दो विधान, दो प्रधान, दो निशान रहे नहीं, फिर कश्मीर में अलग पुलिस पदक की जिद क्यों?

भारत के बाकी हिस्सों की तरह अब जम्मू-कश्मीर के पुलिसकर्मियो को भी वीरता और सेवा के लिए जो पुलिस पदक मिलेगा, उस पर भारत का राजचिन्ह होगा, न कि शेर-ए-कश्मीर नाम से शेख अब्दुल्ला की तस्वीर. जम्मू-कश्मीर की सियासी पार्टियों को समझना होगा कि पुलिस पदक समाज और देश की उत्कृष्ट सेवा के लिए होते हैं, न कि इसे किसी व्यक्ति से जोड़कर देखा जाना जहिए.

Source: News18Hindi Last updated on: May 24, 2022, 7:15 pm IST
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2 विधान, 2 प्रधान, 2 निशान रहे नहीं, फिर कश्मीर में अलग पुलिस पदक की जिद क्यों
जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने पुलिस पदकों से शेख अब्दुल्ला की तस्वीर हटा दी है.

भारत के राजचिन्ह की जगह शेख अब्दुल्ला की तस्वीर के साथ जम्मू–कश्मीर में पुलिस वालों को साहस और सेवा के लिए पुरस्कार दिया जाता रहा है. इसका पता देश के ज्यादातर लोगों को तब लगा है, जब जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने इसमें बदलाव किया है. साहस और सेवा के लिए दिये जाने वाले इन पुलिस पदकों में अब एक तरफ भारत का राजचिन्ह होगा, तो दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर पुलिस पदक लिखा होगा, आवश्यकतानुसार साहस या उत्कृष्ट सेवा शब्द का प्रयोग. भारत के सभी राज्यों में ऐसा ही होता रहा है. ऐसे में जम्मू- कश्मीर में पुलिस कर्मियों को शेख की तस्वीर वाला पदक क्यों दिया जा रहा था, ये बड़ा सवाल है.


देश में राजकीय पुरस्कार व्यक्ति पूजा के लिए नहीं हो सकते, खास तौर पर पुलिस या सेनाकर्मियों को दिये जाने वाले पदक. हमारे जवान देश की सुरक्षा के काम में लगे हैं, भीतरी और बाहरी विध्वसंक ताकतों से बचाने में दिन रात लगे रहते हैं, इसलिए उनकी बहादुरी और सेवा के लिए जो मेडल है, उसमें भारत का राजचिन्ह होना चाहिए, न किसी नेता की तस्वीर. यही वजह रही कि कानून निर्माताओं ने प्रेसिडेंट पुलिस मेडल ऑफ गैलेंटरी या मेरिटोरियस सर्विस का रिवाज किया, भारत के राजचिन्ह के साथ, न कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर पुरस्कार दिया या उनकी तस्वीर लगाई.


विरोध के लिए साथ आईं नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी

अगर राष्ट्रीय स्तर पर या फिर देश के बाकी राज्यों में वीरता और सेवा के लिए पुलिस अधिकारियों को दिये जाने वाले पदक भारत के राजचिन्ह के साथ दिये जाते हैं तो फिर भला शेख अब्दुल्ला की तस्वीर वाला पदक जम्मू-कश्मीर के बहादुर पुलिसकर्मियों को देने का क्या औचित्य है. इस तरह की व्यक्तिपूजक व्यवस्था को पहले ही खत्म कर दिये जाने की जरूरत थी, बावजूद इसके नेशनल कांफ्रेंस इसके विरोध में उतर आई है, यही नहीं महबूबा मुफ्ती वाली पीडीपी भी इसमें अब्दुल्ला परिवार का साथ दे रही है, जो राज्य की सियासत में कभी एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे. दरअसल विरोध मोदी सरकार का करना है, जो केंद्रशासित प्रदेश के तौर पर जम्मू- कश्मीर की व्यवस्था उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के जरिये देख रही है.



नेशनल कांफ्रेंस का विरोध समझ में आ सकता है, आखिर डोगरा राज का विरोध करते हुए नेहरू की मदद से कश्मीर की सत्ता 1947 के आखिरी महीनों में संभालने वाले शेख अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर को शेखडम में ही तब्दील करने की कोशिश की थी. सत्ता पर काबिज होने के लालच में अपनी पार्टी को मुस्लिम कांफ्रेंस से नेशनल कांफ्रेंस का नया नाम देने वाले शेख अब्दुल्ला ने प्रजातंत्र की बात तो की, लेकिन असल में राज्य में प्रजातंत्र का गला घोंटने की कोशिश की, कश्मीर की राजनीति के केंद्र में खुद को रखते हुए. इसी का नतीजा ये रहा कि अपने समर्थकों के जरिये खुद को शेर- ए- कश्मीर बताने वाले अब्दुल्ला ने अपनी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस के सामने कोई राजनीतिक चुनौती खड़ी ही नहीं हो, इसकी भरपूर कोशिश की.


