कश्मीर की वादियों में लाखों लोग थामे हैं तिरंगा, नजर आ रहा है न महबूबा!

जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 की समाप्ति के तीन साल बाद जब देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, कश्मीर की वादियों में भी ‘हर घर तिरंगा’ अभियान को वैसा ही उत्साहजनक समर्थन मिल रहा है, जैसा देश के दूसरे हिस्सों में. क्या युवा, क्या बुजुर्ग, क्या बच्चे और क्या महिलाएं, तिरंगा थामे लोगों की तस्वीरें कश्मीर के हर इलाके से आ रही है. ये तस्वीरें महबूबा मुफ्ती जैसी उन अलगाववादी नेताओं के मुंह पर तमाचा है, जिन्होंने कभी अहंकारी ढंग से कहा था कि अगर आर्टिकल 370 खत्म हुआ, तो भारत का झंडा कश्मीर घाटी में थामने वाला कोई नहीं मिलेगा.

Source: News18Hindi Last updated on: August 13, 2022, 7:34 pm IST
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कश्मीर की वादियों में लाखों लोग थामे हैं तिरंगा, नजर आ रहा है न महबूबा!
कश्‍मीर में हर घर तिरंगा अभियान की सफलता केंद्र की नीतियों के प्रति यहां के लोगों के भरोसे का प्रमाण है.

देशभर में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान अपने उफान पर पहुंच गया है. भारत की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने का समारोह तो दो दिन बाद 15 अगस्त को मनेगा, लेकिन चारों तरफ तिरंगा ही तिरंगा ही दिख रहा है. घर से लेकर सड़क तक, ऑफिस से लेकर मॉल तक, बाजार से लेकर अस्पताल तक, लोगों ने पीएम नरेंद्र मोदी के हर घर तिरंगा अभियान को पूर्ण समर्थन दिया है. महिलाएं, बच्चे, युवा सब झुंड में खड़े होकर तिरंगा लहरा रहे हैं, तिरंगे के साथ सेल्फी पोस्ट कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर अपनी डीपी में खुद के चेहरे की जगह तिरंगा लगा रहे हैं. तिरंगे का बुखार चरम पर है.


कश्मीर में ‘हर घर तिरंगा अभियान’ उफान पर

सबसे सुखद है जम्मू- कश्मीर से आने वाली तस्वीरों और वीडियो को देखना. जम्मू के इलाके तो ठीक, लेकिन जिस कश्मीर घाटी में कभी भारतीय तिरंगे में सरेआम आग लगाई जाती थी, वहां क्या गांव और क्या शहर, हर जगह तिरंगा लहरा रहा है. हर घर तिरंगा अभियान को कश्मीर घाटी की जनता ने पूरी तबीयत से अपना लिया है. चाहे श्रीनगर की मशहूर डल झील में निकाली गई शिकारों की तिरंगा रैली हो या फिर बांदीपोरा, अनंतनाग, कुपवाड़ा या त्राल, घाटी में हर जगह, भारत की आजादी के 75वें वर्ष के समारोह की जोरदार तैयारी चल रही है. कहीं तिरंगे के साथ प्रभात फेरी निकाली जा रही है, तो कहीं तिरंगे को सलामी देते हुए ‘कौमी तराना’ गाया जा रहा है. कौमी तराना गायन के मुकाबले आयोजित किये जा रहे हैं, जिसमें स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थी उत्साह के साथ भाग ले रहे हैं.



कश्‍मीर घाटी में तिरंगा यात्रा



महिलाएं तिरंगा लेकर सड़कों पर

कश्मीर की वादियों में राष्ट्रगान को कौमी तराना कहा जाता है. चाहे स्कूलों में पढ़ने वाली बच्चियां हो, या फिर बुर्कानशीन औरतें, सबके हाथ में तिरंगा है. बड़े उत्साह के साथ सड़कों पर ये तिरंगा रैली में शामिल हो रही हैं, भारत का राष्ट्रीय झंडा अपने हाथों में थामे हुए कौमी तराना गा रही हैं.


