मोदी राज में हिंदी की जड़ें मजबूत करने में जुटे हैं अमित शाह

पीएम नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) पिछले 6 वर्षों से लगातार हिंदी को पूरी दुनिया में बड़े उत्साह के साथ प्रचारित कर रहे हैं, देश की राजभाषा को सांस्कृतिक कूटनीति के बड़े हथियार के तौर पर स्थापित कर रहे हैं. वहीं, उनके सबसे विश्वस्त सहयोगी अमित शाह (Amit Shah) गृह मंत्री की भूमिका में संस्थागत तौर पर देश में हिंदी की जड़ों को मजबूत करने में लगे हैं, सरकारी कामकाज में हिंदी के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल में लगे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: September 14, 2020, 3:04 PM IST
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मोदी राज में हिंदी की जड़ें मजबूत करने में जुटे हैं अमित शाह
अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद मंत्रालय में हिंदी का चलन बढ़ गया है.
आज देश हिंदी दिवस (Hindi Diwas) मना रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना की महामारी के बीच संसद का मानसून सत्र शुरू होने से पहले ट्वीट के जरिये हिंदी दिवस की शुभकामनाएं देशवासियों को दी, साथ में उन लोगों को भी बधाई दी, जो हिंदी के उत्थान के लिए काम कर रहे हैं. पीएम मोदी से पहले गृह मंत्री अमित शाह के एक के बाद एक, तीन ट्वीट हिंदी दिवस को लेकर आए, जिसमें उन्होंने न सिर्फ भारतीय संस्कृति के अटूट अंग के तौर पर हिंदी की चर्चा की, बल्कि आजादी की लड़ाई से लेकर भारत को एकता के सूत्र में पिरोने तक, हिंदी के महत्व की बात की.

यही नहीं, जब लोकसभा की कार्यवाही चल रही थी, उसी बीच सुबह साढ़े दस बजे के करीब दूरदर्शन पर अमित शाह का एक रिकॉर्डेड संदेश भी प्रसारित हुआ. उन्होंने अपने संदेश में राजभाषा के तौर पर हिंदी के विकास के लिए तकनीक के इस्तेमाल की बात की. इसी सिलसिले में राजभाषा निदेशालय की तरफ से विकसित किये जा रहे ई-सरल राजभाषा कोश की चर्चा की, साथ में ई-पत्रिका पुस्तकालय और ई-वेब कांफ्रेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल हिंदी के विकास के लिए किये जाने को भी रेखांकित किया. राजभाषा के तौर पर हिंदी के साथ-साथ सभी स्थानीय भाषाओं का प्रयोग हर स्तर पर किये जाने की अपील करते हुए शाह ने यहां तक कह डाला कि इससे आत्मनिर्भर भारत की मुहिम को भी बढ़ावा मिलेगा.





पहली नजर में तो गृह मंत्री के तौर पर अमित शाह के ये ट्वीट और संदेश हिंदी दिवस के लिए रस्म अदायगी लग सकते हैं, लेकिन सच्चाई इससे काफी हटकर है. सच्चाई ये है कि अमित शाह ने बड़ी ही शिद्दत के साथ हिंदी के इस्तेमाल को अपने मंत्रालय के कामकाज में बढ़ाया है. 2019 में पीएम नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में गृह मंत्री का पद संभालते ही अमित शाह के हिंदी प्रेम की जानकारी उनके मंत्रालय के लोगों को तुरंत लगनी शुरू हो गई. राजभाषा निदेशालय आधिकारिक तौर पर गृह विभाग का हिस्सा है. लेकिन अमित शाह का हिंदी के लिए जोर देना सांकेतिक नहीं रहा, बल्कि हिंदी को लेकर वो काफी गंभीर नजर आए.गृह मंत्रालय का चार्ज संभालते ही अमित शाह ने मातहत अधिकारियों को साफ निर्देश जारी किये कि उनके पास आने वाली तमाम फाइलों में नोटिंग हिंदी में हो. यही नहीं, किसी भी बैठक के लिए जो ब्रीफ यानी संक्षिप्त विवरण बने, वो हिंदी में हो. ये आग्रह सिर्फ संसद में मंत्रालय से संबंधित बातों की जानकारी देने के लिए ही नहीं, बल्कि मंत्रालय के आंतरिक कामकाज में भी हो, संदेश ये भी रहा. यहां तक कि कैबिनेट का जो एजेंडा हर मंगलवार को मंत्रालय में आता है, बुधवार की रुटीन बैठक के पहले, उसके हर मुद्दे की ब्रीफ भी हिंदी में बनाने का निर्देश जारी हुआ. मंत्री के तौर पर अमित शाह न सिर्फ खुद हिंदी का प्रयोग करते रहे, बल्कि तमाम बैठकों में भी हिंदी ही संवाद की भाषा के तौर पर इस्तेमाल होने लगी.





