जिन्होंने सदन की हर मर्यादा भंग की, वो उठा रहे हैं हरिवंश पर सवाल!

राज्य सभा में जिस तरह से उपसभापति हरिवंश को धमकाने की कोशिश की गई, उन पर दबाव बनाया गया और असंसदीय भाषा का इस्तेमाल हुआ, वैसा उच्च सदन में कभी हुआ नहीं है. मृदुभाषी हरिवंश के लिए स्वाभाविक तौर पर ये अनुभव हिला देने वाला रहा होगा, लेकिन उन्हें इसके लिए आगे भी तैयार रहना होगा, जिसके बारे में पीएम मोदी ने दो साल पहले उन्हें ताकीद की थी.

Source: News18Hindi Last updated on: September 21, 2020, 7:04 PM IST
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जिन्होंने सदन की हर मर्यादा भंग की, वो उठा रहे हैं हरिवंश पर सवाल!
उपसभापति हरिवंश का गुनाह ये था कि वो विपक्ष के दबाव में नहीं आए, बल्कि विपक्ष को नियमों के हिसाब से चलने को कहते रहे.
राज्य सभा में कल जो हुआ, उसकी शायद किसी ने कल्पना नहीं की थी. सदन का संचालन कर रहे राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश को घेरकर जिस तरह से विपक्षी सांसदों ने हंगामा किया, असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किया और धमकी तक दे डाली, उसकी कोई कल्पना कर भी नहीं सकता था. यही नहीं, जो राज्य सभा के इतिहास में कभी नहीं हुआ, वो भी करने की कोशिश की गई. उपसभापति हरिवंश के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए राज्यसभा महासचिव को नोटिस दी गई, जिसमें बारह विपक्षी दलों के सांसद शामिल हुए.

ये सारा कुछ हुआ कृषि सुधार से जुड़े दो बिलों को पास कराने को लेकर. उपसभापति हरिवंश का गुनाह ये था कि वो विपक्ष के दबाव में नहीं आए, बल्कि विपक्ष को नियमों के हिसाब से चलने को कहते रहे. लेकिन विपक्ष में कोई सुनने को तैयार नहीं था, मानो पहले से तैयारी हुई हो कि सदन में ये बिल पास नहीं होने देने हैं.

तय समय के हिसाब से दिया गया बात रखने का मौका
राज्यसभा की बिजनेस एडवाइजरी कमिटि की बैठक में ये तय हुआ था कि कृषि सुधार से जुड़े इन दो विधेयकों पर चार घंटे की बहस होगी और विधेयक पास कराए जाएंगे. तय समय के हिसाब से बिल पर सबको अपनी बात रखने का मौका दिया गया. जिन नेताओं को दो मिनट का समय दिया गया था, उनकी दल की सदन में संख्या के आधार पर, वो भी दस मिनट बोले. पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने ये किया. बावजूद इसके जब बिल को पास कराने का समय आया, तो विपक्ष ने अपने रंग दिखाने शुरु कर दिये.
विपक्ष को जैसे ही लगा कि उपसभापति हरिवंश बैठक का समय बढ़ाकर कल ही बिल पास कराने जा रहे हैं, मानो हंगामा मच गया. ऐसा नहीं है कि सदन की बैठक का समय पहले नहीं बढ़ा था. पिछले तीन-चार दिनों में लगातार ऐसा होता आया था. ऐसे में उपसभापति हरिवंश के लिए इसमें कुछ भी नया नहीं था. पहले भी सदन में ये होता आया है.

कुछ और था विपक्ष का इरादा
लेकिन विपक्ष का इरादा कुछ और था. एक तो वो बिल को पास नहीं होने देना चाह रहे थे. इसके लिए बिल को सेलेक्ट कमिटि में भेजने के लिए सात संशोधन प्रस्ताव दिये गये थे. एक ही तरह के सात सशोधन प्रस्ताव देने के पीछे भी मंशा देरी करने की ही थी. यही नहीं, कामकाज का समय नहीं बढ़े, इसे लेकर हंगामा किया गया. अमूमन कामकाज का समय बढ़ाने की मांग की जाती है, तो सदन का मूड भांपकर इसकी अनुमति दे दी जाती है. सदन के ज्यादातर सदस्य ये चाह भी रहे थे, लेकिन ये उन सांसदों को मंजूर नहीं था, जो अपनी बात हर कीमत पर मनवाना चाह रहे थे.स्वाभाविक तौर पर ऐसे में हंगामा खड़ा करना ही विपक्ष के सांसदों को अपने उद्देश्य की पूर्ति का एक मात्र जरिया लगा. हंगामे के बीच विपक्षी सांसद आसानी से ये भूल गये कि सदन की कार्यवाही कोरोना काल के बीच चल रही है और सबने मिल-जुल कर तय किया है कि सदन के अंदर सोशल डिस्टैंसिंग का पालन किया जाएगा. यही वजह है कि दर्शक दीर्घा से लेकर दूसरे सदन में भी राज्य सभा के सांसद बैठ रहे हैं.

