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बोफोर्स के राज सीने में दबाये पंचतत्व में विलीन हो गये माधवसिंह सोलंकी

चार बार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे माधवसिंह सोलंकी का आज अंतिम संस्कार हो गया, जिनका 94 वर्ष की आयु में कल निधन हुआ. सोलंकी पीवी नरसिंह राव की सरकार में विदेश मंत्री रहे थे, लेकिन बोफोर्स घोटाले की जांच को रुकवाने की कोशिश का आरोप लगने पर उन्हें अपने पद से मार्च 1992 में इस्तीफा देना पड़ा था और उसके बाद वो फिर कभी किसी सरकार का हिस्सा नहीं बने. इंदिरा गांधी के अत्यंत करीबी रहे माधवसिंह सोलंकी ने बोफोर्स मामले में मरते दम तक अपना मुंह नहीं खोला, जबकि उसी वजह से उन्हें बड़ी सियासी कीमत चुकानी पड़ी.

Source: News18Hindi Last updated on: January 10, 2021, 8:51 PM IST
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बोफोर्स के राज सीने में दबाये पंचतत्व में विलीन हो गये माधवसिंह सोलंकी
माधवसिंह सोलंकी पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे. (File Photo)
माधवसिंह सोलंकी पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे. गुजरात की पिछले पांच दशकों की सियासत में नरेंद्र मोदी से पहले सबसे प्रमुख सितारे रहे सोलंकी की याददाश्त कमजोर पड़ने लगी थी. सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने के बाद पूरी तरह अध्ययन में रमे रहने वाले सोलंकी की पहचान नेता से कम उनके अध्येता स्वरुप से भी नहीं थी. सोलंकी के घर आप जब भी जाएं, एक चीज पर आपका ध्यान सबसे पहले जाता था, वो चीज थी उनकी समृद्ध लाइब्रेरी. हमेशा किसी नई किताब पर चर्चा या फिर कोई नई किताब पढ़ने की सलाह.

सोलंकी से मेरी पहली और आखिरी विस्तृत मुलाकात अहमदाबाद एयरपोर्ट पर डेढ़ दशक पहले हुई थी. 2006 का साल था, शायद दिसंबर का महीना. सोलंकी दिल्ली जा रहे थे और मैं मुंबई. एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज में बैठे सोलंकी के बारे में मेरे मित्र और तब वहां एयरपोर्ट मैनेजर रहे संत कुमार ने जानकारी दी. शिष्टाचार के नाते मैं उनसे मिलने गया. करीब पैंतालीस मिनट तक हमारी लगातार चर्चा चलती रही, चालीस मिनट किताबों पर और महज पांच मिनट दूसरे विषयों पर. उड़ान का समय हो रहा था और हम दोनों को उठना पड़ा, उठते-उठते भी उन्होंने दो किताबों के अलावा अपने छोटे से बैग में पड़े एक उपकरण को चालू कर दिखाया. वो उपकरण था पोर्टेबल रीडर सिस्टम यानी पीआरएस, जिसे कुछ समय पहले ही अमेरिका में सोनी कंपनी ने लांच किया था. उनके एक मित्र ने किताब पढ़ने के उनके जुनून के मद्देनजर लांच होते ही अमेरिका से फटाफट भिजवाया था. सोलंकी ने बताया कि आसानी से इस पर वो किताब ईबुक फॉर्म में पढ़ लेते हैं, मर्जी के मुताबिक फौंट भी छोटा-बड़ा कर सकते हैं, बड़ी सुविधा हो गई है. मैंने पहली बार ऐसी कोई चीज देखी थी, राजनीतिज्ञ सोलंकी से ज्यादा सौम्यता और शिष्टाचार से भरे विद्वान सोलंकी के प्रति मेरा आदर भाव बढ़ गया.



1999 में मैं गुजरात गया था. उस समय तक सोलंकी राज्य सभा के सदस्य थे. अगले साल यानी वर्ष 2000 में उनका राज्यसभा का टर्म पूरा हो रहा था. लेकिन टर्म खत्म होने पर उन्हें राज्यसभा का उम्मीदवार नहीं बनाया गया. इसका ठीकरा सोलंकी समर्थकों ने अहमद पटेल पर फोड़ा, जो गुजरात के मामले में आलाकमान के निर्णय को अंतिम तौर पर प्रभावित करते थे. अहमद पटेल, जिन्हें पहली बार लोकसभा का चुनाव 1977 में सोलंकी ने ही भरूच से लड़ाया था अपने मित्र हरीसिंह महीडा की सिफारिश पर, पटेल जनता लहर के बावजूद भरूच से जीते. लेकिन सियासत में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता. एक समय करीबी रहे अहमद पटेल के खिलाफ सोलंकी ने मोर्चा खोला और मैदान में उतरे उनके बेटे भरतसिंह सोलंकी और समर्थक, जिनमें अलकाबेन क्षत्रिय भी थीं, जो खुद बाद में राज्यसभा भेजी गईं.
वर्ष 2000 के जून महीने में गांधीनगर की रैली में सोलंकी समर्थकों ने अहमद पटेल पर सीधा हमला किया. खास बात ये रही कि इस दौरान एआईसीसी के किसी भी बड़े नेता ने सोलंकी के खिलाफ कुछ नहीं कहा, यहां तक कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी चुप्पी साधे रखी. सोनिया के सामने दुविधा ये थी कि अगर अहमद पटेल करीब थे, तो सोलंकी भी गांधी परिवार के दशकों से करीबी थे. आखिर उनके पति और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी को संजय गांधी की मौत के बाद राजनीति में इंट्री के लिए तैयार करने का काम सास इंदिरा गांधी ने जिन विश्वस्त सिपहसालारों को सौंपा था, उनमें प्रमुख थे माधवसिंह सोलंकी. आपातकाल के बाद 1977 की जनता लहर में जब इंदिरा गांधी को कुर्सी गंवानी पड़ी, उस वक्त माधवसिंह सोलंकी पार्टी के उन गिने-चुने नेताओं में थे, जो इंदिरा गांधी के साथ मजबूती से खड़े रहे थे. यही वजह थी कि 1980 में सत्ता में आने के बाद इंदिरा गांधी ने गुजरात सहित कई राज्यों में विपक्षी सरकारों को जब भंग किया और फिर चुनावों में कांग्रेस की जीत हुई, तो गुजरात के सीएम की कुर्सी माधवसिंह सोलंकी को ही सौंपी गई थी. इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी और सोनिया गांधी के साथ भी माधवसिंह सोलंकी ने वफादारी निभाई थी. नरसिंह राव की सरकार में विदेश मंत्री की कुर्सी माधवसिंह सोलंकी को गंवानी पड़ी थी, बोफोर्स घोटाले में तेजी से बढ़ रही जांच को रुकवाने के चक्कर में. इसे भी भला सोनिया गांधी कहां भूल सकती थीं.



