक्सल विचारधारा से जुड़े, फिर माओ से मोहभंग हुआ और बुद्ध और मार्क्स के अनुयायी हो गए.

ये दोनों किताबें एक बेमिसाल समाजशास्त्रीय, नृतत्वशास्त्रीय अध्ययन हैं, विराट मानवीय गाथा भी. दलित जीवन के भिन्न संस्करण समझने का बेमिसाल दस्तावेज़. दलित जीवन से शुरू होती यह आत्मकथा तमाम अलिखित रह गयी राजनैतिक घटनाओं को दर्ज करती है. मसलन साठ के दशक तक बीएचयू में दाख़िले के फ़ॉर्म में एक कॉलम हुआ करता था- 'आर यू ब्राह्मण और नॉन-ब्राह्मण?'एक बार कुछ हिंदुत्ववादी छात्रों ने निचली जाति के छात्रों को पीट दिया तो बीएचयू में हड़ताल हो गयी. हजारी प्रसाद द्विवेदी जो उन दिनों रेक्टर थे हिंसा के विरोध में उपवास पर चले गए, लेकिन वाइस-चांसलर के कहने पर कह दिया कि उन्होंने दरअसल एकादशी का व्रत रखा था. इस पर क़रीब दो सौ छात्र उनके घर प्रदर्शन करने गए, और गोरख पांडे आचार्य पर दहाड़े: 'तुम पाखण्डी हो, आरएसएस के दलाल हो, इसलिए उनके दवाब में अपने बयान से पलट गए.'

इन पंक्तियों को लिखते वक़्त मैं सेब के एक बग़ीचे में रह रहा हूं जिसकी देखभाल एक नेपाली युवक ज्ञान भंडारी करते हैं. भंडारी हिमाचली बगीचों में मज़दूरी करते हैं, अक्सर शराब पीकर आते हैं, पत्नी से लड़ते हैं. एक दिन मैंने पूछा: 'आपने अगर पैसा शराब में नहीं उड़ाया होता तो कितना बचा लिया होता.' उन्होंने पलट कर जवाब दिया: 'क्या मैंने आपसे पूछा आप कहां ख़र्च करते हो, कितना बचाया है? अपने पैसे की पीता हूं, आपसे नहीं मांगता.'

मैं सन्न रह गया. मेरे प्रश्न के भीतर यह अहंकार छुपा था कि जिस व्यक्ति को मैं अपने से कमतर मानना चाहता हूं, उससे कुछ भी पूछने-सलाह देने का मुझे अधिकार है. एक अन्यायी व्यवस्था इसी तरह झूठे अहंकार को रचती है, मनुष्य के बीच अमानवीय और क्रूर श्रेणियां तय करती है.

यह प्रश्न मैंने न जाने कितनों से पूछा होगा. मुझे अपने ऊपर ग्लानि हुई, भंडारी के प्रति सम्मान बढ़ा, तुलसी राम की किताब का महत्व बेहतर समझ आया. इसे दलित आत्मकथा कह सकते हैं, लेकिन यह एक बड़े लेखक का घोषणा-पत्र है, जिसके लिए अपनी गरिमा सर्वोपरि थी, जिसे पढ़ मुझे अपनी दृष्टि की न्यूनता का एहसास हुआ.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
आशुतोष भारद्वाज

आशुतोष भारद्वाजलेखक, पत्रकार

गद्य की अनेक विधाओं में लिख रहे गल्पकार -पत्रकार-आलोचक आशुतोष भारद्वाज का एक कहानी संग्रह, एक आलोचना पुस्तक, संस्मरण, डायरियां इत्यादि प्रकाशित हैं। चार बार रामनाथ गोयनका सम्मान से पुरस्कृत आशुतोष 2015 में रॉयटर्स के अंतर्राष्ट्रीय कर्ट शॉर्क सम्मान के लिए नामांकित हुए थे। उन्हें भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, और प्राग के 'सिटी ऑफ़ लिटरेचर' समेत कई फेलोशिप मिली हैं. दंडकारण्य के माओवादियों पर उनकी उपन्यासनुमा किताब कई भाषाओं में शीघ्र प्रकाश्य है।

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First published: July 5, 2020, 1:26 PM IST
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