Opinion: कोरोना से लड़ाई जीतना चाहते हैं तो गांव में बंद पड़े अस्पताल दोबारा खोलिए सरकार

कोरोना संकट ने इस बार जहां शहरों और महानगरों को प्रभावित किया वहीं गांव के गांव भी इस बार महामारी के चपेट में आए हैं. ग्रामीण स्तर पर चिकित्सा सेवाओं की कमी से लेकर सरकारों की उदासीनता भी इसके पीछे एक बड़ी वजह रही है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 19, 2021, 10:28 AM IST
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Opinion: कोरोना से लड़ाई जीतना चाहते हैं तो गांव में बंद पड़े अस्पताल दोबारा खोलिए सरकार
सांकेतिक फोटो.
कोरोना संकट ने इस बार जहां शहरों और महानगरों को प्रभावित किया वहीं गांव के गांव भी इस बार महामारी के चपेट में आए हैं. ग्रामीण स्तर पर चिकित्सा सेवाओं की कमी से लेकर सरकारों की उदासीनता भी इसके पीछे एक बड़ी वजह रही है. कई दशकों से  केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों की वजह से पंचायत स्तर की स्वास्थ्य सेवाएँ हमारे रेडार से बाहर होती चली गईं. हमने बड़े अस्पतालों और बड़े मल्टी-स्पैशलिटी सेंटर बनाने के नाम पर प्राथमिक  चिकित्सा केन्द्रों और उप स्वास्थ्य केन्द्रों की जरूरतों को लगातार नज़रअंदाज़ किया.

भारत की हिन्दी पट्टी खासकर, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों से अक्सर इस तरह की तस्वीर हमारे सामने आती है कि आज से 20-30 वर्ष पहले पंचायत और ब्लॉक के स्तर पर अस्पताल तो बनाए गए लेकिन उसके बाद किसी उनकी सुध नहीं ली. या तो अस्पतालों पर किसी ने कब्जा कर लिया या उसमें पशुओं को बांधा जा रहा है, कई जगहों पर तो अस्पताल के कमरों में भूसे भरे हुए दिख रहे  हैं. ग्रामीण इलाकों में हफ्ते-हफ्ते भर डॉक्टर्स नहीं आते क्योंकि इनके बैठने की जगह नहीं है. ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की भारी कमी है. हमें जो बिहार और झारखंड के ग्रामीण इलाकों से खबरें मिल रही हैं, ग्रामीण इलाकों में व्यवस्था झोला छाप डॉक्टर्स के हाथों में है. गावों के अस्पतालों की बदहाली पर हमारी नजर भी नहीं जाती अगर कोरोना जैसी महा-विभीषिका हमारे सामने नहीं आती.

गांवों में कोरोना की दस्तक
कोरोना वायरस इस बार गांवों में दस्तक दे चुकी है जिसकी आशंका थी और हमारे गाँव, पंचायत और जिलों के अस्पताल इसके लिए तैयार नहीं थे. क्योंकि कोरोना ऐसी बीमारी है, जो आपकी व्यवस्था की परीक्षा लेती है, कोरोना ये भी देखता है कि आप कितनी जल्दी एसओएस (SOS) कॉल का जवाब देते हैं, आप कितनी जल्दी ऑक्सिजन का सिलिंडर एक शहर से दूसरे शहर तक पहुंचा सकते हैं. आपने इस महामारी की शुरुआत में उस जय और वीरू की कहानी जरूर सुनी होगी जब झारखंड के बोकारो से एक युवक अपने जिगरी दोस्त के प्राण बचाने के लिए ऑक्सिजन लेकर गाजियाबाद पहुंच जाता है, 1200 किलोमीटर नॉन स्टॉप कार चलाते हुए. इस तरह की कहानी हमें प्रेरणा देती है कि मुश्किल घड़ी में एक दोस्त दूसरे के काम आ रहे हैं लेकिन साथ ही ये हमारी व्यवस्था का पोल भी खोल रहे हैं कि आखिर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पड़ने वाले गाजियाबाद में एक ऑक्सिजन का सिलिंडर हासिल करना इतना मुश्किल क्यों था?
क्यों किसी को एक सिलिंडर लेकर बोकारो से गाजियाबाद जाना पड़ा. फिर जब हम देखते हैं कि दिल्ली में ऑक्सिजन की कालाबाजारी हो रही है, जीवनरक्षक दवाइयों  को दस गुने कीमत पर बेचा जाता है, पांच किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए अंबुलेंस हजारों की रकम वसूल रहे हैं, कोविड़ के इलाज़ के लिए लाखों वसूला जा रहा है, ऐसे में एक दूसरे के ऊपर दोषारोपण से कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता हैं. इस कोरोनाकाल में हमें रामायण का वो प्रसंग भी याद आता है जब हनुमान जी लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए रामेश्वरम  से हिमालय तक की हवाई उड़ान भरते हैं. ये हनुमान जी ही थे, जो 6000 किलोमीटर तक की यात्रा महज कुछ घंटों में संजीवनी बूटी लेकर आते हैं और लक्ष्मण के प्राण बचाते हैं। ज़रूरी नहीं कि इस कलियुग में आपको हनुमान जी का सहारा मिल सके.