ऐसे माहौल में अहमद पटेल ने कांग्रेस के कोषाध्यक्ष के पद से जुलाई 2000 के पहले हफ्ते में इस्तीफा दिया और माधवसिंह सोलंकी और उनके समर्थकों पर अपने खिलाफ जेहाद छेड़ने का आरोप लगाया. एक समय माधवसिंह सोलंकी के समर्थन के कारण गांधी परिवार के करीब पहुंचे अहमद पटेल इस्तीफा देने के बाद अहमदाबाद में ही शक्ति प्रदर्शन करने पहुंचे थे, जहां उनके समर्थकों ने बड़े रोड शो का आयोजन किया था. उसके बाद का कुछ समय माधवसिंह सोलंकी और अहमद पटेल कैंप के लिए तनाव भरा. आलाकमान ने दोनों का ख्याल रखा. अहमद पटेल फिर से सोनिया गांधी के करीब हुए, उनके राजनीतिक सचिव बने और पूरे 18 वर्ष बाद 2018 में फिर से कोषाध्यक्ष बने, जिस पद पर अपने देहांत तक वो कायम रहे.जहां तक सोलंकी का सवाल है, 2000 के बाद वो सक्रिय राजनीति से बाहर निकल गये. बेटे भरतसिंह सोलंकी बाद में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने और यूपीए की सरकार में मंत्री भी रहे. अहमद पटेल से भरतसिंह सोलंकी ने अपने रिश्ते सुधार भी लिये, जिस अहमद पटेल पर सीधे हमले के कारण उन्हें पार्टी से कुछ समय के लिए वर्ष 2000 में निलंबित भी होना पड़ा था, नवीन शास्त्री, कासमबापू तिरमिजी और जगदीश ठाकोर जैसे सोलंकी समर्थकों के साथ. पिता की विरासत भरतसिंह सोलंकी ने संभाली और माधवसिंह सोलंकी कुछ महत्वपूर्ण सामाजिक-पारिवारिक प्रसंगों को छोड़कर गांधीनगर के अपने घर में बने रहे, जहां वो अपने सबसे प्रिय काम में लगातार जुटे रहे, नई-नई किताबों के अध्ययन में और कोई मिलने आया तो बिना भेदभाव के आसानी से मिल लेने में, आदमी चाहे बड़ा हो या छोटा.



माधवसिंह सोलंकी ने खुद गुजरात में बड़ी ही साधारण पृष्ठभूमि से आगे बढ़ते हुए अपने लिए बड़ा मुकाम बनाया था. भरूच जिले के जंबूसर तालुका के पिलुदरा गांव में 29 जुलाई 1927 को जन्मे सोलंकी का आरंभिक जीवन अपने पैतृक गांव बदलपुर में बीता, जो फिलहाल आणंद जिले के बोरसद तालुका में है और एक समय खेडा जिले का हिस्सा था. पिता फूल सिंह किसान थे और मां रामबा गृहिणी. सामान्य और ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले माधवसिंह सोलंकी ने पूरी लगन के साथ पढ़ाई की और बीए ऑनर्स किया, फिर एलएलबी की पढ़ाई भी की. शुरुआत में कुछ वर्ष वकालत करने के बाद उन्होंने अहमदाबाद नगर निगम में प्रकाशन अधिकारी की नौकरी की और फिर गुजरात समाचार अखबार में काम किया, जहां उनके जिम्मे अखबार के पहले पन्ने पर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों को जगह देना था, लिखना था. उस समय भला कहां पता था कि सोलंकी अपने राजनीतिक जीवन में वो मुकाम हासिल करेंगे कि वो अखबार और पत्रिकाओं की सुर्खियां कई दशकों तक बनते रहेंगे, यहां तक कि अपने अंतिम समय में भी.

वकालत और पत्रकारिता के अनुभव का इस्तेमाल माधवसिंह सोलंकी के काम आया, जब वो राजनीति में आए और फिर राज्य और केंद्र की सरकारों में महत्वपूर्ण भूमिकाओं का निर्वाह किया. सोलंकी के सियासी सफर की शुरुआत तब हुई, जब गुजरात स्वतंत्र राज्य के तौर पर अस्तित्व में भी नहीं आया था. माधवसिंह सोलंकी पहली बार 1957 में विधायक बने, उस समय गुजरात बृहद बंबई राज्य का हिस्सा था. 1960 में जब गुजरात अलग राज्य के तौर पर अस्तित्व में आया, तो स्वाभाविक तौर पर सोलंकी राज्य की पहली विधानसभा के भी सदस्य रहे. गुजरात के निर्माण के बाद 1962 में चुनाव हुए. सोलंकी का विधायिका के साथ लगातार नाता बना रहा. पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी, छठी और सातवीं विधानसभा का वो लगातार हिस्सा रहे. माधवसिंह सोलंकी के पिता तो सामान्य किसान थे, लेकिन श्वसुर ईश्वरसिंह चावड़ा मध्य गुजरात के बड़े कद्दावर नेता. सोलंकी को राजनीति में अपने श्वसुर से शुरुआती बल मिला और फिर वो लगातार आगे बढ़ते गये.

अपने लंबे विधायिका करियर के दौरान ही 1962 में वो पहली बार गुजरात में सरकार में शामिल हुए उपमंत्री के तौर पर. राजस्व, गृह, वन, विधि और न्याय जैसे महत्वपूर्व विभागों की जिम्मदारी रही उपमंत्री के नाते और इस दौरान उन्होंने जो अनुभव हासिल किया, आगे के सियासी सफऱ में वो काफी काम आया. 1972 में वो राजस्व मंत्री बने. 1975-76 और 1977-80 के दौरान वो विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे. इसी बीच वो करीब साढ़े तीन महीने के लिए पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने, 24 दिसंबर 1976 से लेकर 11 अप्रैल 1977 तक.



आपातकाल के बाद 1977 में लोकसभा के चुनाव हुए, इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर होना पड़ा. लेकिन अगले तीन वर्षों में ही जनता पार्टी के अंदर बिखराव शुरु हुआ. कांग्रेस के अंदर भी उथल-पुथल मची रही. इस दौरान माधवसिंह सोलंकी कांग्रेस के उन गिने-चुने बड़े नेताओं में से थे, जो पूरी ताकत के साथ इंदिरा गांधी के साथ खड़े रहे. ऐसे में 1980 में केंद्र में सत्ता में वापसी के बाद इंदिरा गांधी ने अपने सभी विश्वस्त लोगों को एक बार फिर से महत्वपूर्ण स्थानों पर बिठाया. जनता पार्टी की राज्य सरकारों को भंग कर इंदिरा गांधी ने कई राज्यों में विधानसभा चुनाव कराए, जिनमें से एक राज्य गुजरात भी था. 1980 में हुए इन चुनावों में गुजरात में कांग्रेस की सरकार बनी और माधवसिंह सोलंकी ने दूसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली 6 जून 1980 को.

