मोदी पर निशाना साधने से पहले अपने गिरेबान में झांकें हामिद अंसारी

दस साल तक उपराष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी (Hamid Ansari) का टकराव मोदी सरकार (Modi Govt) से सवा तीन साल तक चलता रहा, जब वो 2014 में सत्ता में आई. राज्य सभा के अंदर ही नहीं, सदन के बाहर भी अंसारी ने अपने कामकाज, बयानों और टिप्पणी से मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की. हालांकि, इस कोशिश में वो खुद विवादास्पद हो गए. एक बार फिर से यही हुआ है, जब उन्होंने अपनी नई पुस्तक में मोदी पर सीधा हमला करने की कोशिश की है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 29, 2021, 7:54 pm IST
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मोदी पर निशाना साधने से पहले अपने गिरेबान में झांकें हामिद अंसारी
पीएम नरेंद्र मोदी और पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी राष्ट्रपति भवन में ‘एट होम’ कार्यक्रम के दौरान.

इसी 26 जनवरी की बात है. गणतंत्र दिवस के मौके पर परंपरा के मुताबिक राष्ट्रपति भवन में ‘एट होम’ का आयोजन किया गया था. हर साल ये होता है, 15 अगस्त और 26 जनवरी के मौके पर, दिल्ली में राष्ट्रपति और राज्यों की राजधानियों में राज्यपाल अपने आधिकारिक आवास पर अतिथियों को चाय-नाश्ते के लिए बुलाते हैं, जिसमें सरकार और प्रशासन से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों के अलावा समाज के अन्य क्षेत्रों के लोगों को भी बुलाने की परंपरा रही है.


दिल्ली में 26 जनवरी के दिन किसान आंदोलन के नाम पर उपद्रवियों ने ट्रैक्टर रैली के बहाने जमकर हिंसा की, यहां तक कि लाल किले पर भी तिरंगे का अपमान किया और किसी धर्म विशेष का झंडा लगा दिया. जगह-जगह हुए उपद्रवों में सैकड़ों पुलिसकर्मी घायल हुए, सरकारी संपत्ति का जमकर नुकसान हुआ. दिल्ली जाने वाले तमाम रास्तों को बंद किया गया, ताकि हिंसा के फैलाव को रोका जा सके.


ऐसे माहौल में लगा कि एट होम में उपस्थित रह पाना संभव होगा या नहीं. औपचारिक आमंत्रण होता है और स्वीकार करने के बाद नहीं जाना अशिष्टता मानी जाती है, खास तौर पर आमंत्रण जब राष्ट्र के सांवैधानिक प्रमुख की तरफ से हो और वो भी गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर. आखिर हम जिस संविधान की दुहाई देकर अपने मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का बार-बार जिक्र करते हैं, वो संविधान इसी 26 जनवरी के दिन लागू हुआ था 1950 में. दूसरा ये कि अगर आप दिल्ली में रहते हैं और राष्ट्रपति भवन में हुए एट होम के आयोजन में निमंत्रण मिले, तो निमंत्रित आदमी गर्व महसूस करता है.


शाम चार बजे से आयोजित होने वाले एट होम के लिए आधे घंटे पहले पहुंच जाना आवश्यक होता है, लेकिन किसी तरह भागकर चार बजने में जब महज पांच मिनट कम थे, राष्ट्रपति भवन के पिछले हिस्से में मौजूद उस लॉन में पहुंचा, जिसे देश और दुनिया मुगल गार्डेन के तौर पर जानती है, जो अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर है. महज पौने दो सौ लोगों की मौजूदगी थी, जिसमें भारत सरकार के मंत्रियों के अलावा प्रमुख प्रशासनिक और सैन्य अधिकारी मौजूद थे. मेरे जैसे गिने-चुने पत्रकार भी थे.


कोरोना काल में तमाम एहतियात बरती गई थी. बैठने की जगह तय थी, इसलिए अपने लिए निर्धारित जगह पर बैठ गया. चार बजे के करीब प्रधानमंत्री आए, उनके बाद प्रोटोकॉल के मुताबिक उपराष्ट्रपति और फिर राष्ट्रपति को आना था. आते ही प्रधानमंत्री मोदी ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पास बैठे पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी को देखा और शिष्टाचार के नाते उनकी टेबल की तरफ आए. इनकी टेबल से नजदीक ही हम लोगों की भी टेबल थी, इसलिए शिष्टाचार के नाते हमारी टेबल पर बैठे लोग भी खड़े हो गए.


