विलोम: ज्यों की त्यों धर दीनी कितबिया

छोटा नागपुर इलाक़े की बोली में ख़ुद को कहती यह किताब हिंदी का विस्तार करती है, उन शब्दों को पन्ने पर ले आती है जिन्हें मानकीकरण की ज़िद ने तिरस्कृत और विस्मृत कर दिया था. जिन भुरभुरी और निष्पाप अनुभूतियों और स्मृतियों से बचपन निर्मित होता है उन्हें इसी विधा में कहना सम्भव था. चित्र यहाँ महज़ एस्थेटिक अभिव्यक्ति नहीं है, बचपन को पुनर्जीवित करने का माध्यम है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 29, 2020, 6:19 PM IST
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विलोम: ज्यों की त्यों धर दीनी कितबिया
बिक्सू किताब की कवर फोटो
झारखंड के गुमला जिले में हुआ संत इग्नासियस आवासीय हाई स्कूल. बिक्सू यानि विकास कुमार विद्यार्थी छठी कक्षा में दाख़िला लेता है, दसवीं तक यहीं रहता है. गाँव की स्मृतियां स्कूल में चली आयी हैं. सुबह उठते वक़्त मां के पेट में लगी “एगो घड़ी” का अलार्म याद आता है और अपने पेट में बंद “कौढ़िया बेंग” यानि आलसी मेंढक.

स्कूल में रोज सुबह तीन तरह की प्रार्थना होती है- “हिंदू लड़का रोज सरसती बंदना करता था, आदिबासी रोज सरना स्थल में सरना गीत गाता था और क्रिस्तान लड़का रोज गिरजाघर जाता था.” एक हैं घुड़मुड़िया सर यानि फादर सिविल जोसेफ होरो. एक बार वह “रास्ते में साइकिल से गिर गए और 2-3 पलटनिया खा गए. तब से इनका नाम घुड़मुड़िया सर पड़ गया.” और इतिहास की क्लास में समस्या यह है कि “किताब पलटो तो हर तीसरा पन्ना में एगो नया लड़ाई शुरू हो जाता है.”

बिक्सू को बिछुड़ा प्रेम भी याद आता है. गाँव के मिडिल स्कूल में एक लड़की “रूल छीलने में एकदम मास्टर थी. पता नई कटर से रूल छिल के ऊ एतना लम्बा झालर कईसे निकालती थी. उसी का देखादेखी हम भी बिना नोकी तोड़े सुंदर से रूल छिलना सीखे थे.”

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इससे पहले कि हम बिक्सू की बेमिसाल और बहुरंगी कथा को आगे बढ़ाएँ, थोड़ी बात इस विधा पर. हिंदी में बाल साहित्य बहुत कम है, और जो है भी उसे साहित्य के कैनन में अमूमन जगह नहीं मिलती. जबकि अंग्रेज़ी में एलिस इन वंडरलैंड और फ़्रेंच में लिटिल प्रिंस को क्लासिक का दर्जा हासिल है. हिंदी के बड़े लेखक इस विधा पर कम ही आते हैं.

इस मायने में भोपाल स्थित एकलव्य और इकतारा अनूठी संस्थायें हैं, जिन्होंने इस विधा का सौंदर्य-शास्त्र रच दिया है. एकलव्य ने पिछले कुछ दशकों में बच्चों के लिए उत्कृष्ट साहित्य प्रकाशित किया है. रुस्तम सिंह एक दशक से अधिक यहाँ सम्पादक रहे, अनेक बेहतरीन किताबें उनके सम्पादन में आयीं. कुछ वर्षों पहले एकलव्य के सम्पादक रहे सुशील शुक्ल ने इकतारा की स्थापना की. विनोद कुमार शुक्ल ने एकलव्य की पत्रिका चकमक और इकतारा की पत्रिका साइकिल के लिए कथाएँ लिखीं. साइकिल का सिनेमा पर केंद्रित हालिया विशेषांक वरुण ग्रोवर ने अतिथि सम्पादित किया है. इस पत्रिका के लिए फ़िल्मकार अमित दत्ता भी लिखते हैं. विनोद जी और अमित मुझसे कहते रहे हैं कि बच्चों के लिए लिखना बड़ी आनंदकारी प्रक्रिया है. तेज़ी ग्रोवर की हाल ही इकतारा से किताब आयी है — ‘मन में ख़ुशी पैदा करने वाले रंग’. उन्होंने बाल कविताओं की पाँच किताबें सम्पादित भी की हैं.