दूसरी बार सत्ता संभालने के बाद अगले पांच साल तक लगातार सोलंकी गुजरात के मुख्यमंत्री बने रहे. 1960 में अस्तित्व में आए गुजरात के राजनीतिक इतिहास में पहली बार हुआ कि किसी मुख्यमंत्री ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया हो. माधवसिंह सोलंकी के बाद लगातार पांच साल का कार्यकाल बतौर सीएम पूरा करने वाले दूसरे नेता नरेंद्र मोदी बने, जिन्होंने अक्टूबर 2001 में गुजरात की कमान संभालने के बाद मई 2014 में सीएम पद तभी छोड़ा, जब वो देश के पीएम बने और तब से लगातार पीएम की कुर्सी पर बैठे हुए हैं.

जहां तक माधवसिंह सोलंकी का सवाल रहा, 1980 का साल उनके लिए खासा महत्वपूर्ण रहा. एक तरफ जहां प्रशासन पर उनकी पकड़ मजबूत बनी, वही इंदिरा गांधी का भरोसेमंद होने के कारण वो राजनीतिक तौर पर भी मजबूत होते चले गए. यही वजह रही कि वो गुजरात के सामाजिक, आर्थिक और औद्योगिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा पाए. 1980 में जीत के बाद इंदिरा गांधी गुजरात आई थीं, अंबाजी मंदिर में दर्शन करने के लिए. उस वक्त की एक घटना गुजरात काडर के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी एसके नंदा को आज भी याद है कि किस तरह सोलंकी ने इंदिरा के सहारे गुजरात में विकास के सिलसिले को आगे बढ़ाया.

इंदिरा गांधी का वो दौरा निजी था, अंबाजी में उनकी गहरी आस्था थी. पहले भी वो यहां आ चुकी थीं. ये एक संयोग ही था कि 1978 में जब कांग्रेस में विभाजन के बाद उन्होंने अपने समर्थकों के साथ नई पार्टी कांग्रेस-आई बनाई तो उसका चुनाव चिन्ह हाथ रखा. बेंगलुरु के एक पुराने कांग्रेस नेता आरके राजरत्नम ने ये दावा किया था कि इंदिरा गांधी को चुनाव चिन्ह के तौर पर हाथ रखने का सुझाव उन्होंने दिया था 2 फरवरी 1978 की रात, लेकिन नंदा ने 1980 की अंबाजी यात्रा के दौरान इंदिरा गांधी के मुंह से जो सुना, उसके कारण उनकी धारणा कुछ और ही है. इंदिरा गांधी ने तब कहा था कि मां अंबे का हाथ मेरे काम आया, उन्हीं के आशीर्वाद से मैं जीती. दरअसल अंबाजी शक्तिपीठ में मांअंबे के दर्शन हाथ स्वरूप में होते हैं.



दर्शन के बाद जब इंदिरा बाहर निकलीं, तो माधवसिंह सोलंकी ने नंदा सहित तमाम अधिकारियो को इंदिरा गांधी से मिलाना चाहा, हालांकि इंदिरा खुद उसके लिए बहुत उत्सुक नहीं थीं. वो अपने दौरे को निजी ही रखना चाह रही थीं, लेकिन माधवसिंह सोलंकी के कहने पर वो अधिकारियों से मिलने के लिए तैयार हो गईं. उस वक्त राज्य के तमाम वरिष्ठ अधिकारी वहां जमा थे, मुख्य सचिव एचकेएल कपूर के साथ गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव चंद्रमौली और उद्योग विभाग की अगुआई करने वाले अतिरिक्त मुख्य सचिव शिवज्ञानम. गुजरात के मशहूर अधिकारियों में से एक रहे एचके खान उस वक्त डायरेक्टर इंडस्ट्रीज थे, नंदा सबसे कनिष्ठ आईएएस अधिकारी. 1978 बैच के अधिकारी नंदा वडोदरा में उस वक्त एसडीएम थे.

माधवसिंह सोलंकी के इशारे पर शिवज्ञानम ने उस वक्त बंबई हाई में मिले गैस के भंडार को सिर्फ महाराष्ट्र के इस्तेमाल की जगह, जैसा मोरारजी देसाई ने घोषणा की थी, पूरे देश के लिए इस्तेमाल करने का सुझाव दिया और इसके लिए डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर के तौर पर सूरत के करीब हजीरा के विकास का सुझाव दिया, जो समंदर के किनारे उस वक्त छोटा सा गांव था. उस वक्त इंदिरा गांधी ने कोई वादा तो नहीं किया, लेकिन थोड़े समय बाद ही ओसेन डेवलपमेंट का विभाग अपने पास रखते हुए हजीरा को गैस डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर के तौर पर विकसित करने की मंजूरी दी. उसके बाद से हजीरा के विकास ने जो रफ्तार पकड़ी, वो आज की तारीख में भारत का सबसे बड़ा औद्योगिक घनत्व वाला कस्बा बन चुका है, जहां सरकारी और निजी क्षेत्र की दर्जनों बड़ी कंपनियों काम कर रही हैं.

मौके का इस्तेमाल माधवसिंह सोलंकी किस खूबसूरती से कर लेते थे, उसकी ये मिसाल भर है. 1980 से 1985 के उस कार्यकाल के दौरान सोलंकी ने समाज कल्याण से जुड़ी हुई कई लोकप्रिय योजनाओं को लांच किया, चाहे देश में पहली बार मध्याह्न भोजन योजना को लागू करना हो या कन्या शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उसे पूरी तरह मुफ्त करना हो. जन वितरण प्रणाली की दुकानों के जरिये सामान्य मध्यम वर्ग को भी रियायती दर पर खाद्यान्न देना शुरु कर दिया. वयस्क शिक्षा को भी बढ़ावा दिया. गरीबों में बचत की प्रवृति को बढ़ावा देने के लिए कुटुंब पोथी योजना शुरु की, तो श्रमिकों के कल्याण के लिए एक तरफ जहां न्यूनतम पारिश्रमिक की सीमा बढाई, तो रुरल लेबर कमिश्नर के नये पद का सृजन किया. पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र से जुड़े अपने साथियों का भी उन्होंने भरपूर इस्तेमाल किया सरकार में. अपने पत्रकार साथी भूपतभाई वडोदरिया को सूचना निदेशक बनाया, तो शायर मित्र शेख आदम अबूवाला को सूचना विभाग में ही सलाहकार. फिल्मों को प्रोत्साहित करने के लिए कई जगहों पर स्टूडियो बनवाए, तो राज कपूर, देवानंद या दिलीप कुमार की फिल्मों को अक्सर टैक्स फ्री किया. प्रेम रोग फिल्म को तो उन्होंने इसलिए टैक्स फ्री किया, क्योंकि इसमें विधवा और अंतरजातीय विवाह दोनों को प्रोत्साहित किया गया था. फिल्म जगत की कई बड़ी मशहूर अभिनेत्रियां माधवसिंह सोलंकी की कायल थीं, जिनमें रीटा भादुड़ी से लेकर अरुणा ईरानी तक का नाम शामिल है.

सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र के साथ ही औद्योगिक क्षेत्र में भी माधवसिंह सोलंकी ने दूरदर्शिता दिखाई. राज्य के औद्योगिक विकास के लिए गुजरात औद्योगिक विकास निगम यानी जीआईडीसी के बैनर तले राज्य के तमाम हिस्सों में इंडस्ट्रियल इस्टेट विकसित किये, जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर निवेश आया, कंपनियां स्थापित हुईं, सैकड़ों फैक्ट्रियां लगीं. स्थानीय लोगों को रोजगार मिले, इसलिए 85 फीसदी रोजगार स्थानीय लोगों को मिले, ये नियम भी बनाया. गुजरात ने तेजी से औद्योगिक विकास की राह पकड़ी और औद्योगिक विकास के मामले में गुजरात आठवें नंबर से दूसरे नंबर पर आया. उर्वरक उत्पादन के लिए जीएनएफसी की नींव डाली. गुजरात के लिए जीवन रेखा कही जाने वाली नर्मदा परियोजना पर भी काम शुरु करवाया और इसके लिए विश्व बैंक से पांच सौ करोड रुपये का कर्ज हासिल किया.

मनमोहन सिंह के साथ माधवसिंह सोलंकी


गुजरात भाषाई आधार पर 1960 में राज्य के तौर पर अस्तित्व में आया था और गुजराती अस्मिता इसके मूल में थी. लेकिन सोलंकी ने अधिकारियों को प्रमुख स्थानों पर रखे जाने के मामले में गुजराती और गैर गुजराती का खास भेद नहीं किया. गुजरात काडर के एक और रिटायर्ड आईएएस अधिकारी रवि सक्सेना को याद है कि किस तरह से औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए उन्‍होंने चुन-चुनकर ऐसे अधिकारी रखे, जो न सिर्फ कार्यकुशल थे, बल्कि स्मार्ट भी थे. एच के खान, केसी कपूर, एसके शैलत, एलएनएस मुकुंदन, केडी बुद्धा कुछ ऐसे ही नाम थे, जिन्होंने सोलंकी के समय में उद्योग विभाग के अंदर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. केसी कपूर जीआईडीसी के सबसे युवा एमडी बने, इस पद पर नियुक्ति के वक्त वो महज डिप्टी सेक्रेटरी रैंक के अधिकारी थे.

एसके नंदा का खुद का अनुभव सोलंकी को लेकर अनूठा है. नंदा 1980 में वो प्रभारी डीएम थे वडोदरा के, क्योंकि नियमित डीएम एसके चौधरी कैंसर से पीड़ित थे और मुंबई में इलाज करा रहे थे. तत्कालीन राज्यपाल शारदा मुखर्जी के करीबी थे चौधरी और इसे ध्यान में रखते हुए माधवसिंह सोलंकी ने बीमार चौधरी को पद पर तो बने रहने दिया, लेकिन प्रभार दे दिया नंदा को. इसी दौरान सोलंकी का वडोदरा आना हुआ. वडोदरा में उस वक्त बाईपास नहीं था, सारा ट्रैफिक शहर के बीचोबीच होकर गुजरता था और आए दिन दुर्घटना होते रहती थी.

सोलंकी ने नंदा से पूछा कितने समय में बाईपास बना सकते हो, नंदा ने कहा नब्बे दिन, अगर पूरे अधिकार दे दिये जाएं. सोलंकी ने तत्कालीन मुख्य सचिव एचकेएल कपूर को इस बारे में कहा, कपूर ने आनाकानी की, लेकिन सोलंकी दृढ़ थे, नंदा को जरूरी सत्ता दी. नंदा ने वादे के मुताबिक महज 86 दिन में बाईपास का काम पूरा किया. माधवसिंह सोलंकी की लोगों को परखने की ताकत जबरदस्त थी, चाहे अधिकारी हों या कार्यकर्ता या फिर भांपना हो सामान्य जनता का मूड.

यही वजह थी कि गुजरात के इतिहास में पिछड़े वर्ग से आने वाले पहले मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी ने एक ऐसा रिकॉर्ड कायम किया, जो आज तक कोई तोड़ नहीं पाया. गुजरात विधानसभा की सबसे अधिक सीटें अपनी अगुआई में जीताने का. 1985 के विधानसभा चुनाव थे. गुजरात विधानसभा की 182 में से 149 सीटें अपनी अगुआई में माधवसिंह सोलंकी ने जीतवाईं. ये ऐसा रिकॉर्ड है, जो आजतक टूटा नहीं है. बीजेपी ने इसी के मद्देनजर कई बार 150 प्लस सीट जीतने का लक्ष्य गुजरात में विधानसभा चुनावों के दौरान निर्धारित किया, लेकिन वो पूरा नहीं हो पाया.

लेकिन सोलंकी की यही भारी-भरकम जीत दूसरे कारणों से उनके राजनीतिक जीवन के लिए नुकसानदेह साबित हुई. 1980 के विधानसभा चुनावों को जीतने के लिए उन्होंने एक खास सियासी समीकरण बनाया था, कांग्रेस पार्टी के अपने करीबी नेता जीणाभाई दर्जी और सनत मेहता के साथ मिलकर. ये समीकरण गुजरात ही नहीं, राजनीति शास्त्र की किताबों में भी खाम के तौर पर जाना जाता है. खाम, केएचएएम का हिंदी रुप, जिसका पूरा स्वरुप है क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम. इस समीकरण के तहत अगड़ी जातियों को किनारे रखकर खाम में समाहित समुदायों के वोट को अपने साथ जोड़कर सोलंकी ने 1980 के विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत हासिल की.