अलगाववादियों के गढ़ रहे कश्मीर यूनिवर्सिटी में भी लहरा रहा है तिरंगा

जिस कश्मीर यूनिवर्सिटी में कभी अलगाववादियों का बोलबाला था, जहां भारत का तिरंगा नहीं लहरा पाता था, जहां के शिक्षकों का एक बड़ा समूह पढ़ाई कम, अलगाववादी-आतंकवादी गतिविधियों में शामिल रहा करता था, वहां भी भारत का तिरंगा लहरा रहा है. कौमी तराना गाया जा रहा है. ऐसे लोगों की तादाद बड़ी थी, जो दो साल पहले तक भारत के राष्ट्रगान को बड़ी मुश्किल से गा पाते थे या फिर याद रख पाते थे, आज पूरे तरन्नुम के साथ गा रहे हैं.



कश्‍मीर में महिलाओं ने भी थामा तिरंगा



महबूबा मुफ्ती ने दी थी तिरंगा के बहिष्कार की धमकी

कश्मीर के लिए ये एक बड़ा बदलाव है. पांच साल पहले जब आर्टिकल 370 की समाप्ति को लेकर अटकलें लग रही थीं, महबूबा मुफ्ती का अत्यंत गैरजिम्मेदाराना बयान आया था. 29 जुलाई 2017 को महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि अगर आर्टिकल 370 हटा तो कश्मीर घाटी में कोई भारत का झंडा थामने वाला नहीं मिलेगा. जिस समय महबूबा ने ये बयान दिया था, उस वक्त वो जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री थीं. ध्यान रहे कि ये बयान उस महबूबा का था, जिनके पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बनने से पहले केंद्रीय गृह मंत्री भी रह चुके थे. महबूबा का ये बयान शर्मनाक था. उससे भी शर्मनाक तब, जब महबूबा ने आर्टिकल 370 की समाप्ति के सवा साल बाद अक्टूबर 2020 में बयान दिया कि जब तक जम्मू-कश्मीर में वापस आर्टिकल 370 नहीं लग जाता, वो तिरंगा नहीं फहराएंगी.



महबूबा को अब भी अपने बयान पर शर्म नहीं

हुर्रियत का खेल खत्म हो जाने के बाद खुद को कश्मीर में अलगाववाद की सबसे बड़ी झंडाबरदार के तौर पर पेश करने में लगीं महबूबा को अपने बयानों पर शायद दो साल बाद भी शर्म न आए. हालांकि सामान्य तौर पर कोई भी पढ़ा-लिखा आदमी शर्म कर लेता. जिस भारतीय संविधान के तहत शपथ लेकर वो राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुई थीं, उसी संविधान के अनिवार्य हिस्से और प्रतीक तिरंगे के बारे में इस तरह का भड़काऊ बयान कैसे दे सकती थीं महबूबा.


महबूबा को मुंह चिढ़ा रही है कश्मीर की जनता

लेकिन अब कश्मीर की जनता ही महबूबा को ठेंगा दिखा रही है, उनको उनकी औकात बता रही है, देश के प्रति अपनी भावना, राष्ट्रगान और तिरंगे के प्रति सम्मान को दर्शाते हुए. जिस हुर्रियत की जगह लेने को बेचैन हैं महबूबा और जिस हुर्रियत के कार्यालय में बैठकर कभी कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश रची जाती थी, उसके गेट पर भी भारत का तिरंगा टंगे होने वाली तस्वीर देश और दुनिया ने वायरल होते हुए देखी, महबूबा ने भी देखी होगी.



कश्‍मीर में तिरंगे के प्रति सम्‍मान



दुनिया भी देख रही है तिरंगामय कश्मीर को

आर्टिकल 370 की समाप्ति के जब तीन साल पूरे हो चुके हैं और भारत के अभिन्न हिस्से के तौर पर कश्‍मीर आजादी के अमृत महोत्सव को पूरी शिद्दत के साथ मना रहा है, दुनिया के लिए कश्मीर से आने वाली तस्वीरें हैरान करने वाली होगी, जो ज्यादातर समय कश्मीर के हालात को पाकिस्तानी चश्मे से देखने का अभ्यस्त रही हैं. हाथ में तिरंगा लेकर सड़कों पर चले रहे कश्मीर के लोग दुनिया को भी अपना नजरिया बदल लेने की मानो सलाह दे रहे हैं.


