OPINION : सब्सिडी की राजनीति, हरित क्रांति और शास्त्री जी का वामपंथियों द्वारा घनघोर विरोध!

खेत की मिट्टी को सुरक्षित बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है ताकि हरित क्रांति के दुष्प्रभावों को कम किया जा सके, लेकिन जरूरी है कि किसानों को समझाकर पहले तैयार किया जाए.

Source: News18 Bihar Last updated on: May 23, 2021, 9:11 AM IST
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OPINION : सब्सिडी की राजनीति, हरित क्रांति और शास्त्री जी का वामपंथियों द्वारा घनघोर विरोध!
केंद्र ने हाल में डीएपी फर्टिलाइज़र पर सब्सिडी काफी बढ़ाई.
पटना. आपको पता है कि हर वर्ष रबी और खरीफ मौसम से पहले खादों की कीमत को लेकर किसान संगठन क्यों शोर-शराबा क्यों करते हैं? अगर इन उर्वरकों का इस्तेमाल न हो तो क्या होगा? क्या इन रासायनिक उर्वरकों के बगैर भारतीय कृषि संभव नहीं है? उत्तर होगा, नहीं.

अगर भारतीय खेती की रूप रेखा को समझने की कोशिश करें तो ये स्पष्ट है कि हमारे किसान इन रसायनिक उर्वरकों पर इस हद तक निर्भर हैं कि हर राज्य और केंद्र सरकारों के सामने खाद पर सब्सिडी देना एक राजनीतिक मजबूरी बन जाती है.

आपने देखा कि केंद्र सरकार ने समय रहते ही डीएपी खाद पर सब्सिडी 140 प्रतिशत बढ़ा दी यानी जिस खाद की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में 2400 रुपए प्रति क्विंटल है, उसे केंद्र आधी कीमत पर मुहैया कराने को तैयार हो गई. इस मद के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने 14,755 करोड़ रुपए की राशि निर्गत की है.

हर वर्ष केंद्र सरकार खादों पर 71,000 करोड़ सब्सिडी के रूप में देती है, जिससे न सिर्फ कृषि क्षेत्र को संबल मिलता है लेकिन इसके पीछे सोच यही है कि भारत में बम्पर उत्पादन जारी रहे और भारत का फूड बास्केट भी भरा रहे. भारत सरकार के लिए इस सब्सिडी को जारी रखना न सिर्फ ज़रूरत है बल्कि मजबूरी भी है.
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सब्सिडी से कृषि क्षेत्र को संबल मिलता है.


1970 के दशक में हरित क्रांति की शुरुआत के बाद इस बात की ज़रूरत थी कि भारत “सिप टू माउथ” की स्थिति से बाहर निकलकर अनाज उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने. भारत में अनाज के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बनाए रखने के लिए इन रसायननिक खादों का प्रयोग बेहद ज़रूरी हो गया है.

बहुतों को याद होगा कि लाल बहादुर शास्त्री जब देश के प्रधानमंत्री थे, अमेरिका अपने जहाज़ से भारी मात्रा में दोयम दर्जे का गेहूं PL-480 स्कीम के अंदर भारत भेजता थे, जिसे जानवरों के खाने के लायक भी नहीं समझा जाता था. पाकिस्तान से 1965 की लड़ाई के बाद, भारत पर दवाब डालने के लिए अमेरिका राष्ट्रपति लिंडन जॉन्सन ने उन सड़े हुये गेहूं की सप्लाई रोकने की धमकी भारत को दी थी.उसके बाद जो फैसला शास्त्रीजी ने लिया वो अपने आप में बेमिसाल था, उनके एक अपील पर भारत के लोगों ने प्रधानमंत्री शास्त्री के साथ सोमवार के दिन उपवास रखने का फैसला कर लिया लेकिन अमेरिका के सामने हाथ फैलाने से इनकार किया, इस घटना ने भारत की अस्मिता को जगाया और शास्त्री जी हरित क्रांति की नींव डाली.

शास्त्री जी के वो कोई सामान्य समय नहीं रहा होगा जब उनकी नीतियों का उनके साथी ही विरोध करते थे. कोई कृषि मंत्री बनने के लिए तैयार नहीं था, बहुत मुश्किल के बाद सी सुब्रमनियन मंत्री बनने के लिए तैयार हुए थे.