1980 के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद शैक्षणिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को अपनी तरफ और मजबूती से जोड़ने के लिए माधवसिंह सोलंकी ने एक और दांव चला. ये दांव था गुजरात हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस सीवी राणे की अगुआई में पांच सदस्यीय आयोग के गठन का, जो उन जातियों को ओबीसी आरक्षण के दायरे में लाने के लिए गठित किया गया था, जिन जातियों का समावेश इससे पहले गठित हुए बक्षी आयोग की रिपोर्ट में नहीं था. माधवसिंह सोलंकी ने राणे आयोग का गठन 20 अप्रैल 1981 को किया. इसके साथ ही सोलंकी को आरक्षण विरोधी आंदोलन का सामना तुरंत करना पड़ा. 1981 के उस साल में अगड़ी जाति के लोग सड़कों पर उतर आए, जिन्हें ये लगा कि उनके बच्चों को बेहतर योग्यता के बावजूद शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों का लाभ नहीं मिल सकेगा, जबकि कम प्रतिभा वाले पिछड़े छात्र अच्छी जगह पा जाएंगे.

दरअसल गुजरात में शैक्षणिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े लोगों की पहचान और फिर उनको सशक्त करने के लिए पहला कोशिश एक दशक पहले हुई थी. 8 अगस्त 1972 को हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस एआर बक्षी की अगुआई में चार सदस्यीय आयोग का गठन हुआ था, जिसे उन जातियों या वर्गों की पहचान करती थी, जो अनुसूचित जाति या जनजाति में नहीं आते थे, लेकिन सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर काफी पिछड़े थे और जिन्हें आरक्षण का लाभ देकर सशक्त बनाया जा सकता था. बक्षी आयोग की सिफारिशों को 1 अप्रैल 1978 को स्वीकार किया गया था, जब गुजरात में बाबूभाई जसभाई पटेल की अगुआई में जनता मोर्चा की सरकार थी. बक्षी आयोग ने एक तरफ जहां जातियों को सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का आधार माना, वही 82 ऐसी जातियों को ओबीसी के तहत लाते हुए उनके लिए एक तरफ जहां छात्रवृति तो दूसरी तरफ शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की. प्रथम और द्वितीय श्रेणी की नौकरियों में जहां पांच फीसदी आरक्षण ओबीसी के अंदर आने वाली इन जातियों के छात्रों के लिए किया गया, तो तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों में दस फीसदी आरक्षण दिया गया. शैक्षणिक संस्थानों में दस फीसदी आरक्षण ओबीसी के लिए दिया गया.

स्वाभाविक तौर पर गुजरात में सवर्ण जातियां बक्षी आयोग की रिपोर्ट माधवसिंह सोलंकी के कार्यकाल के एक साल के अंदर ही लागू किये जाने से पहले से ही भन्नाई हुई थीं. लेकिन खाम के सियासी समीकरण को सफल ढंग से साधते हुए 1980 में सत्ता में आए माधवसिंह सोलंकी ने अगले ही साल 1981 में जब बक्षी आयोग की रिपोर्ट के हिसाब से आरक्षण देने के साथ ही राणे आयोग के गठन की घोषणा की, तो विरोध और तेज हो गया. करीब सौ दिन तक आंदोलन चला और इस दौरान हुई हिंसा में करीब चालीस लोगों की जान गई.

इस हल्ले-हंगामे के करीब ढाई साल बाद 31 अक्टूबर 1983 को राणे आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, लेकिन करीब 18 महीने तक माधवसिंह सोलंकी उस रिपोर्ट पर बैठे रहे. और जैसे ही इंदिरा गांधी की हत्या के बाद की सहानुभूति लहर में 1984 में लोकसभा चुनाव हुए और कांग्रेस को अच्छी कामयाबी मिली, माधवसिंह सोलंकी ने मार्च 1985 में होने जा रहे गुजरात विधानसभा चुनावों के पहले बड़ा दांव खेल दिया. दस जनवरी 1985 को सोलंकी ने राणे आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की, जिसके तहत ओबीसी आरक्षण को दस फीसदी से बढ़ाकर 28 फीसदी कर दिया गया और 63 नई जातियों का समावेश ओबीसी में किया गया. इस तरह एससी-एसटी और ओबीसी आरक्षण को मिलाकर गुजरात में कुल आरक्षण 49 फीसदी हो गया. यही नहीं, राणे आयोग की उस सिफारिश को सोलंकी ने दरकिनार कर दिया, जिसमें आरक्षण का एक पैमाना आर्थिक भी रखने की बात की गई थी, जिसको लेकर विरोधी और भन्नाए.

माधवसिंह सोलंकी की इस घोषणा को दो महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनावों से जोड़कर देखा गया. इस दौरान माधवसिंह सोलंकी के वो सियासी साथी और समर्थक नेता भी उनके खिलाफ हो चुके थे, जो 1980 में सीएम बनते समय उनके सबसे करीब थे. चाहे बीस सूत्री कार्यक्रम अन्वयन समिति के अध्यक्ष रहे जीणाभाई दर्जी हों या सोलंकी की सरकार में वित्त मंत्री रहे सनत मेहता या फिर केंद्र में मंत्री रहे योगेंद्र मकवाणा, सोलंकी से ये सभी नाराज थे. इंदिरा गांधी के करीबी रहे योगेंद्र मकवाणा ने तो 1980 में सोलंकी को सीएम बनाए जाने के लिए दिल्ली में जमकर लॉबिंग भी की थी. ऐसे में जब सोलंकी की सरकार के खिलाफ फरवरी 1985 में आरक्षण विरोधी आंदोलन की आग भड़की, तो पार्टी का एक बड़ा धड़ा उनके विरोध में आ गया. दूसरी तरफ बीजेपी सहित पूरा विपक्ष भी मैदान में आ गया. विरोध करने वालों में चिमनभाई पटेल भी थे, जिन्हें 1974 में नवनिर्माण आंदोलन की आग भड़कने के कारण सीएम पद से त्याग देना पड़ा था और उसके बाद वो अपनी नई पार्टी किसान मजदूर लोक पक्ष बनाकर चुनाव लड़े थे.

जल्दी ही आरक्षण विरोधी आंदोलन ने जातीय और सांप्रदायिक दंगों का रुप हासिल कर लिया और गुजरात में हालात भयावह होते चले गये. स्कूल-कॉलेज बंद करने पड़े, सड़क पर सेना उतारनी पड़ी. उस वक्त केंद्र में राजीव गांधी की अगुआई में कांग्रेस की ही सरकार थी. अहमदाबाद के एलडी इंजीनियरिंग कॉलेज में बैठक कर छात्रों ने 18 फरवरी 1985 के दिन गुजरात नवरचना समिति का गठन किया और आंदोलन को व्यवस्थित तौर पर पूरे राज्य में फैलाना शुरु किया. ये वही एलडी इंजीनियरिंग कॉलेज था, जहां से 1974 में छात्रों के नवनिर्माण आंदोलन ने जोर पकड़ा था और जिससे प्रेरणा लेते हुए जयप्रकाश नारायण ने बिहार से संपूर्ण क्रांति की शुरुआत की थी इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ सशक्त आंदोलन के तौर पर. इसी पर काबू पाने के चक्कर में इंदिरा गांधी ने 1975 में इमरजेंसी लगाई और फिर जिसकी कीमत उन्हें 1977 में बुरी हार के तौर पर चुकानी पड़ी थी.

