विलोम: हिंदी कैनन की तलाश

कोई कृति किस आधार पर महान घोषित की जाती है? इन मूल्यों का निर्धारण आलोचना कैसे करती है? हिंदी के आलोचकीय कैनन का निर्माण कैसे हुआ? हिंदी साहित्य के इतिहास पर अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं. मृत्युंजय त्रिपाठी की बेहतरीन किताब ‘हिंदी आलोचना में कैनन-निर्माण की प्रक्रिया’ इस इतिहास को एक भिन्न दृष्टि से देखती है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 29, 2020, 5:49 AM IST
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विलोम: हिंदी कैनन की तलाश
मृत्युंजय की किताब अनेक प्रश्न भीतर बो जाती है
खड़ी बोली के मानकीकरण के साथ ही कैनन बनने की प्रक्रिया औपनिवेशिक काल के दौरान शुरु हो जाती है. ज़ाहिर है यह आरम्भिक कैनन राष्ट्रवादी होगा, उन कथित शाश्वत मूल्यों की स्थापना करेगा जिनके सहारे हिंदी साहित्य को अंग्रेज़ी राज के बरक्स खड़ा कर सके. लेकिन शाश्वत होने का दावा करता यह कैनन क्या तमाम स्थानीय आकांंक्षाओं को जगह दे पाएगा?

मिश्र बंधुओं की ‘नवरत्न’ हिंदी का पहला व्यवस्थित कैनन घोषित करती है. 1910 के पहले संस्करण में नौ रचनाकार हैं — तुलसी, सूर और देव; बिहारी, भूषण और केशव; मतिराम, चंदबरदाई और भारतेंदु. गौर करें, यहाँ कबीर नहीं हैं, जो 1924 के दूसरे संस्करण में अपने ‘महात्मापन’ की वजह से (कवित्व की वजह से नहीं) प्रवेश पाते हैं.

क्या आलोचक तटस्थ हो सकता है?
लगभग इसी समय लाला भगवानदीन एक सूत्र देते हैं – ‘सांची समालोचना वाही, पक्षपात से दूरि जु रहे’. यानी तटस्थता का मूल्य हिंदी आलोचना में प्रवेश करता है. लेकिन क्या आलोचक तटस्थ हो सकता है? वह किसी विचार या विचारधारा या सौंदर्यशास्त्रीय रुचियों, नहीं तो अपने समय से सत् ग्रहण करता है. पक्षधरता का विचार अभी बहुत दूर है.
यह राष्ट्रवादी कैनन एक अन्य मूल्य प्रस्तावित करता है, शायद एक भक्त कवि की स्थापना करने के लिए, जो अनेक दशकों तक हिंदी का स्थाई स्वभाव बना रहता है — ‘मर्यादा’.

ग्रियर्सन, मिश्र बंधु और फिर रामचंद्र शुक्ल तक आते में यह निर्विवाद है कि ‘मर्यादा’ की स्थापना करती तुलसीदास की कविता श्रेष्ठतम है. दुराचारी अंग्रेज़ राज के बरक्स “लोकमंगल की साधनावस्था’ के कवि और उनके मर्यादा पुरुषोत्तम को कैनन में आना ही था. इस मर्यादा का क्या अज्ञेय के औदात्य से कोई दूर का संबंध है? इस प्रश्न को किसी आगामी निबंध के लिए रखा जा सकता है.

ज़ाहिर है, अब रीतिक़ालीन कविता कैनन में नीचे आने लगेगी. कुछ दशक बाद रामविलास शर्मा लिखते हैं: 'आधुनिक हिंदी साहित्य रीतिवादी परम्परा के विरोध में, साहित्य में उसे निर्मूल करके ही स्थापित हो सकता था.' इन शब्दों में आधुनिक हिंदी साहित्य ही नहीं, आधुनिक हिंदी समाज के कैनन-निर्माण की भी प्रक्रिया देखी जा सकती है.हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के समय तक सामाजिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं. मृत्युंजय रेखांकित करते हैं कि सावरकर और गोलवलकर विमर्श में आ चुके हैं. मुसलमान को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने, विदेशी ठहराने का सांस्कृतिक उपक्रम जोर पर है. ऐसे में द्विवेदी समन्वय के प्रमुख प्रतीक कबीर को केंद्र में लाते हैं. जिन कबीर को आचार्य शुक्ल के कैनन में ख़ास जगह नहीं मिली थी, वह अब शिखर पुरुष हैं.

