बिहार के करोड़ों लोग पलायन की त्रासदी झेलने को अभिशप्त, नेताओं ने क्‍या किया?

अफवाहों को बड़े-बड़े पंख लगे होते हैं. इसकी रफ्तार, खबरों की रफ्तार से कई गुना तेज़ होती है. देश की अधिसंख्य आबादी अफवाह और खबरों में फर्क नहीं कर पाती. अफवाह चिंगारी के समान फैलती है, जो सोशल मीडिया पर आने के बाद और ज्‍यादा उच्‍छृंखल हो गई है. तमिलनाडु में बिहारी मजदूरों को लेकर फैली अफवाह को रोकने के लिए दोनों राज्यों की पुलिस प्रतिबद्ध है लेकिन बिहार में पलायन रोकने के लिए अब तक क्या किया गया?

Source: News18Hindi Last updated on: March 7, 2023, 8:23 am IST
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बिहार के करोड़ों लोग पलायन की त्रासदी झेलने को अभिशप्त, नेताओं ने क्‍या किया?
बिहार और तमिलनाडु की सरकार मजदूरों के भय को ‘आधारहीन’ और हमलों को अफवाह बता रही हैं.

बिहार एक ऐसा प्रदेश है जहां से सबसे ज्‍यादा लोग पलायन करते हैं. बिहार से लोग रबी या खरीफ के मौसम में पलायन करते थे पर हाल के कुछ वर्षों में ये देखने को मिला है कि अब पलायन सालों भर ही चलता रहता है. पिछले दिनों तमिलनाडु से इस तरह की खबरें छन-छन के आती रही कि वहां बिहारी मूल के मजदूरों के साथ ज्यादती हो रही है, उनके साथ मार-पिटाई हो रही है. बिहार सरकार ने इस बात को मानने से इंकार कर दिया कि वहां ऐसा कुछ हो रहा है फिर भी तमिलनाडु से भाग कर आने वाले मजदूरों का सिलसिला थमा नहीं. आनन-फानन में सरकार ने तमिल भाषा जानने वाले तमिल मूल के अधिकारियों को तिरुपुर भेजा जिसे हिंसा का एपीसेंटर माना जा रहा था.


बिहार और तमिलनाडु की सरकारों ने मजदूरों के भय को ‘आधारहीन’ बताया लेकिन ये देखना जरूरी है कि आखिर ऐसी स्थिति बनी क्यों और कैसे? जब हम तमिलनाडु की बात करते हैं तो हमें महाराष्ट्र को नहीं भूलना चाहिए जब बाल ठाकरे खुलकर उत्तर भारतीयों के खिलाफ जहर उगला करते थे. आखिर, बिहार के लोग निशाने पर आए कैसे? हमने वापस आने वाले जितने लोगों से बातचीत की, किसी ने यह नहीं कहा कि उनके साथ में मारपीट हुई, बल्कि ये माना कि उन्होंने सुना है कि उनके किसी जानने वाले के साथ में हिंसा हुई इसलिए घटनाओं को लेकर संदेह पैदा हुआ.



दूसरी बात, मजदूरों से बातचीत के क्रम में बिहार और तमिल मजदूरों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा की बात सामने आई. कई बिहारी मजदूरों ने यह कहा कि उनके ऊपर ये दबाव बनाया जाता रहा है कि वो कम पैसे में मजदूरी न करें. मसलन, बिहार के मजदूर 500-600 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं वहीं तमिल मजदूर 800-1,000 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से पैसा मांगते हैं. समस्या की मूल जड़ यही है.