गुजरात में मार्च 1985 में विधानसभा चुनाव हुए और नतीजे आए तो इतिहास बन गया. पार्टी में अपने तमाम बड़े विरोधियों के टिकट को काटते हुए सोलंकी ने अपनी इच्छा के हिसाब से टिकट बांटे थे और वो अपनी पार्टी को राज्य विधानसभा की 182 में से 149 सीट जीताने में कामयाब रहे, जो गुजरात के इतिहास में कभी हुआ नहीं था. इस बड़ी और ऐतिहासिक जीत के साथ माधवसिंह सोलंकी ने 11 मार्च 1985 को तीसरी दफा गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. लेकिन चुनावों में इतनी बड़ी जीत उन्हें राहत नहीं दे पाई. एक बार फिर से छात्रों का आंदोलन शुरु हो गया, हालात बेकाबू बनते चले गये, आगजनी और हिंसा की घटनाएं आम हो गई, कानून-व्यवस्था का नाम नहीं रहा. मामले को शांत करने के लिए सोलंकी ने एक साल तक राणे आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं करने की बात की, लेकिन इससे भी आंदोलन शांत नहीं हुआ.

तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पहले माधवसिंह सोलंकी का बचाव कर रहे थे, लेकिन हिंसा नहीं थमने के कारण अपने रुख में बदलाव किया. तेजी से बिगड़ते हालात के मद्देनजर जून 1985 के मध्य में राजीव ने सोलंकी को अगले पंद्रह दिन में हालात पर काबू पाने का अल्टीमेटम जारी किया, अन्यथा पद छोड़ने की तैयारी रखने को कहा. लेकिन हिंसा का दौर थमा नहीं. आरक्षण विरोधी हिंसा सांप्रदायिक हिंसा का रुप ले चुकी थी, जिसमें करीब पौने दो सौ लोगों की जान गई थी और 2200 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति का नुकसान हुआ था.

हिंसा की बड़ी घटनाएं होती रहीं, गुजरात समाचार अखबार के दफ्तर में भी आग लगा दी गई, जिसका आरोप सोलंकी समर्थकों पर लगा. आखिरकार राजीव गांधी के इशारे पर माधवसिंह सोलंकी को 6 जुलाई 1985 को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा और आदिवासी समुदाय से आने वाले अमरसिंह चौधरी को गुजरात का अगला मुख्यमंत्री बनाया गया, जो सोलंकी की महज पौने चार महीने चली सरकार में गृह मंत्री थे. गृह मंत्री के तौर पर जो अमरसिंह चौधरी हिंसा पर काबू नहीं कर पाए थे, उन्हीं अमरसिंह को माधवसिंह सोलंकी की जिद के कारण आलाकमान ने सीएम बनाया, जबकि सोलंकी विरोधी धड़ा तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष नटवरलाल शाह को सीएम बनाना चाह रहा था. खुद सोलंकी की अपनी पसंद तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष महंत विजयदास थे, जो मेर जैसी पिछड़ी जाति से आते थे. विजय दास के मामले में कामयाबी नहीं मिली, तो उन्होंने अपने खास दोस्त हरिसिंह महीडा का नाम आगे कर दिया, लेकिन जब उस पर भी बात नहीं बनी, तो अमरसिंह चौधरी के पक्ष में आलाकमान को मनवा लिया, आखिर नई विधानसभा में चुनकर आए ज्यादातर विधायक सोलंकी समर्थक जो थे.

जिस समय सोलंकी ने इस्तीफा दिया और चौधरी की सरकार बनी, उस वक्त हालात इतने भयावह हो चुके थे कि गुजरात पुलिस की कमान संभालने और राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति को बहाल करने के लिए गुजरात बाहर के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को डीजीपी बनाकर लाया गया, तत्कालीन डीजीपी वीटी शाह को हटाया गया. बाहर से लाये गये ये पुलिस अधिकारी थे, जुलियो रिबेरो, जिन्होंने संयुक्त बंबई प्रांत के जमाने में अपने कैरियर की शुरुआत उसी भरूच से की थी, जहां आजादी के पहले माधवसिंह सोलंकी का जन्म हुआ था. रिबेरो थोड़े समय पहले ही सीआरपीएफ के डीजीपी नियुक्त किये गये थे. व्यवस्था में बदलाव के बाद राज्य में कानून-व्यवस्था में सुधार हआ, लेकिन पार्टी और सरकार की हालत बिगडती ही चली गई. विपक्ष लगातार मजबूत होता चला गया, जिसके केंद्र में एक नया सितारा आ गया था, जिसका नाम था नरेंद्र मोदी. 1987 में गुजरात बीजेपी में संगठन महामंत्री का दायित्व संभालने वाले नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस की सरकार के सामने लगातार आंदोलन जारी रखा.

छह जुलाई 1985 को गुजरात के सीएम की कुर्सी छोड़ने वाले माधवसिंह सोलंकी की चौथी दफा गुजरात के सीएम के तौर पर वापसी हुई, 10 दिसंबर 1989 को. गुजरात में तब तक लोकसभा के चुनाव हो चुके थे और कांग्रेस को जनता दल और बीजेपी के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा था. ऐसे में पार्टी को विधानसभा चुनावों में जीत दिलाने के लिए राजीव गांधी को सोलंकी के हाथों में एक बार फिर से गुजरात की कमान देने के लिए मजबूर होना पड़ा. लेकिन सोलंकी के पास समय रह नहीं गया था, तीन महीने से भी कम समय में चुनाव होना था. जैसी आशंका थी, फरवरी 1990 में हुए चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और माधवसिंह सोलंकी का बतौर सीएम चौथा और अंतिम कार्यकाल तीन मार्च 1990 को खत्म हो गया.

चुनाव नतीजों के बाद राज्य में चिमनभाई पटेल की अगुआई में जनता दल और बीजेपी की संयुक्त सरकार बनी, लेकिन कुछ महीनों बाद ही बीजेपी ने चिमनभाई पटेल का साथ छोड़ दिया, चिमनभाई ने फिर से कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई, बाद में वो कांग्रेस में शामिल भी हो गये और चार साल तक सीएम रहे. चिमनभाई के देहांत के बाद उनके करीबी छबील दास मेहता सीएम बने और 1995 में जो चुनाव हुए, उसके बाद से बीजेपी लगातार छह चुनाव जीतने का रिकॉर्ड गुजरात में बना चुकी है. लेकिन माधवसिंह सोलंकी ने जो रिकॉर्ड बनाया, वो नहीं तोड़ पाई, 182 में से 149 सीट जीतने का. सोलंकी ने मरते दम तक ये रिकॉर्ड अपने नाम पर ही रखा. संयोग ये भी है कि सोलंकी के बाद कांग्रेस गुजरात में कभी विधानसभा का चुनाव अपने बूते जीतकर सरकार नहीं बना पाई.

