इतिहास के पन्नों से: पुराने विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर कैसे बनी ज्ञानवापी की मस्जिद, है इसका पूरा विवरण!

कट्टर मुस्लिम शासक औरंगजेब के शासन काल में वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर को तोड़ा गया और उस पर मस्जिद का निर्माण किया गया था. इसका विवरण उसी कालखंड के दस्तावेजों में उपलब्ध है. जिस तरह का वर्णन उन दस्तावेजों में है, उसी की निशानी अब भी सामने आई है, जब वाराणसी की स्थानीय अदालत के आदेश पर ज्ञानवापी परिसर का सर्वेक्षण हुआ है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 17, 2022, 5:06 pm IST
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पुराने विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर कैसे बनी ज्ञानवापी की मस्जिद, पढ़िए पूरा विवरण
काशी विश्वनाथ मंदिर से सटे ज्ञानवापी परिसर में कोर्ट कमिश्नर ने सर्वे किया है. (PTI)

ज्ञानवापी का मामला गरम है, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इसकी चर्चा है, अलग-अलग मुद्दों को लेकर बहस हो रही है. वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर से सटे ज्ञानवापी परिसर में कोर्ट कमिश्नर ने सर्वे का काम किया है. हिंदू पक्ष की तरफ से कहा जा रहा है कि वहां मौजूद कुंए के अंदर से शिवलिंग मिला है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे वजूखाना के फव्वारे का पत्थर ठहराने में लगा है. ज्ञानवापी का अर्थ होता है ज्ञान का कुंआ, वहां के परिसर से हासिल होने वाली जानकारी को अपने-अपने ज्ञान की कसौटी पर कसने में लगे हैं दोनों पक्ष.


हिंदू पक्ष का हमेशा से कहना रहा है कि ज्ञानवापी परिसर में जो मस्जिद है, वो प्राचीन विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर बनाई गई है, जबकि मुस्लिम संगठन इतिहास से किनारा करते हुए भारतीय संविधान और कानून की दुहाई देकर ये कहने में लगे हैं कि ये मस्जिद थी और रहेगी, इसमें किसी भी किस्म का बदलाव वो सहन नहीं करेंगे.


लेकिन सवाल ये उठता है कि मध्यकालीन इतिहास क्या कहता है इस बारे में, खास तौर पर उस दौर के दरबारी इतिहासकार क्या लिखते हैं, जब विश्वनाथ के मंदिर को तोड़ा गया था, जो विश्वेश्वर के मंदिर के तौर पर भी जाना जाता था.


विश्वनाथ मंदिर कई बार तोड़ा गया

अगर इतिहास पर निगाह डालें, तो पाएंगे कि विश्वनाथ के मंदिर को कई बार तोड़ा गया. वाराणसी के इतिहास पर सबसे महत्वपूर्ण किताब ‘काशी का इतिहास’ लिखने वाले डॉक्टर मोतीचन्द्र ने इस पर विस्तार से प्रकाश डाला है. मोतीचन्द्र के मुताबिक, विश्वनाथ का मंदिर पहली बार कुत्बउद्दीन ऐबक के समय में टूटा, जिसने 1194 ईस्वी में बनारस पर कब्जा किया था. इस बारे में ओमप्रकाश केजरीवाल संपादित पुस्तक ‘काशी, नगरी एक: रूप अनेक’ में भी विस्तार से जानकारी दी गई है. ये बताया गया है कि बनारस के शासक जयचंद्र को असनी के युद्ध में पराजित कर ऐबक ने शहर पर कब्जा किया था.


‘काशी, नगरी एक: रूप अनेक’ किताब में बनारस की विस्तार से जानकारी है.


‘काशी, नगरी एक: रूप अनेक’ किताब में बनारस की विस्तार से जानकारी है.



केजरीवाल की पुस्तक में हसन निजामी लिखित फारसी की पुस्तक ’ताज–उल –म’आसिर’ से एक प्रासंगिक उद्धरण है – “वहां (असनी) से शाही सेना ने बनारस की ओर प्रस्थान किया, जो कि हिंदुस्तान का केंद्र है. यहां सेना ने करीब एक हजार मंदिरों को विध्वंस कर उनके स्थान पर मस्जिदों का निर्माण किया.”

