OPINION: दिल की बात ज़ुबान पर आ ही गई कैप्टन साहब?

मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह (Amarinder Singh) होशियारपुर में एक सभा को संबोधित करते हुए किसानों को हिदायत देते हुए कह बैठे कि किसानों के धरनों से पंजाब का बड़ा आर्थिक नुकसान हो रहा है, इसलिए उन्हें ये धरने पंजाब से उठाकर दिल्ली या हरियाणा के करीब ले जाना चाहिए, जिससे केंद्र की सरकार पर दवाब पड़े.

Source: News18Hindi Last updated on: September 13, 2021, 11:43 PM IST
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OPINION:  दिल की बात ज़ुबान पर आ ही गई कैप्टन साहब?
पंजाब में चुनावी हवा ज़ोरों-शोरों से चल रही है, ऐसे में वैसी बातें भी बाहर आ जाती है, जिसकी चर्चा दबी ज़ुबान में होनी चाहिए. (फाइल फोटो)

“क्या ऐसा होता है कि पड़ोस के घर में आग लगे और उसकी तपिश आप तक न पहुंचे. नुकसान अगर होगा तो सबका होगा, किसी का कम किसी का ज़्यादा. लेकिन हाथ तो सबका जलेगा. ऐसे में ज़रूरत है वैसे लोगों की जो किसानों को मरहम दे सके. उन्हें समझा-बूझकर वापस बातचीत की मेज़ पर ल सके. क्या आज कोई ईमानदार कोशिश करने के लिए तैयार है?”


पंजाब में चुनावी हवा ज़ोरों-शोरों से चल रही है, ऐसे में वैसी बातें भी बाहर आ जाती है, जिसकी चर्चा दबी ज़ुबान में होनी चाहिए या बंद कमरे में होनी चाहिए, नहीं तो बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगती. आजकल जहां मीडिया की मौजूदगी हर जगह है, इसलिए आप ये उम्मीद नहीं कर सकते कि आपके द्वारा कही गई कोई बात ज़मीन पर गिरेगी.


ज़ाहीर है उसकी चर्चा भी होगी और उसके मतलब भी निकाले जाएंगे. आप भी पूछेंगे, ऐसा क्या हुआ, ऐसा क्या कह दिया पंजाब के मुख्यमंत्री ने, जिसकी हर जगह चर्चा हो रही है.


कैप्टन की स्वीकारोक्ति का मतलब क्या है?


असल में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह होशियारपुर में एक सभा को संबोधित करते हुए किसानों को हिदायत देते हुए कह बैठे कि किसानों के धरनों से पंजाब का बड़ा आर्थिक नुकसान हो रहा है, इसलिए उन्हें ये धरने पंजाब से उठाकर दिल्ली या हरियाणा के करीब ले जाना चाहिए, जिससे केंद्र की सरकार पर दवाब पड़े.


एक और बात और जिसकी चर्चा कैप्टन ने की वो ये कि पंजाब सरकार की वजह से ही यह आंदोलन संभव हो पाया है नहीं तो आंदोलन दिल्ली तक कैसे पहुँच पाता? कैप्टन अमरिंदर सिंह की स्वीकारोक्ति इस तर्क को और पुख्ता करने के लिए काफी है कि पंजाब की काँग्रेस सरकार किसान आंदोलन को खत्म करने को लेकर क्या वाकई संजीदा है?


नुकसान सिर्फ पंजाब का नहीं सबका हुआ है


किसान आंदोलन के राजनीतिक मकसद को लेकर हमेशा चर्चा होती रही है लेकिन क्या पंजाब की काँग्रेस सरकार वाकई किसान समस्या का एक सार्थक समाधान चाहती है? शायद मुख्यमंत्री के बयानों को सुनकर या पढ़कर ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा है.


“क्या ऐसा होता है कि पड़ोस के घर में आग लगे और उसकी तपिश आप तक न पहुंचे. नुकसान अगर होगा तो सबका होगा, किसी का कम किसी का ज़्यादा. लेकिन हाथ तो सबका जलेगा” किसान आंदोलनों की वजह से दिल्ली और उत्तर प्रदेश में रहने वालों लाखों लोगों की ज़िंदगी थम सी गई है. एनसीआर के सेंकड़ों उद्योग- धंधे चौपट हो गए हैं. लोगों ने दिल्ली और हरियाणा बार्डर से अपने बिजनेस हटा लिए हैं.


नुकसान दिल्ली का हो, हरियाणा का हो, उत्तर प्रदेश का हो या पंजाब का, नुकसान तो सबका हो ही रहा है. पंजाब के लाखों लोगों को हर दिन घर से बाहर निकलने से पहले सोचना पड़ता है कि वो कब घर पहुंचेंगे.


कई बड़े उद्योग घराने पंजाब से मुंह मोड़ रहे हैं-


दिल्ली, जालंधर और अमृतसर जैसे बड़े शहरों में व्यापारियों का लाखों करोड़ों का नुकसान हो चुका है. पंजाब के सीएम के मुताबिक ही वहाँ 113 जगहों पर धरना और आंदोलन हो रहे हैं.


किसानों के आंदोलन की वजह से पिछले महीने एक बड़े बिजनेस हाउस ने अपना कारोबार पंजाब से समेत लिया. एक रिपोर्ट के मुताबिक राज्य को कम से कम 7000 करोड़ का नुकसान हुआ. कंपनी ने पंजाब से बाहर जाने से पहले अदालत की शरण ली थी लेकिन सरकार और न्यायालय की तरफ से उन्हें कोई राहत नहीं मिली.


किसान आंदोलन की असली चाभी किसके पास?


किसी भी बड़ी समस्या का समाधान करने के लिए ये ज़रूरी है कि दोनों पक्ष किसी किसी नतीजे पर पहुँचने के लिए मुद्देवार चर्चा करें. किसान नेता राकेश टिकैत के हालिया राजनीतिक बयानों से ये स्पष्ट हो रहा है कि वो किसान आंदोलन के इतर हर वो राजनीतिक पैतरा आजमा रहे हैं, जिससे समाधान की बजाय विवाद खड़ा हो.


लाल किले पर हुए घिनौने कृत्य को एक पल के लिए किनारे भी कर दें, तो किसान आंदोलन में समाधान की बजाय टकराव की बात ज़्यादा हो रही है. मसलन, पिछले दिनों अपने मंच से अल्लाह-हो-अकबर का जयकारा देकर टिकैत ने क्या संदेश दिया, सिवाय एक अनचाहा विवाद खड़ा करने के, या टिकैत सरकार से निबटने के लिए जब ट्रैक्टर और टैंकर इस्तेमाल करने बात करते हैं, तो इसका क्या निहितार्थ होता है?


किसानों के सच्चे हितैषी चाहेंगे कि किसान आंदोलन का सार्थक अंत हो. किसान सड़कों से वापस खुशी- खुशी अपने घरों को जाएँ. लेकिन ये होगा कैसे? आग में घी डालने से आग भड़कती है. इसका उत्तर सभी दलों और किसान नेताओं को शांत-चित्त से खोजना होगा.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रज मोहन सिंह

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

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First published: September 13, 2021, 11:35 PM IST
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