माधवसिंह सोलंकी का गुजरात के बाद केंद्र की सरकार से नाता जुड़ा 1991 में, जब पीवी नरसिंहराव की अगुआई में सरकार बनी. 21 जून 1991 को जब राव सरकार का शपथ ग्रहण हुआ, तो माधवसिंह सोलंकी ने कैबिनेट मंत्री के तौर पर शपथ ली और दो दिन बाद विभागों के बंटवारे का जब आधिकारिक तौर पर ऐलान हुआ, तो उन्हें विदेश मंत्रालय का प्रभार दिया गया.

माधवसिंह सोलंकी विदेश मंत्री की भूमिका के लिए उपयुक्त भी थे. गुजराती और हिंदी के साथ अंग्रेजी पर भी उनकी अदभुत पकड़ थी. उनकी लाइब्रेरी भी इसका प्रमाण है, जहां हजारों किताबें अंग्रेजी की मौजूद हैं. शुरु से ही सोलंकी को साहित्य के अलावा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संबंध, बड़े अंतरराष्ट्रीय नेताओं की जीवनी पढ़ने का शौक रहा. भूगोल से लेकर इतिहास और दर्शन से लेकर यात्रा वृतांत तक ये सब उनकी रुचि के विषय थे. अब्राहम लिंकन से जुड़े लतीफों का विशाल संग्रह उनकी लाइब्रेरी का खास हिस्सा रहा है. दुनिया के तमाम देशों को देखना, वो भी अकेले ट्रेन में बैठकर, उनके शौक में शामिल रहा.

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. विदेश मंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल काफी संक्षिप्त रहा और उसका कारण रहा, बोफोर्स घोटाले की जांच से जुड़ा ही एक विवाद, जिसके केंद्र में आये खुद माधवसिंह सोलंकी. दरअसल फरवरी 1992 में दावोस में हुई विश्व व्यापार संगठन की बैठक के दौरान माधवसिंह सोलंकी ने स्विट्जरलैंड के विदेश मंत्री रेने फेबर को एक अनौपचारिक नोट पकड़ाया था, जिसमें बोफोर्स कांड की जांच को आगे नहीं बढ़ाने की बात की गई थी और कहा गया था कि सिर्फ राजनीतिक आरोप वाले इस मामले को खीचने में भारत सरकार की कोई रुचि नहीं है.

दरअसल इसका भांडा तब फूटा, जब इस मामले की जांच कर रही सीबीआई को इस बारे में स्विट्जरलैंड के फेडरल डिपार्टमेंट और जस्टिस एंड पुलिस ने सूचित किया. सीबीआई सूत्रों के मुताबिक, स्विट्जरलैंड के विदेश मंत्री ने माधवसिंह सोलंकी का नोट फेडरल डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस एंड पुलिस के डायरेक्टर को पकड़ा दिया. इसी दौरान सीबीआई ने स्विस सरकार की इस एजेंसी से उन दस्तावेजों को हासिल करने के लिए फिर से आग्रह किया, जो दस्तावेज करीब 64 करोड़ रुपये की दलाली की उस रकम के लेन-देन से जुड़े थे, जिसके तहत स्वीडन की बोफोर्स कंपनी के खाते से स्विसबैंक के कुछ एकाउंट्स में पैसे ट्रांसफर किये गये थे. अगर ये दस्तावेज सीबीआई को जल्दी हाथ लग जाते, तो इस मामले में जांच की रफ्तार तेज हो सकती थी, जिस घोटाले के बारे में यूं तो 1987 में ही स्विडिश रेडियो के ब्रोडकास्ट के बाद पूरी दुनिया को पता लग गया था, लेकिन जिसमें सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की वीपी सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद 1990 में.

स्वाभाविक तौर पर भारत का ये परस्पर विरोधी रुख स्विस अधिकारियों को समझ में नहीं आया. एक तरफ मामले की जांच कर रही एजेंसी स्विस सरकार से घोटाले से जुड़े दस्तावेजों की मांग कर रही थी, दूसरी तरफ भारत सरकार के विदेश मंत्री के तौर पर माधवसिंह सोलंकी अनौपचारिक नोट पकड़ा रहे थे कि भारत सरकार को बोफोर्स मामले की जांच आगे बढ़ाने में कोई रुचि नहीं. इसी से झल्लाई स्विस एजेंसी ने माधवसिंह सोलंकी का वो नोट सीबीआई को भेजकर ये पूछा कि आखिर इस मामले में करना क्या है.

जाहिर है, जब सीबीआई के अधिकारियों को इस नोट की जानकारी मिली तो हड़कंप मच गया. जो नोट दिया गया था, वो मोटे तौर पर हिंदुजा बंधुओं की तरफ बढ़ रही जांच को रोकने के इरादे से था, जिनके बारे में आरोप था कि दलाली का मोटा पैसा उनके पास डमी एकाउंट्स के जरिये गया है. हिंदुजा बंधुओं का नाम इससे पहले भी जर्मनी के एचडीडब्ल्यू पनडुब्बी घोटाले में उछला था, जब बॉन स्थित भारतीय राजदूत ने राजीव गांधी सरकार को ये इत्तिला 1987 में ही कर दी थी कि एसएसके पनडुब्बियों की सप्लाई करने वाली जर्मन फर्म एचडीडब्ल्यू ने दो अतिरिक्त पनडुब्बियों के लिए उंची कीमत बताई है, क्योंकि उसका दावा है कि उसे भारतीय एजेंटों को सात प्रतिशत कमीशन देना पड़ा है. इसी की जांच की फाइल जब वीपी सिंह ने बतौर वित्त मंत्री आगे बढ़ाई तो उन्हें तुरंत वित्त मंत्रालय से हटाकर जनवरी 1987 में रक्षा मंत्रालय का जिम्मा सौंप दिया गया. तीन महीने बाद अप्रैल 1987 में बोफोर्स तोप खरीद मामले में भी दलाली का भंडाफोड़ हुआ और आखिरकार इसी को मुद्दा बनाकर वीपी सिंह ने राजीव गांधी सरकार से इस्तीफा दिया और जनता दल का निर्माण कर 1989 में हुए चुनावों में बीजेपी के समर्थन से मोर्चा सरकार बनाई और बोफोर्स घोटाले में सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की.