कश्मीर के युवा हो रहे हैं मुख्यधारा में शामिल

कश्मीर के युवा अलगाववाद की राह छोड़कर मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं. पिछले दो साल में कश्मीर के युवाओं की मानसिकता में बड़ा बदलाव आया है. वो रोजगार, खुशहाली और बेहतर कल के बारे में सोच रहे हैं, न कि पाक प्रायोजित आतंकवाद की राह पकड़ने के बारे में. जो इक्का-दुक्का अब भी भटक रहे हैं, उनके लिए अब हालात आसान नहीं रह गये हैं. जिस डल झील पर नब्बे के दशक में सैकड़ों की तादाद में आतंकवादी हथियार लेकर घूमते नजर आते थे, वहां आज देश और दुनिया भर से आए सैलानी नजर आते हैं, स्थानीय युवा मस्ती करते दिखते हैं.

विकास की बयार, आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस

ऐसा हुआ है केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की नीति के कारण, जिसे बड़े ही प्रभावी ढंग से पिछले दो साल से लागू करने में लगे हैं जम्मू- कश्मीर के संवैधानिक-प्रशासनिक प्रमुख के तौर पर लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा. अगर इस नीति को समझना हो, तो आज ही कश्मीर घाटी से आई कुछ खबरें उसकी झलक दे जाती हैं. सिन्हा ने एक तरफ जहां खुद श्रीनगर के राजभवन में कर्मचारियों को तिरंगा बांटकर हर घर तिरंगा अभियान को व्यापक बनाने की कोशिश की, वहीं आजादी के अमृत महोत्सव के तहत 25 डीडीसी और बीडीसी भवनों के लिए शिलान्यास किया, साथ ही पूरे जम्मू- कश्मीर में विकसित किये गये एक हजार अमृत सरोवरों का उद्घाटन भी. यही नहीं, ग्रामीण रोजगार और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 75 ‘होम स्टे’ लांच किये, भारत की आजादी के 75 साल के साथ ताल बिठाते हुए.


आतंकी और उनके समर्थक हो रहे हैं सिस्टम से बाहर

विकास से जुड़ी इन तमाम योजनाओं वाली खबरों के बीच एक और बड़ी खबर आई, जो प्रशासन के दूसरे पहलू की झलक देती है. विकास की बहार लाने की कोशिश, लेकिन आतंकवाद के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति. इसी का प्रदर्शन एक साथ उन चार सरकारी अधिकारियों की बर्खास्तगी की घोषणा के साथ हुआ, जिनके तार आतंकवाद से जुड़े हैं. इनमें से एक असाबा अर्जूमंद खान भी है, जो फारुख अहमद डार उर्फ बिटट् कराटे की बीबी के तौर पर भी मशहूर है, वो बिट्टा कराटे, जिसकी दरिंदगी और वहशीपन की कहानी देश भर के लोगों ने कश्मीर फाइल्स फिल्म के जरिये जानी.



आतंकी बिट्टा कराटे की बीबी हुई सरकारी सेवा से बर्खास्त

वर्ष 2011 में जम्मू-कश्मीर एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस में चयनित होकर बिट्टा कराटे से शादी करने वाली असाबा की अलगाववादी-आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने की कहानी काफी पुरानी है. धांधली और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से 2003 में शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रिकल्चर साइंस और टेक्नोलॉजी में नौकरी पा जाने वाली असाबा 2007 तक सरकारी सेवा में बनी रही, वो भी लंबे समय तक ड्यूटी से गायब रहने के बावजूद. इस दौरान वो अलगाववादी गतिविधियों में जमकर सक्रिय रही.


असाबा आतंकियों के लिए करती थी फंड कलेक्शन का काम

जर्मनी, यूके, श्रीलंका और थाइलैंड जैसे देशों में वो आतंकी संगठन जेकेएलएफ के लिए फंड जुटाती रही. जांच के बाद 2007 में वो बर्खास्त हुई, लेकिन चार साल बाद ही वो फिर से जेकेएएस की परीक्षा क्लीयर कर 2011 में सरकारी अधिकारी बन गई. असाबा की गतिविधियों की जांच कर आखिरकार लेफ्टिनेंट गवर्नर सिन्हा ने उसे आज सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया.