बिक्सू सबसे पहले धारावाहिक बतौर चकमक में आयी, फिर इकतारा ने किताब रूप में प्रकाशित किया. यह कथा विकास कुमार विद्यार्थी की एक चिट्ठी से जन्म लेती है जो उन्होंने राजकुमारी को लिखी थी. राजकुमारी और विवेक ने मिल कर इसके संवाद लिखे, वरुण ग्रोवर ने पटकथा और राजकुमारी ने कथा को मधुबनी चित्रों में बुन दिया, कुछ इस तरह कि किताब दृश्य में तब्दील हो गयी. इसे आप पढ़ते हुए देख सकते हैं, देखते हुए पढ़ सकते हैं, और चूंकि मधुबनी शैली के चित्र देख “त्योहार सा एहसास होने लगता है”, पाठक बचपन के किसी मेले में पहुँच जाता है. पन्ने पर चित्र और शब्द का संयोजन ऐसा अनोखा कि पाठक पहली बार सिर्फ़ चित्रों को पढ़ता है, दूसरी बार संवाद देखता है.
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और भाषा? छोटा नागपुर इलाक़े की बोली में ख़ुद को कहती यह किताब हिंदी का विस्तार करती है, उन शब्दों को पन्ने पर ले आती है जिन्हें मानकीकरण की ज़िद ने तिरस्कृत और विस्मृत कर दिया था. जिन भुरभुरी और निष्पाप अनुभूतियों और स्मृतियों से बचपन निर्मित होता है उन्हें इसी विधा में कहना सम्भव था. चित्र यहाँ महज़ एस्थेटिक अभिव्यक्ति नहीं है, बचपन को पुनर्जीवित करने का माध्यम है.

विकास और राजकुमारी रूपक भी ज़बरदस्त गढ़ते हैं. मसलन जब बच्चे हॉकी खेलते वक़्त एक-दूसरे को पास नहीं देते, ख़ुद ही गेंद धकेलते हुए गोल तक बढ़ते जाते हैं, फादर उन्हें एक चिड़िया का उदाहरण देते हैं जो अंडे देने के लिए ऑस्ट्रेलिया से चीन उड़ कर जाती है, बिना रुके दस दिन में दस हज़ार किलोमीटर पार कर लेती है.

“तुम लोग भी एकदम वईसा ही हैं. आँख बंद किया और उड़ा गोल करने के लिए. पास देना सीखो. दउड़ो कम और दिमाग जादे दउड़ाव, समझा!” फादर बच्चों से कहते हैं.

मैं अक्सर पेंसिल लेकर किताब पढ़ता हूँ. मेरी किताबों पर पेंसिल के तमाम निशान दर्ज रहते हैं. यह स्मृति-चिन्ह किताब पर लौटने में मुझे मदद करते हैं. इन निशानों से मुझे, मेरे पाठक को भी पढ़ा जा सकता है. लेकिन बिक्सू पढ़ते वक़्त मुझे पन्ने पर पेंसिल छुआने का क़तई साहस नहीं हुआ. यह किताब मेरी निगाह के साथ इतना निर्दोष, मासूम और पारदर्शी सम्बंध रच रही थी कि इसे क़तई मैला नहीं किया. ज्यों की त्यों धर दीनी कितबिया.
(डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
आशुतोष भारद्वाज

आशुतोष भारद्वाजलेखक, पत्रकार

गद्य की अनेक विधाओं में लिख रहे गल्पकार -पत्रकार-आलोचक आशुतोष भारद्वाज का एक कहानी संग्रह, एक आलोचना पुस्तक, संस्मरण, डायरियां इत्यादि प्रकाशित हैं। चार बार रामनाथ गोयनका सम्मान से पुरस्कृत आशुतोष 2015 में रॉयटर्स के अंतर्राष्ट्रीय कर्ट शॉर्क सम्मान के लिए नामांकित हुए थे। उन्हें भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, और प्राग के 'सिटी ऑफ़ लिटरेचर' समेत कई फेलोशिप मिली हैं. दंडकारण्य के माओवादियों पर उनकी उपन्यासनुमा किताब कई भाषाओं में शीघ्र प्रकाश्य है।

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First published: July 29, 2020, 3:55 PM IST
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