हंगामे के दौरान टूटे सारे प्रोटोकॉल
लेकिन हंगामे के दौरान ये सारे प्रोटोकॉल टूटे गये, सारी व्यवस्था ध्वस्त हो गई. करोड़ों देशवासियों ने टीवी स्क्रीन पर देखा कि उन्हें अनुशासन का ज्ञान देने वाले कई सांसद खुद सदन में किस किस्म का हंगामा कर रहे हैं, किस तरह कोरोना से बचने के नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं. और तो और, संजय सिंह जैसे सांसद तो एक मार्शल का गला दबाते हुए नजर आए. उनसे भी चार कदम आगे बढ़कर तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा में नेता डेरेक ओ ब्रायन उपसभापति के आसन तक पहुंच गये और वहां जाकर हंगामा करना शुरु कर दिया. यहां तक कि रुल बुक भी फाड़ डाली और उपसभापति के उपर उसे फेंक दिया.

उपसभापति हरिवंश के हाथ में जो बिल की कॉपी थी, वो भी किसी ने उठाकर फाड़ दी. सदन के अंदर की कार्यवाही की जो वीडियो रिकॉर्डिंग देखी गई, उसमें किसी का हाथ भी हरिवंश की तरफ चला, लेकिन मार्शल ने बीच में रोक दिया. अगर मार्शलों ने सदन में इस तरह की सुरक्षा नहीं दी होती, तो पता नहीं क्या होता.

हरिवंश के पास क्या था विकल्प
सवाल ये उठता है कि सदन का संचालन कर रहे हरिवंश के पास विकल्प क्या था, जिन पर हंगामा करने वाले विपक्षी सांसदों का आरोप है कि उन्होंने नियमों को तोड़ा. कौन सा नियम तोड़ा, तो कहा ये जा रहा है कि डिविजन की मांग करने पर भी उन्होंने डिविजन नहीं कराया, बल्कि ध्वनि मत से बिलों को पास करा दिया.

लेकिन हरिवंश के पास विकल्प क्या थे. तीन बार उन्होंने हंगामा करने वाले सांसदों को कहा कि वो अपनी सीटों पर लौट जाएं, तभी पर्चे के जरिये डिविजन कराया जा सकता है. नियम बड़े साफ हैं, इस तरह के डिविजन से पहले सभी सांसदों को पहले से निर्धारित जगह पर बैठना पड़ता है. लेकिन अपनी सीट पर शांत बैठने की कौन कहे, कई सांसद तो टेबल के उपर खड़े थे, कई दर्शक दीर्घा की अपनी सीट से निकलकर नीचे आ गये थे और हल्ला- हंगामा करने में अपना योगदान दे रहे थे. इनमें वो सांसद भी थे, जिन्होंने संशोधन प्रस्ताव दिये थे.


अगर मंशा यही थी कि इस बिल पर सदन का मूड बकायदा वोट कर रिकॉर्ड किया जाए, तो इसके लिए हंगामा करने वाले सांसदों को खुद अनुशासन का पालन करना चाहिए था. ऐसा कही होता हुआ नहीं दिखा. क्या ये विकल्प था कि हंगामा करने वाले सांसदों को सदन से बाहर कर इस पर वोटिंग करा ली जाती, जैसा कि सदन का संचालन करने वाले उपसभापति के पास नियम 256 के तहत अधिकार है और जिस अधिकार का इस्तेमाल कई बार यूपीए शासन काल में सदन के अंदर हो चुका है.

