और कितनी आबादी का बोझ झेल सकेगा भारत?

कोरोना के दूसरे लहर के दौरान, स्वास्थ्य व्यवस्था करोड़ों की आबादी को संभालने में लिए अपर्याप्त साबित हुई. ऑक्सिजन की व्यवस्था, वेंटिलेटर का इंतजाम, आबादी के अनुपात में डॉक्टर्स की नियुक्ति करने जैसे कार्यों के लिए बजट का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य सैक्टर के लिए अलग रखना होगा.

Source: News18Hindi Last updated on: June 21, 2021, 7:19 PM IST
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और कितनी आबादी का बोझ झेल सकेगा भारत?
भारत में अक्सर जनसंख्या नियंत्रण प्रभावी न होने के पीछे धार्मिक सोच और विश्वास को ज़िम्मेवार ठहराया जाता है.

देश की बढ़ती आबादी एक ऐसी समस्या है, जिस पर राजनीतिक दल कभी भी मुखर होकर अपनी बात नहीं रखते. हालांकि सभी इस बात से सभी सहमत हैं कि बढ़ती जनसंख्या का बोझ हमारी अर्थव्यवस्था अब झेल नहीं पा रही है. वजह भी समझ में आती है, हर पाँच वर्ष के बाद नेताओं को जनता के पास वोट मांगने के लिए जाना होता है. जनता उम्मीद करती है कि सरकार उन्हें अनंत काल तक बहुत कुछ मुफ्त यूं ही देती रहे, इससे किसका भला हुआ, न तो लोगों का और न ही देश का.


कोरोना के दूसरे लहर के दौरान सबने महसूस किया कि स्वास्थ्य व्यवस्था करोड़ों की आबादी को संभालने में लिए कैसे अपर्याप्त साबित हुई. मसलन, हर ज़िले तक ऑक्सिजन की व्यवस्था करना, वेंटिलेटर का इंतजाम करना, आबादी के अनुपात में डॉक्टर्स की नियुक्ति करना, ये ऐसे कार्य हैं, जिसे पूरा करने के लिए बजट का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य सैक्टर के लिए अलग रखना होगा.


ये बात नहीं भुलनी चाहिए कि भारत एक विकासशील देश है. हमारे संविधान में भारत एक लोक कल्याणकारी देश है, जहां केंद्र और राज्यों को गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को हर तरह की सुविधा देनी ही होती है, जिसमें, मुफ्त इलाज़, मुफ्त शिक्षा से लेकर मुफ्त राशन तक शामिल है. हर साल बजट में इनके लिए अलग से प्रावधान किया जाता है.


आबादी को लेकर यूपी विधि आयोग चेयरमैन का बड़ा बयान

पिछले रविवार को आपकी नज़र शायद उत्तर प्रदेश के विधि आयोग के चेयरमैन आदित्यनाथ मित्तल के उस बयान की तरफ गया होगा, जिसमें उन्होने देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश की स्थिति के बारे में कुछ महत्वपूर्ण विचार साझा किए थे.


हमारे प्रदेश में संसाधन कम पड़ रहे हैं, चाहे अस्पतालों की बात करें, चाहे नौकरी की बात करें, या मुफ्त भोजन की, हर जगह कमी देखने को मिल रही है. अगर आने वाले 20-30 वर्षों में उत्तर प्रदेश की आबादी 20-22 करोड़ बनी रहे, तो शायद लोगों की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा नहीं तो आने वाला कल निश्चित रूप से मुश्किलों भरा होगा."


हो सकता है, मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी आने वाले महीनों में “हम दो हमारे दो,” की नीति पर मुहर लगा दें, जिसके बाद सरकारी स्कीम का फायदा लेने के लिए परिवारों को दो बच्चे की नीति अपनानी पड़ेगी. इसका ब्लू प्रिंट उत्तर प्रदेश विधि आयोग लगभग तैयार कर चुका है. सरकार का मकसद साफ है कि जनसंख्या नियंत्रण करने में जो लोग साथ दे रहे हैं, उनको ही सरकरी योजनाओं का फायदा मिले लेकिन ये तय है कि सरकार की मंशा में लोग सियासत भी तलाशेंगे.