परिणाम ये हुआ कि मंत्रालय में साफ तौर पर सबको संकेत चला गया. ज्यादा से ज्यादा काम हिंदी में करने की होड़ लग गई. जिन लोगों को हिंदी की टाइप या फॉन्ट में काम करने की आदत थी, उन्हें तो कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन जिन्हें हिंदी फॉन्ट का इस्तेमाल नहीं आता था, उन्होंने गुगल लैंग्वेज टूल्स का सहारा लेना शुरु किया. अंग्रेजी में लिखिए और गूगल उसे हिंदी में टाइप कर देगा, ये तरकीब सबने अपना ली.

खुद अमित शाह के अपने कार्यालय में ये सुनिश्चित किया गया कि देश के किसी भी हिस्से से अगर कोई संदेश या आधिकारिक चिट्ठी आती है, तो उसका सार हिंदी में ही लिखा जाए, ताकि उसे पढ़कर वो तुरंत सही जवाब दे सकें या उचित फैसला ले सकें. यही नहीं, बतौर गृह मंत्री उनकी तरफ से जितने भी निर्देश जारी होते हैं, वो सारे हिंदी में ही होते हैं, सारे पत्र हिंदी में भेजे जाते हैं.

अमित शाह ने हिंदी का अधिकाधिक इस्तेमाल अपने भाषणों के लिए भी किया है. चुनावी रैलियां तो ठीक, सरकारी कार्यक्रमों में भी उनके ज्यादातर भाषण हिंदी में ही होते हैं. जब कोई ऐसा अंतरराष्ट्रीय मंच हो, जहां अंग्रेजी का इस्तेमाल करना प्रोटोकॉल के हिसाब से आवश्यक हो, उसे छोड़कर शायद ही अमित शाह ने कभी अंग्रेजी को हाथ लगाया हो. सदन के अंदर भी उन्होंने अपनी बात हिंदी में ही धारदार ढंग से रखी, चाहे आर्टिकल 370 की समाप्ति हो या फिर सीएए संबंधित विधेयक पास कराने के समय की बात हो.



अगर मंत्रालय के मुखिया का ही हिंदी पर इतना अधिक जोर हो, तो नीचे भी संदेश साफ तौर पर चला जाता है. अमित शाह के हिंदी प्रेम को देखते हुए पिछले एक वर्ष में हिंदी के इस्तेमाल में गृह मंत्रालय के अंदर काफी तेजी आई है. उनके अपने कार्यालय में तो अमूमन सारा काम हिंदी में होता ही है, बाकी विभागों में भी हिंदी में कामकाज का प्रतिशत तेजी से बढ़ा है.

ये सारा कुछ तब है, जब अमित शाह खुद हिंदी पट्टी के राज्य से नहीं आते हैं. मूल तौर पर गुजराती अमित शाह का जन्म 22 अक्टूबर 1964 को मुंबई में हुआ, लेकिन बचपन से लेकर पढ़ाई, फिर राजनीति में प्रवेश और जुलाई 2010 तक गुजरात के गृह राज्य मंत्री के रुप में उन्होंने ज्यादातर समय गुजरात में ही बिताया. पार्टी संगठन के अंदर चाहे भारतीय जनता युवा मोर्चा के 1997 में राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रहें हों, या फिर 2001 में बीजेपी के केंद्रीय सहकार सेल के नेशनल कोऑर्डिनेटर रहे हों, ऐसे कुछ अवसरों को छोड़कर अमित शाह के लिए गुजरात से बाहर निकलने के मौके भी कम रहे. ऐसे में सामान्य तौर पर उनके बोलचाल की भाषा गुजराती ही रही. पार्टी के केंद्रीय नेताओं से बातचीत के दौरान ही उनके लिए हिंदी के इस्तेमाल की नौबत आती थी या फिर जब वो गुजरात से बाहर होते थे, बैठकों या कार्यक्रमों के लिए.