हंगामा करने वाले सांसदों ने नहीं सुनी उपसभापति की बात
लेकिन हरिवंश को ये मंजूर नहीं था. उन्होंने हंगामा खड़ा करने वाले सांसदों को समझाने की कोशिश की, कहा जो आप चाहते हैं, वही होगा, लेकिन अपनी सीट पर बैठ जाएं. लेकिन हंगामा करने वाले सांसदों ने एक नहीं सुनी. उन्हें पता था कि अगर शांति से मतदान की नौबत आती है, तो वो अल्पमत में होंगे. जाहिर है, इस सच्चाई को स्वीकार करने की जगह वो हंगामा खड़ा कर बिल को पास नहीं होने देना चाहते थे, जो उपसभापति हरिवंश को मंजूर नहीं था.

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अगर हंगामा करने वाले सांसद अपनी सीटों पर बैठ जाते, तो बिलों को शांतिपूर्ण ढंग से पास कराने में कोई दिक्कत नहीं होती


हरिवंश का शुरू से जोर रहा है कि सदन में कामकाज ढंग से हो, सदन में प्रोडक्टिविटि बढ़े. 2014 में पहली बार जब वो सांसद बन कर आए थे, तब भी उन्होंने ये बात उठाई थी और जब अगस्त 2018 में पहली बार उपसभापति बने, तब भी यही कोशिश की. यही वजह रही कि सदन में तेजी से बड़े-बड़े विधेयकों पर पूरी चर्चा उन्होंने करवाई, लेकिन उतनी ही तेजी के साथ विधेयकों को पास कराने के लिए भी सभापति वेंकैया नायडू की अगुआई में हरिवंश कई-कई घंटों तक आसन पर लगातार बैठे रहे. वो सदन का कुशलता से संचालन करते रहे और उत्पादकता के लक्ष्य को हासिल करते रहे. पिछले तीन साल में, मौजूदा सत्र के पहले, सदन में कुल 93 विधेयक पास हुए, उसमें से 60 विधेयक उन आखिरी तीन सत्रों में पास हुए, जब नायडू सभापति और हरिवंश उपसभापति की भूमिका में रहे. राज्य सभा की उत्पादकता कितनी बढ़ी है, इसका ये बड़ा और साफ सबूत है. 2019 का साल राज्यसभा के हिसाब से सबसे प्रोडक्टिव वर्ष रहा है.

स्वाभाविक तौर पर रविवार के दिन भी हरिवंश यही करने की कोशिश कर रहे थे. कृषि सुधार से जुड़े दोनों बिलों पर चर्चा पूरी होने के बाद इनको पास कराने का समय आ गया था. अगर हंगामा करने वाले सांसद अपनी सीटों पर बैठ जाते, तो बिलों को शांतिपूर्ण ढंग से पास कराने में कोई दिक्कत नहीं होती और न ही डिविजन कराने की उनकी मांग को पूरा करने में. सदन संचालन के नियम भी यही कहते हैं.

पहले से रही है हंगामा करके बिल को लटकाने की प्रवृत्ति
बिलों को हंगामा कर लटकाने की प्रवृति पहले रही है, लेकिन मोदी सरकार के आने के बाद पिछले कुछ वर्षों में ये प्रवृति कम हुई है, खास तौर पर वेंकैया नायडू के उपराष्ट्रपति बनने और इसी के साथ राज्यसभा का पदेन सभापति बनने के साथ. जब तक राज्यसभा के अंदर बहुमत नहीं था, विपक्ष ने तमाम बिलों को रोकने और लटकाने की कोशिश की. लेकिन एक बार बहुमत आ जाने के बाद नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार बिलों को तेजी से पास कराने में कामयाब रही है. वैसे भी जिन दो बिलों को कल राज्य सभा में हंगामे के बीच पास किया गया, उसकी जरूरत लंबे समय से कृषि विशेषज्ञ महसूस कर रहे थे, कृषि को फायदेमंद बनाने से लेकर बिचौलियों के राज को खत्म करने के लिए. खुद इस बिल का विरोध करने वाली कांग्रेस अपने घोषणापत्र में यही कानून बनाने का वादा पहले ही कर चुकी थी.

ऐसे में इसमें देर करने का कोई कारण नहीं था. उपसभापति हरिवंश ने देखा कि जब विपक्षी सांसदों की मंशा हंगामा खड़ा कर सिर्फ बिल को पास होने से रोकना है, न कि शांत बैठकर इस बिल को लेकर सदन में बहुमत की चुनौती सरकार को देना, तो उन्होंने वही रास्ता अख्तियार किया, जो इस सदन में पहले भी कई दफा हो चुका है. पहले भी हंगामे के बीच ध्वनि मत से महत्वपूर्ण विधेयक पास होते रहे हैं.

