अब ममता के सहारे 2024 में मोदी को चुनौती देने की आस में है विपक्ष!

टीएमसी को पश्चिम बंगाल में जीत दिलाने में कामयाब रहीं ममता बनर्जी भले ही खुद अपना चुनाव नंदीग्राम से हार गई हैं, लेकिन विपक्ष अब उन्हीं में अपना सहारा ढूंढ़ रहा है. कांग्रेस धीरे-धीरे खात्मे की ओर है, ऐसे में भला विपक्ष ममता के अलावा आस भी किससे लगाए. ये बात अलग है कि खुद ममता के लिए अपने होम टर्फ पर ही चुनौती बढ़ती चली जाएगी क्योंकि अब राज्य में आक्रामक विपक्ष की भूमिका में स्थापित हो गई है बीजेपी.

Source: News18Hindi Last updated on: May 2, 2021, 10:12 PM IST
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अब ममता के सहारे 2024 में मोदी को चुनौती देने की आस में है विपक्ष!
टीएमसी को पश्चिम बंगाल में जीत दिलाने में वालीं ममता बनर्जी खुद नंदीग्राम से हार गईं. (PTI)
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे आ गए. जैसा कि पहले से कहा जा रहा था, असम, तमिलनाडु, केरल और पुद्दुचेरी में परिणाम उम्मीद के मुताबिक ही रहे. लड़ाई भी सबसे बड़ी पश्चिम बंगाल में थी और परिणामों को लेकर उत्सुकता भी. यहां टीएमसी ने दो सौ से भी ज्यादा सीटें जीतकर अपनी सरकार को बनाए रखा, लेकिन पार्टी सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद चुनाव हार गईं. वो भी उस नंदीग्राम से जहां से आंदोलन की शुरुआत कर दस साल पहले उन्होंने पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता पर कब्जा किया था.

जीत का एक नशा होता है, जीत किसी भी व्यक्ति में जबरदस्त उर्जा भर देती है. यही ममता बनर्जी के मामले में भी दिखा. नंदीग्राम में वो अपना पांव अपनी ही गाड़ी के दरवाजे में दबाकर चोटिल हो गई थीं और फिर बीजेपी पर हमले का आरोप लगाते हुए पूरे प्रचार के दौरान व्हीलचेयर पर सवार होकर प्रचार किया सहानुभूति बटोरने के लिए. लेकिन आज व्हील चेयर को उन्होंने तुरंत त्याग दिया, जैसे ही लगा कि पार्टी की नैया पार हो गई है, भले ही खुद की नाव नंदीग्राम में डूब गई हो, जहां से व्हील चेयर पर सवार होने का रास्ता उन्होंने अख्तियार किया था.

पश्चिम बंगाल का चुनाव मोदी बनाम ममता की लड़ाई में तब्दील हो गया था. जाहिर है, जैसे ही टीएमसी को जीत हासिल होती हुई दिखी, सेक्युलरिज्म और सोशलिज्म को ढाल बनाकर चुनावी वैतरणी पार करती रहीं पार्टियों को अचानक मोदी के सामने कोई तारणहार बनता दिखा. ये बात अलग रही कि इसको वो दल आगे बढ़ाते, उससे पहले खुद ममता के चुनाव हार जाने की खबर आई. जाहिर है, इससे मोदी विरोधी खेमे के उत्साह में थोड़ी कमी आ गई.


सवाल उठता है कि इन नतीजों के मायने क्या हैं. अगर बीजेपी के लिहाज से देखा जाए, तो वो असम में अपनी सरकार को बचाने में कामयाब रही, जबकि विरोधियों को लग रहा था कि सर्वानंद सोनोवाल और हिमंत विश्व शर्मा की आपसी लड़ाई में कांग्रेस वाले गठबंधन का कुछ भला हो जाए. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. असम में बीजेपी ने कांग्रेस और मौलाना बदरुद्दीन अजमल के गठजोड़ को ध्वस्त करते हुए अपनी सरकार बरकरार रखी. यही नहीं, पुद्दुचेरी में भी उसने खाता खोल लिया है, पहली बार उसके गठबंधन की सरकार बन रही है. इससे पहले वहां कांग्रेस सत्ता में थी, कांग्रेस से  बीजेपी ये राज्य भी छीनने में कामयाब रही.
केरल में बीजेपी को पहले से पता था कि उसके लिए अब भी जमीन तैयार नहीं हो पाई है, बातें वो जितनी कर ले. लेकिन उसने एक काम बखूबी किया. यूडीएफ के वोट बैंक में सेंध लगाई, जिसकी अगुआई करती है कांग्रेस और केरल में चार दशक बाद ऐसा हुआ कि कोई गठबंधन लगातार दूसरी बार सत्ता में बना रहा. कांग्रेस के मन की मुराद वहां भी पूरी नहीं हो पाई, राहुल गांधी का पुशअप या फिर समंदर में छलांग लगाना काम नहीं आया. उत्तर प्रदेश के मुकाबले जिस केरल के मतदाताओं के बुद्धि विवेक पर उन्हें ज्यादा भरोसा था, उस केरल के लोगों ने कांग्रेस की अगुआई वाली यूडीएफ पर भरोसा नहीं किया, वो भी तब जबकि 2019 के लोकसभा चुनावों में सुरक्षित सीट की तलाश में राहुल गांधी खुद केरल पहुंच गए थे, जहां का लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते हैं वो. केरल के लोगों ने एलडीएफ पर भरोसा किया.

