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Opinion : अब बहुत मुश्किल हो गया किसान आंदोलन को दोबारा खड़ा करना

लाल किले में हुड़दंग मचाना, निहत्थे पुलिस वालों पर जानलेवा हमला करना, सब कुछ किसी सोची-समझी साजिश का ही हिस्सा ही तो है. व्यापक पैमाने पर हिंसा फैलाने के बाद अगर किसान संगठन जनता से समर्थन की उम्मीद करेंगे तो यह उनकी एक बड़ी गलतफहमी होगी.

Source: News18Hindi Last updated on: January 28, 2021, 6:17 PM IST
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Opinion : अब बहुत मुश्किल हो गया किसान आंदोलन को दोबारा खड़ा करना
26 जनवरी के दिन ट्रैक्टर परेड के दौरान शामिल लोग अराजक होते दिखे. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
लाल किला परिसर में किसान संगठनों द्वारा मचाए गए उपद्रव के बाद बहुत कुछ बदल गया. किसान संगठनों में अब आंदोलन के मकसद को लेकर न आम सहमति दिख रही है और न ही आम जनता में आंदोलन को लेकर सहानुभूति. ऐसे में आंदोलन को वापस उसी स्वरूप में खड़ा कर पाना लगभग असंभव है. इसके पीछे कई कारण हैं. पहला, हिंसक तत्त्वों का आंदोलन में घुस जाना, जिनका देश की संसद और न्यायपालिका पर शुरू से ही कोई भरोसा नहीं रहा. ऐसे लोग इस माइंडसेट के साथ काम कर रहे थे कि कैसे देश की एकता और संप्रभुता के ऊपर एक बड़ा प्रश्न चिह्न खड़ा किया जाए.

दूसरा, दिल्ली में हिंसा का तांडव फैलाने के बाद आंदोलन का मुलम्मा हट गया और असली चेहरा सामने आ गया. बहुत से किसान नेता लाल किला पर हुए वाकये के बाद डर गए और अपने आप को आंदोलन से अलग कर लिया. देश में अब कोई नहीं चाहेगा कि ऐसी घटना की पुनरावृति राष्ट्रीय राजधानी में हो.
लाल किला तो देश में एक ही है, जहां से हर साल पंद्रह अगस्त को प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं. लाल किले की प्राचीर से कही हर बात दुनिया गौर से सुनती है. लेकिन देश की अखंडता, अस्मिता और संप्रभुता के प्रतीक पर आघात कर आंदोलनकारी यह जताने की कोशिश कर रहे हैं जैसे उन्होने कोई बड़ा किला फतह कर लिया हो. सच्चाई तो यह है कि इन षड्यंत्रकारियों ने सीधे-साधे किसानों की जान को खतरे में डाल, अपना एजेंडा पूरा करने की नाकाम कोशिश की. लाल किला पर फहराया गया झंडा खालिस्तान का है या निशान साहिब का, ये महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्वपूर्ण यह है कि यहां तिरंगा के अलावा किसी और झंडे के लिए कोई जगह नहीं थी, न है और न होगी.