लेकिन अमित शाह के जीवन में बड़ा फर्क तब आया, जब सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले में उन्हें सीबीआई ने चार्जशीट कर दिया और फिर उन्हें सरेंडर करना पड़ा. कुछ महीने के जेलवास के बाद उन्हें जमानत मिली, इस शर्त के साथ कि वो गुजरात में नहीं रहेंगे. इसी के साथ अमित शाह का दिल्ली आना हुआ और करीब डेढ़ साल तक वो दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में घूमते रहे. इन दौरान उन्होंने ना सिर्फ अपनी हिंदी को और बेहतर किया, बल्कि बांग्ला और तेलुगू जैसी भाषाओं को सीखने की कोशिश भी की. जिस तरह नरेंद्र मोदी ने दिल्ली सहित उत्तर भारत में बिताये गये 1995 से 2001 के समय को अपनी हिंदी बेहतर करने के लिए इस्तेमाल किया, उसी तरह अमित शाह के लिए भी ये मौका 2010 से 2012 के बीच रहा, जब वो बिना नोटिस में आए देश के तमाम हिस्सों में गये, सामान्य लोगों से बातचीत की, मंदिरों का चक्कर लगाया. इसके बाद 2013 में उन्हें उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी मिली, 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी की जमीन तैयार करने के लिए. इस अवसर का भी उन्होंने बखूबी इस्तेमाल किया अपनी हिंदी को सही करने के लिए. आखिर उत्तर प्रदेश न सिर्फ देश का सबसे बड़ा प्रदेश है, बल्कि हिंदी के लिहाज से भी सबसे महत्वपूर्ण प्रदेश, जहां देश में सबसे अधिक हिंदी बोलने वाले लोग रहते हैं.

ये शायद सुखद संयोग ही था कि स्वतंत्रता के बाद हिंदी को देश के संपर्क की भाषा के तौर पर विकसित करने में जिन लोगों ने अहम भूमिका निभाई, उनमें से एक गोविंद वल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने थे. बाद में देश के गृह मंत्री बनने के साथ ही पंत ने राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई, राजभाषा के तौर पर इसे स्थापित किया.

जहां तक अमित शाह के अपने गृह राज्य गुजरात का सवाल है, उस मिट्टी में पले-बढ़े नेताओं ने भी हिंदी के योगदान में अहम भूमिका निभाई है. पीएम मोदी ने पिछले छह वर्षों में तो हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है. सभी बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर न सिर्फ उन्होंने हिंदी में भाषण दिया, बल्कि हिंदी के अभिवादन नमस्ते को भी पूरी दुनिया में लोकप्रिय बना दिया. कोरोना की महामारी के बीच दुनिया के कई बड़े नेता एक-दूससे से हाथ मिलाने की जगह एक-दूसरे को हाथ जोड़कर नमस्ते करते दिखाई देते हैं. मोदी ने सांस्कृतिक कूटनीति के हथियार के तौर पर भी हिंदी को बखूबी इस्तेमाल किया है. हालात ये हैं कि दुनिया के कई बड़े नेता, चाहे वो राष्ट्राध्यक्ष हों या शासनाध्यक्ष, हिंदी में ट्वीट करते दिखाई पड़ते हैं, पीएम मोदी की अगुआई वाली भारत की सरकार से अपने संबंधों को प्रगाढ़ करने के लिए.

हिंदी को आधिकारिक तौर पर स्वीकार्यता दिलाने में भला गुजरात से संबंध रखने वाले तीन और महापुरुषों की भूमिका को कौन भूल सकता है. महात्मा गांधी ने तो आजादी की लड़ाई के दौरान हिन्दी को देश की आम जनता से संवाद स्थापित करने का माध्यम बनाया, कन्हैयालाल माणेकलाल मुंशी और देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल, ये दोनों भी हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के बड़े पक्षधर रहे. 20 नवंबर 1920 को कोलकाता में आयोजित कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा बनाने के लिए पहली बार जो प्रस्ताव पारित हुआ था, उसे भारतीय संविधान में आधिकारिक तौर पर भारत की राजभाषा बनाने के लिए संविधान सभा की बैठक में 14 नवंबर 1949 को प्रस्ताव पारित कर आधिकारिक स्वीकार्यता दी गई. इस मामले में सबसे महत्वपूर्म भूमिका मुंशी ने ही निभाई थी.

गुजरात की अस्मिता और गौरवशाली इतिहास को गुजराती भाषा में लिखे उपन्यासों के जरिये रेखांकित करने वाले मुंशी ने 1946 में उदयपुर में हुए हिंदी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की थी. इस दौरान मुंशी ने 1931 में हुई जनगणना के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि हिंदी वास्तव में इस देश की राष्ट्रभाषा है, इसे जबरदस्ती वो दर्जा नहीं दिया जा रहा है. मुंशी ने 1931 के इन्हीं आंकड़ों को पेश करते हुए कहा था कि देश में भली प्रकार से या फिर थोडे प्रयास के साथ हिंदी बोलने वालों का आंकड़ा 69 प्रतिशत है, इसलिए हिंदी सहज स्वीकृत देश की संपर्क भाषा है. मुंशी के पहले गुजरात की ही धरती टंकारा में पैदा हुए स्वामी दयानंद सरस्वती ने हिंदी का इस्तेमाल करते हुए पूरे देश में वेदों के महत्व को रेखांकित करते हुए समाज को नई दिशा दिखाने की कोशिश की थी.