दो बच्‍चों की अनिवार्यता लागू कर सरमा ने की है बड़ी पहल
उत्तर प्रदेश से पहले ही बीजेपी शासित असम में तो वहाँ के नए मुख्यमंत्री हिमन्ता बिश्वा सरमा ने इस आशय का एक महत्वपूर्ण पहल किया जिसमें सरकारी योजनाओं का फायदा उठाने के लिए दो बच्चों की अनिवार्यता लागू कर दी है.


सरमा ने 10 जून कहा था कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को भी सरकार के साथ आना होगा ताकि उन्हें बेहतर स्वास्थ्य, आवास और शिक्षा सुविधाएं मुहैया कराई जा सकें. सामाजिक समस्याओं का खत्म करने के लिए और एक बेहतर समाज बनाने के लिए कुछ ज़रूरी कदम उठाने होंगे. असम के मुख्यमंत्री ने सीधे-सीधे अपनी बात वहाँ के अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े संगठनों के सामने रखी.


बात जब उत्तर प्रदेश और असम की हो रही है तो बिहार की चर्चा भी बहुत लाज़मी है क्योंकि यहाँ जन्म दर अन्य प्रदेशों और राष्ट्रीय दर से कहीं ऊपर तीन फीसद से ज़्यादा है. यह बताना ज़रूरी है कि भारत में पिछले 20-25 वर्षों में फर्टिलिटी रेट 4-5 से गिरकर 2.1 के करीब आ गया है, लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी समाज के सभी तबके नहीं उठा रहे हैं, समस्या वहीं मुंह बाए खड़ी है. बिहार जैसे राज्य में जहां गठबंधन की सरकार है, ऐसे मसलों पर आम सहमति बनाना बहुत ज़रूरी है.


भारत जैसे देश में जब भी जनसंख्या नियंत्रण की बात होगी तो उसमें धर्म और मज़हब का घालमेल ज़रूर होगा. ऐसा नहीं है कि अपने देश में इसके बारे में पहले नहीं सोचा गया. आज़ादी के पहले से ही बहुत से अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने इसको लेकर सरकार पर दवाब बनाने की कोशिश की लेकिन राजनीति की वजह से निर्यायक कदम नहीं उठाए जा सके.


पहली बार केंद्र सरकार के स्तर पर पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने परिवार नियोजन के लिए सख्त कदम उठाए, जिसमें ज़बरदस्ती नसबंदी कराना भी शामिल था, जिसकी चहुं ओर आलोचना हुई. 1976 में एक ऐसा वक़्त आया जब लोग डर से अपने घरों में नहीं, खेत में छुपकर सोते थे, ताकि सरकार ज़बरदस्ती उठाकर उनका नसबंदी न करा दे. एक आंकड़े के मुताबिक आपातकाल के उन 16-17 महीने की अवधि में कम से कम 60 लाख लोगों की नसबंदी की गई. इस आयोजन में कम कम दो हज़ार पुरुषों की मौत भी हुई.


जनसंख्‍या नियंत्रण प्रभावी न होने के पीछे कौन जिम्‍मेदार?
भारत में अक्सर जनसंख्या नियंत्रण प्रभावी न होने के पीछे धार्मिक सोच और विश्वास को ज़िम्मेवार ठहराया जाता है लेकिन इसी सोच को ही अगर आधार माना जाय तो उन इस्लामी देशों से भी हमें सीखना होगा जिनहोने जन्म दर कम करके आबादी पर लगाम लगा लिया. इन देशों में मुख्यतः टर्की, अल्जीरिया, मिस्र, बांग्लादेश, ईरान और सऊदी अरब जैसे देश हैं, जहां कुरान और हदीस का शब्दशः पालन किया जाता है.


आज ये कहना अनुचित नहीं होगा कि तमाम राजनीतिक दलों को अपने संकीर्ण दलीय और धार्मिक दक़ियानूसी से बाहर निकलकर देशहित को प्राथमिकता देनी होगी. देश सहमति से चलता है और बहुदलीय व्यवस्था में, तय है, मत विभिन्नता भी होगी लेकिन बात जब समाज को आगे रखकर चलने की होगी, तो राजनीतिक दलों को पहल करना ही होगा नहीं तो हम जनसंख्या के बोझ तले दबकर पिछड़े देशों की पंक्ति में सबसे आगे खड़े होंगे.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रज मोहन सिंह

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

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First published: June 21, 2021, 7:37 PM IST
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