दिल्ली में राव का स्मारक मनमोहन की जगह बनाएंगे मोदी!

देश के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव का जन्मशताब्दी वर्ष आज से शुरू हो रहा है. 2004 में उनके देहांत के वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनका स्मारक दिल्ली में बनाए जाने का वादा राव के परिवार को किया था. मनमोहन तो अपना वादा नहीं निभा पाए, अब पीएम मोदी को ही ये यश हासिल होगा. मोदी शासन के दौरान भारत रत्न से भी राव मरणोपरांत नवाजे जाएं तो बड़ी बात नहीं, उनकी उपलब्धियां तो हैं इस लायक.

Source: News18Hindi Last updated on: June 28, 2020, 8:00 PM IST
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दिल्ली में राव का स्मारक मनमोहन की जगह बनाएंगे मोदी!
पीएम ने कहा कि वे बहुत बड़े ज्ञानी थे और इतिहास को अच्छी तरह समझते थे.
आज देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय पीवी नरसिंह राव की जयंती है. देश के ज्यादातर लोगों को इसका ध्यान दो कारणों से आया. एक तो तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की तरफ से देश के ज्यादातर महत्वपूर्ण अखबारों में पूरा आवरण पृष्ठ नरसिंह राव को याद में उनका जन्म शताब्दी वर्ष मनाने की घोषणा के विज्ञापन के तौर पर जारी किया गया, तो दूसरी तरफ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज प्रसारित ‘मन की बात’ में भी राव को याद किया. खास बात ये रही कि जिस कांग्रेस पार्टी के राव मरते दम तक सदस्य रहे और उसी पार्टी की अगुआई करते हुए पांच वर्षों तक अर्थव्यवस्था का उदारीकरण करने वाली ऐतिहासिक सरकार चलाई, उसने महज एक ट्वीट कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली, वो भी सुबह साढ़े नौ बजे. हो सकता है कि टीआरएस की तरफ से जारी फुल पेज का विज्ञापन देखकर पार्टी को राव याद आए हों. कांग्रेस की कमान फिर से संभालने के लिए बेचैन राहुल गांधी ने दिन में साढ़े ग्यारह बजे के करीब दो लाइन का फेसबुक पोस्ट डालकर अपना काम चला लिया. दरअसल इन्हें और पार्टी के बाकी नेताओं को चीन को लेकर मोदी सरकार को घेरने से ही फुर्सत नहीं है, राव भला प्राथमिकता में कहां आएं. सरकार के खिलाफ सैकड़ों ट्वीट करने वाले कांग्रेस के ज्यादातर नेताओं को राव के बारे में ट्वीट करने तक का ख्याल नहीं आया, आखिर वो हर मामले में आलाकमान का मिजाज देखने के अभ्यस्त जो हैं.

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तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की तरफ से देश के ज्यादातर महत्वपूर्ण अखबारों में पूरा आवरण पृष्ठ नरसिंह राव को याद में उनका जन्म शताब्दी वर्ष मनाने की घोषणा के विज्ञापन के तौर पर जारी किया गया


सवाल ये उठता है कि आखिर क्यों नेहरू-गांधी परिवार नरसिंह राव और उनकी विरासत की उपेक्षा में लगा रहता है, जिनके योगदान को पूरा देश स्वीकार करता है. नब्बे के दशक में जब देश आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रहा था और जिस बदहाली का कारण पूर्ववर्ती सरकारों की कई दशकों से चली आ रहीं खराब नीतियां थीं, वहां से देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का काम राव ने किया, ये हर कोई मानता है. राव ने अल्पमत के बावजूद पांच साल तक अपनी सरकार को टिकाये रखकर ऐतिहासिक फैसले लिए और अपने वित्त मंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह को पूरी छूट दी लाइसेंस- कोटा-परमिट राज को समाप्त कर अर्थव्यवस्था को उदार बनाने के लिए सभी जरूरी फैसले लेने के लिए ताकि आर्थिक बदहाली के दलदल से देश को बाहर निकाला जा सके. खुद पीएम मोदी ने आज मन की बात के दौरान ये खास तौर पर कहा कि राव ने एक नाजुक दौर में देश को नेतृत्व प्रदान किया.
“मेरे प्यारे देशवासियों, आज 28 जून को भारत अपने एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि दे रहा है, जिन्होंने एक नाजुक दौर में देश का नेतृत्व किया. हमारे ये पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव जी की आज जन्म-शताब्दी वर्ष की शुरुआत का दिन है. जब हम पीवी नरसिम्हा राव जी के बारे में बात करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से राजनेता के रूप में उनकी छवि हमारे सामने उभरती है. लेकिन सच्चाई यह भी है कि वे अनेक भाषाओं को जानते थे, भारतीय और विदेशी भाषाएं बोल लेते थे. वे एक ओर भारतीय मूल्यों में रचे बसे थे तो दूसरी ओर उन्हें पाश्चात्य साहित्य और विज्ञान का भी ज्ञान था.
वे भारत के सबसे अनुभवी नेताओं में से एक थे. लेकिन उनके जीवन का एक और पहलू भी है और वो उल्लेखनीय भी है. हमें जानना भी चाहिए. साथियों नरसिम्हा राव जी अपनी किशोरावस्था में ही स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए थे. जब हैदराबाद के निजाम ने वन्दे मातरम गाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था, तब उनके खिलाफ आंदोलन में उन्होंने भी सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था. उस समय उनकी उम्र सिर्फ 17 साल थी. छोटी उम्र से ही श्रीमान नरसिम्हा राव जी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने में आगे थे. अपनी आवाज बुलंद करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ते थे.