शेख अब्दुल्ला ने खुफिया तंत्र का दुरुपयोग किया

अपने सामने राजनीतिक चुनौती को खत्म करने के लिए शेख अब्दुल्ला ने वैसे ही पुलिस और खुफिया तंत्र का इस्तेमाल किया, जैसा एक समय उनके मित्र और राजनीतिक संरक्षक जवाहरलाल नेहरू ने किया था, अपने सियासी दुश्मनों और उनके परिवारों की निगरानी का. केंद्र सरकार के पुराने दस्तावेजों के कुछ साल पहले सामने आने के बाद ये ध्यान में आया कि नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस जैसे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के बारे मे जानकारी हासिल करने के लिए डेढ़ दशक से भी अधिक समय तक उनके परिवार वालों की निगरानी करवाई थी, वो भी तब जबकि नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विमान दुर्घटना में मारे जाने की खबरें आ चुकी थीं.



देश के सभी राज्यों में भारतीय राजचिन्ह के साथ पुलिस पदक दिए जाते हैं.




शेख अब्दुल्ला ने भी नेहरू से ये सबक बहुत ध्यान से सीखा था. जम्मू- कश्मीर पुलिस के खुफिया विभाग के दस्तावेजों से पता चलता है कि शेख अब्दुल्ला प्रजा परिषद के नेताओं की हमेशा निगरानी करवाते थे, जो प्रजा परिषद शुरुआती दौर में शेख को चुनौती देने वाली एक मात्र सियासी संस्था थी. शेख के इशारे पर जम्मू- कश्मीर की खुफिया पुलिस के अधिकारी प्रजा परिषद के अध्यक्ष गिरधारी लाल डोगरा ही नहीं, शिवराम गुप्त और माखन लाल जैसे नेताओं की भी निगरानी करते थे, जो बिना चर्चा में आए परिषद की गतिविधियों को आगे बढ़ा रहे थे. प्रजा परिषद के हर बड़े नेता की एक एक गतिविधि की जानकारी पुलिस अधिकारी शेख अब्दुल्ला को देते थे. ये भी बताया जाता था कि शेख अब्दुल्ला की मौजूदा सरकार को राजनीतिक तौर पर मजबूत चुनौती देने का काम प्रजा परिषद के नेता कैसे कर रहे हैं और इन पर अंकुश लगाने के लिए क्या किया जाना चाहिए.


सवाल ये उठता है कि जो शेख अब्दुल्ला अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए बिना किसी झिझक के पुलिस अधिकारियों का बेजा इस्तेमाल कर रहे थे, उनकी तस्वीर के साथ पुलिस वालों को वीरता पदक दिये जाने का औचित्य क्या. जहां तक जम्मू- कश्मीर के राजनीतिक इतिहास का सवाल है, शेख अब्दुल्ला ने प्रजा परिषद के नेताओं पर गंभीर जुल्म ढाये, उनको जेल में बंद रखा. यहां तक कि भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी की गिरफ्तारी भी कर ली. शेख की सरकार के रहते हुए ही संदेहास्पद परिस्थितियों में जून 1953 में मुखर्जी का देहांत हुआ और उनके परिवार की मांग को ठुकराते हुए शेख अब्दुल्ला ने किसी भी किस्म की जांच नहीं करवाई.

शेख ने अपने राजनीतिक जीवन में ऐसा कोई आदर्श पेश नहीं किया, जिससे पुलिस वालों को प्रेरणा हासिल हो सके. जम्मू- कश्मीर में जब कबाइली हमला हुआ तो शेख भागकर दिल्ली पहुंच गये. और तब तक वापस कश्मीर घाटी में नहीं गये, जब तक कि भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर रियासत का विलय भारत में मंजूर करते हुए घाटी में सेना भेजने का फैसला नहीं किया.



सच्चाई ये है कि अक्टूबर 1947 में कश्मीर पर कबाइली हमले के समय अगर किसी ने सबसे अधिक साहस का परिचय दिया, तो वो शख्स थे मकबूल शेरवानी. कबाइलियों के सामने बिना किसी सांप्रदायिक भेदभाव के सभी नागरिकों की रक्षा करने के लिए बारामूला में चट्टान की तरह खड़े हो गये थे शेरवानी और इस दौरान वो उनसे जूझते हुए शहीद हुए. इसी तरह की बहादुरी सादिक और महमूदा शाह ने भी दिखाई थी, जिन्होंने बतौर शिक्षक अपनी भूमिका से आगे बढ़कर महिलाओं और पुरुषों को इकट्ठा करते हुए कबाइलियों के सामने मोर्चा संभाला.


