मोदी को फंसाने की साजिश पर आखिरकार सुप्रीम कोर्ट का फुल स्टॉप!

सुप्रीम कोर्ट ने आज एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट पर दोबारा अपनी मुहर लगाकर उन लोगों की साजिश को नाकाम कर दिया है, जो पिछले दो दशक से इस कोशिश में लगे थे कि कैसे नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों के मामले में ‘फिक्स’ किया जाए. इस इरादे के साथ एनजीओ ब्रिगेड के सदस्य डेढ़ दशक तक अदालतों के फोरम का हर संभव इस्तेमाल करते रहे, जिसका जिक्र खुद सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले में है. कोर्ट ने अपने फैसले में इन तत्वों और इनके साथ साजिश रचने में शामिल रहे गुजरात के कुछ कुंठित अधिकारियों की भी जमकर आलोचना की है, साथ ही SIT के उन अधिकारियों की तारीफ, जिन्होंने मोदी के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के बाद उन आरोपों में कोई सच्चाई नहीं पाई थी और तमाम आलोचनाओं का मजबूती से सामना किया था.

Source: News18Hindi Last updated on: June 24, 2022, 8:31 pm IST
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मोदी को फंसाने की साजिश पर आखिरकार सुप्रीम कोर्ट का फुल स्टॉप!
सुप्रीम कोर्ट ने जाकिया जाफरी की उस पिटीशन को खारिज कर दिया है, जिसमें नरेंद्र मोदी पर मामला दर्ज करने की मांग की गई थी. (फोटो: PTI)

गोधरा कांड के बाद 2002 में हुए गुजरात दंगों को बीस साल से ज्यादा हो गए हैं, दंगों के ज्यादातर मामलों में दोषियों को सजा भी हो चुकी है. लेकिन इन दंगों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर नरेंद्र मोदी को फंसाने की साजिश पर आज जाकर पूर्ण विराम लगा है. जस्टिस एएम खानविलकर की अगुआई वाली तीन जजों की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने याचिकाकर्ता जाकिया जाफरी की उस स्पेशल लीव पिटीशन को खारिज कर दिया है, जिसमें मोदी सहित गुजरात के कई नेताओं और अधिकारियों पर मामला दर्ज करने की मांग की गई थी. यही नहीं, कोर्ट ने उस एसआईटी के कामकाज की भी जमकर तारीफ की है, जिसने गुजरात दंगों के नौ बड़े मामलों की जांच के साथ-साथ जाकिया की शिकायत की भी विस्तृत जांच कर अपनी क्लोजर रिपोर्ट संबंधित अदालत को सौंपी थी और जिसे अदालत ने सही पाते हुए स्वीकार किया था. ये बात अलग रही कि मनमाफिक फैसला नहीं आने और मोदी को फंसाने की अपनी मंशा में नाकाम होने के बाद याचिकाकर्ताओं ने उल्टे एसआईटी के सदस्यों की निष्ठा और कार्यप्रणाली पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे.


सुप्रीम कोर्ट ने करीब चार सौ बावन पृष्ठों के अपने जजमेंट में एसआईटी की निष्पक्ष और बेहतरीन जांच की तारीफ तो की ही है, याचिकाकर्ता के साथ मिलकर अपना एजेंडा चलाने वालों की भी बखिया उधेड़ी है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है –


“पूरी निष्पक्षता और जिम्मेदारी के साथ दंगों के सभी बड़े मामलों में एसआईटी के सदस्यों ने जांच की, जिनके कामकाज से सुप्रीम कोर्ट भी पूरी तरह संतुष्ट रही है. ऐसे अधिकारियों की मंशा और ईमानदारी पर याचिकाकर्ताओं की तरफ से गंभीर सवाल खड़े किए गए. ध्यान रहे कि एसआईटी का गठन करते समय सुप्रीम कोर्ट ने इस बात का ध्यान रखा था कि जटिल मामलों की जांच में सक्षम और ईमानदार, प्रामाणिक अधिकारियों को एसआईटी में रखा जाए. ऐसे में दंगों के सभी नौ बड़े मामलों की विस्तृत जांच करने वाले अधिकारियों की मंशा पर सवाल खड़े कर न सिर्फ ऐसे अधिकारियों की सारी मेहनत को व्यर्थ साबित करने की कोशिश की गई, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की अपनी समझ पर भी सवाल खड़ा करने की कोशिश की गई. ऐसे में हम अपनी भद्रता को नहीं खोते हुए और कुछ नहीं कह रहे हैं और इस याचिका को खारिज कर रहे हैं.