नरसिम्हा राव इतिहास को भी बहुत अच्छी तरह समझते थे, बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि से उठकर उनका आगे बढ़ना, शिक्षा पर उनका जोर, सीखने की उनकी प्रवृत्ति और इन सबके साथ उनकी नेतृत्व क्षमता सब कुछ स्मरणीय है. मेरा आग्रह है कि नरसिम्हा राव जी के जन्म-शताब्दी वर्ष में आप सभी लोग उनके जीवन और विचारों के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने का प्रयास करें. मैं एक बार फिर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं.” – नरेंद्र मोदी

अल्पमत सरकार में भी पूरा किया पांच साल का कार्यकालरिकॉर्ड के तौर पर राव पहले ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जिन्होंने अल्पमत सरकार चलाने के बावजूद पांच साल का टर्म पूरा किया. इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ. यही नहीं, राव पहले ऐसे प्रधानमंत्री भी रहे, जिनकी सियासी पृष्ठभूमि दक्षिण भारत की थी. इससे पहले के सभी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, वीपी सिंह और चंद्रशेखर उत्तर या पश्चिम भारत से संबंध रखते थे, मोरारजी को छोड़कर बाकी सबकी सियासत की जमीन तो उत्तर प्रदेश ही थी. लेकिन राव इनमें से ज्यादातर पर भारी पड़े, जिस तरह के बड़े फैसले लिये, इससे ये बहस लगातार गंभीर होती चली गई कि आखिर ऐतिहासिक योगदान के हिसाब से उन्हें नेहरू और इंदिरा के मुकाबले बराबरी पर रखा जाए या कुछ मामलों में उनसे भी उपर. शास्त्री, देसाई, वीपी सिंह और चंद्रशेखर से उनकी तुलना करने का कोई कारण नहीं था, क्योंकि इन सबका कार्यकाल छोटा रहा था, वही राजीव गांधी ऐतिहासिक मैंडेट हासिल होने के बावजूद अपनी उपलब्धियों की जगह बोफोर्स जैसे घोटाले के कारण ही चर्चा में बने रहे.

फिर ऐसा क्या है कि राव की उपलब्धियों का श्रेय लेने की जगह नेहरू-गांधी परिवार के कब्जे में रहने वाली कांग्रेस पार्टी राव से उनकी मौत के बाद भी लगातार दूरी बरतती आई है. ये बात तो किसी से छुपी नहीं है कि जब राव का लंबी बीमारी के बाद 23 दिसंबर 2004 को दिल्ली में निधन हुआ, तो अगले दिन उनका शव हैदराबाद ले जाए जाने से पहले 24 अकबर रोड से होकर गुजरा. लेकिन सोनिया गांधी के इशारे पर कांग्रेस के इस मुख्यालय का दरवाजा तक नहीं खोला गया, जिस कांग्रेस के न सिर्फ राव सिर्फ अध्यक्ष रहे थे, बल्कि बड़े नेताओं में से एक थे. इससे पहले ये परंपरा रही थी कि हर पूर्व अध्यक्ष का शव श्रद्धांजलि देने के लिए कांग्रेस मुख्यालय के अंदर लाया जाता था, लेकिन राव को ये भी नसीब नहीं हुआ.