अपनी तरफ पीएम मोदी को बढ़ते देख हंसते-हंसते अंसारी ने पूछ लिया, कैसे हैं आप. पीएम मोदी का उतना ही तत्पर जवाब था, जी रहे हैं हम. नजदीक होने के कारण मैं भी ये सुन पाया. महज दो छोटे वाक्य थे, एक सवाल का और एक जवाब का. लेकिन बॉडी लैग्वेंज और संवाद की अदायगी काफी कुछ कह जाने वाली थी. गणतंत्र दिवस का दिन और उस मौके पर दिल्ली में जमकर हिंसा की गई हो, पुलिसकर्मियों को गोली चलाने के लिए उकसाने की पूरी कोशिश की गई हो और इसके पीछे किसानों से ज्यादा उन सियासी पार्टियों और नेताओं की भूमिका हो, जो आंदोलन के बहाने पीएम मोदी की सरकार को किसी तरह घेरने में लगे हों, बदनाम करने में लगे हों, तो मोदी का अवसाद समझा जा सकता है.


शायद पीएम मोदी को अपने सामने खड़े अंसारी को देख अपनी सरकार के पहले कार्यकाल के करीब सवा तीन वर्ष भी याद आ गए हों, जिस वक्त हामिद अंसारी देश के उपराष्ट्रपति की भूमिका में राज्य सभा के भी सभापति थे और जहां तमाम महत्वपूर्ण बिलों को पास कराना असंभव हो गया था. खुद हामिद अंसारी के कई ऐसे बयान आए थे, जो सीधे-सीधे मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले थे और इस धारणा को मजबूत करने की कोशिश करने वाले थे, जिसमें विपक्ष की अगुआई में ये कहा जा रहा था कि देश में असहिष्णुता बढ़ गई है और अल्पसंख्यक अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.

जिस समय हामिद अंसारी और नरेंद्र मोदी की ये सबसे ताजी मुलाकात हम लोग अपनी आंखों के सामने देख रहे थे, उस समय अंदाजा नहीं था कि अगले ही दिन हामिद अंसारी एक बार फिर से नरेंद्र मोदी पर हमला करने वाले हैं अपनी नई किताब के जरिए, जिसका एक बड़ा हिस्सा उनके बतौर उपराष्ट्रपति वाले कार्यकाल के दौरान की घटनाओं का भी है, जब वो राज्य सभा का भी बतौर सभापति संचालन कर रहे थे. हामिद अंसारी देश के पहले उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बाद दूसरे ऐसे शख्स हैं, जो लगातार दो टर्म इस पद पर रहे हैं.


राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी राष्ट्रपति भवन में ‘एट होम’ कार्यक्रम के दौरान.


राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी राष्ट्रपति भवन में ‘एट होम’ कार्यक्रम के दौरान.



हामिद अंसारी की 26 जनवरी शाम की हंसी और अगले दिन उनकी आत्मकथा ‘By Many a Happy Accident’ का बाजार में आना. अंदाजा नहीं था कि अगले दिन उनकी इस आत्मकथा में पीएम मोदी से जुड़े प्रसंग को लेकर विवाद शुरु हो जाएगा. हालांकि मोदी को हामिद अंसारी के बारे में कोई संशय नहीं रहा है, जब वो देश के उपराष्ट्रपति के तौर पर राज्य सभा के सभापति की भूमिका में थे या फिर जब रिटायर हो रहे थे.


ज्यादातर लोगों को याद होगा कि 10 अगस्त 2017 को हामिद अंसारी का कार्यकाल जब खत्म हो रहा था, तो राज्य सभा में उनके लिए दिए गए विदाई भाषण में पीएम मोदी ने उनके कूटनीतिक कैरियर का भी जिक्र किया था और कहा था एक कैरियर डिप्लोमैट की हंसी भी सामान्य नहीं होती, वो भी कुछ खास संदेश देती है. शायद गणतंत्र दिवस की शाम भी जब अंसारी से पीएम मोदी की मुलाकात हो रही थी तो मोदी को अपनी कही हुई बात ध्यान में थी और इसलिए उन्होंने कहा था- जी रहे हैं.