तमिलनाडु में भी उम्मीद के मुताबिक ही परिणाम रहे. जयललिता के देहांत के बाद एआईएडीएमके के पास ऐसा कोई करिश्माई नेतृत्व नहीं था, जो फिर से जीत दिला सके. वैसे भी तमिलनाडु की राजनीति एआईएडीएमके और डीएमके के बीच टॉस होती रही है, जनता ने इस बार डीएमके के वादों पर भरोसा कर लिया.


लेकिन असली खेल पश्चिम बंगाल में हुआ, वैसे भी हर पार्टी खेला होबे का ही वहां नारा बुलंद कर रही थी. बीजेपी ने पश्चिम बंगाल के चुनावों में पूरी ताकत झोंक दी थी, वैसा ही जैसे वो हर चुनाव में करती है, चाहे चुनाव राज्यों का हो, स्थानीय निकायों का हो या फिर लोकसभा का. दावे जाहिर है जीत के किए जा रहे थे, लेकिन अंदर से बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को भी पता था कि ऐसा करना आसान नहीं होगा. एक तो पश्चिम बंगाल में पार्टी का ढांचा अब भी पूरी तरह तैयार नहीं है, धरातल पर हर जगह उसके लोग नहीं हैं. दूसरा ये कि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट बहुत बड़ी तादाद में है और सैकड़ों सीटों पर निर्णायक भूमिका में. मुस्लिम वोटर की प्राथमिकता बहुत स्पष्ट है. जो भी पार्टी बीजेपी को हराने में सक्षम है, उसके साथ वो जाता है. पश्चिम बंगाल में भी यही हुआ. कभी लेफ्ट फ्रंट के साथ जुड़े रहने वाले मुस्लिम मतदाता ममता बनर्जी के साथ पिछले एक दशक में जुड़े और बाकी बचे-खुचे भी इस बार पूरी तरह ममता के साथ लग गए. यही हाल कांग्रेस को वोट करते आए मुस्लिम मतदाताओं का भी रहा. कांग्रेस और लेफ्ट तो ठीक, उस फुरफुरा शरीफ के लिए भी उन्होंने अपना वोट बर्बाद नहीं किया, जिसके बारे में कहा जाता है कि पश्चिम बंगाल के बड़े हिस्से में उसका प्रभाव है. मुस्लिम मतदाता पूरी ताकत से टीएमसी के साथ लग गए, क्योंकि उन्हें लगा कि यही पार्टी बीजेपी को राज्य में सत्ता की बागडोर थामने से रोक सकती है. मुस्लिम वोटर वैसे भी टैक्टिकल वोटिंग के लिए मशहूर है.
ममता ने महिलाओं का वोट भी अपने पाले में करने के लिए उनके लिए ढेर सारी लोकलुभावन योजनाएं घोषित कीं. इसके अलावा व्हील चेयर पर सवार होकर उन्होंने उस बेचारी की इमेज भी बनाई, जिसे बीजेपी पूरी ताकत से खत्म करने में लगी है. बाकी का काम उस बंगाली मानसिकता ने भी किया, जिसे आज भी भीतरी और बाहरी का भान बहुत अधिक है. ममता इनके लिए ज्यादा अपनी लगी. वैसे भी बंगाल अब तक उस कुंठा से बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहा है, जहां ये भाव रहा है कि एक समय देश को दिशा दिखाने वाला, प्रगति का ध्वजवाहक रहा बंगाल विकास की रफ्तार में पीछे क्यों छूट गया.


बावजूद इसके एक बड़ा वर्ग ऐसा रहा, जिसमें बीजेपी को अपना भला करने की तस्वीर नजर आई. ये उम्मीद गांव के गरीब, दलित से लेकर समाज के उस हिस्से में रही, जो प्रगति की दौड़ में पीछे छूट गया है और जिसे आज भी आजीविका के लिए बंगाल से बाहर का रास्ता अख्तियार करना पड़ता है. अगर ये उम्मीद और बीजेपी के सबसे बड़े कैंपेनर पीएम नरेंद्र मोदी पर भरोसा नहीं होता, तो पिछले विधानसभा चुनावों में महज तीन सीट पाने वाली बीजेपी इस बार अपनी संख्या में पचीस गुणे का इजाफा नहीं कर पाती.

