OPINION: कोरोना के एक साल बाद अब नकारापन और सियासत स्वीकार्य नहीं !

महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्य वैक्सीन की कमी का रोना रो रहे हैं. लेकिन उन्हें बताना चाहिए कि इन राज्यों में जनता की सुरक्षा के लिए क्या खास इंतजाम किए गए. क्या इन राज्यों में वैक्सीन की बरबादी नहीं हुई? ऊपर से अब ट्रेनों में भर कर लोग मुंबई जैसे महानगरों से अपने राज्यों में भी लौट रहे हैं. क्या इससे गांवों में खतरा बढ़ नहीं रहा है?.

Source: News18Hindi Last updated on: April 8, 2021, 5:23 PM IST
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OPINION: कोरोना के एक साल बाद अब नकारापन और सियासत स्वीकार्य नहीं !
फिर से शहरों से अपने गांव की तरफ लोग पलायन कर रहे हैं. 
“हम इतिहास से सीखते हैं कि हम इतिहास से कुछ भी नहीं सीखते“ -जॉर्ज बर्नार्ड शॉ

एक बार फिर कोरोना (COVID-19) की लहर चल पड़ी है. विशेषज्ञ बताते हैं कि इस बार यह तेजी से फैल रही है और घातक भी है. इसलिए आपने देखा होगा कि देखते ही देखते कोरोना के आंकड़े एक लाख प्रति दिन कब और कैसे पार हो गए, इसका पता भी नहीं चला. एक समय था जब कोरोना मैनेजमेंट को लेकर भारत की चहुं ओर तारीफ हो रही थी, लेकिन कुछ राज्यों की कुव्यवस्था ने हमें फिर से खतरे की राह पर धकेल दिया है. क्या शहर, क्या कस्बे, क्या गांव, हर जगह स्थिति खराब हो रही है. महानगरों से जो रेलगाड़ियां आ रही हैं, पहले से भरी हुई हैं. आम लोग फिर से शहरों से अपने गांव की तरफ पलायन कर रहे हैं. बसों में भर भर कर, अपने जान को खतरे में डालकर.

मुंबई से स्पेशल ट्रेन में भर-भर कर जो लोग बिहार आ रहे हैं, वो राज्य सरकारों के लिए चिंता का सबब बन गए हैं. अगर इस पर नजर नहीं रखी गईं तो खतरा गावों तक फैलेगा. इसलिए पटना जैसे शहर में 70 के करीब मेडिकल टीम बनाई गई हैं जो इन लोगों की सेहत पर नजर रख सके. सवाल यह भी है कि क्या इन लोगों को ऐसी स्थिति में बिहार वापस भेजना जायज भी था? जाहिर है ऐसा इसलिए होता है जब हम जिम्मेदारियों से मुंह फेर लेते हैं. ऐसा इसलिए होता जब राज्य सरकारें अपना उत्तरदायित्व भूल सब कुछ केंद्र पर डालने लगती हैं. मुंबई में न तो पैसे की कमी है और न संसाधनों की कमी है. क्या बिहार वापस भेजे जा रहे लोगों के लिए वैक्सीन की व्यवस्था नहीं हो सकती थी, इस पर शायद सोचने की ज़रूरत थी.

महाराष्ट्र सरकार ने कोरोना को लेकर अगर ठोस कदम उठाया होता तो आज देश में ऐसे हालात नहीं होते. मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है. जाहिर है कि इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है.
भारत में कोरोना की शुरुआत पिछले वर्ष 2020 के मार्च महीने में हुई थी, जब चीन के वुहान से कुछ छात्र आए थे. उसके बाद इस बीमारी ने पूरी दुनिया को तबाही के दलदल में धकेल दिया. इस बीमारी ने हमारी पोल खोल दी खासकर हमारे आधारभूत स्वास्थ्य संरचना की. शहरों में और गावों में बड़े पैमाने पर प्राइमरी हेल्थ सुविधाओं को बेहतर बनाने का जितना प्रयास होना चाहिए था, उतना नहीं किया गया. पिछले एक वर्ष में हमने जितना किया, क्या वो काफी है? क्या सरकारों के पास इतना वक़्त नहीं था कि लोगों की रोज़ी-रोटी के लिए मूलभूत सरंजाम उनके गांव या पास के शहरों, कस्बों में जुटाया जा सके.

भारत को पूरी दुनिया में रिकॉर्ड समय में वैक्सीन विकसित करने के लिए वाहवाही मिली लेकिन अगर हम अपनी गलतियों को बार-बार दोहराते रहेंगे तो हम अपनी बढ़त खो देंगे. मसलन, आज वैक्सीन मैनेजमेंट को लेकर कुछ राज्यों का जिस तरह का व्यवहार रहा, उससे बचा जा सकता था. आज महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्य वैक्सीन की कमी का रोना रो रहे हैं. लेकिन उन्हें सबसे पहले अपने लोगों को बताना चाहिए कि उन्होंने अपनी जनता की सुरक्षा के लिए क्या खास इंतजाम किए.
क्या इन राज्यों में वैक्सीन की बरबादी नहीं हुई? महाराष्ट्र जैसे राज्य में 11 फीसद और आंध्रप्रदेश में छह फीसद वैक्सीन व्यर्थ हो गए, कोरोनाकाल में ऐसे अपराध क्या क्षम्य हो सकते हैं? कतई नहीं.पंजाब जैसे राज्य में तो पिछले वर्ष सितंबर से ही किसान आंदोलन चल रहे हैं जिसमें दुनिया भर के लोग बुलाये गए. पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार ने अब रात में कर्फ़्यू और राजनीतिक सभाओं पर रोक लगाने का फैसला लिया है लेकिन वहां अब हालात चिंताजनक हो चुके हैं. छत्तीसगढ़ के हालात पर तो अभी खासतौर पर नजर रखने की जरूरत है, जहां पिछले एक हफ्ते में 10 हजार से ज़्यादा कोरोना के मामले आ गए.  सबसे बड़ी चिंता की बात यह भी है कि दिल्ली और पंजाब जहां बाकी राज्यों के मुक़ाबले स्वास्थ्य सेवाएं थोड़ी बेहतर हैं फिर भी हेल्थ वर्कर्स को टीके नहीं लगाए जा सके हैं, यह बेहद दुखद है.

एक संघीय व्यवस्था में केंद्र की तरफ से तरफ से भले ही लाख प्रयास कर लिए जाएं लेकिन जब तक राज्यों का पूरा सहकार नहीं मिलेगा, 140 करोड़ लोगों का टीकाकरण का लक्ष्य पूरा करना संभव नहीं हो पाएगा. देश की आर्थिक तरक्की के लिए ये बेहद ज़रूरी है कि टीकाकरण की गति को तेज किया जाय और मानसून के पहले कम से कम 30 फीसद आबादी को टीके का संरक्षण दिया जाय. कम से कम, कुछ समय के लिए सियासत को किनारे रखकर सभी राज्यों को केंद्र के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की ज़रूरत है ताकि हम महत्वपूर्ण ज़िंदगियों को बचाने के साथ-साथ भारत के नेतृत्व का परचम भी लहरा सकें. अगर हम सुरक्षित रहेंगे, तो सियासत बाद में भी कर लेंगे. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रज मोहन सिंह

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

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First published: April 8, 2021, 4:43 PM IST
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