हंगामे के बीच सदन में पास होते रहे हैं बिल
हरिवंश के सामने जाकर हंगामा कर रहे डेरेक ओ ब्रायन भला ये कैसे भूल सकते हैं कि 20 फरवरी 2014 को जब यूपीए सत्ता में थी और अलग तेलंगाना के निर्माण के लिए इसी राज्य सभा में बिल पास हो रहा था, तो किस तरह का हंगामा उन्होंने खड़ा किया था, यहां तक कि बिल की कॉपी भी फाड़ डाली थी, फिर भी बिल पास हुआ. लोकपाल संबंधी बिल हो, या भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील से जुड़े विधेयक को पास कराने का मसला, हंगामे के बीच बिल पास होते रहे हैं. राज्य सभा में ऐसा पहली बार नहीं, दर्जनों बार हुआ है.

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हंगामे के बीच बिल पास होते रहे हैं. राज्य सभा में ऐसा पहली बार नहीं, दर्जनों बार हुआ है.


यूपीए जब सत्ता में थी, अपने आखिरी महीनों में, फरवरी से अप्रैल 2014 के बीच, जब लग रहा था कि मोदी बंपर बहुमत से सरकार बनाने जा रहे हैं, राज्यसभा में हंगामे के बीच कई बिल फटाफट पास कराये गये थे. ऐसे बिलों में सिर्फ आंध्रप्रदेश के पुनर्गठन संबंधी बिल ही नहीं था, बल्कि ग्रैच्युटी, एनआईटी, राज्यपाल और फेरियों से जुड़े कई विधेयक थे. उस समय किसी ने इस नियम की दुहाई नहीं दी कि हंगामे के बीच बिल कैसे पास हो गया. एक समय हंगामे के बीच बिल का पास होना संवैधानिक और दूसरी दफा हंगामे के बीच बिल पास होना असंवैधानिक नहीं हो सकता, अपनी सुविधा के हिसाब से व्याख्या नहीं हो सकती.

लंबे समय से चल रही थी कृषि सुधार से जुड़े इन कानूनों की मांग
विपक्ष के कई सांसदों की तरफ से टिप्पणी आती है कि राज्य सभा में जल्दीबाजी में कोई बिल पास नहीं कराया जाना चाहिए, बल्कि यहां पर आराम से चर्चा होनी चाहिए, जैसा संविधान निर्माताओं की सोच थी. इस संबंध में प्रसिद्ध संविधानवेत्ता और संविधान सभा के सदस्य रहे गोपालस्वामी आयंगर की एक टिप्पणी का इस्तेमाल भी किया जाता है कि राज्य सभा कानून बनाने में जरूरी देरी भी लगाएगी, ताकि कोई कानून किसी जुनून या भावनात्मक उद्वेग से प्रभावित न हो.

लेकिन इस तरह की टिप्पणी करने वाले आयंगर के मन में भी ये कही से नहीं था कि विस्तार से विचार के नाम पर महत्वपूर्ण कानूनों को लटकाने की कोशिश की जाएगी. वैसे भी कृषि सुधार से जुड़े ये कानून किसी उद्वेग में नहीं आए हैं, लंबे समय से इनकी मांग चल रही थी, कृषि विशेषज्ञ इसकी जरूरत पर बल दे रहे थे.

जहां तक तेजी से बिल पास करवाने का सवाल है, हर सरकार अपने समय में ये करती रही है. इंदिरा गांधी जब देश की प्रधानमंत्री थी, उस दौर में 25 अगस्त, 1984 को राज्य सभा की एक ही बैठक में एक के बाद एक पांच संविधान संशोधन पारित कर दिये गये थे, इसका जिक्र रामविलास पासवान ने अपने लेख राज्यसभा का महत्व में किया है. पासवान लिखते हैं कि ऐसे कई उदाहरण हैं, जब राज्य सभा ने परिस्थितियों के मद्देनजर विधेयकों को पारित करने में काफी तत्परता भी दिखाई.


हंगामे के बीच बिल पास कराने वाले सांसद भी खोले हैं हरिवंश के खिलाफ मोर्चा
भारत के संसदीय इतिहास और खास तौर पर राज्य सभा से जुड़े इन पुराने अध्यायों को ध्यान में रखते हुए कही से भी नहीं लगता कि हरिवंश ने उपसभापति की भूमिका में कुछ ऐसा कर दिया है, जिस पर विपक्ष को कोहराम मचाने की जरूरत थी या फिर योगेंद्र यादव जैसे राजनीतिक विचारक को परेशान होने की, जो अपनी सुविधा के हिसाब से कह रहे हैं कि हरिवंश ने पचीस साल का सबसे खराब काम किया है.

योगेंद्र यादव को ध्यान रखना होगा कि अगर कुछ खराब हुआ है तो हमारा सोचने का तरीका, जिसमें अपनी सुविधा के हिसाब से घटनाओं की व्याख्या की जाती है, न कि निष्पक्ष ढंग से. जो सांसद खुद कई दफा हंगामे के बीच बिल पास कराने में सहयोग देते आए हैं, वही हरिवंश के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं.

सभापति का आदेश मानने के बजाय नारेबाजी करते रहे सांसद
सदन के अध्यक्ष के आसन पर बैठे व्यक्ति के प्रति कई सांसदों का क्या विद्रोही रुख हो गया है, वो आज भी देखने को मिला. उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू जब राज्यसभा के सभापति के तौर पर आज सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे थे, लगातार हंगामा किया गया. यहां तक कि जब उपसभापति हरिवंश के खिलाफ कल हंगामा करने और सदन की कार्यवाही में बाधा डालने के आरोप में उन्होंने डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन सहित आठ संसद सदस्यों को इस सत्र के बाकी बचे हुए समय के लिए राज्य सभा से निलंबित कर दिया, तो सभापति का आदेश मानने की जगह ये सांसद सदन में नारेबाजी करते रहे. ये किस किस्म की संसदीय परंपरा विकसित की जा रही है, इसकी तरफ ध्यान देना होगा, उन्हें भी जो ये हरकतें कर रहे हैं और उन्हें भी जो निजी स्वार्थ और अपने राजनीतिक एजेंडे की वजह से इसका समर्थन कर रहे हैं. सभापति के पास मार्शल के जरिये सांसदों को बाहर करने का विकल्प था, जैसा पहले होता रहा है, लेकिन वेंकैया नायडू ने ये विकल्प अपनाने की जगह सदन की कार्यवाही स्थगित करने का शालीन तरीका अख्तियार किया.

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ये किस किस्म की संसदीय परंपरा विकसित की जा रही है, इसकी तरफ ध्यान देना होगा, उन्हें भी जो ये हरकतें कर रहे हैं और उन्हें भी जो निजी स्वार्थ और अपने राजनीतिक एजेंडे की वजह से इसका समर्थन कर रहे हैं.


नियमों की दुहाई देने वाले विपक्षी सांसदों को ये ध्यान में भी नहीं रहा कि उपसभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए न्यूनतम चौदह दिनों की नोटिस अनिवार्य है. फिर क्या सोचकर महासचिव के सामने ये मांग लेकर गए थे, विवाद करने के अलावा और क्या उद्देश्य हो सकता है, सहज ही समझ में आ सकता है. नियमों की दुहाई देते समय खुद नियम का ध्यान रखना आवश्यक है, ये सबको समझना होगा.

जनता को करना है कृषि बिल पर फैसला
जहां तक सदन में पास हुए बिलों के किसान विरोधी होने का आरोप है, इस पर फैसला जनता को करना है. अगर ये नये प्रावधान किसान विरोधी हैं तो जनता खुद सरकार को सजा देगी. समय-समय पर ऐसा होता भी आया है. 1975 में आपातकाल लागू करने की सजा जनता ने इंदिरा गांधी को दी, तो जनता पार्टी के अंदर समन्यव ठीक नहीं होने की सजा दो साल में खुद जनता मोर्चे को.

वैसे भी बिहार में अगले दो महीने में चुनाव होने हैं. बिहार में खेती प्रधान पेशा है, आजीविका का मुख्य आधार. स्वाभाविक तौर पर मोदी सरकार या फिर उसके सहयोगी जेडीयू को भी ये पता है. ऐसे में किसान विरोधी बिल को पास कराने या फिर इसका समर्थन करने की बेवकूफी राजनीतिक तौर पर कच्चा कोई आदमी ही कर सकता है, मोदी और नीतीश कुमार जैसे जनता के मूड को भांपने वाले नेता नहीं. वैसे भी जनता वोट के जरिये दूध का दूध और पानी का पानी कर देती है. वैसे ही जैसे नोटबंदी के बाद यूपी में चुनाव हुए और तमाम आशंकाओं और आलोचनाओं के बीच बीजेपी वहां बंपर बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब रही, और विपक्षी दल धराशायी, जो नोटबंदी का विरोध कर वोट की फसल उगाने का ख्वाब देख रहे थे.

हरिवंश से बेहतर कौन सोच सकता है किसानों का हित
जहां तक किसानों के हित के बारे में सोचने का सवाल है, जिस हरिवंश ने उपसभापति के आसन पर बैठकर कृषि सुधार से जुड़े दोनों बिलों को पास कराया, उनसे अधिक किसानों के दर्द का अंदाजा किसे हो सकता है. निश्चित तौर पर सदन में कल सबसे अधिक हंगामा करने वाले डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेन और संजय सिंह के मुकाबले उनका ज्ञान बेहतर है, न सिर्फ सैद्धांतिक, बल्कि व्यावहारिक तौर पर भी. राज्यसभा के लिए पर्चा भरते समय डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेन और संजय सिंह ने जो हलफनामा भरा, उसमें खुद स्वीकार किया है कि उनके पास खेती वाली कोई जमीन है ही नहीं.

इसके मुकाबले हरिवंश के हलफनामे में उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों के अंदर उनकी खेती वाली जमीन का वर्णन है. डेरेक ओ ब्रायन का सारा जीवन शहरों और कॉरपोरेट वर्ल्ड के बीच बीता है, जबकि हरिवंश का खेत, खलिहान, गांव और किसानों की चिंता करते हुए. किसान परिवार से खुद भी आते हैं हरिवंश, चौदह साल की उम्र तक गांव में ही रहकर पले-बढ़े, वो गांव, जो उत्तर प्रदेश के बलिया और बिहार के भोजपुर और सारण जिले तक फैला हुआ है.

हरिवंश उसी गांव सिताब दियारा से आते हैं, जिस गांव से संपूर्ण क्रांति के जनक जयप्रकाश नारायण आते थे. सिताब दियारा में जेपी का अपना पुश्तैनी घर भी नदी के आगोश में समा चुका है, उनके स्मारक जरूर बलिया और सारण, दोनों जिलों के अंदर सिताबदियारे के इलाके में बने हैं. बलिया वाला स्मारक चंद्रशेखर ने बनवाया, तो बिहार की तरफ वाले हिस्से का स्मारक बनाने में हरिवंश और उनकी पार्टी जदयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार की सबसे बड़ी भूमिका रही, जहां पर पीएम मोदी ने केंद्र सरकार की तरफ से भी एक और शानदार स्मारक बनाया है.


गांव में रहने वाले किसान का दर्द क्या होता है, हरिवंश से बेहतर कौन जानता है. गंगा और सरयू नदी के बीच बसे उनके गांव में साल में एक ही फसल अमूमन होती है और छह-छह महीने तक पानी लगता है. नदी के कटान की वजह से घर बार-बार नदी में समाते हैं और नई जगह पर घर बनाने की नौबत आती है. पिछले 150 वर्षों में हरिवंश का पुश्तैनी घर पांचवी बार बना है. कभी सारण में था, तो कभी आरा में और फिलहाल गांव के उस हिस्से में है, जो प्रशासनिक तौर पर बलिया के अंदर आता है.

हरिवंश की खुद की जमीन पर भी होती है खेती
हरिवंश आज भी गांव अक्सर जाते रहते हैं, परिवार के बाकी सदस्य खेती करते हैं, खुद की जमीन में भी खेती होती है. बचपन से ही उन्होंने ये देखा कि खेतों में पैदा होने वाली उपज इतनी कम होती है कि उससे किसान का काम नहीं चल सकता. गांव को लोग शादी ही नहीं, श्राद्ध और इससे पहले बीमारी में भी जमीन बेचकर अपना काम चलाते हैं, न कि खेती से इतनी आमदनी हो पाती है. हरिवंश की खुद की पढ़ाई खेत बेच कर हुई. खेती में निवेश आता नहीं, फसल का उचित मूल्य मिलता नहीं, क्योंकि न तो अपनी सुविधा के हिसाब से फसल मनचाही जगह पर बेचने की आजादी रही है और न ही पहले से किसान ये तय कर पाता है कि वो अपनी फसल का क्या मूल्य पाएगा.