दरअसल हामिद अंसारी ने बतौर उपराष्ट्रपति अपने कार्यकाल के आखिरी सवा तीन वर्षों में पीएम मोदी और उनकी सरकार को परेशान करने में कोई कमी छोड़ी भी नहीं थी. स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद ही कभी उपराष्ट्रपति के पद पर बैठा कोई व्यक्ति इतना विवादित रहा हो, पद पर रहने के दौरान और पद पर छोड़ने के बाद भी. पद पर रहते हुए अपने तमाम बयानों और पद छोड़ने के बाद दिए गए बयानों और कारगुजारियों की वजह से अंसारी विवाद में बने रहे.

अंसारी की समस्या ये थी कि भले ही उनके अपने नाते-रिश्तेदार राजनीति में कई पीढ़ियों से थे, लेकिन उनकी अपनी विचार दृष्टि उस कैरियर डिप्लोमेट वाली ही थी, जो राजनीति के मैदान में आया, तो वो तय नहीं कर पाया कि उसे करना क्या है, सियासत करनी है या फिर कूटनीति या फिर संवैधानिक मर्यादा का पूरी निष्ठा से पालन. आम तौर पर उप राष्ट्रपति के आसन पर बैठने वाले लोग लंबी-चौड़ी सियासी पृष्ठभूमि वाले रहे, इसके उलट हामिद अंसारी की पृष्ठभूमि थोड़ी अलग थी, जिसका जिक्र खुद पीएम मोदी ने अपने भाषण में किया था. पीएम मोदी ने 10 अगस्त 2017 के अपने भाषण में गिनाया था कि किस तरह हामिद अंसारी के कैरियर का ज्यादातर समय मध्य और पश्चिम एशिया के देशों में बीता, जहां वो कूटनीति की अलग-अलग भूमिकाओं में थे. रिटायरमेंट के बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रहे, फिर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष, जहां से सीताराम येचुरी जैसे अपने वामपंथी मित्रों की मदद से यूपीए-1 के दौरान वो उपराष्ट्रपति बनने में कामयाब रहे थे.


मोदी ने सीधे-सीधे तो कुछ नहीं कहा था, लेकिन इशारों-इशारों में जरूर संकेत दे दिया था कि हामिद अंसारी की दृष्टि कितनी एकांगी है, माइनॉरिटी सिंड्रोम से बाहर नहीं निकल पाए हैं वो, उनके डीएनए में भी खिलाफत आंदोलन के बीज हैं, क्योंकि नाते-रिश्तेदार 19वीं सदी में धार्मिक आधार पर हुए इस पहले आंदोलन का हिस्सा रहे थे, जहां से जन्मे मुस्लिम अलगाववाद ने आखिर देश का विभाजन भी करवा दिया धार्मिक आधार पर – हिंदुस्तान और पाकिस्तान अस्तित्व में आए.


अंसारी को भी अंदाजा था कि पीएम मोदी उनकी विदाई के मौके पर जो भाषण दे रहे हैं, उसके निहितार्थ क्या हैं. इसका जिक्र उन्होंने अपनी किताब में किया भी है. कहा भी है कि मोदी ने खास तौर पर मुस्लिम देशों में उनके कैरियर का जिक्र और एक खास दृष्टिकोण की बात कर साफ संकेत देने की कोशिश की थी.



दरअसल मोदी कोई चीज छुपाते नहीं हैं. वो अटलबिहारी वाजपेयी की परंपरा के नहीं हैं, जो सारी परेशानी सहते हुए भी मुंह पर मीठा ही बोलें. मोदी के लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि है और उसकी राह में आने वाले अवरोध को हटाने की वो भरपूर कोशिश करते हैं. अंसारी ने जिस घटना का जिक्र किया है और जिसके सहारे ये संदेश देने की कोशिश की है कि मोदी उन्हें धमकाने आए थे, उस घटना को भी इसी लिहाज से देखा जा सकता है.


अंसारी लिखते हैं कि जिस समय एनडीए ये मांग कर रही थी डिन यानी शोर-शराबे के बीच भी महत्वपूर्ण बिल राज्य सभा में पारित कराए जाएं, उसी दौर में एक दिन पीएम मोदी बिना किसी पूर्व सूचना के उनके चेंबर में आए और बड़े अधिकारपूर्वक कहा कि उनसे ज्यादा जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती है, लेकिन वो उनकी सहायता नहीं कर रहे हैं.


