Opinion: बिहार में सभी करते हैं जाति की सियासत से इनकार फिर क्यों जातिगत चाहिए आंकड़े?

बिहार में बीजेपी के अलावा सभी पार्टियां जाति की बुनियाद पर खड़ी है. बात चाहे, राष्ट्रीय जनता दल की करें, जद (यू) की करें या एलजेपी की, सभी दलों के अपने जातिगत ब्लॉक बने हुए हैं.

Source: News18 Bihar Last updated on: July 28, 2021, 4:27 PM IST
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Opinion: बिहार में सभी करते हैं जाति की सियासत से इनकार फिर क्यों जातिगत चाहिए आंकड़े?
बिहार में जातिगत जनगणना कराने की तैयारी में है नीतीश कुमार सरकार.
पटना. बिहार के लोगों ने लगता है अपनी नियति तय कर ली है. यहाँ जाति के बिना बातचीत का सिलसिला आगे नहीं बढ़ता. आप जब बिहार पहली बार आएंगे तो यहाँ के अधिसंख्य लोगों की पहली जिज्ञासा ये होगी कि आपकी जाति क्या है? योग्यता से पहले जाति, यही है किसी के प्रतिभा के आकलन का पैमाना. आप किस प्रदेश से आते हैं, आपकी शिक्षा क्या है, आपकी योग्यता क्या है, ये बातें शायद बिहार आकर गौण हो जाती हैं. ऊपर से लेकर नीचे तक समाज जाति के आधार पर इस कदर विभाजित हैं कि आपकी पहचान आपकी जाति से ही होने लगती है. आश्चर्य नहीं, बिहार की राजनीति में जाति का इतना ज़्यादा दबदबा है कि सभी राजनीतिक दल ये चाहते हैं कि जल्द से जल्द जातिगत आबादी के आंकड़े निर्गत क्यों नहीं किया जा रहे हैं. चाहे लाख विकास की बातें कर लें लेकिन जब वोट देने की बात होती है, प्रतिभा धरी की धरी रह जाती है.

बिहार में जाति ही सियासत की बुनियाद
बिहार में बीजेपी के अलावा सभी पार्टियां जाति की बुनियाद पर खड़ी है. बात चाहे, राष्ट्रीय जनता दल की करें, जद (यू) की करें या एलजेपी की, सभी दलों के अपने जातिगत ब्लॉक बने हुए हैं. जाति एक ऐसी सामाजिक इकाई है जिसका सहारा लेकर बिहार में राजनीतिक दल अपनी रोटियाँ सेंकते है.  बिहार के अलावा अन्य राज्यों में जातिगत आधार पर वोट की राजनीति होती है लेकिन बिहार में जिस नियमितता और आक्रामकता के साथ जाति का इस्तेमाल होता है, वैसा किसी और अन्य राज्य में नहीं होता.

1931 के बाद नहीं जारी हुये जातिवार आंकड़े
भारत में आखिरी बार जातिवार जनगणना 1931 में हुई उसके बाद, 1951 से 2011 तक सिर्फ अनुसूचित जाति और जनजाति के आंकड़े ही जाहिर गए. 1941 में जातिगत आंकड़े इकट्ठा किए गए थे लेकिन उसे प्रकाशित नहीं किया गया. यहाँ ये याद दिलाना ज़रूरी है कि काँग्रेस ने इस जातिगत जनगणना का विरोध किया था, ये भी याद रखना ज़रूरी है कि देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल ने इसका यह कहकर विरोध किया था कि इससे समाज का ताना बाना बिगड़ेगा.