सैयद सलाउद्दीन और उसका बेटा अब्‍दुल मुईद



आतंकियों के तीन और समर्थक हुए सरकारी सेवा से बर्खास्त

असाबा के साथ जो बाकी तीन और सरकारी अधिकारी बर्खास्त हुए हैं, उनमें से दो तो कश्मीर यूनिवर्सिटी में काम करने वाले वैज्ञानिक और शिक्षक, मुहीत अहमद भट और माजिद हसन कादरी हैं, जबकि चौथा सैय्यद अब्दुल मुईद है, जो जम्मू-कश्मीर उद्यमी विकास संस्थान में मैनेजर के तौर पर काम कर रहा था. असाबा की तरह इन तीनों पर भी आतंकवादी- अलगाववादी गतिविधियों में शामिल रहने या फिर आतंकवादियों की मदद करने का आरोप है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311 का इस्तेमाल करते हुए लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा ने इनको बर्खास्त किया. सैयद सलाउद्दीन के बेटे अब्‍दुल मुईद को भी बर्खास्‍त किया गया है.



लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा



सिस्टम को ‘क्लीन’ करने का तेजी से चल रहा है काम

जम्मू-कश्मीर प्रशासन के अंदर घुसे आतंकवादियों या फिर आतंकी समर्थकों की तादाद काफी बड़ी है, जो पिछले चार दशक में राजनीतिक दलों और आतंकवादियों से सहानुभूति रखने वाले सरकारी अधिकारियों की सरपरस्ती में सिस्टम के अंदर घुसे हैं. मनोज सिन्हा की अगुआई में राज्य प्रशासन ऐसे दागी अधिकारियों और कर्मचारियों को एक-एक कर जांच के बाद बाहर निकाल रहा है. सिस्टम को क्लीन करने में समय लगेगा, लेकिन सिन्हा इस अभियान को पूरा करने में काफी गंभीर दिख रहे हैं.


दो साल में बदल गई है कश्मीर की फ़िज़ा

आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस और विकास को लेकर गंभीरता, यही वो दो कारण हैं, जिनकी वजह से कश्मीर का माहौल बदला है. जनता ने भ्रष्ट नेताओं के अपने स्वार्थ के कारण बढ़े आतंकवाद और भ्रष्टाचार का दंश झेला है और जब आर्टिकल 370 की समाप्ति के बाद इनसे मुक्ति मिली है और विकास कार्य तेजी से हुए हैं, लोगों को फर्क साफ दिख रहा है. इसलिए वो अब अलगाववाद के नारे पर ध्यान देने की जगह या फिर पत्थरबाजी में शामिल होने की जगह शांति और विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं, भारत का तिरंगा थामे.



बेखौफ थाम रहे हैं लोग घाटी में तिरंगा

अलगाववाद को जन्म देने वाले जम्मू-कश्मीर के अलग झंडे का इस्तेमाल बंद होने और हर जगह तिरंगा फहराने के बाद का फर्क भी घाटी के लोगों ने देख लिया है. यही वजह है कि कश्मीर में हरि पर्वत की चोटी से लेकर डल झील तक, गांव से लेकर शहर तक तिरंगा ही तिरंगा है. न तो कश्मीर के लोगों को आतंकवादियों का डर सता रहा है और न ही जाहिल किस्म के नेताओं के बयान का इन पर कोई असर है. हर घर तिरंगा शबाब पर है, जो परवान चढ़ेगा 15 अगस्त को, जब सिर्फ श्रीनगर ही नहीं, गांवों और गलियों में भी हजारों की तादाद में लोग झंडा फहराएंगे और कौमी तराना गाएंगे. आखिर गाएं भी क्यों नहीं, तिरंगे के साये में रहने से इनके जीवन में बदलाव जो आया है.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
ब्रजेश कुमार सिंह

ब्रजेश कुमार सिंह

लेखक नेटवर्क18 समूह में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से 1995-96 में पत्रकारिता की ट्रेनिंग, बाद में मास कम्युनिकेशन में पीएचडी. अमर उजाला समूह, आजतक, स्टार न्यूज़, एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ में काम करने के बाद अप्रैल 2019 से नेटवर्क18 के साथ. इतिहास और राजनीति में गहरी रुचि रखने वाले पत्रकार, समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन, दो दशक तक देश-विदेश में रिपोर्टिंग का अनुभव.

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First published: August 13, 2022, 7:34 pm IST