एसआईटी ने झूठे दावों की बखिया उधेड़ दी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ”इस केस को निबटाते हुए हम एसआईटी के सदस्यों और जांच से जुड़े अधिकारियों के अथक परिश्रम की तारीफ करते हैं, जो चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में भी बेदाग होकर बाहर निकले हैं और अपना झंडा गाड़ा है. इस पूरे मामले को देखने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि गुजरात के कुछ कुंठित और नाराज अधिकारियों ने कुछ अन्य लोगों क साथ मिलकर सनसनी पैदा की और जानते-बूझते वाहियात किस्म के आरोप लगाए. उनके झूठे दावों की एसआईटी ने अपनी विस्तृत जांच के जरिये बखिया उधेड़ दी है. सोलह साल तक इस मामले को जानबूझकर खीचा किया गया, 2006 में पहली बार शिकायत देने से लेकर 2013 में एसआईटी की क्लीनचिट के बाद प्रोटेस्ट पिटीशन डालकर. पूरे दुस्साहस का परिचय देते हुए इन्होंने एसआईटी के हर उस अधिकारी के चरित्र हनन का कैंपेन चलाया, जिसने इनके षडयंत्र और कारगुजारी की कलई खोली. जानबूझकर विवाद बनाए रखा गया ताकि इनके निहित स्वार्थों की पूर्ति हो सके. सच्चाई तो ये है कि वो सभी लोग जो अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग में शामिल रहे हैं, उनको कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए और कानून के हिसाब से कार्रवाई करनी चाहिए.”


मोदी को कानूनी जाल में घेरने की कोशिश थी…

सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का यह हिस्सा ये इशारा करने के लिए काफी है कि किस तरह से मोदी को टार्गेट करने के लिए साजिशें रची गईं. खुद बीजेपी ने साफ तौर पर आरोप लगाया है कि इस साजिश में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां शामिल थीं, जो चुनावी मैदान में मोदी के सामने लड़ाई में जीत हासिल न कर पाने के कारण अदालत के मंच का इस्तेमाल एनजीओ ब्रिगेड के जरिये कर रही थीं, मोदी से स्कोर सेटल करने के लिए, मोदी को रोकने के लिए. इरादा ये था कि किसी भी तरह मोदी को कानूनी जाल में घेर लिया जाए, दिल्ली पहुंचने से रोक दिया जाए. गुजरात से लेकर दिल्ली तक चुनावी मैदान में मोदी से लगातार मुंह की खाने के बावजूद कोशिश यही थी कि गुजरात दंगों को लेकर किसी तरह से मोदी के खिलाफ कोई मामला बनाकर सजा सुनवा दी जाए, ताकि मोदी को कानूनी तौर पर चुनाव लड़ने से रोका जा सके.


2002 के गुजरात दंगों के बाद शुरू हुई थी साजिश

इस साजिश की शुरुआत हुई थी 2002 के गुजरात दंगों के तुरंत बाद. गुजरात दंगों के लिए मोदी को जिम्मेदार ठहराते हुए कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने तब केंद्र में सत्तारुढ़ रही वाजपेयी सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया कि नरेंद्र मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री पद से हटा दिया जाए. लेकिन ये दबाव काम नहीं आया. गुजरात में मोदी को पूरी तरह जन समर्थन तो हासिल था ही, गोवा में हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दौरान भी बीजेपी पूरी ताकत से मोदी के साथ खड़ी नजर आई, मोदी ने इस्तीफा देने का प्रस्ताव भी रखा, लेकिन उसे खारिज कर दिया गया. जिन वाजपेयी पर विपक्ष दबाव बना रहा था मोदी को हटाने के लिए, उन्होंने ही गोवा की जनसभा में जेहादी आतंकवाद के कारण भारत सहित पूरी दुनिया में हो रही अशांति का मुद्दा उठा दिया.