बीएचयू से एमए और लंदन यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने वाले डॉक्टर मोतीचंद्र के मुताबिक, ऐबक के शासनकाल के दौरान ही विश्वनाथ का मंदिर पहली बार तोड़ा गया. इस दौरान कई मंदिरों को मस्जिदों में बदला गया या फिर मंदिरों की सामग्री से मस्जिदों का निर्माण किया गया. मसलन दारानगर से हनुमान फाटक की तरफ जाने वाली ढाई कंगूरे की मस्जिद, जिसका निचला हिस्सा हिंदू मंदिरों के अमले से बना है. गुलजार मुहल्ले में मकदूम साहब की कब्रगार का उत्तरी और पश्चिमी हिस्सा भी मंदिरों को तोड़कर हासिल हुई सामग्री से ही बनाया गया. इसी तरह भदऊं मुहल्ले की मस्जिद भी मंदिरों की सामग्री से बनी. राजघाट के इलाके की एक मस्जिद की दालान तो गाहडवाल युग के खंभों से बनी है. ऐसे कई उदाहरण मोतीचंद्र ने अपनी किताब में गिनाये हैं, जब सल्तनत काल में मंदिरों को तोड़ा गया और उनकी सामग्री के सहारे मस्जिदें खड़ी की गईं.


कुत्बउद्दीन के समय में बनारस में हिंदू धर्म की जो हानि हुई, जिस तरह के अत्याचार हुए, इल्तुतमिश का दौर आते-आते उसमें थोड़ी कमी आई. उसके अमलदारों को पैसे खिलाकर हिंदू जनता और श्रेष्ठी वर्ग ने काशी में फिर से अपनी धार्मिक गतिविधियां शुरु कर दीं और 1296 ईस्वी तक मंदिर फिर से बनाये जाने लगे. इसी दौर में विश्वनाथ का मंदिर भी दोबारा बना.

लेकिन बनारस के लिए दोबारा परेशानी का सबब शुरु हुआ, जब जौनपुर में शर्की सुल्तानों की सत्ता मजबूत हुई. जौनपुर को 1359-60 में फीरोज शाह तुगलक ने बसाया था. लेकिन इसी जौनपुर में 1393-94 ईस्वी में ख्वाजा जहां मलिक सरवर ने नसीरूद्दीन मुहम्मद तुगलक से अपना संबंध तोड़कर स्वतंत्र सल्तनत कायम की. तुगलक के वजीर से स्वतंत्र शासक बने इसी मलिक सरवर के वंशज महमूद शाह शर्की ने 1436 से 1458 ईस्वी के अपने शासनकाल में बनारस में फिर से मंदिरों की तोड़ फोड़ शुरु की, जिसका शिकार विश्वनाथ का मंदिर भी हुआ.


दूसरी बार विध्वंस के करीब सवा सौ साल बाद, एक बार फिर से विश्वनाथ का मंदिर बना. इसका श्रेय अकबर के दरबारी और राजस्व व्यवस्था का मजबूत ढांचा ख़ड़ा करने वाले राजा टोडरमल के पुत्र गोबरधन दास को जाता है. डॉक्टर मोतीचंद्र के मुताबिक, 1585 ईस्वी के आसपास गोबरधन दास ने अपने पिता की आज्ञा के मुताबिक विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया. ऐसा माना जाता है कि 1580 ईस्वी में मुंगेर की जीत के बाद राजा टोडरमल को विश्वनाथ का मंदिर फिर से बनवाने की प्रेरणा नारायण भट्ट ने दी थी, जो दक्षिण भारत के मशहूर विद्वान थे और काफी समय तक काशी में रहे थे.


डॉक्टर मोतीचन्द्र ने 'काशी का इतिहास' किताब में कई राज खोले हैं.


डॉक्टर मोतीचन्द्र ने ‘काशी का इतिहास’ किताब में कई राज खोले हैं.



डॉक्टर मोतीचंद्र ने लिखा है-

“विश्वनाथ के प्राचीन मंदिर में पांच मंडप थे. इनमें से पूर्व की ओर पांचवे मंडप की नाप 125 गुणे 35 फीट थी, ये रंग मंडप था और इसमें धार्मिक उपदेश होते थे. टोडरमल ने मंदिर की मरम्मत करा दी और मंदिर की कुरसी सात फीट और उंची उठाकर सड़क के बराबर कर दी. लेकिन मुसलमानों के डर से मंदिर में मूर्तियां नहीं खोदी गईं.


