Opinion: बिहार में लोग शराब इसलिए पी रहे हैं क्योंकि वो बिक रही है!

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए बिहार में शराब बंदी को सौ फीसद लागू करना एक बड़ा राजनीतिक फैसला था. हालांकि, बड़ा सवाल यही है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के तमाम प्रयासों, दावों और तर्कों के बाद भी शराब माफियाओं में खौफ क्यों नहीं है.

Source: News18India Last updated on: February 25, 2021, 6:35 PM IST
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Opinion: बिहार में लोग शराब इसलिए पी रहे हैं क्योंकि वो बिक रही है!
बिहार में शराब माफियाओं का मन इतना बढ़ गया है कि वे पुलिस टीम पर ही धावा बोल देते हैं.
बिहार में आज दो सवालों के उत्तर हर कोई जानना चाह रहा है. पहला कि तमाम प्रयासों के बावजूद प्रदेश में शराब की खरीद और बिक्री क्यों नहीं थम रही है. दूसरा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के तमाम प्रयासों, दावों और तर्कों के बाद भी शराब माफियाओं में खौफ क्यों नहीं है. हमें यह बात स्वीकार लेनी चाहिए कि शराब बिहार के शहरों में, गावों में, और दूरदराज इलाकों में बेची और खरीदी जा रही है. यक्ष प्रश्न है कि इससे निपटा कैसे जाए. प्रदेश में हर दिन कहीं न कहीं शराब को लेकर पुलिस और अपराधियों के बीच मुठभेड़ की खबर मिलती रहती है. इस तरह की घटनाएं राज्य के कानून-व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा चिंता का सबब बन गई हैं. अपराधियों का मन इतना बढ़ गया है कि वे पुलिस टीम पर ही धावा बोल देते हैं.

महज दो दिन पहले सीतामढ़ी में शराब की बिक्री रोकने गए एक दारोगा (एएसआई) दिनेश राम पर हमला किया गया, जिससे उनकी मौत हो गई. इस घटना की गूंज तो विधानसभा में सुनने को मिल रही है. शायद इस मौत के बाद सरकार मामले की गंभीरता को समझ कोई गंभीर कदम उठाए, लेकिन समस्या इतना
व्यापक स्वरूप ले चुकी है कि आज यह बड़ी चुनौती बन गई है. यह कोई पहली घटना नहीं थी, 2020 में पुलिस टीम पर कई ऐसे बड़े हमले देखने को मिले, जिससे कहीं न कहीं माफियाओं की ताकत और नेटवर्क का भी अंदाजा मिलता है.

सबको याद होगा कि पिछले वर्ष 2020 के सितंबर महीने में जब पुलिस श्रमजीवी ट्रेन से शराब की खेप उतरने के वक़्त दबिश डालने गई तो शराब तस्करों ने बुरी तरह से पीटा. घटनाएं हर दिन हो रही हैं, लेकिन कुछ हालिया घटनाओं का ज़िक्र सिर्फ मामले की गंभीरता को समझने के लिए किया जा रहा है.
इन बढ़ती घटनाओं को दो नज़रिये से समझा जा सकता है. पहला यह कि राज्य में शराब माफिया बड़े पैमाने पर तस्करी में लिप्त हो गए हैं या पुलिस कुछ ज़्यादा ही सक्रिय हो गई है. सच्चाई इन दोनों तथ्यों से परे नहीं है बल्कि इसके इर्द-गिर्द ही घूम रही है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए प्रदेश में शराब बंदी को सौ फीसद लागू करना एक बड़ा राजनीतिक फैसला था, जिससे वो राज्य की महिलाओं का वोट तो हासिल करना ही चाहते थे. साथ ही साथ समाज में एक बड़ा संदेश भी देना चाहते थे कि जो पैसे घर के कमाऊ पुरुष शराब में डुबा देते हैं, उसी रकम का इस्तेमाल सामाजिक और पारिवारिक हित के लिए किया जा सकता है. नीतीश कुमार ने बताया कि प्रदेश में अपराध रोकने के लिए शराबबंदी अनिवार्य हो गया था.

प्रदेश में बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के बाद मुख्यमंत्री के लिए यह बताना ज़रूरी था कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था नियंत्रण में है. सड़क, बिजली और पानी जैसे मुद्दों को काफी हद तक सुलझाने के बाद सरकार की यह नैतिक ज़िम्मेदारी थी कि वो निवेश और नए उद्योगों की बात करें. नए बजट में आत्मनिर्भर बिहार की बात कही गई है, ग्रामीण इलाकों में रोजगार सृजित करने की बात कही गई है लेकिन यह लक्ष्य तभी हासिल किए जा सकेंगे जब पटना से बाहर भी अपराधी लगाम में रहेंगे.शराबबंदी नीतीश कुमार के लिए महज कानून व्यवस्था का मसला नहीं है, इसे मुख्यमंत्री ने एक सामाजिक दायित्व के तौर पर अंगीकार किया था. इसके बावजूद अगर उन्हें प्रशासनिक व्यवस्था से पर्याप्त समर्थन नहीं मिला था. सरकार के लिए यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होता जाएगा. आज शराब तस्करों का जाल इतना मजबूत हो गया है. प्रतिबंधित पेय बिहार के गांव-गांव में खरीदे बेचे जा रहे हैं. इससे भी ज़्यादा खतरनाक है देसी शराब और केमिकल का इस्तेमाल, जिससे आम लोगों की ज़िंदगी खतरे में पड़ गई है. प्रदेश के कई हिस्सों से जहरीली शराब से लोगों के मरने की खबरें मिलती रहती हैं.

बेरोजगारी से उपजी निराशा के बीच युवा अगर इस तरह से शराब के गैरकानूनी खरीद-बिक्री में अगर लिप्त होते हैं तो उनकी और उनके पूरे परिवार की ज़िंदगी अंधेरे में घिरती जाएगी. किसी भी राज्य के लिए युवा शक्ति एक ईंधन की तरह होती है, जिसका सकारात्मक इस्तेमाल राज्य को प्रगति की राह पर ले जा सकता है लेकिन अगर वही वर्ग राह भटक जाए तो इसका नुकसान भी बड़े पैमाने पर होता है. सत्ता और संस्थान को देखना होगा कि शराबबंदी को सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा का न मानकर इसके सामाजिक और आर्थिक पहलू की भी समीक्षा होनी चाहिए.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रज मोहन सिंह

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

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First published: February 25, 2021, 6:16 PM IST
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