वर्ष 2002 के दिसंबर महीने में हुए गुजरात विधानसभा चुनावों को मोदी ने गुजरात की अस्मिता की लड़ाई बना दी, गुजरात को बदनाम करने वाले दलों के खिलाफ जनादेश मांगा. गुजरात की जनता ने मोदी की इस मांग पर मुहर लगाई और बंपर ढंग से बीजेपी की जीत हुई. उसके बाद मोदी का ग्राफ लगातार बढ़ता चला गया. 2004 के लोकसभा चुनावों में भले ही वाजपेयी सरकार चुनाव हार गई, लेकिन मोदी के कद में और बढ़ोतरी ही हुई.

2004 में कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए केंद्र में सत्ता में आई. इसी के साथ मोदी को गिराने और घेरने का अभियान फिर से शुरू हुआ. गुजरात दंगों के मामलों को हवा दी जाने लगी. एनजीओ ब्रिगेड को आगे किया जाने लगा, मानवाधिकार के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले ऐसे लोगों में तीस्ता शेतलवाड़, हर्ष मंदर, शबनम हाशमी जैसे नाम प्रमुख थे. इन सबको यूपीए सरकार ने शह दी. इन लोगों को सोनिया गांधी की अगुआई वाली उस सुपर कैबिनेट में जगह मिली, जो राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के तौर पर जानी जाती थी. इनकी संस्थाओं को ग्रांट दिए गए, कांग्रेस ने अपने बड़े नेता, जो देश के माने हुए वकील भी थी, उनकी इन लोगों की मदद के काम में लगा दिया. एक हाई प्रोफ़ाइल एक्टिविस्ट को तो एक राजनीतिक दल ने मोदी को फंसा देने में कामयाबी मिलने पर राज्यसभा में भेजने का लालच भी दिया!


2006 में जाकिया जाफरी को आगे किया गया

इसी तैयारी और इरादे के साथ वर्ष 2006 में जाकिया जाफरी को आगे किया गया. वो जाकिया जाफरी, जो पूर्व कांग्रेसी सांसद एहसान जाफरी की पत्नी थीं. एहसान जाफरी की मौत गुजरात दंगों के बड़े मामलों में से एक, गुलबर्ग सोसायटी कांड में हुई थी. 28 फरवरी 2002 को हुए गुलबर्ग सोसायटी कांड को लेकर पुलिस ने पहले ही एफआईआर दर्ज कर रखी थी और जांच चल रही थी. लेकिन एनजीओ ब्रिगेड और कांग्रेस के इरादे कुछ और ही थे.


पुलिस से शिकायत की, पर जांच में सहयोग नहीं

इनका इरादा था नरेंद्र मोदी को फंसाना. इसलिए जाकिया को आगे कर गुजरात के तत्कालीन डीजीपी पीसी पांडे के पास 8 जून 2006 को एक शिकायत सौंपी गई, जिसमें 2002 के गुजरात दंगों को व्यापक साजिश का नतीजा बताया गया और उसके लिए नरेंद्र मोदी सहित 62 लोगों को जिम्मेदार ठहराया गया, जिसमें राज्य सरकार के कुछ मंत्री, अधिकारी और नेता थे. पीसी पांडे ने जाकिया की ये शिकायत अपने एक मातहत अधिकारी को दी. अधिकारी ने इतने संगीन आरोपों से भरे आवेदन को लेकर आगे की जानकारी हासिल करने के लिए जब जाकिया को बुलाकर और जानकारी मांगनी चाही, तो जाकिया आने के लिए तैयार नहीं हुईं, बल्कि ये जिद कर डाली कि उनकी शिकायत के आधार पर जब तक सभी लोगों के खिलाफ एफआईआर दायर नहीं हो जाती, वो पुलिस अधिकारी के सामने नहीं आएंगी कोई भी जानकारी देने के लिए. जाहिर है, होश हवास में रहने वाला कोई भी अधिकारी बिना किसी ठोस आधार के अनाप-शनाप आरोपों वाली शिकायत के आधार पर एफआईआर नहीं दर्ज कर सकता था.