Harivansh narayan singh, Deputy Chairman, Rajya Sabha, पत्रकार, राजनेता, हरिवंश नारायण सिंह,
स्वाभाविक तौर पर हरिवंश गांव, किसान और खेती की समस्या से वाकिफ है.


स्वाभाविक तौर पर हरिवंश गांव, किसान और खेती की समस्या से वाकिफ हैं. चार दशक से भी अधिक लंबे पत्रकारिता के जीवन में भी उन्होंने किसान, कृषि और ग्रामीण भारत की समस्या को जोर-शोर से उठाया, जिसकी तरफ ध्यान देने की प्रेरणा उन्हें जयप्रकाश नारायण से मिली थी. वो डेरेक ओ ब्रायन के शहर कोलकाता की चकाचौंध भरी जिंदगी को छोड़कर झारखंड के आदिवासी समाज की समस्या को उठाने के लिए ही रांची आए और सफलतापूर्वक तीन दशक तक ये किया भी. झारखंड और बिहार के किसानों के हक में लिखते रहे, आवाज उठाते रहे. आदिवासी इलाकों में रहने वाले किसानों को भी अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता था, जिसके लिए मुहिम चलाई हरिवंश ने.

हफ्ते भर में खुद के ही उद्गार भूल गए डेरेक ओ ब्रायन
दुर्भाग्य ये है कि जिस हरिवंश की लेखनी और सार्थक पत्रकारिता का जिक्र खुद डेरेक ओ ब्रायन ने पिछले सोमवार को अपने भाषण में किया था, जब हरिवंश का दोबारा राज्यसभा के उपसभापति के लिए चयन हुआ था, वही डेरेक ओ ब्रायन हफ्ते भर में खुद के ही उद्गार भूल गये. भारतीय राजनीति का ये दुर्भाग्य भी है, जहां पर आप अपने विचार अपनी पार्टी की तत्कालीन जरूरत और सुविधा के हिसाब से बदलते हैं. एक सोमवार को विश्वास तो दूसरे सोमवार को अविश्वास ऐसी ही राजनीति में हो सकता है.

हरिवंश जब अगस्त 2018 में पहली बार राज्यसभा के उपसभापति बने थे, तो पीएम मोदी ने अपने स्वागत भाषण में कहा था कि इस सदन में खिलाड़ी से ज्यादा अंपायर परेशान रहते हैं. हरिवंश को इसका सबसे गंदा अनुभव कल हुआ होगा, जब संसदीय मर्यादा को ताक पर रखते हुए उनके खिलाफ नारेबाजी, हंगामा और असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किया गया. हरिवंश शालीन हैं, दिल का दर्द जल्दी चेहरे पर नहीं लाते, इसलिए वो खुलकर कुछ बोलेंगे भी नहीं, लेकिन देश की जनता सब कुछ ध्यान से देख रही है. उनकी कर्मभूमि बिहार के लोग भी देख रहे हैं, जहां से वो राज्यसभा में सांसद के तौर पर आये हैं और उपसभापति की जिम्मेदारी निभा रहे हैं.


जनता अपने हिसाब से जवाब भी देती है और सबक भी सिखाती है, इसका ध्यान सबको रखना होगा. अतीत से सीखना भी होगा, जब जनता ने बड़े-बड़े नेताओं को खारिज कर दिया, उनको धूल चटा दी. काश इतिहास से सबक लेते वो लोग जिनका मकसद सदन में सिर्फ हंगामा खड़ा करना है, सार्थक बदलाव लाना नहीं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रजेश कुमार सिंह

ब्रजेश कुमार सिंहGroup Consulting Editor

लेखक नेटवर्क18 समूह में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से 1995-96 में पत्रकारिता की ट्रेनिंग, बाद में मास कम्युनिकेशन में पीएचडी. अमर उजाला समूह, आजतक, स्टार न्यूज़, एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ में काम करने के बाद अप्रैल 2019 से नेटवर्क18 के साथ. इतिहास और राजनीति में गहरी रुचि रखने वाले पत्रकार, समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन, दो दशक तक देश-विदेश में रिपोर्टिंग का अनुभव.

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First published: September 21, 2020, 6:15 PM IST
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