सवाल ये उठता है आखिर किन परिस्थितियों में हामिद अंसारी से नरेंद्र मोदी ने ये बात कही. और अगर कहा भी तो अपनी पुस्तक को सनसनीखेज बनाने के लिए इस तरह की घटनाओं का जिक्र किताब में करना चाहिए था? अंसारी को अपने दस साल के कार्यकाल में याद रहा होगा कि राज्यसभा के सभापति की भूमिका में जिस बिजनेस एडवाइजरी कमिटि की बैठक की वो हमेशा अध्यक्षता करते रहे, उसमें शामिल सदस्यों से भी उम्मीद की जाती है कि वो बाहर जाकर सामान्य तौर पर ये जिक्र न करें कि बैठक के दौरान क्या-क्या चर्चा हुई, फैसले क्या लिए गए यही बात बोलें.


मान लीजिए कि अगर प्रधानमंत्री ने अंसारी से आकर कोई बात कही और भारत के संवैधानिक ढांचे में अंसारी बतौर उपराष्ट्रपति उनसे भी बड़े आसन पर बैठे थे, तो देश के दो महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के बीच की बातचीत को इस तरह से पेश करना संसदीय परंपरा और संवैधानिक आचरण की श्रेणी में आता है क्या. जिस समय भैरोंसिंह शेखावत देश के उपराष्ट्रपति थे और मनमोहन सिंह पीएम, उस वक्त कई दफा खुद मनमोहन सिंह भी शेखावत के पास आए थे, लेकिन दोनों के बीच क्या बातचीत हुई, इसका जिक्र आजतक दोनों में से किसी ने नहीं किया. शेखावत ने मरते दम तक अपना मुंह नहीं खोला और बीजेपी के शीर्षस्थ नेता होने के बावजूद राज्यसभा के सभापति की भूमिका में यूपीए सरकार को उन्होंने सदन में कभी परेशान नहीं किया, बल्कि अपनी चौतरफा स्वीकार्यता के कारण वो सदन का संचालन बड़े ही सटीक ढंग से कर पाए.


अंसारी ने इस घटना का जिक्र किया है, तो उसके पीछे उनकी मंशा भी है. बिना मंशा के कोई चीज की नहीं जाती. इरादा यही है कि दुनिया को बताया जाए कि मोदी किस तरह से उपराष्ट्रपति के पद पर बैठे शख्स को धमकाने आए थे. मोदी ने धमकाया या सिर्फ अपनी बात गंभीरता से रखी, जाहिर है इस पर जब कभी मोदी अपना पक्ष रखने का इरादा करें, तभी ये जाना जा सकेगा. लेकिन अगर मान लें कि वो राज्यसभा में सरकार का कामकाज नहीं हो पाने से परेशान थे, तो क्या इस परेशानी को जाहिर करने में कुछ गलत था.


बतौर राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी का कार्यकाल खुद इस बात की गवाही देता है कि उनका अपना व्यवहार कितना पक्षपात पूर्ण रहा. हामिद अंसारी ने अपनी किताब में लिखा है कि यूपीए के दौरान उन पर कभी शोर-शराबे के बीच बिल पास कराने का दबाव नहीं आया और उन्होंने जो इस मामले में नियम बनाया था, उसका पूरी तरह पालन हुआ. सवाल उठता है कि अंसारी का ये कदम यथार्थ से कितना परे है.

राज्य सभा सचिवालय के रिकॉर्ड इस बात की गवाही देते हैं कि अंसारी के खुद के कार्यकाल में और यूपीए के सत्ता में रहते हुए 2007 से 2014 के बीच हल्ले-हंगामे के दौरान एक-दो नहीं, बल्कि पूरे तेरह बिल राज्य सभा में पास हुए. अगर अंसारी को अच्छे स्वास्थ्य के बावजूद सुविधा के हिसाब से स्मृति दोष हो गया है, तो ये 13 बिल हैं, 2007 में पास हुए मर्चेंट शिपिंग एमेंडमेंट बिल, कैरेज ऑफ रोड बिल, कंपीटिशन एमेंडमेंट बिल, सिगरेट एंड अदर टोबैको प्रोडक्ट्स एमेंडमेंट्स बिल और एम्स बिल, 2008 में पास हुए एससी-एसटी रिजर्वेशन इन पोस्ट्स एंड सर्विसेज बिल, द एप्रोप्रिएशन (रेलवे) बिल और आईटी एमेंडमेंट बिल. इसी तरह 2011 से लेकर 2014 में यूपीए के सत्ता से जाने के बीच पांच और बिल अंसारी के सभापति रहते हुए पास हुए, जिनमें 20 फरवरी 2014 को पास हुआ आंध्र प्रदेश पुनर्गठन बिल भी है. वो बिल किन परिस्थितियों और हल्ले-हंगामे के बीच पास हुआ, ये सबको पता है. आश्चर्य होता है कि हामिद अंसारी ये भूल कैसे गये.