सोलहवीं सदी में चौखूंटा था विश्वनाथ मंदिर

सोलहवीं सदी में जो विश्वनाथ मंदिर बना, वो चौखूंटा था और उसकी प्रत्येक भुजा 124 फीट की थी. मुख्य मंदिर बीच में 32 फीट के मुरब्बे में जलधरी के अंदर था. गर्भगृह से जुटे हुए 16 गुणे 10 फीट के चार अंतर्गृह थे. इनके बाद 12 गुणे आठ फीट के छोटे अंतर्गृह थे, जो चार मंडपों में जाते थे. पूर्वी और पश्चिमी मंडपों में दंडपाणि और द्वारपालों के मंदिर थे.


मंदिर के चारों कोनों पर 12 फीट के उपमंदिर थे. नंदीमंडप मंदिर के बाहर था. मंदिर की उंचाई शायद 128 फीट थी. मंडपों और मंदिरों पर शिखर थे, जिनकी अनुमानत: उंचाई 64 फीट और 48 फीट थी. मंदिर के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ था, जिसमें अनगिनत देवी देवताओं के मंदिर थे.”


औरंगजेब की धर्मांधता का शिकार बना मंदिर

टोडरमल की इच्छा के मुताबिक अकबर के काल में गोबरधन दास और नारायण भट्ट ने जिस विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया, वो महज नौ दशक के अंदर औरंगजेब की धर्मांधता का शिकार बना. 1658 ईस्वी में शाहजहां के बीमार पड़ते ही उसके चारों बेटों में गद्दी के लिए मारकाट मच गई और आखिरकार औरंगजेब ने अपने भाइयों दारा और शुजा पर जीत हासिल करने के बाद तख्त संभाला. शुरु के वर्षों में अस्थिरता का दौर था, औरंगजेब के प्रति ज्यादातर लोगों में घृणा का भाव था. एक तरफ उसने पिता के जीते जी गद्दी पर कब्जा कर लिया था, शाहजहां को कैद कर लिया था तो दूसरी तरफ अपने भाइयों की क्रूरता से हत्या की थी. इसलिए राजकीय अस्थिरता के दौर में गद्दी संभालने के शुरुआती आठ-दस वर्षों में उसकी धार्मिक कटटरता खुलकर सामने नहीं आई, बल्कि अपनी छवि को ठीक करने के लिए उसने कई जगह मंदिरों को जमीन दी और महंतों को खास अधिकार वाले पट्टे. लेकिन ये महज छलावा था. सत्ता संभालने के महज एक दशक के अंदर उसका क्रूर चेहरा सामने आया.


डॉक्टर मोतीचंद्र के मुताबिक, विश्वनाथ मंदिर गिराकर उस जगह पर ज्ञानवापी मस्जिद उठा दी गई.


डॉक्टर मोतीचंद्र के मुताबिक, विश्वनाथ मंदिर गिराकर उस जगह पर ज्ञानवापी मस्जिद उठा दी गई.



औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता के बारे में उसी के समकालीन दरबारी इतिहासकार साकी मुस्तइद खां ने अपनी किताब ‘मासिर- ए- आलमगिरी’ में लिखा है, जिसे मोतीचंद्र ने अपनी किताब में इस प्रकार उद्धृत किया है – “17 जिलकदा, हिजरी 1079 (18 अप्रैल 1669) के दिन दीन (धर्म) के रक्षक बादशाह सलामत के कानों में खबर पहुंची कि ठट्टा और मुल्तान के सूबों में और विशेषकर बनारस में बेवकूफ ब्राह्मण अपनी रद्दी किताबें अपनी पाठशालाओं में पढ़ाते और समझाते हैं और उनमें दूर-दूर से हिन्दू और मुसलमान विद्यार्थी और जिज्ञासु उनके बदमाशी भरे ज्ञान-विज्ञानों को पढ़ने की दृष्टि से जाते हैं. धर्म संचालक बादशाह ने यह सुनने के बाद सूबेदारों के नाम यह फरमान जारी किया कि वे अपनी इच्छा से काफिरों के तमाम मंदिर और पाठशालाएं गिरा दें. उन्हें इस बात की भी सख्त ताकीद दी गई कि वे सब प्रकार के मूर्ति-पूजा संबंधी शास्त्रों का पठन- पाठन और मूर्ति पूजा भी बंद कर दें. 15 रबी-उल-आखिर (2 सितंबर, 1669) को दीन प्रतिपालक बादशाह को खबर मिली कि उनकी आज्ञा के अनुसार उनके अमलों ने बनारस में विश्वनाथ का मंदिर गिरा दिया.”