स्वाभाविक तौर पर घोटाले के सामने आने के पांच साल बाद एक बार फिर से कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार के विदेश मंत्री का स्विस सरकार से जांच को रोके जाने का अनुरोध, संसद से लेकर सड़क तक हंगामा मच गया. माधवसिंह सोलंकी ने संसद में ये कबूला कि उन्होंने स्विट्जरलैंड के विदेश मंत्री को इस आशय का नोट दिया है और इसके साथ ही 31 मार्च 1992 को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसे स्वीकार करने के अलावा पीएम पीवी नरसिंह राव के पास कोई चारा नहीं था. इस वाकये के बाद राव इतने घबरा गये कि लंबे समय तक उन्होंने विदेश मंत्रालय अपने पास ही रखा और आरएल भाटिया और सलमान खुर्शीद जैसे राज्य कक्षा के मंत्रियों के सहारे विदेश मंत्रालय का रुटीन कामकाज चलाते रहे. इसके बाद कुछ समय के लिए दिनेश सिंह को विदेश मंत्री बनाया गया और कार्यकाल के आखिरी महीनों में प्रणब मुखर्जी को. ये वही प्रणब मुखर्जी थे, जिन्हें माधवसिंह सोलंकी ने 1981 में गुजरात से राज्यसभा में भेजा था.

प्रणब मुखर्जी के साथ माधवसिंह सोलंकी


माधवसिंह सोलंकी की सबसे बड़ी खासियत ये रही कि उन्होंने जीतेजी कभी ये नहीं बताया कि आखिर किसके कहने पर बोफोर्स मामले की जांच रोकने के लिए उन्होंने वो अनौपचारिक नोट स्विट्जरलैंड के विदेश मंत्री को सौंपा था, जिसके सार्वजनिक हो जाने कारण न सिर्फ उनका राजनीतिक कैरियर खत्म होने की राह पर आगे बढ़ गया, बल्कि कानून के घेरे में भी आना पड़ा. सीबीआई ने सोलंकी के खिलाफ मामला भी दर्ज किया और इसकी वजह से उनकी बदनामी भी हुई, कोर्ट के चक्कर भी लगे.

स्वाभाविक तौर पर सोलंकी न तो अज्ञानी थे और न ही अनुभवहीन थे. उन्हें भली-भांति पता था कि खतरा कितना बड़ा है इस तरह के किसी भी झमेले में पड़ने का. फिर भी उन्होंने ये किया तो अपनी प्रतिबद्धता अपनी पार्टी के किसी बड़े नेता या परिवार के प्रति निभाने के लिए ही, जिसे इस मामले में जांच तेजी से आगे बढ़ने पर भारी नुकसान हो सकता था. अगर हिंदुजा बंधु लपेटे में आते, तो कौन इसमें नपता, राजनीति की थोड़ी भी समझ रखने वाले हर आदमी को ये सहज ही ध्यान में आ सकता है. स्वाभाविक तौर पर सोलंकी ने आखिरी दम तक पार्टी और इसकी धुरी के प्रति अपनी वफादारी बनाए रखी, जिसकी वजह से खुद बड़ी कीमत चुकाने के बाद भी उन्होंने अपनी जुबान बंद रखी. जहां तक सवाल है आखिर वो कौन वकील था, जिसने ये नोट तैयार किया था, सीबीआई सूत्रों की मानें तो पार्टी के ही एक बड़े नेता थे, जिनकी वकालत की पृष्ठभूमि थी और जो अपने लंबे-चौड़े सियासी करियर में विधि मंत्रालय का जिम्मा संभालने के साथ ही एक राज्य के राज्यपाल भी रहे थे. जाहिर है, इस वाकये से जुड़े सभी बड़े चरित्र पिछले कछ वर्षों में स्वर्गवासी हो चुके हैं, जिसकी आखिरी कड़ी थे माधवसिंह सोलंकी और औपचारिक तौर पर ये नाम सामने रखने के लिए कोई आएगा नहीं.



सवाल ये उठता है कि माधवसिंह सोलंकी को इतिहास किस तौर पर याद करेगा. एक ऐसा नेता, जो सामान्य पृष्ठभूमि का था, अपनी प्रतिभा के बल पर गुजरात जैसे राज्य की राजनीति में जीत और सिद्धि के कुछ ऐसे रिकॉर्ड कायम कर गया, जो उसकी जिंदगी में कभी टूट नहीं पाए, मौत के बाद भी जल्दी टूट पाएं, लगता नहीं. या फिर एक ऐसे नेता के तौर पर जिसने गुजरात में जाति की राजनीति को अतिवाद तक पहुंचाया और भ्रष्टाचार व कानून-व्यवस्था की बिगड़ी हालत पर लगाम नहीं लगा पाया, जिसकी बड़ी कीमत उसे खुद चुकानी पड़ी या फिर उस नेता के तौर पर जिसने एक तरफ तो अपनी प्रशासनिक क्षमता का लोहा मनवाया, तो दूसरी तरफ पार्टी और परिवार के प्रति ऐसी वफादारी दिखाई कि खुद बड़ी कीमत चुकाकर भी अपने नेतृत्व को नुकसान नहीं पहुंचने दिया. या ऐसे व्यक्ति के तौर पर जो राजनीति में रहते हुए भी ढोंगी नहीं था, जो आराम से सर्किट हाउस में, सूट पहने पहने हुए, डनहिल या 555 सिगरेट सुलगाते हुए, मांसाहार का सेवन करते हुए कठिन से कठिन समस्याओं का हल आसानी से ढूंढ सकता था. या फिर उस शांत, सौम्य व्यक्ति के तौर पर, जिसकी पहचान तो बनी राजनीति के क्षेत्र में, लेकिन जिसका पहला और आखिरी व्यसन शायरी, साहित्य और किताबों के प्रति समर्पण था, जिससे वो आखिरी समय तक प्रेम करता रहा, और उन्हीं के बीच बिना किसी अवसाद के 94 वर्ष की लंबी उम्र तक रहकर पंचतत्व में विलीन हो गया, जिसके बारे में खुद पीएम मोदी ने भी श्रद्धाजंलि व्यक्त करते हुए इशारा किया. माधवसिंह सोलंकी तो परम ज्ञानी ईश्वर के पास चले गये और ज्ञान हासिल करने के लिए, इतिहास अब अपना काम करे. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रजेश कुमार सिंह

ब्रजेश कुमार सिंह

लेखक नेटवर्क18 समूह में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से 1995-96 में पत्रकारिता की ट्रेनिंग, बाद में मास कम्युनिकेशन में पीएचडी. अमर उजाला समूह, आजतक, स्टार न्यूज़, एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ में काम करने के बाद अप्रैल 2019 से नेटवर्क18 के साथ. इतिहास और राजनीति में गहरी रुचि रखने वाले पत्रकार, समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन, दो दशक तक देश-विदेश में रिपोर्टिंग का अनुभव.

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First published: January 10, 2021, 8:51 PM IST
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