किसान आंदोलन में क्या अब भी तर्क और विमर्श की जगह बची है?

Farmer Protest: किसी भी बातचीत के सफल होने के लिए ये ज़रूरी हैं कि संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधि और सरकार दोनों ही समाधान की दिशा में दो-दो कदम आगे बढ़ाएं नहीं तो नतीजे ढाक के तीन पात ही होंगे.

Source: News18Hindi Last updated on: July 22, 2021, 5:51 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
किसान आंदोलन में क्या अब भी तर्क और विमर्श की जगह बची है?
किसान आंदोलन पिछले आठ महीने से अबाध गति से चल रहा है (File Photo)
आज से आठ महीने पहले पंजाब से शुरू हुआ किसान आंदोलन अब दूसरे दौर में प्रवेश कर चुका है. किसानों ने दिल्ली के मुहाने पर बैठकर कई मौसम झेले, अब उनका अगला पड़ाव जंतर-मंतर होगा. जिस समय किसान आंदोलन शुरू हुआ था उसके बाद यमुना नदी में बहुत पानी भी बह चुका है लेकिन किसान मोर्चा और सरकार किसी भी ठोस समाधान से अभी भी बहुत-बहुत दूर हैं.

आज से किसान दिल्ली के सिंघू, टिकरी और गाजीपुर बार्डर से निकलकर जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करेंगे ताकि उनकी आवाज़ संसद तक पहुँच सके. दिल्ली पुलिस ने इन किसानों को सीमित संख्या में प्रदर्शन करने की अनुमति दी है ताकि किसान ये न कह सकें कि उनको अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया.

किसान आंदोलन पिछले आठ महीने से अबाध गति से चल रहा है, दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने किसी भी मौके पर ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे किसान मोर्चा से जुड़े लोग ये आरोप न लगा सकें कि उन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने से रोका गया.

ये भी सच्चाई है कि किसान मोर्चा से जुड़े लोग गणतंत्र दिवस जैसे पावन दिवस पर हुई हिंसक घटनाओं के बाद अब ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे गणतंत्र की मर्यादा तार-तार हो. इसके लिए दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की ज़रूरत है.
किसान संगठन और सरकार दोनों दो कदम आगे बढ़ें
भारत जैसे विशाल लोकतान्त्रिक देश में, जहां अभी भी 80 फीसद लोग कृषि पर निर्भर हैं, सरकार को भी प्रतिबद्धता दिखानी होगी कि संसद सत्र के दौरान ही कोई ठोस समाधान निकल सके लेकिन पिछले कई दौर की बातचीत के बाद भी संगठनों ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वो कृषि कानून को रद्द करने के अलावा और किसी मुद्दे पर बातचीत करने के पक्ष में हैं.

किसी भी बातचीत के सफल होने के लिए ये ज़रूरी हैं कि संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधि और सरकार दोनों ही समाधान की दिशा में दो-दो कदम आगे बढ़ाएं नहीं तो नतीजे ढाक के तीन पात ही होंगे.आंदोलन में तर्क और विमर्श के लिए कितनी जगह?
किसान नेता राकेश टिकैत ने आज दिल्ली में ऐलान किया है कि किसान भी जंतर मंतर पर अपना “संसद” लगाएंगे और अपनी बात देश तक लेकर जाएंगे लेकिन ये भी समझना चाहिए कि किसान पिछले आठ महीने से आप आपस में विचार-विमर्श ही तो कर रहे हैं. लेकिन विमर्श में तर्क की कितनी गुंजाइश बची है?
मूल रूप से पंजाब से शुरू हुआ किसान आंदोलन मुख्यतः दो राज्यों पंजाब और हरियाणा तक सीमित होकर रह गया है. इसका थोड़ा असर उत्तर प्रदेश के उस पश्चिमी हिस्से में भी देखा जा रहा है, जहां पारंपरिक तौर पर किसान आंदोलन पहले से मजबूत रहा है.

पंजाब और हरियाणा दो ऐसे राज्य हैं, जहां एमएसपी लागू करने को लेकर किसानों ने बेहद आक्रामक रवैया अपनाया, इनके निशाने पर मूलतः भारतीय जनता पार्टी रही है, समय-समय पर किसान आंदोलन से जुड़े लोगों ने बीजेपी के कार्यक्रम स्थलों पर हमले भी किए हैं. भारतीय जनता पार्टी के नेता लगातार ये आरोप लगाते रहे हैं कि पंजाब में दर्जनों बार बीजेपी कार्यकर्ताओं को शांतिपूर्ण कार्यक्रम करने से रोका गया, भले ही वहाँ पुलिस पहले से मौजूद रही हो लेकिन वो ज़्यादातर मौके पर मूकदर्शक बनी रही. इस तरह की घटनाओं का दोहराव समाज और प्रदेश के हित में कतई नहीं है, जहां हमेशा हिन्दू और सिख भाईचारे की मिसाल दी जाती है.

पंजाब में अब इस तरह की राजनीतिक फिज़ा ऐसी नहीं है कि मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व से किसी पहल या समाधान की उम्मीद की जा सके. पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी कुर्सी बचाने में लगे हैं, उनसे आज की स्थिति में कुछ भी उम्मीद करना बेमानी होगा.

राजनीतिक दलों के हाथ का खिलौना होने से बचें किसान
वर्ष 2022 में पंजाब और उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव होने हैं, किसान आंदोलनकारी लेकर स्पष्ट कर चुके हैं उनका अगला लक्ष्य “मिशन यूपी” है जिसको लेकर पाँच सितंबर को वह अपनी रणनीति स्पष्ट करेंगे.

अगर किसान मोर्चे से जुड़े नेता बीजेपी के विरोध में उतर जाते हैं तो इससे सकारात्मक नतीजे निकलने की उम्मीद ख़त्म होती जाएगी और वो अपने लक्ष्य से दूर विपक्ष द्वारा बुने जाल में फंसते जाएंगे.

समय आ गया है कि वैसे लोग सामने आएं जो किसान संगठनों और सरकार के प्रतिनिधियों को एक टेबल पर ला सकें. अच्छा तो यही होगा कि किसान आंदोलनकारी भी ज़िद छोड़, उन मुद्दों पर बात करें, जिनको लेकर वह धरने पर बैठे हैं. आखिरकार किसान आंदोलकारियों को ही यह देखना होगा कि राजनीतिक दल उनका इस्तेमाल अपने चुनावी फ़ायदे के लिए न कर सकें.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रज मोहन सिंह

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: July 22, 2021, 5:51 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर