भारत के संवैधानिक प्रमुख रहे हस्तियों की अनूठी गाथा समेटे हुए है ‘राष्ट्रपति भवन’!

देश के पंद्रहवें राष्ट्रपति के चुनाव के लिए वोट डाले जा चुके हैं. जो संकेत हैं, उनके मुताबिक देश की अगली राष्ट्रपति होंगी उड़ीसा निवासी द्रौपदी मुर्मू, जो पहले झारखंड की राज्यपाल रह चुकी हैं. द्रौपदी मुर्मू के पहले चौदह शख्सियतें देश के संवैधानिक प्रमुख के तौर पर राष्ट्रपति भवन की शोभा बढ़ा चुकी हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: July 19, 2022, 11:16 am IST
शेयर करें: Share this page on FacebookShare this page on TwitterShare this page on LinkedIn
विज्ञापन
भारत के संवैधानिक प्रमुखों की अनूठी गाथा समेटे हुए है ‘राष्ट्रपति भवन’!
भारत के संवैधानिक प्रमुख रहे हस्तियों की अनूठी गाथा समेटे हुए है ‘राष्ट्रपति भवन’!

एक समय ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता का प्रतीक रहा लुटियंस निर्मित भवन कैसे आजादी के बाद के 75 वर्षों में महत्वपूर्ण बदलावों और राष्ट्रपति के पद पर आसीन रही शख्सियतों की खासियतों का गवाह रहा, उसे बड़े ही रोचक अंदाज में पेश किया है मशहूर अभिनेता और निर्देशक मनोज जोशी ने, ‘राष्ट्रपति भवन’ शीर्षक वाले नाटक के जरिए ही, जिसका मंचन राष्ट्रपति भवन कल्चरल सेंटर में ही किया गया.


मशहूर अभिनेता मनोज जोशी हैं नाटक के सूत्रधार


जिस समय देश भर में चर्चा ये चल रही थी कि देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा, उस वक्त राष्ट्रपति भवन प्रांगण में मौजूद राष्ट्रपति भवन कल्चरल सेंटर के मंच पर मुंबई से आया हुआ कलाकारों का एक दल एक नाटक की तैयारी में जुटा हुआ था. इसकी अगुआई कर रहे थे मनोज जोशी, मुंबईया फिल्मों, टीवी सीरियल्स और नाट्यजगत के मशहूर कलाकार, जिनकी चाणक्य के तौर पर निभाई गई भूमिका की चर्चा खूब होती है.



राष्ट्रपति भवन में मौजूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के साथ अन्य गणमान्य लोग.



मनोज जोशी की कोशिश राष्ट्रपति भवन के इतिहास को रोचक ढंग से बताने की ही नहीं थी, बल्कि राष्ट्रपति के सर्वोच्च आसन पर अभी तक बैठने वाले सभी 14 महानुभावों के व्यक्तित्व की भी खास झलकियां पेश करने की थी. करीब तीन महीने के शोध और एक महीने की प्रैक्टिस के बाद जोशी की अगुआई में पचीस से भी अधिक कलाकारों के दल ने आखिरकार जब आरबीसीसी के मंच पर करीब सवा घंटे लंबे नाटक का मंचन किया, तो राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद भी अपने को तालियां बजाने से रोक नहीं पाए.


राष्ट्रपति कोविंद के सामने हुआ ‘राष्ट्रपति भवन’ का मंचन


उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ही नहीं, देश के तमाम राज्यों के राज्यपाल और केंद्र सरकार के कई मंत्री भी ‘राष्ट्रपति भवन’ नाटक का भरपूर लुत्फ उठाते नजर आए. नाटक जब खत्म हुआ तो राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति, दोनों ने ही मंच पर जाकर कलाकारों का हौसला बढ़ाया और उनके साथ तस्वीरें भी खिंचायी. मंच पर जो कलाकार मौजूद थे, उनमें वो चौदह कलाकार भी थे, जो डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से लेकर राम नाथ कोविंद की भूमिका तक की भूमिका निभा रहे थे.


मनोज जोशी ने महीनों तक नाटक के लिए शोध किया


राष्ट्रपति के प्रेस सचिव अजय सिंह और बॉलीवुड कलाकार मनोज जोशी की पुरानी दोस्ती रही है. एक दिन बातचीत में राष्ट्रपति भवन के इतिहास को रोचक ढंग से नाटक के तौर पर पेश करने की योजना बन गई. राष्ट्रपति कोविंद को भी ये आइडिया पसंद आया और इस तरह इस नाटक की स्किप्ट और डिजाइन पर काम शुरु हुआ. मनोज जोशी ने इस सिलसिले में लगातार राष्ट्रपति भवन का दौरा किया, ताकि वो यहां के शिल्प से लेकर ऐतिहासिक दस्तावेजों पर निगाह डालकर नाटक की स्क्रिप्ट तैयार कर सकें, जिसके जरिये देश की इस सबसे मशहूर इमारत के इतिहास को आसान व रोचक ढंग से लोगों के सामने रखा जा सके.


लुटियंस के दिल में भी झांकता है ये नाटक


मनोज जोशी ने न सिर्फ राष्ट्रपति भवन के इतिहास को पढ़ा, बल्कि राष्ट्रपति के आसन पर बैठे सभी राष्ट्रपतियों के कार्यकाल और उनके व्यक्तित्व का भी अध्ययन किया. यही नहीं, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के बड़े प्रतीक के तौर पर बनाये गये ‘वायसराय हाउस’ के आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस की सोच को भी दस्तावेजों के जरिये जाना, जिसे भारतीय कला और इतिहास से कोई खास प्रेम नहीं था, लेकिन आखिरकार जब वो इस इमारत को बनाने गया, तो अपनी थियोसॉफिस्ट पत्नी से प्रभावित होकर न सिर्फ सांची के स्तूप, बल्कि हिंदू और जैन मंदिरों के स्थापत्य से भी जमकर प्रेरणा ली और उसका इस्तेमाल किया. ब्रिटिश आधुनिक इतिहास के सबसे मशहूर स्थापत्य शिल्पकार माने जाने वाले लुटियंस की आरंभिक सोच के साथ ‘राष्ट्रपति भवन’ नाटक शुरु होता है.



भारत के संवैधानिक प्रमुख रहे हस्तियों की अनूठी गाथा समेटे हुए है ‘राष्ट्रपति भवन’!



एटनबरो को राष्ट्रपति भवन में शूटिंग के लिए मना किया रेड्डी ने


मनोज जोशी न सिर्फ नाटक के सूत्रधार की भूमिका में है, बल्कि राष्ट्रपति की भूमिका निभाने वाले हर पात्र से संवाद भी करते हैं. नाटक के जरिये पिछले 75 वर्षों का इतिहास सजीव हो उठता है, राजेंद्र प्रसाद से लेकर राम नाथ कोविंद के व्यक्तित्व की झांकी तक मिल जाती है. नाटक में रोचक जानकारी भी है. मसलन किस तरह से तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने हॉलीवुड के मशहूर डायरेक्टर रिचर्ड एटनबरो को ‘गांधी’ फिल्म की शूटिंग के लिए राष्ट्रपति भवन का इस्तेमाल करने से मना कर दिया था, भला ऐतिहासिक घटनाओं के साक्षी रहे इस भवन की गरिमा को कैसे ठेस पहुंचाई जा सकती थी.



देश के दूसरे राष्ट्रपति रहे सर्वोपल्लि राधा कृष्णन का किरदार निभाता पात्र.



हर राष्ट्रपति के व्यक्तित्व के खास पहलू की झलक है नाटक में


भारत के प्रथम राष्ट्रपति ‘देशरत्न’ डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की सादगी भी इस नाटक में परिलक्षित होती है, जो राष्ट्र के सामने की चुनौतियों से वाकिफ थे और खराब सेहत के बावजूद रोजाना बारह घंटे अपना आधिकारिक काम करते थे. देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉक्टर एस राधाकृष्णन, जो राजनीति की जगह शिक्षण क्षेत्र, खास कर भारतीय दर्शन में पूरी दुनिया में अपना नाम कमा चुके थे, देश के सामने चीन के आक्रमण के तौर पर आए संकट से तो जूझे ही, देश के पहले दो प्रधानमंत्रियों, नेहरू और शास्त्री की, अपने कार्यकाल में हुई मौत से उत्पन्न परिस्थिति में भी सूझबूझ के साथ काम करते रहे. जाकिर हुसैन की पीड़ा भी दिखी, जो देश के सामने महंगाई से लेकर अन्न संकट से जूझते रहे और अवसाद के बीच ही उनका राष्ट्रपति भवन में इंतकाल हुआ.



भारत के राष्ट्रपति रहे फखरुद्दीन अली अहमद.



फखरुद्दीन अली अहमद कई खेलों में पारंगत थे


वीवी गिरी, जो कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार नहीं थे, बावजूद इसके इंदिरा गांधी की पसंद के कारण राष्ट्रपति बने और खुद अपने चुनाव में राजनीतिक दांव-पेंच की पराकाष्ठा से वाकिफ हुए. गिरी को राष्ट्रपति पद के अलावा श्रमिक हितों की रक्षा करने वाले राजनेता के तौर पर भी दुनिया में शोहरत मिली. फखरुद्दीन अली अहमद, जिन्हें देश में ज्यादातर लोग इमरजेंसी की काली अधिसूचना पर हस्ताक्षर करने वाले राष्ट्रपति के तौर पर जानते हैं, वो कई खेलों में माहिर थे, खाली समय में खेल के मैदान पर होते थे, ये नाटक देखकर पता चलता है. गोल्फ, फुटबॉल, टेनिस और क्रिकेट में उनकी गहरी रुचि थी. राष्ट्रपति भवन के कैंपस में भी वो गोल्फ मैदान पर नजर आते थे. निधन के बाद वो दफनाये गये भी दिल्ली में ही, राष्ट्रपति भवन के नजदीक.


ज्ञानी जी के अल्हड़ अंदाज का साक्षी रहा राष्ट्रपति भवन


नीलम संजीव रेड्डी, जो जनता शासन काल के दौरान देश के राष्ट्रपति बने, उन्हें ये गवारा नहीं हुआ कि राष्ट्रपति भवन का इस्तेमाल कोई फिल्मों की शूटिंग के लिए करे, भले ही वो आदमी एटनबरो जैसा विश्व प्रसिद्ध फिल्म निर्माता- निर्देशक ही क्यों न हो. ज्ञानी जैल सिंह राष्ट्रपति भवन में भी पंजाब के गांवों जैसे अल्हड़ अंदाज में रहे. राष्ट्रपति भवन के लॉन पर बैठकर देसी भोजन करना उन्हें ज्यादा पसंद रहा, पंजाबी में बातचीत भी.



पूर्व राष्‍ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के व्‍यक्तित्‍व का मंचन



जब राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा को शिक्षक के तौर पर मिला शिष्य से सम्मान


राष्ट्रपति के तौर पर आर वेंकटरमण ने कई प्रधानमंत्री देखे, जिनके कार्यकाल संक्षिप्त रहे. कठिन संवैधानिक परिस्थिति से गुजरने के बावजूद मुगल गार्डेन की साजसज्जा में उनकी काफी रूचि रही और देसी प्रजाति के फल-फूल उन्होंने बड़ी तादाद में लगवाये. राष्ट्रपति के तौर पर शंकर दयाल शर्मा की अपनी प्रतिष्ठा तो थी ही, लेकिन जब वो एक अरब देश के दौरे पर गये, तो वहां के शासनाध्यक्ष इसलिए उनके लिए पलक-पांवड़े बिछाये रहे, क्योंकि बतौर शिक्षक शंकरदयाल शर्मा ने उस शख्स को पढ़ाया था. ये शख्स थे ओमान के सुल्तान कबूल बिन सईद, जिन्हें शर्मा ने बतौर शिक्षक पुणे में पढाया था.



पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ. कलाम की सादगी



कलाम की सादगी से राष्ट्रपति भवन में हर कोई था हैरत में


राष्ट्रपति भवन नाटक देखकर आपको पता चलता है कि केआर नारायणन देश के सांवैधानिक प्रमुख की बड़ी जिम्मेदारी निभाने के साथ ही अंग्रेजी साहित्य का अपना शौक केस पूरा करते रहे. लेकिन सबसे रोचक है, एपीजे अब्दुल कलाम के व्यक्तित्व की झांकी, जो राष्ट्रपति भवन में किताबों के अलावा महज एक सूटकेस लेकर आये थे और अपना टर्म पूरा करने के बाद वापस लौटे भी तो एक सूटकेस लेकर ही, जिन्हें दिन में किसी कॉलेज प्रोफेसर के तौर पर चाव से शिक्षा और भारत के भविष्य के बारे में बात करते हुए, तो खाली समय में संगीत में खो जाते हुए देखा जा सकता था.