ग़ौर करें, यह समूचा प्रयोजन राष्ट्रवादी परियोजना के तहत घटित हो रहा है.

इसी समय मार्क्सवादी आलोचक अपना भिन्न कैनन रचना शुरु करते हैं. शिवदान सिंह चौहान के 1937 के लेख ‘भारत में प्रगति शील साहित्य की आवश्यकता’ से मार्क्सवादी आलोचना की शुरुआत होती है. यह आलोचना भक्ति और रीतिकाल को ख़ारिज कर आधुनिक युग की ओर अंतिम उम्मीद की तरह देखती है, ‘वर्ग दृष्टि’ केंद्र में लाती है. मसलन मराठी संत काव्य पर मुक्तिबोध कहते हैं:“ब्राह्मणेतर संत कवि की काव्य-भावना अधिक जनतांत्रिक, सर्वांगीण तथा मानवीय थी.” यह कैनन उत्तरोत्तर संश्लिष्ट होता, नामवर सिंह, मैनेजर पांडे इत्यादि से गुजरता हिंदी साहित्य का केन्द्र बन जाता है.

मृत्युंजय अगले अध्याय में ‘मार्क्सवादी आलोचना के प्रतिपक्ष’ को परखते हैं, विजयदेव नारायण साही और निर्मल वर्मा पर केंद्रित होते हुए. इसके बाद अंतिम अध्याय स्त्री और दलित विमर्श पर है, जहांं प्रचलित कैनन प्रश्नांकित होने लगते हैं. यह दोनों अध्याय कुल तीस पन्ने में सिमट गए हैं. मेरे ख़याल से यह दोनों कहीं गहरे विमर्श और सवालों की अपेक्षा रखते हैं.

यहां गद्य के पास ऊंची छलांग का ज़बरदस्त अवसर था, लम्बे आलाप के बाद कलाकार की प्रतिभा अंतिम बंदिश में फूट कर बाहर आ सकती थी. इन अध्यायों में बहुत अधिक आपत्तियां नहीं, लेकिन जहां हैं, बहुत मारक हैं. मसलन साही की ‘जायसी’ पर मृत्युंजय का यह प्रश्न: “यह थोड़ा आश्चर्यजनक लगता है कि इस पुस्तक में सूरदास का ज़िक्र सिरे से नहीं है…कहीं ऐसा तो नहीं कि जायसी को आधुनिक बनाने के जितने पैमाने दिए हों वे सूर पर भी लागू होते हों!”

साही की परम्परा और आधुनिकता पर बहस निर्मल वर्मा के अखंड कालबोध तक पहुंचती है. निर्मल मानते थे कि भारतीय साहित्य, ख़ासकर उपन्यास को औपनिवेशिक युग में खंडित हो गए अखंड कालबोध को अपनी चेतना में हासिल करना चाहिए. मृत्युंजय निर्मल के इतिहास बोध पर प्रश्न करते हैं (हालांंकि वह ऐसा करने वाले पहले नहीं हैं) कि निर्मल का मनुष्य “आध्यात्मिक अलगाव की पीड़ा के अतिरिक्त किसी अन्य दुःख से ग्रस्त हो ही नहीं सकता”. अगर प्रेमचंद का होरी “औपनिवेशिक किसान” है तो “औपनिषदिक किसान” कैसा होगा?

इन प्रचलित कैननों की अपर्याप्तता और सामाजिक परिस्थितियों में परिवर्तन अस्सी के दशक के आसपास स्त्री और दलित विमर्श को जन्म देते हैं. हालांकि स्त्री हिंदी व अनेक भारतीय भाषाओं के आधुनिक साहित्य के केंद्र में उन्नीसवीं सदी से ही रही है, लगभग सभी भाषाओं के आरम्भिक उपन्यास स्त्री-केंद्रित हैं, लेकिन स्त्री विमर्श का विषय नहीं बनी.