लेकिन मुंशी के लिए संविधान सभा के जरिये हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा दिलाने की चुनौती आसान नहीं थी. संविधान सभा के सदस्यों का एक हिस्सा इसके लिए तैयार नहीं था. ऐसे में मुंशी ने एन गोपालस्वामी अय्यंगार की मदद से एक फार्मूला निकाला. देवनागरी में लिखी जाने वाली हिंदी को भारत की राजभाषा के तौर पर मान्यता देते हुए दस वर्ष तक अंग्रेजी का भी इस्तेमाल राजभाषा के तौर पर करने का प्रावधान रखा गया, ताकि इस दौरान हिंदी में सहज तौर पर पूरे देश में राजभाषा के तौर पर  कामकाज शुरु हो जाए. इस तरह इस अति विवादित मुद्दे को हल करने में मुंशी को कामयाबी मिली. हिंदी कहानियों और उपन्यासों के जरिये धनपत राय उर्फ मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी की जड़े जमाने में बड़ी सेवा दी थी और गुजरात की धरती में जन्म लेने वाले कन्हैयालाल माणेकलाल मुंशी ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर आधिकारिक जामा पहनाने में, जिसे ध्यान में रखते हुए राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा – भारतीय जनता हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन कराने के लिए की गई मुंशी की देश सेवा की सदा आभारी रहेगी.

आभारी ये देश और खासतौर पर हिंदी प्रेमी मोदी और अमित शाह के भी रहेंगे, जो 21वीं सदी में पूरे देश और दुनिया में हिंदी को फैलाने के लिए काम कर रहे हैं, मोदी सार्वजनिक तौर पर तो अमित शाह संस्थागत तौर पर. इनकी राह में कोई रोड़ा भी नहीं है, कभी हिंदी का विरोध करने वाले नेता आज नैतिक तौर पर खुद हिंदी विरोध करने की हालत में नहीं है, क्योंकि उनके अपने लोग हिंदी के महत्व और जरूरत को समझ रहे हैं. इसलिए हिंदी विरोध आंदोलन का फायदा लेने वाले नेता भी हिंदी के विरोध की अब महज रस्म अदायगी कर रहे हैं, तो इसके उलट मोदी और शाह की जोड़ी हिंदी के व्यापक प्रसार की सार्थक कोशिश, जिसकी नोटिस देश और दुनिया के लोग ले रहे हैं. सौ साल में कांग्रेस अपने सबसे खराब दौर में है, लेकिन सौ साल पहले हिंदी को लेकर तत्कालीन कांग्रेस का जो पहला प्रस्ताव था, उसे पूरे उत्साह के साथ पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह आगे बढ़ा रहे हैं. इन्होंने कांग्रेस को तो सियासी तौर पर जमींदोज कर दिया है, लेकिन हिंदी के प्रसार में पूरी ताकत से लगे हैं, जिसमें देश के पहले पीएम नेहरू की कोई खास रुचि नहीं थी, जिनके लिए हिंदी का उत्साह के साथ प्रसार हिंदू पुनरुत्थानवाद की निशानी लगती थी. लेकिन मोदी और शाह को प्रेरणा सरदार और मुंशी से मिलती है, इसलिए हिंदी इनके लिए सामाजिक- सांस्कृतिक एकता स्थापित करने का आधार है, जिसे कहने ही नहीं, बखूबी इस्तेमाल करने में भी इन्हें गुरेज नहीं. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रजेश कुमार सिंह

ब्रजेश कुमार सिंहGroup Consulting Editor

लेखक नेटवर्क18 समूह में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से 1995-96 में पत्रकारिता की ट्रेनिंग, बाद में मास कम्युनिकेशन में पीएचडी. अमर उजाला समूह, आजतक, स्टार न्यूज़, एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ में काम करने के बाद अप्रैल 2019 से नेटवर्क18 के साथ. इतिहास और राजनीति में गहरी रुचि रखने वाले पत्रकार, समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन, दो दशक तक देश-विदेश में रिपोर्टिंग का अनुभव.

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First published: September 14, 2020, 1:54 PM IST
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