और जहां तक सवाल है, पीएम मोदी के उनसे किए गए अनुरोध का. मोदी का अनुरोध कितना अधिकारपूर्ण था, ये तो मोदी और अंसारी के बीच की बात है, लेकिन अगर एक पल को मान भी लिया जाए, तो सवाल उठता है कि मोदी का ये कहना कितना जायज और नाजायज था. कल्पना कीजिए एक पीएम की, जिसे स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार उस सरकार को चलाने का गौरव हासिल हुआ हो, जो किसी एक पार्टी के बहुमत वाली पहली गैर-कांग्रेसी सरकार हो, जनता ने उस पर अगाध प्रेम दिखाया हो और उम्मीद की हो कि वो उन वादों को पूरा करे, जिनके पूरा होने की उम्मीद में जनता ने उसे वोट दिया है, और राज्य सभा में विपक्ष के अड़ियल रवैये के कारण वहां काम नहीं हो पा रहा हो और जिसमें खुद सभापति की मौन सहमति हो.


सवाल ये उठता है कि क्या अंसारी की अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं थी इस हालात को सुधारने में. या फिर वो उपराष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका में होने के बावजूद अपने को कांग्रेस का नेता मानकर ही चल रहे थे. सभापति का ये दायित्व भी है कि सदन ढंग से चल पाए, उसे वो सुनिश्चित करे. सभापति की इस भूमिका की कल्पना शायद ही संवैधानिक निर्माताओं ने की थी, जहां वो पहला मौका मिलते ही सदन की कार्यवाही को हंगामे का बहाना सामने रखते हुए स्थगित कर दे. जाहिर है, हामिद अंसारी यही कर रहे थे.


मई 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई और अगस्त 2017, जब हामिद अंसारी का कार्यकाल खत्म हुआ, सामान्य धारणा यही थी कि राज्यसभा में मोदी सरकार का कुछ होने वाला नहीं है, क्योंकि वहां सदन का कामकाज या तो हंगामे की वजह से नहीं चलेगा या फिर तकनीकी आधार पर मामले को उलझाया जाएगा. अगर इस तरह की छवि बन रही थी तो इसके लिए हामिद अंसारी भी जिम्मेदार थे. और शायद यही वजह थी कि पीएम मोदी ने जाकर उन्हें सभापति की गंभीर भूमिका की याद दिलाई थी.

हामिद अंसारी ने अपनी किताब में ये भी जिक्र किया है कि जब अरुण जेटली ने 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद सैलिसबरी डॉक्ट्रीन के हिसाब से राज्यसभा का कामकाज चलाने की बात कही थी, तो राज्यसभा में विपक्ष ने उन पर विशेषाधिकार भंग की कार्रवाई करने की मांग की थी. सैलिसबरी डॉक्ट्रीन ब्रिटिश संसद के उच्च सदन, हाउस ऑफ लॉर्ड्स की वो परंपरा है, जिसे तब वहां विपक्ष के नेता रहे सैलिसबरी ने 1945-51 के लेबर गवर्नमेंट की मदद के तहत प्रतिपादित किया था, जिसमें ये कहा गया था कि अगर कोई सरकार अपने चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादे को बिल की शक्ल में लेकर आती है, तो अगर उसे सदन का बहुमत नहीं है, तो भी उसे पास कर दिया जाए, क्योंकि वो उन्हीं वादों के आधार पर देश की जनता का सीधा विश्वास जीतकर हासिल आई है.


