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    जन्मदिन विशेष: 75 साल के हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, अपने आचरण से बढ़ाई पद की गरिमा

    भारत के चौदहवें राष्ट्रपति के तौर पर रामनाथ कोविंद (Ram Nath Kovind) ने पिछले सवा तीन साल में अपनी सादगी और सौम्यता से सबका मन मोह लिया है. कोविंद कई मामलों में देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की याद दिलाते हैं, जो राष्ट्रपति भवन में भी अत्यंत सादगी के साथ रहा करते थे.

    Source: News18Hindi Last updated on: October 1, 2020, 1:27 PM IST
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    जन्मदिन विशेष: 75 साल के हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, अपने आचरण से बढ़ाई पद की गरिमा
    राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद आज 75 साल के हो गए.
    राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद आज 75 साल के हो गए. एक अक्टूबर 1945 को कानपुर के गरीब दलित परिवार में जन्मे कोविंद 25 जुलाई 2017 से देश के प्रथम नागरिक की भूमिका में हैं. करीब सवा तीन वर्ष के अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने राष्ट्रपति पद की गरिमा को अक्षुण्ण रखा है, साथ ही अपनी सौम्यता से देश-विदेश में लोगों का दिल जीता है.

    राष्ट्रपति कोविंद के सहज व्यक्तित्व की झलक कोरोना काल में भी दिखी है. वो और उनका परिवार कोरोना से प्रभावित लोगों की सेवा करने और कोरोना वॉरियर्स का सम्मान करने में लगा रहा. राष्ट्रपति कोविंद की पत्नी सविता कोविंद जहां खुद भोजन बनाकर राष्ट्रपति भवन के बगल में मौजूद गुरुद्वारा रकाबगंज में भिजवाती नजर आईं, तो राष्ट्रपति कोविंद ने इस साल 15 अगस्त के एट होम समारोह में डॉक्टरों, नर्सों, पुलिसकर्मियों और सफाई कर्मियों को बुलाया, जो कोरोना पीड़ितों की सेवा में लगातार लगे रहे थे.

    जब 2017 में एनडीए के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के तौर पर रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा हुई थी, तो ज्यादातर लोगों को अचरज हुआ था. उस वक्त बिहार के राज्यपाल थे कोविंद. उनके नाम की कहीं कोई चर्चा नहीं थी. लेकिन उनकी स्वीकार्यता कैसी थी, इसका अंदाजा भी लग गया, जब नीतीश कुमार ने उन्हें अपना समर्थन देने की तुरंत घोषणा की, जबकि वो उस समय बिहार में आरजेडी के समर्थन से सरकार चला रहे थे. यूपीए ने कोविंद के सामने जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार को मैदान में उतारा था, लेकिन रामनाथ कोविंद को वो कोई खास चुनौती नहीं दे पाईं और देश के 14वें राष्ट्रपति के तौर पर जुलाई 2017 में कोविंद देश के संवैधानिक प्रमुख बन गए.

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    रामनाथ कोविंद सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर चुके हैं.
    देश का संवैधानिक प्रमुख बनने से पहले कोविंद लंबे समय तक सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर चुके थे. कानपुर से बीकॉम और एलएलबी की पढ़ाई करने वाले कोविंद ने 1971 में बार काउंसिल ऑफ इंडिया में अपना पंजीकरण कराया था. बाद में वो मोरारजी देसाई के साथ जुड़े. इसकी झलक तब मिली, जब 1977 में जनता पार्टी की सरकार आई और कोविंद को मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री बनते ही अपना एक्जिक्यूटिव असिस्टेंट बनाया. इसके साथ ही कोविंद पहले दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार के स्टैंडिंग काउंसिल बने, तो फिर 1980 से सुप्रीम कोर्ट में, जिस भूमिका का निर्वाह उन्होंने 1993 तक किया. इस दौरान उन्होंने सात-सात प्रधानमंत्री देखे.

    न्यायपालिका के साथ लंबे जुड़ाव का फायदा कोविंद को बतौर राष्ट्रपति भी मिला, जहां आर्टिकल 370 को बेअसर करने जैसे महत्वपूर्ण बिलों पर अपनी अंतिम मुहर लगाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई. बहुत कम लोग ये जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले जो अब हिंदी सहित तमाम महत्वपूर्ण भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होते हैं, इसके पीछे भी राष्ट्रपति कोविंद की ही भूमिका रही है.