पीएम की कुर्सी छोड़ते ही शुरू हो गई उपेक्षा
लेकिन ऐसा नहीं है कि राव की उपेक्षा उनकी मौत के बाद शुरू हुई, पीएम की कुर्सी छोड़ने के बाद ही ये शुरु हो गया था. सोनिया गांधी की अगुआई में राव को पूरी तरह से किनारे करने की कोशिश की गई. राव अपना ये दर्द छुपा भी नहीं सके. राव की जीवनी ‘हाफ लायन’ लिखने वाले विनय सीतापति ने अपनी किताब में वर्णन किया है कि नवंबर 2004 में बीमारी के वक्त जब राव अस्पताल में भर्ती थे और उनकी तबीयत बिगड़ने लगी थी, तो सोनिया गांधी अपने राजनीतिक सचिव अहमद पटेल और वरिष्ठ नेता शिवराज पाटिल के साथ एम्स पहुंची थीं, उनका हालचाल जानने की औपचारिकता निभाने के लिए. इस दौरान जब अहमद पटेल ने पानी का एक ग्लास राव की तरफ बढ़ाया, तो राव ने नाराजगी भरे लहजे में कहा कि आप लोग मुझ पर मस्जिद तोड़ने का आरोप लगाते हैं और अब आप पानी दे रहे हैं.

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राव की जीवनी हाफ लायन का अंश


सवाल उठता है कि क्या नेहरू-गांधी परिवार ने सिर्फ राव के कार्यकाल के दौरान 1992 में बाबरी मस्जिद टूटने की वजह से उनकी उपेक्षा की. अगर सच्चाई यही थी तो फिर सोनिया गांधी के पति राजीव गांधी का क्या किया जाए, जिन्होंने पहले तो मुस्लिम वोटबैंक के चक्कर में शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा और फिर हिंदुओं को खुश करने के लिए राम जन्मभूमि परिसर का दशकों से बंद दरवाजा खुलवाया. राजीव गांधी के 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिये गये उस बयान को भी देश और खास तौर पर सिख समुदाय आज भी कटुता से याद करता है, जब उन्होंने सिख विरोधी हिंसा को उचित ठहराने की कोशिश के तहत ये विवादित बयान दिया था कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती ही है.

राव को लेकर कांग्रेस के प्रथम परिवार में इतना तीखापन क्यों?
अगर किसी मस्जिद के गिरने या फिर उसके बाद हुए दंगे को ही आधार बनाकर किसी के बारे में फैसला करना हो, तो बतौर पार्टी कांग्रेस के लिए मुश्किल काफी बढ़ जाएगी, क्योंकि उसके कई बड़े नेताओं के कार्यकाल के दौरान देश के कई राज्यों में दंगे हुए और तब भी पार्टी ने उन्हें अछूत की तरह नहीं देखा, बल्कि उनको सहेज कर रखा, एचकेएल भगत से लेकर जगदीश टाइटलर के उदाहरण सामने हैं.

फिर राव को लेकर कांग्रेस के प्रथम परिवार में इतना तीखापन क्यों. जानकार बताते हैं कि राव ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में सोनिया गांधी के सामने हमेशा सिर झुकाने की जगह अपने दम पर फैसले लिए, ये बात अलग है कि जिस मनमोहन सिंह को अपना वित्तमंत्री बनाकर राव ने उनका कद ऊंचा किया, वही मनमोहन सिंह दस साल के यूपीए शासन के दौरान अपने मार्गदर्शक राव के उलट ज्यादातर मामलों में सोनिया गांधी की सहमति के बगैर कदम नहीं उठा पाए, सारे बड़े फैसले 7 आरसीआर की जगह 10, जनपथ से होते रहे. मनमोहन सिंह के उलट राव का स्वतंत्र रवैया नेहरू-गांधी परिवार को रास नहीं आया था, बल्कि वो इस बात से दुखी था कि राव ने उसे पूरी तरह किनारे लगा कर रखा.

और ये गुस्सा ही था कि राव को दिल्ली में अंतिम संस्कार के लिए जगह तक मयस्सर नहीं हो पाई. राव का परिवार ये चाहता था कि उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में हो, आखिर राव अपने कैरियर के आखिरी तीन दशकों में तो दिल्ली के ही होकर रह गये थे. लेकिन सोनिया गांधी की नाराजगी के कारण राव को दिल्ली में अंतिम संस्कार के लिए भी जगह नहीं मिल पाई, जिस दिल्ली में राव की अपेक्षा छोटी भूमिका निभाने वाले नेताओं को भी जमुना के किनारे समाधि के लिए जगह मिल गई, जिनमें से ज्यादातर की एक मात्र योग्यता नेहरू-गांधी परिवार से संबंध होना या फिर परिवार के करीबी होना थी.

बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे राव
आज से राव का जन्म शताब्दी वर्ष शुरू हो रहा है, वो राव जो बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. सियासत और प्रशासन में अपनी उपलब्धियों के लिए जाने गये राव निजी तौर पर भी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा भाषाएं बोलने वाले प्रधानमंत्री थे राव. तेलगु, हिंदी, उड़िया, बांग्ला, गुजराती, कन्नड़, संस्कृत और तमिल जैसी भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, फ्रेंच, अरबी, स्पेनिश, जर्मन, ग्रीक, लैटिन और फारसी जैसी भाषाओं पर भी समान प्रभुत्व रखते थे राव. निजाम के शासन काल के दौरान आजादी की लड़ाई में शामिल होने वाले राव ‘वंदे मातरम’ गाने के अधिकार को लेकर आंदोलन में उतरे, वहां से अपने सियासी कैरियर का अंत आते-आते वो राजनीति के चाणक्य तक कहे जाने लगे. उस चाणक्य को सिर्फ शास्त्रों से ही नहीं, तकनीक से भी प्यार था. 1986-87 में ही कंप्यूटर का इस्तेमाल करने लगे थे राव. अर्थनीति को लेकर मशहूर राव सामरिक तौर पर भी उतने ही सक्रिय रहे. परमाणु बम विस्फोट की पूरी तैयारी उन्होंने कर ली थी, खबर लीक हो जाने के कारण खुद के कार्यकाल में कर नहीं पाए, लेकिन अपने अभिन्न मित्र अटलबिहारी वाजपेयी को इसके लिए प्रेरित कर गये, जिसका खुलासा खुद वाजपेयी ने किया था पोखरण विस्फोट के बाद.

राव का स्मारक भी पीएम मोदी ही बनाएंगे
राव का योगदान इतना बड़ा है कि उनकी अपनी पार्टी या फिर उसका शीर्ष नेतृत्व भले ही उपेक्षा करता रहे, लेकिन देश उनके योगदान का ध्यान रखेगा. पीएम मोदी ने आज इस बात को खुलकर कहा भी. राव के सम्मान और उनकी याद में एक बड़ा स्मारक दिल्ली में बनाने का वादा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2004 में ही उनके परिवार को किया था, दस साल के कार्यकाल के दौरान अपना वो वादा पूरा नहीं कर पाए. क्यों नहीं कर पाए, ये समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है. राव का स्मारक भी पीएम मोदी ही बनाएंगे, उसी तीनमूर्ति के अंदर, जिसे नेहरू- गांधी परिवार ने सिर्फ जवाहरलाल नेहरू का स्मारक बनाकर रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था, लेकिन मोदी वहीं पर देश के सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों का स्मारक बनाने की घोषणा कर चुके हैं. अगर ऐसा होता है, तो राव के योगदान को याद करने के लिए कम से कम उनके जन्म शताब्दी वर्ष में कृतज्ञ राष्ट्र की तरफ से ये सच्ची श्रद्धांजलि होगी, भले ही उनकी पार्टी इससे बचती आ रही हो. राव का अंतिम संस्कार भी हैदराबाद में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद ढंग से हुआ तक नहीं था, कम से कम उनकी याद दिल्ली में तो मुकम्मल रहे, जहां पांच वर्ष तक सत्ता के शीर्ष पर रहकर देश के लिए बड़े काम किये राव ने. (ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रजेश कुमार सिंह

ब्रजेश कुमार सिंहGroup Consulting Editor

One of India's most credible and well known journalists with more than 23 years of experience in the Indian media industry - mostly in broadcasting but also with a strong pedigree in print and digital media. Brajesh was part of the first satellite TV news reporting teams in India and has held senior editorial positions with several media organisations - including ABP News Network, TV Today Network, Zee News Network and Amar Ujala Group. Known for being a journalist with impeccable sources across the political divide, Brajesh has over the years scooped several important stories- such as breaking the complete portfolio of Narendra Modi cabinet, a day before the official communique! A hard core field reporter turned editor, Brajesh is a widely travelled journalist, best known in the industry for his distinct style and expertise while tracking and analysing politics and society from different vantage points. An alumni of Indian Institute of Mass Communication and BHU, Brajesh also holds a PhD in Mass Communication. His last assignment was with ZEE Media as Group Editor- Political Affairs & Special Projects. He has successfully launched and previously been editor of two channels, ABP Asmita and Zee Hindustan.

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First published: June 28, 2020, 7:59 PM IST
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