ये वो दौर था जब शास्त्री हर हाल में बाजार व्यवस्था और तात्कालिक कृषि व्यवस्था क बदलाव के पक्ष में थे लेकिन उस वक़्त भी वामपंथी पार्टियां उनका खुलकर विरोध कर रह थी, जैसा आज प्रधानमंत्री मोदी का कर रहे हैं. विरोध का आलम ये था कि एक वामपंथी नेता हिरेन मुखर्जी ने उन्हें “स्प्लीट पर्सनलिटी” करार दिया था जिसके जवाब में शास्त्री जी ने बहुत मासूमियत से जवाब दिया था कि वो इतने मासूम नहीं हैं, जितने दिखते हैं. वक़्त गवाह है कि शास्त्री जी ने हरित क्रांति का आगाज करके न सिर्फ देश को अन्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाया बल्कि अपने विरोधियों को भी गलत साबित किया.

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शास्त्री जी ने हरित क्रांति का आगाज करके देश को अन्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाया.


भारत की हरित क्रांति की सुंदर और स्वप्न जैसी यात्रा शुरू हुई, भारत धीरे-धीरे अनाज उत्पादन के मामले में अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करने लगा. इसे सपने को साकार साबित करने में लिए मेक्सिको के कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बरलौग और एमएस स्वामीनाथन जैसे लोगों का बड़ा योगदान रहा। इनलोगों ने अधिक उत्पादन करने वाले वैसी गेहूं की वैरायटी भारत ने लगानी शुरू की जिसने चमत्कार कर दिया.

1966 में मेक्सिको में पहली बार जब 18000 टन गेहूं के बीज पहुंचा कांडला पोर्ट पर आए, पंजाब ने बढ़-चढ़कर अपने ट्रक्स भेजे और और लोगों में बीज और खाद लोगों के बीच बांटा. इसके बाद पंजाब ने वापस मुड़कर नहीं देखा.

1970 के दशक के अंत में पंजाब में स्थिति ऐसी हो गई कि फसलों की कटाई के दौरान स्कूलों में छुट्टियाँ दी जाती थीं और स्कूलों के कमरे का इस्तेमाल स्टोरेज के लिए किया जाने लगा था. पंजाब और हरियाणा ने भारत को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए बहुत मिहनत की, लेकिन भाखड़ा डैम शुरू होने के बाद सपने को जैसे पंख लग गए. लेकिन इस बात को हमेशा याद रखनी चाहिए कि अत्यधिक खाद और रासायनिक दवाओं के इस्तेमाल से पंजाब की जमीन और ग्राउंड वॉटर की गुणवत्ता खराब होती गई. पंजाब हरियाणा और राजस्थान ही नहीं अन्य राज्यों में भी हाल के कुछ वर्षों में रासायनिक खाद का इस्तेमाल बेतहाशा बढ़ा और आज स्थिति यह है कि रासायनिक खाद के बगैर आधुनिक खेती की कल्पना ही नहीं कर सकते हैं. पंजाब में बढ़ते कैंसर के मामले इन्हीं रासायनिक उर्वरकों के कारण बढ़े हैं. खैर जब इन रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ा तो किसानों को बाज़ार कीमत से (मैक्सिमम रीटेल प्राइस) उर्वरक मुहैया कराने के लिए सरकार ने सब्सिडी देने की नीति बनाई ताकि किसानों के ऊपर बाज़ार के उतार चढ़ाव का असर न पड़े.

खेती के सीजन आने से पहले ही सरकार की पहली प्राथमिकता होती है कि किसानों को सही कीमत पर उर्वरक की उपलब्धता हो. इसके लिए सरकार ने देश भर में लगभग 2.3 लाख जगहों पर (POS) यानि पॉइंट्स ऑफ सेल मशीन लगवाया है, जहां से खादों की बिक्री की जाती है. ये पॉइंट ऑफ सेल मशीन E-उर्वरक पोर्टल से सीधा जुड़ा होता है. सरकार भी रीटेल विक्रेताओं को हर हफ्ते सब्सिडी के रूप में सीधी भरपाई करती है.