इन कैननों को एक झटके से अपार ऊर्जा और आक्रोश से भरी दलित आलोचना झिंझोड़ देती है. प्रेमचंद पर तीखा प्रहार करते श्योराज सिंह बेचैन लिखते हैं कि “दलित और हरिजन में अंतर यह है कि दलित अन्याय अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह करेगा, हरिजन एक गाल पर तमाचा लगने पर दूसरा गाल भी आगे कर देगा.” वहीं डॉक्टर धर्मवीर, कबीर और प्रेमचंद का पुनर्पाठ करते हैं. ‘कफ़न’ जिसे निर्मल ने हिंदी कहानी में मुक्ति का पहला स्वर माना था, अब अनेक सवालों से घिरी है. हिंदी कैनन का स्थापित सिंहासन डोलने लगता है. हरेक किताब एक पाठ है, जिसकी स्त्री और दलित रीडिंग अनिवार्य व अपरिहार्य है.

अनेक प्रश्न भीतर बो जाती है मृत्युंजय की किताब 
मृत्युंजय की किताब अनेक प्रश्न भीतर बो जाती है. मसलन पिछले सौ वर्षों में हिंदी में अनेक क़द्दावर लेखिकाएं रहीं हैं, लेकिन इसके बावजूद इस साहित्य का स्त्री विमर्श अभी भी आरम्भिक अवस्था में क्यों दिखता है? जबकि स्त्रीवादी आलोचना के ही साथ जन्मा दलित कैनन कहीं सशक्त और समर्थ है. कृष्णा सोबती समेत हिंदी की अनेक बड़ी लेखिकाएं ख़ुद को स्त्रीवादी (फ़ेमिनिस्ट) कहने का कड़ा विरोध करती रहीं हैं. अगर महादेवी वर्मा उन्नीस सौ तीस में ‘मैं नीर भरी दुःख की बदली’ के साथ हिंदी का ‘अ रूम ऑफ वंस ओन’ लिख रहीं होतीं, और कृष्णा सोबती उन्नीस सौ साठ में ‘मित्रों मरजानी’ के साथ ‘द सेकंड सेक्स’ जैसा भी कुछ लिख देतीं, तो क्या हिंदी का स्त्री विमर्श शायद बहुत पहले शुरु हो आज कहीं अन्यत्र होता? प्रेमचंद के रचनाकाल में जिस तरह ‘हरिजन’ बतौर नायक और प्रत्यय साहित्य में आया, उनके समकालीन अम्बेडकर से प्रेरणा ले ‘दलित’ भी स्थापित हो जाता तो आज दलित विमर्श कहां होता?

स्त्री और दलित कैनन का क्या कोई स्पेक्युलेटिव पाठ संभव है? अगर मर्यादा के बजाय विध्वंस को कैनन में जगह मिलती, हिंदी की क्या दिशा होती? यह लेकिन पाठक के प्रश्न हैं. महज़ 184 पन्नों की यह किताब अपनी संकल्पना से अधिक हासिल करती है. आगे का काम साहित्य के बाक़ी इतिहासकारों के ज़िम्मे हुआ.

पुनश्च: मेरी एक मित्र एक निजी विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई साहित्य पढ़ाती हैं. हाल ही में उनसे बीजिंग विश्वविद्यालय ने पिछले दो दशकों की उत्कृष्ट हिंदी आलोचना और ग़ैर-गल्प किताबों के नाम पूछे थे. उनके द्वारा अनुशंसित चुनिंदा किताबों में मृत्युंजय त्रिपाठी की यह किताब शामिल थी.
ब्लॉगर के बारे में
आशुतोष भारद्वाज

आशुतोष भारद्वाजलेखक, पत्रकार

गद्य की अनेक विधाओं में लिख रहे गल्पकार -पत्रकार-आलोचक आशुतोष भारद्वाज का एक कहानी संग्रह, एक आलोचना पुस्तक, संस्मरण, डायरियां इत्यादि प्रकाशित हैं। चार बार रामनाथ गोयनका सम्मान से पुरस्कृत आशुतोष 2015 में रॉयटर्स के अंतर्राष्ट्रीय कर्ट शॉर्क सम्मान के लिए नामांकित हुए थे। उन्हें भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, और प्राग के 'सिटी ऑफ़ लिटरेचर' समेत कई फेलोशिप मिली हैं. दंडकारण्य के माओवादियों पर उनकी उपन्यासनुमा किताब, द डैथ स्क्रिप्ट, हाल ही में प्रकाशित हुई है.

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First published: September 29, 2020, 5:49 AM IST
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