आज कोई हनुमान जी नहीं आने वाले अगर आप दवाई और ऑक्सिजन की कालाबाजारी नहीं रोकते , समय रहते लोगों तक वैक्सीन नहीं पहुंचाते हैं, तो कीमती जानें नहीं बचाई जा सकेंगी. आज भी जब बिहार जैसे राज्य में हम कल्पना करते हैं कि हम पाँच घंटे में राजधानी पहुंच जाएं ताकि समय से पहले एम्स, आईजीएमएस या पीएमसीएह आकर इलाज करा सकें लेकिन स्थिति यही है कि आप जब तक अपने नज़दीकियों को लेकर पटना पहुंचेंगे तब तक काफी देर हो जा रही है.

अस्पतालों पर उठते सवालकुछ दिनों पहले, भारत के पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने दरभंगा मेडिकल कॉलेज की दुर्दशा का सवाल उठाया, जो कभी बिहार के प्रिमियर अस्पतालों में से एक होता था. 1946 में बना ये अस्पताल, पिछले 75 वर्षों में मिथिला के करोड़ों लोगों को सस्ती चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराता रहा है लेकिन इन वर्षों में हमने इस अस्पताल के लिए क्या किया गया? 75 वर्षों में किसी भी इमारत की स्थिति खस्ता हो सकती है, इसलिए डीएमसीएच की स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है.
ये सिर्फ दरभंगा की बात नहीं है, यही स्थिति कमोबेश सभी सरकारी अस्पतालों की है। जितना बड़ा दोष हमारी व्यवस्था का है, उससे भी बड़ा हमारी नीयत का भी है.

क्या ये काफी है?
पिछले दस वर्षों में देश में बड़े पैमाने पर एम्स जैसे बड़े अस्पताल बने हैं, निजी क्षेत्रों में निवेश भी हुआ है लेकिन क्या ये काफी हैं? जिस देश की 70-80 फीसद आबादी अभी भी गावों में रहती है वहां तो आपको हर शहर में ही अच्छे अस्पताल चाहिए. ब्लॉक में और पंचायत में उन अस्पतालों को दोबारा चालू करना होगा, दोबारा उन्हें चमकाना होगा. भारत में स्वास्थ्य के मद पर जितना खर्च हो रहा है, क्या वो काफी है?
कम से कम इस महामारी ने हम सबको यह बता दिया है कि हर परिवार को स्वास्थ्य के लिए और भी पैसे बचाने होंगे.

डॉक्टर्स की कमी
भारत में प्रति व्यक्ति डॉक्टर्स बहुत कम हैं. विश्व स्वास्थ्य केंद्र के आंकड़े बताते हैं कि भारत में 133 करोड़ की आबादी के लिए महज 18 लाख डॉक्टर्स उपलब्ध हैं. 1000 हज़ार लोगों पर मुश्किल से एक डॉक्टर. ऐसे आंकड़े बहुत ज़्यादा विश्वास नहीं जगाते हैं. यह तभी संभव होगा जब नीतिगत स्तर पर एक आम सहमति बने कि हमें सेहत के मद में कितना खर्च करने जा रहे हैं. कोरोना पर नियंत्रण करने के लिए बिहार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश और ओड़ीशा जैसे पिछड़े राज्यों को उनके स्वास्थ्य बजट का कम से कम 20-30 फीसद खर्च करना पड़ेगा क्योंकि ज़्यादातर राज्यों ने मुफ्त में वैक्सीन देने की घोषणा की है. अभी हम कोरोना के दूसरे वेव से दो-दो हाथ कर रहे हैं लेकिन हमें अपनी ताकत आगे के खतरों के लिए भी बचाकर रखना होगा. इसके लिए न केवल सरकार बल्कि निजी क्षेत्र को भी खुलकर योगदान करना होगा, तभी भारत इस लड़ाई को जीत सकेगा.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रज मोहन सिंह

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

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First published: May 19, 2021, 10:28 AM IST
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