प्रतिभा ताई ने लड़ाकू विमान में चढ़कर दिया बड़ा संदेश


देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति होने का गौरव जिन प्रतिभा देवीसिंह पाटिल को हासिल है, उनके व्यक्तित्व की झांकी भी इस नाटक में देखने को मिलती है, जो बेहिचक लड़ाकू विमान की सवारी करने को राजी हो गईं, जबकि महिला होने के नाते कई लोग ये सलाह उन्हें देने से हिचक रहे थे. आखिर प्रतिभाताई को ये भी तो ध्यान में था कि राष्ट्रपति के तौर पर देश की संवैधानिक प्रमुख होने के साथ ही, भारत की सेनाओं की वो सुप्रीम कमांडर भी हैं. ऐसे में अपनी हिम्मत के साथ न सिर्फ उन्हें सेना के जवानों को प्रोत्साहित करना था, बल्कि महिलाओं में ये संदेश भी देना था कि वो पुरुषों से किसी मायने में कम नहीं हैं.



राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद के व्‍यक्तित्‍व को अभिनीत करता पात्र



प्रणब दा और मौजूदा राष्ट्रपति कोविंद का व्यक्तित्व भी झलका है नाटक में


प्रणब मुखर्जी का धीर- गंभीर व्यक्तित्व भी इस नाटक में उभरा है. प्रणब दा ने बिना हिचक उन आतंकियों की दया याचिका को खारिज कर दिया था, जो देश के सामने आतंकी हमले कर चुके थे या फिर उनकी साजिश में शामिल रहे थे. मौजूदा राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के व्यक्तित्व की झांकी भी नाटक में उभरी है. कानपुर के पास पड़ौख गांव में जन्मे कोविंद, जो देश में राष्ट्रपति की कुर्सी पर आसीन होने वाले दलित समाज के पहले सदस्य हैं, अपनी सादगी के लिए मशहूर हैं. कोरोना काल के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोगों को राष्ट्रपति भवन में बुलाकर सम्मानित करना उनके व्यक्तित्व के उस पहलू का परिचय देता है, जिसमें राष्ट्र के संवैधानिक प्रमुख के तौर पर उन लोगों के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करने में वो कोई कमी नहीं रखते, जिन्होंने संकट के समय में जनता की सेवा की है.


कलाकारों के लिए भी ऐतिहासिक मौका


सवा घंटे का ये नाटक कसा हुआ है, इसके कलाकार गुजराती, पारसी और हिंदी फिल्मों और नाटकों के मंजे हुए कलाकार हैं. बिना किसी मेहनताना के महीने भर तक मुंबई से दिल्ली आकर इस नाटक का रिहर्सल करने और पूर्ण कुशलता के साथ इस नाटक का मंचन करने वाले कलाकारों के लिए खुशी इस बात की है कि देश के संवैधानिक प्रमुखों के कार्यकाल और इसके साक्षी रहे राष्ट्रपति भवन के इतिहास को असरदार ढंग से वो सवा घंटे में समेटने में कामयाब रहे हैं, जिसके लिए तारीफ उनको देश के मौजूदा राष्ट्रपति कोविंद से लेकर सभी गणमान्य लोगों से मिल रही है. आखिर राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में ही, राष्ट्रपति भवन की कहानी, मंच पर जीवंत करने का अवसर भला जल्दी कहां किसी को मिलता है. यही खुशी मनोज जोशी की अगुआई में नाटक का मंचन करने वाले सभी कलाकारों को है, जिनके लिए ये मौका अविस्मरणीय बन गया है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रजेश कुमार सिंह

ब्रजेश कुमार सिंह

लेखक नेटवर्क18 समूह में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से 1995-96 में पत्रकारिता की ट्रेनिंग, बाद में मास कम्युनिकेशन में पीएचडी. अमर उजाला समूह, आजतक, स्टार न्यूज़, एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ में काम करने के बाद अप्रैल 2019 से नेटवर्क18 के साथ. इतिहास और राजनीति में गहरी रुचि रखने वाले पत्रकार, समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन, दो दशक तक देश-विदेश में रिपोर्टिंग का अनुभव.

और भी पढ़ें
First published: July 19, 2022, 11:16 am IST