    राष्ट्रपति बनने के चार महीने के अंदर ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को कहा कि देश की सर्वोच्च अदालत में भले ही अंग्रेजी में कामकाज होता रहे, लेकिन उसके फैसले तमाम भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध होने चाहिए, ताकि देश के आम लोग बड़े फैसलों को आसानी से पढ़ सकें, समझ सकें. स्वाभाविक तौर पर आम लोगों की इस तकलीफ का अंदाजा कोविंद को वकालत के अपने करीब तीन दशक लंबे कैरियर के दौरान लगा होगा.
    आम लोगों को राष्ट्रपति भवन से जोड़ने की मुहिम भी कोविंद ने देश के संवैधानिक प्रमुख की जिम्मेदारी संभालते ही शुरू की. राष्ट्रपति के लिए राष्ट्रपति भवन का एक कोना ही पर्याप्त है, बाकी हिस्से को आराम से देश के आम लोग देख सकें, इसके लिए निर्देश जारी किए. यही वजह है कि आज राष्ट्रपति भवन घूमने के लिए आने वाले लोगों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है. राष्ट्रपति भवन का जो मुगल गार्डन कभी बड़े विशेषाधिकार का प्रतीक हुआ करता था, उसका लुत्फ उठाते आज देश की आम जनता भी दिख जाती है.


    राष्ट्रपति के तौर पर कोविंद ने ये भी सुनिश्चित किया है कि राष्ट्रपति भवन में जो तमाम ऐतिहासिक दस्तावेज हैं, उस तक आम लोगों और शोधार्थियों की आसानी से पहुंच हो. यही वजह है कि दस्तावेजों और चित्रों के डिजिटलाइजेशन की प्रक्रिया पिछले कुछ महीनों में काफी तेज की गई है.

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    राष्ट्रपति कोविंद अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान जताने के लिए प्रोटोकॉल तोड़ने में भी नहीं हिचके.


    कोविंद की सहजता तब भी नजर आई, जब वो राष्ट्रपति के तौर पर पिछले साल फरवरी में कानपुर के डीएवी कॉलेज के शताब्दी समारोह में भाग लेने गए और मंच पर ही अपने पुराने शिक्षकों के पांव छू लिए बिना किसी झिझक के. ये बात अलग है कि राष्ट्रपति से मिलने के पहले प्रोटोकॉल अधिकारियों की तरफ से आम और खास सबको यही सिखाया जाता है कि न तो राष्ट्रपति के पांव छूने की कोशिश करें और न ही उनकी तरफ हाथ आगे करें, जब तक कि वो खुद हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ आगे न बढ़ाएं. लेकिन अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान के प्रदर्शन के लिए स्थापित प्रोटोकॉल को तोड़ने में भी राष्ट्रपति कोविंद ने कोई हिचक नहीं दिखाई.

    ऐसी ही एक खास तस्वीर विज्ञान भवन में भी दिखी थी, जब राष्ट्रपति कोविंद वहां एक कार्यक्रम में गए थे और जहां राष्ट्रगान के दौरान एक महिला पुलिस कांस्टेबल बेहोश होकर गिर गई थी. कार्यक्रम खत्म होते ही कोविंद मंच से नीचे उतरे और उस महिला कांस्टेबल से सेहत के बारे में पूछा, उससे आराम से मिले और हिम्मत बंधाई. देश के राष्ट्रपति, जो भारतीय सेना के सुप्रीम कमांडर भी होते हैं, अपनी इस भूमिका में भी कोविंद देश के सबसे दुर्गम इलाके सियाचिन तक गए थे जवानों का हौसला बढ़ाने के लिए.

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    रामनाथ कोविंद जवानों का हौसला बढ़ाने के लिए देश के सबसे दुर्गम इलाके सियाचिन तक जा चुके हैं.


    जब रामनाथ कोविंद देश के राष्ट्रपति बने, उनकी दलित पृष्ठभूमि चर्चा का विषय बनी थी. कांग्रेस ने मीरा कुमार को मैदान में उतारकर राष्ट्रपति के चुनाव को दलित बनाम दलित बना दिया था. लेकिन खुद कोविंद अपनी दलित पृष्ठभूमि को कंधे पर लेकर नहीं घूमते. इसकी झलक तब मिली, जब अंग्रेजी के एक अखबार ने उनका नाम लेकर एक विवादास्पद टिप्पणी की, तब जब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया.

    उस समय बीजेपी से संबंधित कई दलित सांसद और नेता इस मामले को लेकर दलित राष्ट्रपति के अपमान का मुद्दा बनाना चाह रहे थे, लेकिन कोविंद ने पूरी गंभीरता के साथ इस मामले को तूल पकड़ने से खुद रोक दिया, ये संदेश देकर कि राष्ट्रपति दलित नहीं होता, अपमान अगर हुआ है तो देश के राष्ट्रपति का, न कि किसी दलित का. देश में जाति आधारित राजनीति जिस तरह से स्थापित है, उसमें राष्ट्रपति कोविंद का ये कदम उन्हें एक अलग मंच पर ही ले जाकर रखता है, उनके व्यक्तित्व की गहराई का परिचायक है.