विश्वनाथ मंदिर गिराकर उस पर बनाई गई मस्जिद

डॉक्टर मोतीचंद्र के मुताबिक, सिर्फ विश्वनाथ का मंदिर ही नहीं गिराया गया, उस पर ज्ञानवापी की मस्जिद भी उठा दी गई. मस्जिद बनाने वालों ने पुराने मंदिर की पश्चिमी दीवार गिरा दी और छोटे मंदिरों को जमींदोज कर दिया. पश्चिमी, उत्तरी और दक्षिणी द्वार भी बंद कर दिये गये, द्वारों पर उठे शिखर गिरा दिये गये और उनकी जगह गुम्बद खड़े कर दिये गये. गर्भगृह मस्जिद के मुख्य दालान में तब्दील हो गया. चारों अंतर्गृह बचा लिये गये और उन्हें मंडपों से मिलाकर 24 फीट मुरब्बे में दालानें निकाल दी गईं. मंदिर का पूर्वी भाग तोड़कर एक बरामदे में परिणत कर दिया गया, जिसमें अब भी पुराने खंभे लगे हैं. मंदिर का पूर्वी मंडप, जो 125 गुणे 35 फीट का था, उसमें पत्थर के चौके बिठाकर एक लंबे चौक में परिणत कर दिया गया.


औरंगजेब के अत्याचार छुपाने में जुटे इतिहासकार

विश्वनाथ का जो मंदिर औरंगजेब के समय में तोड़कर उस पर ज्ञानवापी की मस्जिद बनाई गई, उसको औरंगजेब में श्रेष्ठ इस्लामिक प्रशासक की छवि देखने वाला कट्टर वर्ग और उसके अत्याचारों को छुपाने की कोशिश में जुटा इतिहासकारों का एक धड़ा दूसरे ढंग से कहने की शर्मनाक कोशिश में जी जान से जुटा रहता है. इस तरह की एक शरारत को मशहूर स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस नेता डॉक्टर पट्टाभी सीतारमैया ने अपनी किताब ‘फेदर्स एंड स्टोन्स’ में जगह दी है, जिसे ओमप्रकाश केजरीवाल ने अपनी किताब में इस तरह उद्धृत किया है-


“अपनी प्रसिद्धि की पराकाष्ठा के दौरान औरंगजेब, किसी अन्य विदेशी शासक की तरह ही, जब किसी यात्रा पर निकलता था, तो उसके साथ हिंदू दरबारियों की काफी बड़ी संख्या होती थी. एक बार वे सब हिंदू दरबारीगण बनारस के पवित्र मंदिर (विश्वनाथ) के दर्शन के लिए निकले. उनके दल में कच्छ की एक रानी भी थी. मंदिर के दर्शन कर जब सब लोग बाहर आए तो ज्ञात हुआ कि रानी गायब है. काफी छानबीन की गई पर उनका पता न चला. अंतत: जब अधिक कड़ाई और सतर्कता से खोज की गई तो मंदिर के दुमंजिले भवन के नीचे एक तहखाने का पता चला जिसका द्वार अंदर से बंद था. उस द्वार को तोड़कर जब लोग अंदर घुसे तो उन्हें वस्त्राभूषण- विहीन, भय से त्रस्त रानी दिखाई पड़ी. अंतत: यह पता चला कि वहां के महंतगण धनी तथा आभूषणालंकृत तीर्थयात्रियों को फुसला कर इस तहखाने में ले आते थे और उनके आभूषण आदि लूट लेते थे. उनके जीवन के साथ क्या होता था, इसकी कोई जानकारी नहीं है. जो भी हो, चूंकि इस मामले में खोज सघन व तात्कालिक थी, इसलिए ऐसी किसी वारदात के लिए कोई समय ही नहीं था. जब औरंगजेब को पंडों की यह काली करतूत मालूम हुई तो वह बोला – इस प्रकार की लूट का स्थान निस्संदेह खुदा का घर नहीं हो सकता. और उसने उसे तुरंत गिरा देने का आदेश दिया. आदेश का तत्काल पालन हुआ और मंदिर खंडहर में परिवर्तित हो गया. बाद में उक्त रानी, जिसे बचा लिया गया था, ने इच्छा प्रकट की कि मंदिर के स्थान पर मस्जिद बनवा दी जाए और बाद में मस्जिद बनवाकर रानी की इच्छा पूरी कर दी गई.”


