यूपी जैसा जनसंख्या कानून बिहार में अभी नहीं, जानिए नीतीश कुमार की क्या है मजबूरी?

Population Control Act: बिहार के सीएम नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) वर्ष 2005 में एक विकास पुरुष के तौर पर निखर कर आए हैं, लेकिन सभी जातियों और धर्म के बीच समन्वय बनाकर रखने की कला में उन्होंने महारत हासिल की है. यही वजह है कि उन्‍होंने जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर अपनी अलग राय रखी है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 14, 2021, 9:43 AM IST
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यूपी जैसा जनसंख्या कानून बिहार में अभी नहीं, जानिए नीतीश कुमार की क्या है मजबूरी?
जनसंख्या नियंत्रण कानून के पक्ष में नहीं हैं सीएम नीतीश कुमार.
पटना. बिहार में गठबंधन की सरकार चला रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) की राजनीतिक समझ और परिपक्वता पर आप प्रश्न नहीं उठा सकते, जब वो कहते हैं कि सिर्फ कानून से जनसंख्या नियंत्रण (Population Control Act) संभव नहीं है. आपको समझना पड़ेगा कि नीतीश एक ऐसे समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जहां जाति सबसे ताकतवर अवधारणा है और यहां मुस्लिम समुदाय कुल आबादी का लगभग 18 फीसदी है.

भले ही बिहार में नीतीश वर्ष 2005 में एक विकास पुरुष के तौर पर निखर कर आए हैं, लेकिन सभी जातियों और धर्म के बीच समन्वय बनाकर रखने की कला में उन्होंने महारत हासिल की है. यही वजह है कि उन्‍होंने जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर अपनी अलग राय रखी है.

कानून से नहीं होगा जनसंख्या नियंत्रण: नीतीश
पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश और असम जैसे राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू होने जा रहा है, लेकिन बिहार में इस मुद्दे को लेकर सोच कई स्तरों पर बंटी हुई है. सबसे पहले सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड की बात करते हैं, जिसकी अगुवाई बिहार में नीतीश कुमार करते हैं.
राम मनोहर लोहिया और जेपी आंदोलन की उपज माने जाने वाले नीतीश कुमार उस सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की बात करता है. इसमें महादलित भी हैं, मुस्लिम भी हैं और अगड़े तबके के लोग भी हैं. इतने सारे वर्गों को साधने की कला नीतीश को आती है. यकीनन नीतीश की राजनीति की धुरी धर्म के इर्द गिर्द नहीं, सामाजिक बदलाव के साथ-साथ आगे बढ़ती है. वह शिक्षा और सामाजिक सुधार के जरिये बदलाव लाने के हक में बात करते हैं. ये ऐसे कारक हैं, जिनके नतीजे कुछ महीने, कुछ वर्षों में परिलक्षित नहीं होते. आपको याद होगा कि नीतीश कुमार ने बिहार में सबसे पहले लड़कियों को मुफ़्त साइकिल दी, जो स्कूल नहीं जा पा रही थीं. साइकिल के पैडल पर पैर धरते ही उन ग्रामीण लड़कियों की सोच ने भी उड़ान भरना सीख लिया.

महिला पढ़ेंगी तो होगी आबादी कम
नीतीश कुमार बात करते हैं कि अगर लड़कियों को पढ़ाया-लिखाया जाएगा तो उससे प्रजनन दर खुद-ब-खुद कम हो जाएगी. हालांकि ये वो प्रयोग है जो 1950 के दशक से भारत में चल रहा है, जब देश में प्रजनन दर 6 फीसद के करीब थी, वहां से घटते-घटते ये राष्ट्रीय स्तर पर 2.2 के करीब आ गया है, लेकिन इन 70 वर्षों में भारत की आबादी 40 करोड़ से बढ़कर 140 करोड़ हो गई.बिहार में भारतीय जनता पार्टी 74 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी है, मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल से महज एक सीट कम. दोनों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं. दोनों का वोट बैंक और विचारधारा भी एक दूसरे से भिन्न है, इसलिए जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर बिहार के राजनीतिक दलों के विचार बहुत ज्‍यादा अलग हैं.

नीतीश आबादी नियंत्रण पर सोच धारा से अलग
असम और उत्तर प्रदेश की अपनी-अपनी अपनी वजहें हैं, उत्तर प्रदेश में जनसंख्या के आंकड़े 25 करोड़ के करीब पहुंच गए हैं, जहां आर्थिक और सामाजिक ढांचे इतनी बड़ी आबादी को पोषित नहीं कर पा रहे हैं. असम में बंगालदेशी मुसलमानों की अपनी समस्या है, जिससे असम के स्थानीय लोगों में रोष फैला है.