हामिद अंसारी ने तर्क दिया है कि हाउस ऑफ लॉर्ड्स के उलट राज्य सभा के सदस्य चुनकर आते हैं, इसलिए सैलिसबरी डॉक्ट्रीन भारतीय संसद में लागू नहीं किया जा सकता था. ये तर्क देते हुए हामिद अंसारी ये भूल गए कि ब्रिटिश सम्राट से उलट भारत का राष्ट्रपति भी चुनकर आता है, लेकिन उसके कार्यक्षेत्र में कटौती की शुरुआत खुद पहले पीएम नेहरू ने की और आज की तारीख में राष्ट्रपति के पास कार्यकारी शक्तियां नाम मात्र की रह गई हैं. सुविधा के हिसाब से अलग-अलग तर्क नहीं हो सकते, ये समझना होगा अंसारी साहब को.


एक और घटना का जिक्र करना हामिद अंसारी के पक्षपातपूर्ण रवैये की तरफ इशारा करता है. 30 दिसंबर 2011 को यूपीए शासन काल के दौरान शीतकालीन सत्र का अंतिम दिन था. सदन में बहस के बाद वोटिंग होनी थी. खुद यूपीए के कई घटक दल लोकपाल बिल में संशोधन कराना चाह रहे थे, विपक्ष की अपनी तैयारी तो थी ही. कांग्रेस तमाम संशोधनों के लिए तैयार नहीं थी, दूसरा ये लग रहा था कि इसके बिना बिल को पास कराना संभव नहीं होगा. ऐसे में सरकार की मदद के लिए आगे आए सभापति की भूमिका में हामिद अंसारी. जानबूझकर सदन में बहस को लंबा कराते रहे, जिन सदस्यों ने नाम नहीं दिया था, उनको भी बहस में शामिल कर लिया और जैसे ही रात के बारह बज गए, तकनीकी कारण को आगे रखकर सदन को स्थगित कर दिया कि दिन बदल गया है. अंसारी की कितनी निष्ठा लोकपाल जैसे पांच दशक पुराने बिल को पास कराने की थी और कितनी निष्ठा अपनी पार्टी के प्रति थी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है.


मोदी के साथ अपनी उसी बातचीत का जिक्र करते हुए हामिद अंसारी ने किताब में ये भी लिखा है कि पीएम मोदी राज्यसभा टीवी के कामकाज से नाराज थे और कहा था कि ये सरकार के अनुकूल नहीं है, जबकि अंसारी ने उन्हें कहा था कि वास्तविकता ऐसी नहीं है और उसका कामकाज एक समिति की निगरानी में होता है, जिसके सदस्य बीजेपी के भी हैं. सवाल ये उठता है कि क्या वाकई ये सच्चाई थी. राज्यसभा टीवी का गठन और इसका कामकाज शुरु से विवादों के घेरे में रहा है, और इस विवाद के केंद्र में रही है खुद अंसारी की भूमिका.


जब सोमनाथ चटर्जी लेफ्ट समर्थित यूपीए-1 के दौरान लोकसभा के अध्यक्ष थे और भैरोंसिंह शेखावत राज्यसभा के सभापति, उस समय संसद टीवी का विचार आया था. चर्चा ये थी कि संसद टीवी नेटवर्क का गठन कर दोनों सदनों के लिए साझा ढांचा खड़ा किया जाए और देश की संसद में क्या और कैसे कार्यवाही चल रही है, इसकी जानकारी देश को दी जाए. इस पर अधिकार किसका रहे, इसको लेकर शेखावत ने आम सहमति बनाने के लिए कहा और ये मामला थोड़े दिनों के लिए टला. इसी दौरान हामिद अंसारी उपराष्ट्रपति बनने के साथ ही राज्यसभा के सभापति की भूमिका में आ गए.

संसद टीवी के स्वरूप के बारे में राज्यसभा की जनरल परपसेज कमिटि चर्चा कर रही थी और मूड यही था कि साझा ढांचा खड़ा किया जाए. लेकिन हामिद अंसारी को राज्यसभा के लिए अलग से स्वतंत्र टीवी सेटअप चाहिए था और इसलिए जनरल परपस कमिटि को बाइपास कर उन्होने खुद के आदेश से राज्यसभा के लिए अलग से टीवी चैनल को मंजूरी दे दी. जाहिर है, जब राज्यसभा के लिए अलग टीवी चैनल का निर्णय हो गया, तो राज्यसभा सचिवालय ने सरकारी उद्यम बेसिल को इस परियोजना को लागू करने के लिए दायित्व सौंपने का फैसला किया. लेकिन ये भी अंसारी को अनुकूल नहीं लगा था. पहले दूरदर्शन की मदद से इस चैनल को चालू करने की बात की गई और फिर धीरे से अपने मीडिया सलाहकार को ही राज्यसभा टीवी का सीईओ बनाकर पूरे चैनल को अपने नियंत्रण में ले लिया हामिद अंसारी ने.