जहां तक ममता बनर्जी का सवाल है, बंगाल में उनके लिए चुनौती बनी रहेगी. अब विधानसभा में उनके सामने लुंज-पुंज हालत में पहुंच गए वाम दल और कांग्रेस विपक्ष की कुर्सियों पर बैठे नहीं होंगे, बल्कि वो विधायक होंगे, जो बीजेपी के बैनर तले चुनकर आए हैं. इनका मनोबल बढ़ाने और शक्ति देने के लिए केंद्र की मोदी सरकार और खुद बीजेपी की सांगठनिक ताकत होगी, क्योंकि अपनी आदत के मुताबिक बीजेपी अभी से 2024 की तैयारी शुरु कर देगी और उसके आगे 2026 की योजना पर काम भी. भ्रष्टाचार के कई मामले ममता की पार्टी के नेताओं पर हैं, जांच इसकी भी जोर पकड़ेगी और मुश्किलें बढ़ती रहेंगी दीदी की. इसके आगे उस वर्ग को भी, खास तौर पर मुस्लिम वोट बैंक को भी खुश करने की चुनौती होगी, जो साथ में तो खड़ा है, लेकिन अपना हक भी मांगेगा, वो भी तब जब हैरान-परेशान दीदी को इस बार के चुनावों में चंडीपाठ और मंत्रोच्चार तक करने की मजबूरी आ गई. उससे आगे, नंदीग्राम की अपनी हार भी उन्हें पीड़ा देती रहेगी, जहां हार भी मिली तो अपने ही पुराने सिपहसालार, शुभेंदु अधिकारी से, जो अब बीजेपी का बड़ा चेहरा हैं, राज्य में.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल, कांग्रेस का क्या. अगर पार्टी के रुख को देखा जाए, तो वो ममता बनर्जी की जीत में ही अपने लिए संतोष मान ले रही है, वो भी तब जबकि ममता और बीजेपी की लड़ाई में कांग्रेस पार्टी बंगाल में रसातल में पहुंच चुकी है, वो भी उस राज्य में, जहां आजादी के बाद कई दशक तक उसने राज किया. कांग्रेस में वैसे भी जिम्मेदारी तय करने की औपचारिकता होती नहीं है, अगर हार हुई तो दोष सामूहिक और जीत हुई तो माथे पर सेहरा प्रथम परिवार के. परंपरा के मुताबिक ऐसा ही होगा और फिर कुछ समय बाद राहुल गांधी के सत्तारोहण की तैयारी.

अंतिम बात, बंगाल में टीएमसी की जीत क्या 2024 के लोकसभा चुनावों को मोदी बनाम ममता बनाएगी. बीजेपी के सामने खड़ी पार्टियों को ममता में ही ये आस दिख रही है. कभी चंद्रबाबू नायडू, तो कभी नीतीश कुमार, तो कभी राहुल गांधी में विपक्ष अपने लिए उम्मीद तलाशता रहा है, वैसी ही उम्मीद उसे अब ममता से होगी. कांग्रेस भी शायद इसके लिए तैयार हो जाए, क्योंकि खुद में तो ताकत बची नहीं, जो कर पाए, उसी के साथ लग जाएं, यही भाव है. जहां तक बीजेपी का सवाल है, उसे ये हमेशा अच्छा लगेगा. मुस्लिम तुष्टीकरण, हिंसक राजनीति और सिंगुर से नैनो को भगाने वाली ममता अगर सामने रहती हैं, तो मोदी की अगुआई में बीजेपी को सबका साथ, सबका विकास के नारे के साथ आगे बढ़ने में परेशानी नहीं होगी, विश्वास तो उसे यही है. फिलहाल तो बंगाल में शांति की कामना की जाए, जहां अभी से टीएमसी ने हिंसा की शुरुआत कर दी है. कोरोना के सामने लड़ाई की असली चिंता आगे की जा सकती है, फिलहाल तो ‘सेक्युलरिज्म’ की जीत का आनंद उठाने का समय है, मोदी विरोध की सियासत करने वाली पार्टियों के लिए, बंगाल में. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रजेश कुमार सिंह

ब्रजेश कुमार सिंह

लेखक नेटवर्क18 समूह में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से 1995-96 में पत्रकारिता की ट्रेनिंग, बाद में मास कम्युनिकेशन में पीएचडी. अमर उजाला समूह, आजतक, स्टार न्यूज़, एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ में काम करने के बाद अप्रैल 2019 से नेटवर्क18 के साथ. इतिहास और राजनीति में गहरी रुचि रखने वाले पत्रकार, समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन, दो दशक तक देश-विदेश में रिपोर्टिंग का अनुभव.

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First published: May 2, 2021, 10:12 PM IST
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