ये समझना ज़रूरी है कि सब्सिडी की रकम किसानों को नहीं, उन एजेंट्स को मिलता है जो किसानों को सरकार द्वारा निर्धारित दरों पर उर्वरकों की बिक्री करते हैं लेकिन किसान चूंकि एंड यूजर है इसलिए इसका फायदा अंतिम रूप से किसानों को होता है. भारत में खाद के इस्तेमाल का पैटर्न देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि यहांं भले ही खाद की कीमतों में बहुत ज़्यादा इजाफा नहीं हुआ हो लेकिन उर्वरकों के इस्तेमाल में कई गुना बढ़ोत्तरी हुई है.

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रसायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल में पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य बहुत आगे हैं.


1970 के दशक में प्रति हैक्टेयर यूरिया का इस्तेमाल जहां सिर्फ 25 किलो था वहीं 2020 में बढ़कर यह 137 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंंच गया. इसका तात्कालिक फायदा यह हुआ कि अनाज का उत्पादन कई गुना बढ़ गया लेकिन इससे जमीन की गुणवत्ता पर असर पड़ा. हो सकता है एक समय ऐसा भी आए कि इन उर्वरकों का असर खत्म हो जाए.

इन रसायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल में पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य बहुत आगे हैं जहां उत्पादकता बढ़ाने के लिए यूरिया का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया जाता रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान को लेकर चिंता भी व्यक्त की है जहां तय मानकों से कई गुना ज़्यादा नाइट्रोजन का प्रयोग किया जाता है.

अत्यधिक नाइट्रोजन के इस्तेमाल का काला पक्ष यह भी है कि जिन राज्यों में इन उर्वरकों का इस्तेमाल ज़्यादा होता है वहांं पीने वाला पानी भी दूषित होता है और लोगों में “ब्लू बेबी सिंड्रोम” विकसित हो जाता है, जिससे मौत भी हो सकती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन हानिकारक रसायनों के इस्तेमाल को कम करने के लिए एक लाख करोड़ रुपए लगाकर एग्रिकल्चर इंफ्रस्ट्रक्चर फंड की 2020 में शुरुआत की, जिसका इस्तेमाल बेहतर भंडारण क्षमता विकसित करने के साथ-साथ किसानों की आय को दुगुना करने की दिशा में किया जाएगा.

यह एक गैर-राजनीतिक कदम है और किसानों के खेत की मिट्टी को सुरक्षित बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है ताकि हरित क्रांति के दुष्प्रभावों को कम किया जा सके लेकिन ज़रूरी है इसके लिए किसानों को पहले समझाकर इसके लिए तैयार किया जाये. अगर आप किसानों आंदोलन की पृष्टभूमि को समझने का प्रयास करें तो शायद हरित क्रांति की शुरुआत और उसके तमाम पहलुओं को देखना और समझना भी आपके लिए ज़रूरी होगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कृषि क्षेत्रों में सुधार के लिए तीन महत्वाकांक्षी बिल संसद से पारित करवा लिया जिसका उत्तर भारत के दो प्रमुख राज्यों पंजाब और हरियाणा में विरोध हो रहा है. और यह महज संयोग नहीं है कि 1960 के दशक में जब हरित क्रांति को लेकर नए प्रयोग हो रहे थे, विरोध करने वालों में वही वामपंथी ही आगे थे, जो कहते थे हरित क्रांति और मशीनों के आने से छोटे किसान बर्बाद हो जाएंगे, उनकी रोजी रोटी चीन जाएगी, आज वहीं लोग किसानों के साथ खड़े हैं, सिर्फ चेहरे बदल गए हैं लेकिन उनके चाल और चरित्र में कोई बदलाव नहीं आया है.

इतने लंबे लेख के पीछे तर्क यही है कि लोग खाद पर दिये जाने वाली सब्सिडी के साथ साथ हरित क्रांति के उदय और अस्त की कहानी को समझ सकें और देश की मौजूदा राजनीति को समझ सकें क्योंकि एक समय के बाद बदलाव की ज़रूरत आती ही है, अगर हम बेहतर भविष्य की तरफ देख रहे हैं तो हमें बदलाव के लिए हमें ज़रूर सोचना होगा. लोगों के पास वक़्त है कि वो कुछ उन युगांतकारी परिवर्तनों के बारे में सोचें जो आने वाले 30-40 वर्ष तक देश की दिशा और दशा को प्रभावित करते रहेंगे, उसमें कृषि सुधार भी महत्वपूर्ण मील का पत्थर है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रज मोहन सिंह

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

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First published: May 23, 2021, 8:50 AM IST
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