विश्वनाथ के मंदिर को गिरवाने की स्वीकारोक्ति, उस पर मस्जिद का निर्माण कराये जाने की बात, लेकिन उसको न्यायोचित ठहराने की बेशर्म कोशिश के तहत कच्छ की रानी की कहानी का गढना उसी मानसकिता का सूचक है, जिसमें मध्यकालीन मुस्लिम सुल्तानों और बादशाहों की तरफ से हिंदुओं पर किये गये तमाम अत्याचारों को या तो छुपाने की कोशिश की जाती है या फिर उसे न्यायोचित ठहराने की.

खुद सीतारमैया ने अपनी किताब में कबूल किया है कि जो मुस्लिम सज्जन इस कहानी को सुना रहे थे, वो अपने पक्ष में न तो कोई पांडुलिपि पेश कर सके और न ही कोई अन्य स्रोत, ऐसे में इसे मनगढंत कहानी के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता.


लेकिन कच्छ का इतिहास कुछ और कहता है 

जहां तक इतिहास का सवाल है, सच्चाई ये है कि कच्छ के तत्कालीन महाराव तमाची ने औरंगजेब के कट्टर दुश्मन और गद्दी के लिए जिस भाई से उसकी सबसे तग़ड़ी लड़ाई चल रही थी, उस भाई दारा शिकोह को अपने यहां शरण दी थी. कच्छ के भुज शहर में जिस बगीचे के अंदर राव तमाची ने 1659 में दारा शिकोह को ठहराया था, वो जगह आज भी दारावाड़ी के नाम से मशहूर है. ऐसे में इस बात की कोई संभावना नहीं कि अपने कट्टर दुश्मन को शरण देने वाले राजा के परिवार के किसी सदस्य, खास तौर पर महिला को औरंगजेब अपने साथ धर्म यात्रा के लिए लेकर जाए और धर्म यात्रा पर गई रानी हिंदुओं के सबसे पवित्र शहर के सबसे महत्वपूर्ण मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाने की सलाह दे.


कच्छ के इतिहास की गहरी जानकारी रखने वाले और महाराव राजपरिवार से जुड़े कृतार्थसिंह जाडेजा का कहना है कि कच्छ के इतिहास में कही भी इस बात का जिक्र नहीं है कि कच्छ की कोई रानी औरंगजेब के साथ बनारस की यात्रा पर गई हो, मंदिर को मस्जिद में तब्दील करवाने की जिद का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता. कृतार्थसिंह के मुताबिक, कच्छ भौगोलिक तौर पर इतना कटा हुआ था कि काशी तो दूर, तुलनात्मक तौर पर नजदीक द्वारका की धार्मिक यात्रा पर भी जल्दी जाना संभव नहीं था. कृतार्थसिंह बताते हैं कि 1669 में औरंगजेब के आदेश पर जब विश्वनाथ का मंदिर तोड़ा गया, उस समय राव तमाची की जगह राव रायधनजी प्रथम कच्छ के शासक थे और न तो उनका और और न ही उनकी किसी रानी के वाराणसी जाने का किसी ऐतिहासिक दस्तावेज या राजपत्र में कोई जिक्र है. उनके मुताबिक, राव रायधनजी प्रथम के करीब डेढ़ सौ साल बाद महाराव देशलजी द्वितीय, जो 1819 से 1860 तक कच्छ के शासक रहे, उनकी महारानी भी बड़ी मुश्किल से द्वारका दर्शन के लिए पहुंची थीं और समुद्र का पानी उपर चढ़ जाने की वजह से मंदिर में दर्शन करने की जगह मंदिर की ध्वजा को ही दूर से देखकर उन्हें भगवान श्रीकृष्ण की वंदना कर वापस लौट जाना पड़ा था. नजदीक का ये हाल था, तो दो हजार किलोमीटर दूर वाराणसी जाने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था.