जिस शख्स को राज्यसभा टीवी की जिम्मेदारी दी गई, वो पहले कांग्रेस के लिए चुनावों में हवाई बेड़े का प्रबंधन देखता था. राज्यसभा में नियुक्तियों के तहत राजनीतिक विचारधारा और प्रभाव को किस तरह महत्व दिया गया, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक बड़े वामपंथी नेता की पत्नी को कांट्रैक्ट पर लाकर प्रशासनिक जिम्मा दिया गया, तो एक पत्रकार की ऐसी नियुक्ति हुई, जो कांग्रेस के बड़े नेता की बाद में पत्नी बनीं. यूपीए-1 के समय में घोषित वामपंथी विचारधारा वाले पत्रकारों का अड्डा बन गया राज्यसभा टीवी, जिनसे पूरी तरह अब भी निजात नहीं पाया जा सका है, जबकि 2017 में अंसारी जा चुके हैं और वेंकैया नायडू देश के उपराष्ट्रपति के साथ ही राज्यसभा के सभापति हैं. ये जरूर हुआ है कि राज्यसभा टीवी में उपकरणों की खरीद से लेकर बाहर से कार्यक्रम बनाए जाने के नाम पर जो करोड़ों का भ्रष्टाचार हुआ, उसकी जांच जरूर शुरु हो गई है.


जहां तक राज्यसभा टीवी के बेजा इस्तेमाल का सवाल था और इस बारे में पीएम मोदी का हामिद अंसारी से सीधे-सीधे कहना था कि ये सरकार के खिलाफ की गतिविधियों का अड्डा है, खुद हामिद अंसारी ने मोदी के इस आरोप को सच साबित करने की पूरी कोशिश की अपने व्यवहार से. अपने कार्यकाल के आखिरी दिन उन्होंने घोषित मोदी विरोधी पत्रकार करण थापर से अपना एक इंटरव्यू कराया और उसे राज्यसभा टीवी पर ही प्रसारित कराया, जिसमें मोदी सरकार की जमकर आलोचना की गई, ये तक कहा गया कि देश के हर हिस्से में स्थिति असहज है और असुरक्षा की भावना पनप गई है. जाहिर है, उपराष्ट्रपति की भूमिका में देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर बैठे किसी आदमी से ये उम्मीद नहीं की जाती कि वो अपना कार्यकाल समाप्त होते-होते भी सीधे-सीधे सरकार पर बड़ा हमला करे और विवादित बयान दे और इसके लिए मंच चुने संसद के खर्च से चलने वाले राज्यसभा टीवी का.


मोदी ने हामिद अंसारी के विदाई भाषण में माइनॉरिटी सिंड्रोम से पीड़ित होने का जो आरोप इशारों-इशारो में लगाया था और सांप्रदायिक सोच की तरफ भी इशारा किया था, उसके पीछे भी कई वजहें रहीं. हामिद अंसारी ने सार्वजनिक तौर पर कई बार इस्लामिक कार्ड खेला था. यही नहीं, मध्यपूर्व के कई मामलों में उनकी राय भारत सरकार की राय से अलग मुस्लिम प्रेम के नाते थी. पद छोड़ने के तुरंत बाद भी वो विवादास्पद संगठन, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के केरल के एक कार्यक्रम में भी शरीक हो आए थे, जिस पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के ढेरों आरोप हैं.