और हाईकोर्ट ने भी खारिज कर दी जाकिया की याचिका

गुजरात पुलिस का मंच इस्तेमाल करने में जब कामयाबी नहीं मिली, तो जाकिया जाफरी ने गुजरात हाईकोर्ट का मंच इस्तेमाल करने की सोची. वहां सुनवाई के बाद जस्टिस एमआर शाह ने जाकिया की याचिका को खारिज कर दिया. इस समय तक जकिया के साथ तीस्ता शीतलवाड़ भी जुड़ चुकी थीं अपनी संस्था सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस के जरिये. तीस्ता पहले से ही गुजरात दंगों के कई मामलों में पीड़ित परिवारों को आगे रखकर मोदी के सामने तीर चला रही थीं.


सुप्रीम कोर्ट ने गठित की एसआईटी

हाईकोर्ट से भी जब मनचाहा नतीजा नहीं मिला तो जाकिया और तीस्ता ने दिल्ली की राह पकड़ी. सुप्रीम कोर्ट के सामने वही दंगों की व्यापक साजिश वाली शिकायत याचिका की शक्ल में 18 दिसंबर 2007 को रखी गई, जिसमें निशाने पर थे मोदी. सुप्रीम कोर्ट ने उसके कुछ समय बाद ही गुजरात दंगों के बड़े मामलों की दोबारा जांच के लिए सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन की अगुआई में एक विशेष जांच दल यानी एसआईटी का गठन किया. इसी एसआईटी को जाकिया की शिकायत भी पकड़ा दी गई, ये कहते हुए कि इसमें लगाए गए आरोपों की सत्यता की जांच की जाए.


राघवन ने जाकिया की इस शिकायत की इंक्वायरी करने की जिम्मेदारी एके मल्होत्रा नामक अधिकारी को सौंपी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के तय हुए मानक के मुताबिक ये काम गुजरात बाहर के किसी अधिकारी को दिया जाना था, ताकि इन्क्वायरी करने वाले अधिकारी पर किसी किस्म का दबाव न रहे.


आरोपियों को ही गवाह बनाने का आग्रह

मल्होत्रा ने जाकिया की 67 पन्नों की शिकायत को देखा तो समझ में ही नहीं आया कि याचिकाकर्ता कहना क्या चाहती है. पूरी याचिका बहुत ही सतही ढंग से ड्राफ्ट की गई थी. जिन लोगों के नाम आरोपी के तौर पर लिखे गए थे, उनके नाम तक सही ढंग से नहीं लिखे गए थे. मल्होत्रा को बाद में इस स्थिति का सामना भी करना पड़ा कि कुछ अधिकारी जिन पर पहले आरोप लगाए गए थे, उन्हीं को बाद में गवाह के तौर पर ट्रीट करने का आग्रह भी जाकिया की तरफ से रखा गया, क्योंकि उस वक्त तक मोदी सरकार से इन अधिकारियों की खटक चुकी थी.


एसआईटी के दफ्तर में मोदी से 13 घंटे पूछताछ हुई

सीबीआई से डीआईजी के तौर पर रिटायर हुए मल्होत्रा ने मई 2009 में एसआईटी ज्वाइन करने के साथ ही जाकिया की शिकायत पर औपचारिक ढंग से इंक्वायरी शुरु की. इसी सिलसिले में उन्होंने उन तमाम लोगों का पक्ष जाना, जिनके सामने गंभीर आरोप लगाए गए थे. इसी कड़ी में मल्होत्रा ने 27 मार्च 2010 को एसआईटी के दफ्तर में बुलाकर नरेंद्र मोदी से करीब तेरह घंटे लंबी पूछताछ की. ध्यान रहे कि मोदी को उस वक्त गुजरात का सीएम रहते हुए आठ साल से ज्यादा हो गया था और वो 2002 के बाद 2007 का विधानसभा चुनाव भी बंपर ढंग से जीत चुके थे. मोदी से पूछताछ के तीन दिन पहले अमित शाह से भी पूछताछ हुई थी, जो उस वक्त गुजरात की मोदी सरकार में गृह राज्य मंत्री थे. पूछताछ पीके मिश्रा से भी हुई थी, जो 2002 दंगों के वक्त सीएम मोदी के प्रिसिपल सेक्रेटरी थे और फिलहाल पीएम मोदी के प्रिसिपल सेक्रेटरी हैं.