अहिल्याबाई ने कराया मंदिर का पुनर्निर्माण

बहरहाल, जहां तक काशी विश्वनाथ मंदिर का सवाल था, औरंगजेब के बाद मुगल शासन के लगातार कमजोर होते जाने और मराठा शक्ति के उदय के साथ विश्वनाथ का मंदिर फिर से बनाने की कोशिश शुरु हुई. रीवा और मेवाड़ के महाराणा के साथ ही नाना फडणवीस ने भी इस दिशा में कोशिश की थी. लेकिन आखिरकार मंदिर बनवाने का यश हासिल हुआ इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर को. प्रखर राष्ट्रवादी और धर्मपरायण महारानी अहिल्याबाई ने ज्ञानवापी क्षेत्र में जमीन खरीदी और अवध के नवाब से मंदिर निर्माण की अनुमति ले ली. 1777 ईस्वी में जन्माष्टमी के दिन विश्वनाथ मंदिर की पुनर्स्थापना हुई.


ओम प्रकाश केजरीवाल संपादित काशी ग्रंथ के मुताबिक, सल्तनत और मुगल काल में भारी अत्चाचार के शिकार हुए बनारस के ब्राह्मण इतने डर गये थे कि वो अहिल्याबाई की तरफ से बनाये जा रहे मंदिर के कामकाज से अलग ही रहे. ऐसे में महारानी अहिल्याबाई को अपनी राजधानी महेश्वर से एक पंडित को बुलाकर नये मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा करनी पड़ी. इस मंदिर के पहले पुजारी तारापुर इलाके के एक भूमिहार ब्राह्मण बने. मंदिर का गर्भगृह वैसा ही रखा गया, जैसा कि प्राचीन मंदिर का था.

विश्वनाथ मंदिर के दोनों शिखरों को स्वर्णजड़ित करने का काम पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के स्वर्णदान से हुआ, जिन्होंने 1839 ईस्वी में साढ़े बाइस मन सोना इस काम के लिए दिया. धीरे- धीरे इकट्ठा हुए दान से इस मंदिर में और विकास कार्य हुए. 2014 में नरेंद्र मोदी के वाराणसी से सांसद और देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद काशी विश्वनाथ मंदिर की भव्यता और बढ़ी है. पिछले कुछ वर्षों में आसपास की जमीन संपादित कर जिस भव्य विश्वनाथ कॉरिडोर का विकास किया गया है, उससे इस मंदिर में देश – विदेश से श्रद्धालुओं का आना- जना कई गुणा बढ़ गया है, पर्यटकों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है.


लेकिन जिस पुराने मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी की मस्जिद बनी है, उसको लेकर हिंदुओं की टीस कम नही हुई है. यही वजह है कि इसे लेकर कई मामले अदालत में चल रहे हैं. इसी के तहत जब ज्ञानवापी परिसर का सर्वेक्षण हुआ है, पुराने विश्वनाथ मंदिर से जुड़ी हुई निशानियां साफ नजर आ रही हैं. जाहिर है, मुस्लिम पक्ष भी इसको लेकर आक्रामक है, क्योंकि उसे पता है कि अगर पुराने मंदिरों को तोड़कर बनी मस्जिदों को फिर उनके असली रुप में लाने की शुरुआत हो गई, तो ये गिनती दहाई में नहीं, हजारों में जाएगी, आखिर आठ सौ वर्षों के इस्लामी शासन के दौरान मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाने की घटनाएं बड़े पैमाने पर हुई हैं, जिसकी निशानियां देश के ज्यादातर हिस्सों में मौजूद हैं, ज्ञानवापी तो सिर्फ उसका एक उदाहरण भर है.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रजेश कुमार सिंह

ब्रजेश कुमार सिंह

लेखक नेटवर्क18 समूह में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से 1995-96 में पत्रकारिता की ट्रेनिंग, बाद में मास कम्युनिकेशन में पीएचडी. अमर उजाला समूह, आजतक, स्टार न्यूज़, एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ में काम करने के बाद अप्रैल 2019 से नेटवर्क18 के साथ. इतिहास और राजनीति में गहरी रुचि रखने वाले पत्रकार, समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन, दो दशक तक देश-विदेश में रिपोर्टिंग का अनुभव.

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First published: May 17, 2022, 5:06 pm IST
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