जब देश भर में जनसंख्या नियंत्रण करने के लिए कानून बनाए जाने की बात होती है तो नीतीश उस धारा से खुद को अलग कर लेते हैं. भले ही भारतीय जनता पार्टी बिहार की सत्ता में भागीदार है, लेकिन नीतीश अपनी पहचान को धूमिल होने नहीं देना चाहते हैं. उन्हें लगता है कि जागरूकता फैलाने भर से जनसंख्या पर नियंत्रण हो जाएगा.

बिहार भले ही प्रजनन दर के सारणी में राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ऊपर है, लेकिन उनका अनुमान है कि 2040 तक देश में प्रजनन दर वैसे ही घट जाएगी ऐसे में अलग से एक कानून बनाने की जरूरत क्या है? बिहार में प्रजनन दर 3.3 प्रतिशत है, जो देश के सबसे अधिक जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश से ज्‍यादा है.

बीजेपी चाहती है बिहार में बने यूपी जैसा कानून
बिहार जैसे प्रदेश में उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बयार का असर पड़े, ऐसा कम ही होता है, लेकिन नीतीश उस चट्टान की तरह खड़े हैं, जहां आकर टकराकर हवा अपना रुख बदल लेती है. मसलन बिहार में बीजेपी जदयू से बड़ी पार्टी होने के बावजूद भी नीतीश सरकार के ऊपर ये दवाब नहीं बना सकती है कि वो जल्द से जल्द उत्तर प्रदेश के मॉडल को कॉपी कर लें. जबकि प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल का कोर वोट बैंक मुस्लिम समुदाय है, जो जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर पशोपेश में रहता है. नीतीश आम सहमति के बिना ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे, जिससे अल्पसंख्यक और पिछड़े समाज के लोग उनसे दूर हो जाएं.

इस मुद्दे में व्यापक समझ विकसित करने के लिए ये समझना जरूरी है कि न सिर्फ उत्तर प्रदेश या असम बल्कि महाराष्ट्र और राजस्थान में भी सरकारी नौकरी करने के लिए दो बच्चे होने की अनिवार्यता लागू कर दी गई है. दो से ज्‍यादा बच्चे होने की सूरत में आप वहां पंचायत चुनाव भी नहीं लड़ सकेंगे. न ही सरकारी योजनाओं का फायदा ले सकेंगे. आंध्र, तेलंगाना, गुजरात, उत्तराखंड और ओड़ीसा में भी इससे मिलते-जुलते कानून बन गए हैं. जनसंख्या के स्थिरीकरण की दिशा में इन राज्यों ने आशातीत सफलता भी हासिल की है, लेकिन चिंता ज्‍यादा हिन्दी पट्टी के इन दो राज्यों बिहार और उत्तर प्रदेश को लेकर है.

यूपी और बिहार में सबसे ज्‍यादा पलायन
कोरोनाकाल में इन दो राज्यों को स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर संसाधनों की कमी से जूझना पड़ा. संक्रमण के दौर में लाखों मजदूरों के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में आवाजाही एक बहुत बड़ी वजह रही, जिससे इन दो राज्यों के ग्रामीण इलाके भी बहुत हद तक प्रभावित हुए.

केंद्र सरकार द्वारा लोकसभा में पेश किए आंकड़े के मुताबिक, कोरोना की पहली लहर में 15-20 लाख बिहारी वर्कर्स अपने घर वापस लौटे, तो उत्तर प्रदेश में ये आंकड़े 33 लाख के करीब थे, जिनको गरीब कल्याण रोजगार योजना के तहत रोजगार दिया गया. कोरोना के दूसरे दौर के बाद भी बिहार से हर रोज हजारों लोग पलायन कर रहे हैं, इसका शायद ही कोई आधिकारिक आंकड़ा सरकार के पास हो.

बिहार में नहीं हुआ है शहरीकरण
बिहार जैसे राज्य में जहां शहरीकरण महज 11 फीसदी क्षेत्रफल में हुआ है, जो इतनी बड़ी आबादी को काम नहीं दे सकते. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के आंकड़े के मुताबिक, इस अवधि में देश में 30 फीसदी लोगों को असंगठित क्षेत्रों में रोजगार से हाथ धोना पड़ा है. बिहार जैसे प्रदेश में वर्ष 2005 से 2012-13 के बीच आधारभूत संरचनाओं, जैसे की सड़क, पुल और फ्लाईओवर का खूब निर्माण हुआ, लेकिन आज बिहार को भी अपनी प्राथमिकता अपनी जरूरतों को ध्यान में रखकर तय करनी होंगी. नए उद्योग और रोजगार के अवसर पैदा करने के साथ-साथ बिहार को भी एक लक्ष्य तय करना होगा. वर्ष 2040 तक जनसंख्या के स्थिर होने का इंतजार करना न तो संभव है और न ही इसके सफल होने की कोई गारंटी है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रज मोहन सिंह

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

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First published: July 14, 2021, 9:36 AM IST
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