कश्मीर में कबाइली हमला हुआ तो शेख दिल्ली में थे

जिस समय कश्मीर में ये कबाइलियों का हमला हो रहा था, शेख दिल्ली में नेहरू के घर में बैठे हुए थे. डर था कि अगर भारत सरकार ने जम्मू- कश्मीर रियासत का विलय मंजूर नहीं किया और मजबूरन महाराजा हरिसिंह ने जल्दी सैन्य सहायता हासिल न होने की हालत में पाकिस्तान की शरण में जाना कबूल कर लिया, तो फिर उनके अरमानों का क्या होगा, जिसके तहत कश्मीर की बागडोर अपने हाथों में लेने का इरादा था शेख का. ऐसे में जैसे ही जम्मू- कश्मीर के महाराजा के प्रतिनिधि के तौर पर मेहरचंद महाजन ने भारत सरकार से जल्दी सहायता न मिलने पर पाकिस्तान का दरवाजा खटखटाने की धमकी दी, शेख कूदकर नेहरू को इशारा करने में लग गये कि जल्दी कर लो, अन्यथा बाजी मेरे हाथ से निकल जाएगी.


और इतिहास गवाह है कि नेहरू और पटेल के कहने पर महाराजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला को जम्मू- कश्मीर का प्रधानमंत्री क्या बनाया, शेख ने राज परिवार के खिलाफ अपना अभियान और तेज कर दिया. शेख की जिद के कारण हरिसिंह को अपने बेटे कर्ण सिंह को रीजेंट बनाकर अपनी रियासत छोड़ मुंबई की राह पकड़नी पड़ी, जहां से वो जिंदा कभी वापस अपनी रियासत में नहीं लौटे. यही नहीं, शेख अब्दुल्ला ने जल्दी ही कश्मीर बनाम जम्मू की सियासत भी शुरु की, मुस्लिम बनाम हिंदू की सियासत तो 1947-48 में ही उजागर हो गई थी. विभाजन के समय मुसलमानों की पीड़ा दिखी, लेकिन पाकिस्तान से जिन हिंदुओं को भागकर जम्मू- कश्मीर में आना पड़ा, उन्हें लंबे समय तक नागरिक अधिकारों से वंचित रखा गया, जम्मू- कश्मीर की सरकार चुनने के लिए उन्हें वोट का अधिकार नहीं दिया गया.


पीएम मोदी ने 2019 में आर्टिकल 370 को खत्म किया

एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे, ये नारा लगाते हुए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू- कश्मीर में प्रवेश किया था, जहां से उन्हें जिंदा वापस लौटना नसीब नहीं हुआ. लेकिन उनकी शहादत बेकार नहीं गई. शेख के जीवन में ही दो प्रधान की व्यवस्था खत्म हो गई, यानी जम्मू- कश्मीर की सरकार का जो मुखिया शुरु के दिनों में प्रधानमंत्री कहा जाता था, वो शेख अब्दुल्ला की पहली बर्खास्तगी के बारह साल बाद मुख्यमंत्री कहा जाने लगा. दो विधान और दो निशान की व्यवस्था मुखर्जी के पदचिन्हों पर चलकर खड़ी और बड़ी बुई पार्टी बीजेपी और इसके प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2019 में खत्म कर दी, आर्टिकल 370 की समाप्ति के साथ.


जम्मू-कश्मीर के लिए न तो अब अलग से संविधान है और न ही अलग राजकीय ध्वज, जो भारत का हिस्सा होते हुए भी शेख अब्दुल्ला की जिद के कारण अलग रखा गया था. जाहिर है, जब दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं रहे, उस दौर में शेख की तस्वीर के साथ, शेष भारत से अलग जम्मू – कश्मीर के लिए वीरता का अलग पुलिस मेडल क्यों हो. अच्छा ही है कि फारुख अब्दुल्ला ने 2001 में मुख्यमंत्री रहते हुए अपने पिता की तस्वीर के साथ जो राज्य पुलिस मेडल देना शुरु किया था, वो गलती दो दशक बाद जम्मू- कश्मीर प्रशासन ने उपराज्यपाल सिन्हा की अगुआई में सुधार ली है. अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार को ये गलती समझ में न आए तो क्या किया जाए. इन्होंने आर्टिकल 370 के नाम पर पहले भी कश्मीर में जमकर रोटियां सेंकी हैं और अब उसके चले जाने के बाद भी अतीत की ऐंठ से उबर नहीं पा रहे. ऐसे में गलत और सही के बीच भेद नहीं कर पा रहे हों, तो आश्चर्य क्या.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रजेश कुमार सिंह

ब्रजेश कुमार सिंह

लेखक नेटवर्क18 समूह में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से 1995-96 में पत्रकारिता की ट्रेनिंग, बाद में मास कम्युनिकेशन में पीएचडी. अमर उजाला समूह, आजतक, स्टार न्यूज़, एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ में काम करने के बाद अप्रैल 2019 से नेटवर्क18 के साथ. इतिहास और राजनीति में गहरी रुचि रखने वाले पत्रकार, समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन, दो दशक तक देश-विदेश में रिपोर्टिंग का अनुभव.

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First published: May 24, 2022, 7:15 pm IST