बिहार सस्ता मजदूर मुहैया कराने वाला राज्य

पूरे भारत में ही बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है लेकिन बिहार में स्थिति भयावह इसलिए प्रतीत होती है क्योंकि कृषि के अलावा यहां औद्योगिक इकाई बहुत कम विकसित हो सकी हैं. आजादी से पहले बिहार के लोग पलायन करके कोलकाता का रुख करते थे लेकिन कम्युनिस्ट के लंबे शासनकाल में पश्चिम बंगाल में उद्योगों का पतन हुआ. साथ ही मजदूरों का बिहार से देश के अन्य शहरों की तरफ पलायन शुरू हुआ, जहां मजदूरों के लिए स्थितियां थोड़ी बेहतर थीं. मसलन सूरत और लुधियाना जैसे शहर बिहारी मजदूरों के पसंदीदा शहर बन गए. दोनों ही जगहों पर सूती वस्त्र और होजियरी से जुड़े हुए काम सबसे ज्‍यादा होते हैं. साथ ही यहां स्थानीयता को लेकर बहुत ज्‍यादा आग्रह भी नहीं होता है, न बाहरी का विरोध. भाषा की भी यहां समस्या थी. यही वजह रही है कि आतंकवाद के दिनों में भी पंजाब में बिहारी मजदूर काम करते रहे. बिहारी मजदूरों की पूछ इसलिए भी बढ़ी क्योंकि वो स्थानीय मजदूरों जैसे घड़ी देखकर काम नहीं करते हैं. उद्योगों में स्किल्ड मजदूरों का सम्मान होता है, जिसमें बिहारी मजदूरों का कोई सानी नहीं.


कंस्‍ट्रक्‍शन कार्य में बिहारी माहिर

दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में जितना कंस्‍ट्रक्‍शन हुआ उसमें बिहार के मजदूर नजर आए. यहीं नहीं, बिहार के मजदूर आपको जम्मू और कश्मीर के सुदूर इलाकों में भी नजर आ जाएंगे, जहां वे खतरनाक स्थितियों में सड़क बनाने का काम करते हैं. कई बार सबने देखा कि कश्मीर में बिहार और झारखंड के मजदूर आतंकियों के निशाने पर आए. बिहार और झारखंड की सरकारों के पास ऐसे कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं कि यहां से कितने लाख या करोड़ लोग देश एक-दूसरे हिस्सों में मजदूरी का काम कर रहे हैं.


शायद, सरकार ऐसे आंकड़े इकट्ठा करके फंसना नहीं चाहती या सरकार सच्चाई से आंखें चुरा रही है. 2022-23 की आर्थिक विकास रिपोर्ट में बिहार सरकार ने माना है कि राज्य में शहरी इलाकों का सही विकास नहीं हो सका है, जो विकास का इंजिन बन सकता था. राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता के साथ-साथ, इच्छाशक्ति का अभाव भी एक बड़ी वजह है कि दूसरे प्रदेशों से लोग बिहार में पैसा नहीं लगाना चाहते हैं. कहीं आपसी राजनीति तो कारण नहीं?


बिहार और तमिलनाडु में बीजेपी की सरकार नहीं है. ये महज संयोग नहीं है कि तमिलनाडु और बिहार दोनों जगह ही बीजेपी एक मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरी है. तमिलनाडु पुलिस ने तो राज्य के बीजेपी अध्यक्ष के. अन्नामलई के खिलाफ दुर्भावना फैलाने का मामला भी दर्ज किया. हालांकि अन्नामलई ने मामले को बेबुनियाद करार दिया है. पिछले दिनों बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव डीएमके नेता के बर्थडे में शामिल हुए थे जिसको लेकर बिहार बीजेपी ने आरोप लगाया कि उन्होंने स्टालिन का केक खाकर बिहारी मजदूरों के हितों को तिलांजलि दे दी. 2024 से पहले विपक्षी एकता मजबूत करने के सिलसिले में तेजस्वी यादव चेन्नई गए थे.


मूल समस्या जस की तस

बिहार में उद्योगों का विकास हो, नए उद्योग लगें, ऐसा प्रयास दशकों से चल रहा है लेकिन अब तक प्रयास नाकाफी रहे हैं. बिहार दौड़ में शामिल होकर भी रेस से बाहर हो चुका है. यहां प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे कम है. भले ही सरकार दावा करे कि यहां का बजट अब सरप्लस बजट हो गया है लेकिन राज्य की स्थिति ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ वाली हो गई है. बिहार की विकास दर अब भी 10.98 प्रतिशत के साथ देश में तीसरे स्थान पर है लेकिन इससे जमीनी हकीकत नहीं बदल जाती है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रज मोहन सिंह

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

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First published: March 7, 2023, 8:23 am IST

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