    कुछ मामलों में राष्ट्रपति कोविंद देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की याद दिलाते हैं. न सिर्फ राजेंद्र बाबू जैसी सादगी है उनकी, बल्कि धर्म और अध्यात्म से भी उनका गहरा जुड़ाव है. राजेंद्र बाबू धर्म और अध्यात्म को देश और समाज की मूल प्रकृति का हिस्सा मानते थे, वैसे ही विचार कोविंद के भी हैं. यही वजह है कि खाली समय में वो कानून की किताबों और सुप्रीम कोर्ट के बड़े फैसलों के साथ ही धर्म और अध्यात्म से जुड़ी किताबें को पढ़ते हैं, दिल्ली से बाहर अपने दौरों में भी महत्वपूर्ण आश्रमों और मठों में भी जाते हैं.


    धर्म और अध्यात्म के साथ प्रकृति प्रेमी भी हैं कोविंद और साथ में जीव दया के आग्रही भी. यही वजह है कि कई बड़े राष्ट्र प्रमुखों के दौरों के समय, गार्ड ऑफ ऑनर दिए जाते समय अचानक कुत्तों के आ जाने से जब लोग सन्न रह जाते थे और राष्ट्रपति भवन परिसर में बड़ी संख्या में मौजूद कुत्तों को बाहर करने की सोची गई, तो कोविंद ने इसके लिए साफ मना कर दिया, सोच ये थी कि प्रकृति ने हर प्राणी के लिए अपनी व्यवस्था की है, अलग स्वभाव दिया है, फिर भला उसके साथ छेड़छाड़ क्यों.

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    राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का जन्म 1 अक्टूबर 1945 को कानपुर में हुआ था.


    राष्ट्रपति का आसन संभालने से पहले कोविंद दो बार राज्य सभा के सदस्य रहे, अप्रैल 1993 से मार्च 2006 तक. बीजेपी से भी वो 1991 में ही जुड़े. बीजेपी के अंदर दलित पृष्ठभूमि वाले नेता कोविंद पार्टी के प्रवक्ता भी रहे, अलग-अलग समय पर पार्टी के लिए प्रचार करने भी जाते रहे, लंबे समय तक अखिल भारतीय कोली समाज के महामंत्री भी रहे. कोविंद की तरफ मोदी का ध्यान खास तौर पर तब गया, जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे. कई कार्यक्रमों में कोविंद का वहां जाना होता था. मोदी कोविंद के सहज-सरल स्वभाव से प्रभावित हुए, साथ में ये भी अचरज कि कोविंद ने कभी किसी पद की लालसा नहीं रखी. यही वजह थी कि मोदी ने 2015 में उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाने का फैसला किया और दो वर्ष बाद देश का राष्ट्रपति.

    देश का राष्ट्रपति बने हुए करीब सवा तीन साल हो जाने के बावजूद कोविंद के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है. अब भी वैसी ही सादगी, परिवार के रवैये में भी कोई बदलाव नहीं. उनकी बहू आज भी दिल्ली के एक स्कूल में पढ़ाती हैं. खुद कोविंद की सादगी देश-विदेश में लोगों को प्रभावित करती है. राष्ट्रपति के तौर पर  28 देशों का दौरा कर चुके हैं कोविंद और इस दौरान अपनी सादगी और सौम्यता से इन तमाम देशों में उन्होंने भारत के लिए मान बढ़ाया है. पीएम मोदी ने देश की सांस्कृतिक विरासत को भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है, देश के संवैधानिक प्रमुख की भूमिका में राष्ट्रपति कोविंद भी उसे मजबूत आधार दे रहे हैं. जिस तरह राष्ट्रपति के सर्वोच्च आसन पर कोविंद की मौजूदगी देश में सामाजिक उत्थान की सबसे बड़ी तस्वीर है, वैसे ही भारत विश्व गुरु का अपना दर्जा फिर से हासिल करे, इसके लिए देश के प्रथम नागरिक कोविंद की अगुआई में देश आगे बढ़ता रहे, यही उम्मीद है. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
    ब्लॉगर के बारे में
    ब्रजेश कुमार सिंह

    ब्रजेश कुमार सिंहGroup Consulting Editor

    लेखक नेटवर्क18 समूह में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से 1995-96 में पत्रकारिता की ट्रेनिंग, बाद में मास कम्युनिकेशन में पीएचडी. अमर उजाला समूह, आजतक, स्टार न्यूज़, एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ में काम करने के बाद अप्रैल 2019 से नेटवर्क18 के साथ. इतिहास और राजनीति में गहरी रुचि रखने वाले पत्रकार, समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन, दो दशक तक देश-विदेश में रिपोर्टिंग का अनुभव.

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    First published: October 1, 2020, 12:39 PM IST
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