हमें शुक्रगुजार दिल्ली पुलिस का होना चाहिए जिसके जवानों ने करोड़ों किसानों का मान रखा. तीन सौ से ज्यादा पुलिसकर्मी हिंसा में घायल हुए, लेकिन गणतंत्र दिवस को कलंकित और रक्तरंजित होने से बचा लिया. केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को बदनाम करने की कोशिशें अभी भी रुकी नहीं हैं जबकि सच्चाई यही है कि दोनों ने ही आंदोलन को लेकर अपार धैर्य का परिचय दिया है.
देश भर में लाल किले पर तिरंगे के अपमान से जनमानस किस तरह क्षुब्ध है, इसका सहज अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि सिंघु बॉर्डर के पास के दर्जन भर गांव के लोगों ने धरना कर रहे किसानों का विरोध कर उन्हें नेशनल हाइवे को खाली करने को कहा है. ऐसा ही गाजीपुर बॉर्डर पर भी हुआ. यह विरोध स्वतः स्फूर्त है क्योंकि इन्हें हर दिन परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. दिल्ली में सैकड़ों औद्योगिक यूनिट्स आंदोलन की वजह से अपना माल बाहर नहीं भेज पा रहे हैं. यह हाल सिर्फ दिल्ली एनसीआर का नहीं बल्कि पंजाब के शहरों का भी है, जहां उद्योगों को पहले ही हजारों-लाखों करोड़ का नुकसान हो चुका है. इन किसानों ने पहले कई महीने तक ट्रेन की आवाजाही को प्रभावित किया, जिससे उद्योगों के साथ आमलोगों को भी भारी असुविधा हुई. आप समझ सकते हैं कि पिछले कई महीनों से दिल्ली के लाखों लोग अपने तरह से घरों से निकलने में भी डर रहे हैं. कई महीने से देश की राजधानी एक तरह से कैद में है.

किसान नेताओं ने यह भ्रम फैलाने की कोशिश की कि उनका आंदोलन राष्ट्रीय हो गया. लेकिन यह एक भ्रम ही था. देश के बहुत से हिस्सों में भी छिटपुट प्रदर्शन जरूर हुए लेकिन आंदोलन मुख्यतया पंजाब के हाथों में ही रहा, जिसे हरियाणा के कुछ किसान संगठनों का प्रत्यक्ष रूप से और और कुछ नेताओं का परोक्ष तौर पर समर्थन हासिल था और है.

इस बात की जांच बेहद जरूरी है कि पंजाब से आए किसान नेताओं में से कितने लोग नक्सल पृष्टभूमि के हैं, जो अमूमन लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विश्वास नहीं करते और चुनी हुई सरकारों को उखाड़ फेंक देने की मंशा से काम करते हैं. जांच एजेंसियां भी आंदोलन के लिए दिए गए विदेशी फंडिंग पर बहुत सी जानकारी हासिल कर चुकी है और कुछ दिनों में इनका असली चेहरा भी देश के सामने होगा.लाल किले में हुड़दंग मचाना, निहत्थे पुलिस वालों पर जानलेवा हमला करना, सब कुछ किसी सोची-समझी साजिश का ही हिस्सा ही तो है. व्यापक पैमाने पर हिंसा फैलाने के बाद अगर किसान संगठन जनता से समर्थन की उम्मीद करेंगे तो यह उनकी एक बड़ी गलतफहमी होगी.

किसान संगठनों के अड़ियल रवैये को लेकर सरकार ने नरम रुख अपनाया लेकिन हैरत इस बात को लेकर भी होती है कि ग्यारह दौर की वार्ता के बाद भी सरकार किसानों के झांसे में बार-बार फंसती नजर आई. जब किसान संगठनों में बैठे लोग बिल पर बात ही नहीं करना चाहते थे, तो फिर बातचीत किस चीज को लेकर होती रही? दिल्ली पुलिस भी उन किसानों पर यकीन कर बैठी जो मंच पर कुछ कहते रहे और बंद कमरों में कुछ और.

किसान संगठन और केंद्र सरकार कई बार गतिरोध को खत्म करने के कगार पर थे लेकिन तब तक आंदोलन की डोर वैसे लोगों के हाथ में चली गई थी, जिनका मकसद ही दिल्ली में हिंसा फैलाना, देश की व्यवस्था को तबाह करना और दुनिया भर में भारत की छवि खराब करना था. इससे पहले भी सीएए और एनआरसी को लेकर महीनों तक दिल्ली को बंधक बनाने की कोशिश की गई थी, लेकिन वक्त के साथ सारी सच्चाई सामने आ गई. भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृति न हो इसके लिए सरकार को सचेत रहना होगा.

(डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रज मोहन सिंह

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

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First published: January 28, 2021, 6:08 PM IST
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