अब आरजेडी और जद(यू) जैसी पार्टियां तर्क ये दे रही हैं कि ओबीसी की संख्या के सही आंकड़े सरकार के पास नहीं हैं, इस वजह से उन्हें आरक्षण और सरकारी योजनाओं का सही फायदा नहीं मिल पाता. अगर ये डेटा राजनीतिक दलों के पास हो तो उसका इस्तेमाल विधान सभा और लोक सभा चुनावों के दौरान किया जा सकेगा.
नीतीश कुमार के अलावा तेजस्वी यादव, जीतन राम मांझी भी इस महा-अभियान में शामिल हैं कि केंद्र जातिगत आंकड़े जारी करे, हालांकि भारतीय जनता पार्टी इसे विकास विरोधी और हिन्दू धर्म को और विभाजित करने वाला कदम बताता है। वैसी पार्टियां, जिनका आधार जातिगत संरचना पर आधारित है, उनके लिए जातिवार आंकड़े का महत्व काफी ज़्यादा है.केंद्र सरकार क्या चाहती है?
गृह राज्य मंत्री नित्यानन्द राय ने राज्य सभा में बयान देते हुए कहा है कि भारत सरकार ने आज़ादी के बाद ही यह नीतिगत फैसला ले लिया था कि देश में अनुसूचित जाति और जनजाति के अलावा और किसी भी जाति केआंकड़े जारी नहीं किए जाएंगे.
वर्तमान सरकार तो कम से कम जातिगत सेंसस पर फिलहाल कोई फैसला लेने वाली नहीं है जिसको लेकर सामाजिक और राजनीतिक धरातल पर तीव्र प्रतिक्रिया खड़ी हो.
केंद्र में जब यूपीए की सरकार थी, तब भी जातिगत जनगणना के आंकड़े निर्गत करने के लिए सरकार पर काफी दवाब बनाया गया लेकिन मनमोहन सिंह सरकार ने प्रणब मुखर्जी अध्यक्षता में एक ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स का गठन कर दिया, जिसने फैसला लिया कि एक विस्तृत सामाजिक आर्थिक जातिगत जनगणना किया जाय.

वर्ष 2016 में एसईसीसी (SECC) ने आंकड़े प्रकाशित तो किए लेकिन जातिगत आधार पर डेटा जारी नहीं किया। एसईसीसी ने बाद में अपना सारा आंकड़ा नीति आयोग के हवाले कर दिया, आयोग ने इस डेटा के अध्ययन के बाद इसे लगभग 98 प्रतिशत सही करार दिया. 2021 में किसी भी समय देश के जनसंख्या के आंकड़े जारी किए जा सकते हैं, लेकिन उसमें जातिगत आंकड़े शामिल नहीं होंगे.

पहली बार जातिगत सेंसस के मुद्दे पर आरजेडी और जद (यू) एक ही प्लेटफॉर्म पर इसलिए खड़े हैं क्योंकि दोनों की नज़र ओबीसी वोट बैंक पर टिकी हुई है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी उम्मीद है कि जातिगत आंकड़े अगर जारी हुये तो उससे ईबीसी (अत्यंत पिछड़े वर्ग) की संख्या बढ़ सकती है, जिसका नुकसान आरजेडी को होगा, वहीं तेजस्वी यादव की पार्टी की लगता है कि ओबीसी के सही आंकड़े अगर निर्गत हुए तो उससे उनका वोट बैंक और जनाधार और मजबूत हो सकता है. महादलित और अत्यंत पिछड़े वर्ग (EBC) ब्लॉक के मतदाताओं ने नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड के लिए पिछले चुनाव में मतदान किया, भले ही चिराग पासवान ने जदयू को नुकसान पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी हो. 25 ईबीसी वोट के भरोसे नीतीश कुमार ने अपनी पकड़ बिहार की सत्ता पर कायम रखी हुई है लेकिन ये ऐसा वोट बैंक है जो किसी भी वक़्त हाथ से फिसल सकता है.

जातिगत आंकड़े बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र या ओड़ीशा जैसे राज्यों में राजनीतिक दलों के लिए काम के हो सकते हैं लेकिन केंद्र का रुख यही है कि अभी इसकी ज़रूरत क्या है? कम से कम बिहार जैसे राज्य में कई दल इसका इस्तेमाल सिर्फ सियासी फायदे के लिए ही करेंगे, महज कुछ हज़ार सरकारी नौकरियों से भला उन लाखों वंचितों को क्या हासिल होगा, जो दो जून की रोटी के लिए महानगरों में पलायन करने को मजबूर हैं? हाँ, नेताओं को बड़ी चुनावी खुराक ज़रूर मिल जाएगी.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रज मोहन सिंह

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

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First published: July 28, 2021, 4:07 PM IST
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