क्या राज्यसभा के सभापति रहने के दौरान हामिद अंसारी अपनी संकीर्ण सोच से उपर उठ पाए थे, जिसकी तरफ इशारा किया था मोदी ने. राज्यसभा सचिवालय के गलियारों में इसको लेकर खासी चर्चा तब हुई, जब सितंबर 2012 में राज्यसभा के नये सेक्रेटरी जनरल की नियुक्ति होनी थी. राज्यसभा के ज्यादातर सदस्यों और अधिकारियों को लग रहा था कि वीके अग्निहोत्री का कार्यकाल खत्म होने के साथ ही एनसी जोशी सेक्रेटरी जनरल बना दिये जाएंगे, जो उस वक्त सेक्रेटरी थे और सबके बीच अपने ज्ञान और कार्यकुशलता के कारण लोकप्रिय थे. जब लगा कि जोशी की जगह अंसारी उपराष्ट्रपति कार्यालय में अपने सचिव रहे शमशेर शरीफ को ही रिटायरमेंट के बाद राज्यसभा का सेक्रेटरी जनरल बनाने की ताक में हैं, तो अरुण जेटली जैसे नेता अंसारी से मिलने गये. उन्होंने जोशी की तारीफ करते हुए तीन दशक से भी लंबे संसदीय सेवा कैरियर का हवाला दिया, लेकिन अंसारी ने सिर्फ ये कहते हुए उनकी बात हवा में उड़ा दी कि जोशी के साथ मैं सहज नहीं हूं. सवाल ये उठता है कि व्यक्तिगत सहजता अगर किसी की प्रशासनिक-तकनीकी योग्यता पर भारी पड़ती हो, तो ये बड़े आसन पर बैठे आदमी के बारे में शंका तो पैदा करेगी ही, अंसारी को ये ध्यान में रखना होगा. जोशी को इतना आघात लगा कि रिटायरमेंट के कुछ महीने बाद ही वो स्वर्ग सिधार गये.


इसी तरह का पक्षपातपूर्ण रवैया राज्यसभा सचिवालय के एक और कर्मचारी एमके खान के मामले में दिखा. खान पर भ्रष्टाचार के मामले थे और औपचारिक प्रकिया के बाद खान के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करना तय हुआ था, लेकिन अंसारी ने अपनी सत्ता का इस्तेमाल करते हुए खान का गुनाह माफ कर दिया. जाहिर है, इन सब घटनाओं को लोग चुपचाप देखते हैं, बोलते कुछ नहीं हैं, लेकिन अपनी राय बना लेते हैं. यही वजह रही कि राज्यसभा के इतिहास में सभापति के आसन पर बैठा कोई व्यक्ति इतना पक्षपाती रहा हो, ऐसा दूसरा कोई उदाहरण उन लोगों को जल्दी नहीं दिखता, जो इस सदन पर बारीक निगाह रखते हैं.


भारत में परंपरा है कि उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के बारे में जल्दी कोई टीका-टिप्पणी नहीं की जाती. लेकिन बिना सोचे-विचारे अगर आप सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए, चाहे वो किताब की बिक्री के लिए ही क्यों न हो, आप किसी और पर आरोप लगाने जाएंगे, तो सवाल तो उठेंगे ही. अंसारी को आत्मचिंतन करना होगा, हालांकि पीएम मोदी ने कहा था कि रिटायरमेंट बाद हामिद अंसारी फ्री होंगे आराम से अपनी सोच के हिसाब से घटनाओं और तथ्यों को परिभाषित करने के लिए और शायद उन्होंने किया भी यही है. अगर अंसारी सकारात्मक ढंग से साेच पाएं, तो उन्हें तुलना करनी चाहिए कि उनके रहते हुए मोदी सरकार के लाए हुए कितने बिल राज्यसभा में पास हुए या फिर सदन में कामकाज के घंटे कितने रहे और उनके जाने के बाद इसमें किस तेजी से उछाल आया, अंदाजा खुद लग जाएगा. अगर दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं डालना हो, तो नये दशक के पहले सत्र की शुरुआत करते हुए राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद का आज का अभिभाषण ही ध्यान से सुन लें, जो उन्होंने दोनों सदनों की संयुक्त बैठक के दौरान सेंट्रल हॉल में दिया है और जिसमें उन तमाम क्रांतिकारी कानूनों का जिक्र किया है, जो हाल के वर्षों में ही संसद से पास होकर बने हैं. राष्ट्र सकारात्मकता से आगे बढता है, न कि नकारात्मकता से. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं) 


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रजेश कुमार सिंह

ब्रजेश कुमार सिंह

लेखक नेटवर्क18 समूह में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से 1995-96 में पत्रकारिता की ट्रेनिंग, बाद में मास कम्युनिकेशन में पीएचडी. अमर उजाला समूह, आजतक, स्टार न्यूज़, एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ में काम करने के बाद अप्रैल 2019 से नेटवर्क18 के साथ. इतिहास और राजनीति में गहरी रुचि रखने वाले पत्रकार, समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन, दो दशक तक देश-विदेश में रिपोर्टिंग का अनुभव.

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First published: January 29, 2021, 7:54 pm IST
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