2011 में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी की रिपोर्ट स्वीकार की

लंबी चली पूछताछ और जांच-पड़ताल के बाद एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट 12 मई 2010 को सुप्रीम कोर्ट में सौंपी. सुप्रीम कोर्ट ने ये रिपोर्ट उस वक्त इस मामले में एमाइकस क्यूरी रहे प्रशांत भूषण को सौंप दी. प्रशांत भूषण पर एसआईटी की उस रिपोर्ट को लीक करने का भी आरोप लगा, एनजीओ मंडली के साथ उनके संबंध तो प्रगाढ़ थे ही. ऐसे में राजू रामचंद्रन नए एमाइकस क्यूरी बनाए गए. राजू रामचंद्रन के कहने पर एसआईटी की तरफ से हिमांशु शुक्ला नामक आईपीएस अधिकारी ने इस मामले में कुछ बिंदुओं पर आगे की जांच की. बारह सितंबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी की इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि जांच रिपोर्ट को अहमदाबाद की उस अदालत में आगे की कार्रवाई के लिए सौंपा जाए, जो पहले गुलबर्ग सोसायटी मामले का संज्ञान ले चुकी है. इसी के तहत अहमदाबाद शहर के मेट्रोपोलिटन कोर्ट नंबर 11 में एसआईटी की तरफ से हिमांशु शुक्ला ने आठ फ़रवरी 2012 को क्लोजर रिपोर्ट सौंपी, मतलब ये कि मोदी समेत किसी भी आरोपी के सामने कोई मामला बनता नहीं है.


प्रोटेस्ट पिटीशन फाइल कर क्लोजर रिपोर्ट का विरोध किया

ये बात भला जाकिया, तीस्ता या फिर उनको समर्थन दे रही कांग्रेस को कैसे मंजूर होती. प्रोटेस्ट पिटीशन फाइल कर एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट का जमकर विरोध किया गया. लेकिन लंबी चली सुनवाई के बाद अहमदाबाद की मेट्रोपोलिटन कोर्ट ने 26 दिसंबर 2013 को प्रोटेस्ट पिटीशन को रिजेक्ट करते हुए एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया. जाहिर है, इसके बाद मोदी के सामने कोई मामला बनता नहीं था, लंबी चली जांच पड़ताल के बाद मोदी बेदाग निकले थे. तब तक अपनी पार्टी को गुजरात में लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव अपनी अगुआई मे जिताकर मोदी बीजेपी के पीएम उम्मीदवार भी बन चुके थे 2014 लोकसभा चुनावों के लिए.


मोदी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाना मुश्किल था

ये स्थिति मोदी विरोधियों के लिए असह्य थी. मोदी पर व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का कोई आरोप चस्पां नहीं हो सकता था, बल्कि उल्टे कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार के खिलाफ घोटालों की लंबी लिस्ट खड़ी हो गई थी. मोदी पर नाते-रिश्तेदारों की मदद करने का भी कोई आरोप नहीं लग सकता था, परिवार में मां से साल में एक-दो बार मिलने के अलावा कोई संबंध था नहीं, नाते–रिश्तेदारों को मदद करना तो दूर की बात. ऐसे में एक बार फिर से तय यही किया गया कि मोदी को कोर्ट में उलझाए रखा जाए. अगर किसी तरह से मोदी के खिलाफ कोई आरोप चस्पां हो जाते और दो साल की सजा हो जाती तो मोदी कोई चुनाव नहीं लड़ सकते थे जन प्रतिनिधित्व कानून के हिसाब से.


इसी रणनीति के तहत एक बार फिर से गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया. हालांकि सुनवाई चलती रही और इस दौरान मोदी देश के पीएम बन गए बड़े जनसमर्थन के साथ. गुजरात हाईकोर्ट में लंबी चली सुनवाई के बाद जस्टिस सोनिया गोकाणी ने पांच अक्टूबर 2017 को जाकिया और तीस्ता की याचिका खारिज कर दी, उसमे कोई मेरिट नहीं पाया.


10 महीने बाद दी गई हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती

जाहिर है, अगर याचिकाकर्ताओं को गुजरात हाईकोर्ट के फैसले से कोई असंतोष था, तो नब्बे दिन के अंदर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना था उन्हें. लेकिन नब्बे दिन की कौन कहे, बल्कि दस महीने के बाद, पूरे 216 दिन की देरी के साथ, जाकिया और तीस्ता ने सुप्रीम कोर्ट की राह पकड़ी, 11 सितंबर 2018 को. स्पेशल लीव पिटीशन दाखिल की गई हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए. इस बार सुप्रीम कोर्ट में जाकिया की तरफ से कांग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल खड़े हुए, जबकि गुजरात सरकार की तरफ से मुकुल रोहतगी. लेकिन यहां भी मंशा मामले का जल्दी निबटारा नहीं थी, बल्कि बार-बार उलझाया जाना थी. 2019 लोकसभा चुनावों के पहले फिर से विवाद खड़ा करना था.


सुनवाई टालने का बार-बार आग्रह होता रहा

एक तरफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई, लेकिन जल्दी सुनवाई कराने की जगह सुनवाई टालने का आग्रह बार-बार होता रहा, दो साल तक ये सिलसिला चलता रहा. इससे उकताई सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार कह दिया कि 26 अक्टूबर 2021 से लगातार सुनवाई होगी, हर हफ्ते तीन दिन. दीवाली की छुट्टी के बाद फिर से सुनवाई शुरु हुई और नौ दिसंबर 2021 तक ये सुनवाई चली. उसके बाद जस्टिस खानविलकर की अगुआई वाली बेंच ने फैसला रिजर्व कर लिया. आखिर जिरह के घंटों और दस्तावेजों की तादाद जो बड़ी थी.


करीब छह महीने के इंतजार के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आज अपना फैसला सुनाया. याचिकाकर्ताओं और उनके साथ पूरे मामले को जानबूझकर लंबा खीचने की साजिश में शामिल रहे लोगों की कड़ी आलोचना और एसआईटी की जमकर तारीफ की कोर्ट ने. इस फैसले के साथ ही मोदी को 2002 दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराने की साजिश को भी पूर्ण विराम लग गया.


अहमदाबाद की मेट्रोपोलिटन कोर्ट ने जब एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट को 26 दिसंबर 2013 को स्वीकार किया था, तो उस दिन मोदी ने लंबा ब्लॉग लिखते हुए कहा था, सत्यमेव जयते. नौ साल बाद एक बार फिर से जब उनके निर्दोष होने पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लगी है, तो उन्होंने उसकी नोटिस भी नहीं ली है. दरअसल मोदी अब इन साजिशों और आरोपों से काफी उपर उठ चुके हैं, गुजरात के बाद देश और देश के बाद पूरी दुनिया में अपनी धाक जमा चुके हैं. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बयान देकर समय खर्च करना भी उन्होंने शायद उचित नहीं समझा. हां, औपचारिकता के तौर पर बीजेपी ने इस फैसले को लेकर कांग्रेस और वाम दलों पर जरूर निशाना साधा.


वैसे वो अधिकारी सबसे अधिक खुश होंगे, जिन पर मोदी को फिक्स न कर पाने की खीझ में एनजीओ के बैनर तले मानवाधिकार की पेशेवर दुकान चलाने वाले लोगों ने जमकर हमला बोला था, लेकिन आज अदालत की इन्हें जमकर तारीफ मिली. उधर मोदी विरोधी तत्वों की दो दशक बाद भी मुराद नहीं पूरी हो पाई, उल्टे सुप्रीम कोर्ट से मिली जमकर फटकार. पुरानी सूक्ति सबको हमेशा याद रहनी चाहिए, सत्यमेव जयते!


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रजेश कुमार सिंह

ब्रजेश कुमार सिंह

लेखक नेटवर्क18 समूह में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से 1995-96 में पत्रकारिता की ट्रेनिंग, बाद में मास कम्युनिकेशन में पीएचडी. अमर उजाला समूह, आजतक, स्टार न्यूज़, एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ में काम करने के बाद अप्रैल 2019 से नेटवर्क18 के साथ. इतिहास और राजनीति में गहरी रुचि रखने वाले पत्रकार, समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन, दो दशक तक देश-विदेश में रिपोर्टिंग का अनुभव.

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First published: June 24, 2022, 8:31 pm IST
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