Opinion: कमलनाथ के गढ़ छिंदवाड़ा में सिंधिया के चेहरे से भाजपा को होगा लाभ..!

MP Politics: भाजपा ने कमलनाथ को घेरने की रणनीति ऐसे वक्त में तैयार की है, जब वे कांगे्रस की राष्ट्रीय राजनीति के सर्वोच्च पद तक पहुंचने की कवायद में लगे हुए हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: July 28, 2021, 11:07 pm IST
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Opinion: कमलनाथ के गढ़ छिंदवाड़ा में सिंधिया के चेहरे से भाजपा को होगा लाभ..!
मध्य प्रदेश में भाजपा सिंधिया के चेहरे से छिंदवाड़ा में कमलनाथ को घेरने की तैयारी में है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ का गढ़ माने जाने वाले छिंदवाड़ा के दौरे पर जा रहे हैं. छिंदवाड़ा लोकसभा की अकेली सीट ऐसी थी, जो चुनाव में भाजपा नहीं जीत पाई. कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ सांसद है. सिंधिया कांग्रेस में जब तक रहे हैं छिंदवाड़ा से दूरी बना कर रहे. कमलनाथ भी सिंधिया के गढ़ में जाने से बचते रहे. अब दोनों नेता आमने सामने आ रहे हैं. सिंधिया को कांग्रेस कमलनाथ के कारण ही छोड़ना पड़ी थी. भारतीय जनता पार्टी की रणनीति सिंधिया के जरिए छिंदवाड़ा को जीतने की है. सिंधिया के लिए छिंदवाड़ा की चुनौती आसान नहीं है. भाजपा ने कमलनाथ को घेरने की रणनीति ऐसे वक्त में तैयार की है, जब वे कांगे्रस की राष्ट्रीय राजनीति के सर्वोच्च पद तक पहुंचने की कवायद में लगे हुए हैं.


छिंदवाड़ा यात्रा से बदलेगी राजनीति?

माना यह जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर नए सिरे से छिंदवाड़ा की रणनीति पर काम कर रही है. केन्द्रीय नागरिक विमानन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया इस रणनीति के केंद्र में हैं. पहले पार्टी ने राज्यसभा सदस्य के तौर पर प्रकाश जावड़ेकर को छिंदवाड़ा की जिम्मेदारी दी थी. अब सिंधिया छिंदवाड़ा में सक्रिय हो रहे हैं। सिंधिया को भी अब छिंदवाड़ा को लेकर कोई झिझक नहीं है. वे पार्टी की रणनीति के अनुसार अपना हर कदम उठा रहे हैं. भाजपा नेता पंकज चतुर्वेदी कहते हैं कि सिंधिया का छिंदवाड़ा दौरा संगठन स्तर से तय किया गया है. सिंधिया के छिंदवाड़ा में सक्रिय होने से प्रदेश की राजनीति में कई दिलचस्प बदलाव देखने को मिल सकते हैं. मसलन पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भी ग्वालियर-चंबल संभाग में अपना दबाव बढ़ाने की कोशिश करेंगे.


सिंधिया के रास्ते में अड़चन बने रहे कमलनाथ

मध्यप्रदेश कांगे्रस की राजनीति में कमलनाथ और सिंधिया की पहचान दो अलग-अलग क्षत्रपों के रूप में रही है. कमलनाथ गांधी परिवार के नजदीकी माने जाते रहे हैं. उनका झुकाव पहले अर्जुन सिंह और फिर दिग्विजय सिंह के पक्ष में रहा. माधवराव सिंधिया को जब भी मुख्यमंत्री बनाए जाने की बात आई विरोध कमलनाथ की ओर से भी हुआ. कमलनाथ के कारण ही ज्योतिरादित्य सिंधिया वर्ष 2018 में राज्य के मुख्यमंत्री नहीं बन पाए. जबकि वे तत्कालीन कांगे्रस अध्यक्ष राहुल गांधी के सबसे करीबी नेता माने जाते थे. राहुल गांधी की ओर सिंधिया को सिर्फ धैर्य रखने की सलाह मिली थी.


कमलनाथ के गढ़ से दूर रहे सिंधिया

ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीति के केंद्र में हमेशा ही ग्वालियर-चंबल के अलावा मालवा-मध्य भारत का इलाका रहा है. महाकौशल और विंध्य तक अपनी राजनीति को विस्तार देने की कोशिश सिंधिया परिवार ने नहीं की. ज्योतिरादित्य सिंधिया, पिता माधवराव सिंधिया के निधन के बाद वर्ष 2002 में सक्रिय राजनीति में आए थे. तब से अब तक सिर्फ दो बार ही वे छिंदवाड़ा गए. पहली बार वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव से पहले कमलनाथ के निमंत्रण पर गए थे. चुनावी शंखनाद की सभा थी. प्रदेश के सभी बड़े नेता इस कार्यक्रम में एक मंच पर थे. सिंधिया वर्ष 2013 में ऊर्जा मंत्री रहते हुए दूसरी बार छिंदवाड़ा गए थे. यह यात्रा केवल एयर स्ट्रिप के उपयोग तक सीमित थी. सिंधिया यहां से सड़क मार्ग से नरसिंहपुर चले गए थे.


कमलनाथ के विरोधियों को सिंधिया का सहारा

सिंधिया का छिंदवाड़ा दौरा 18 अगस्त को होना है. छिंदवाड़ा यात्रा की अधिकृत जानकारी प्रदेश भाजपा कार्यालय की ओर से जारी कर दी गई है. बताया जाता है कि सिंधिया की छिंदवाड़ा यात्रा की रणनीति पूर्व विधायक अजय चौरे ने तैयार की है. चौरे भी कांगे्रस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं. चौरे का परिवार पुराना कांग्रेसी परिवार है. छिंदवाड़ा में कमलनाथ का विरोध कर राजनीति करना मुश्किल है. यही कारण है कि चौरे ने कांगे्रस छोड़ी. सिंधिया की कोशिश छिंदवाड़ा में कमलनाथ विरोधियों को एक मंच पर लाने की है. भारतीय जनता पार्टी की रणनीति कांटे से कांटा निकालने की है. छिंदवाड़ा में कमलनाथ की राजनीतिक विरासत नकुल नाथ को संभालना है.


नकुल नाथ ने वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव मामूली अंतर से जीता था. वह भी तब जब पिता कमलनाथ राज्य के मुख्यमंत्री थे. कमलनाथ ने चुनाव में जो मदद नकुल नाथ की,वह मदद ज्योतिरादित्य सिंधिया की नहीं की. उलट सिंधिया विरोधियों को मदद पहुंचाई. लोकसभा चुनाव के बाद से ही कमलनाथ और सिंधिया के बीच दूरी बढ़ती गई. नतीजा यह हुआ कि कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांगे्रस सरकार गिर गई. भारतीय जनता पार्टी की सत्ता में वापसी हुई. कांगे्रस प्रवक्ता जेपी धनोपिया कहते हैं कि छिंदवाड़ा की जनता को इस बात का दुख है कि वह मुख्यमंत्री विहीन हो गई.


छिंदवाड़ा में मराठी भाषा सिंधिया के लिए बनेगी मददगार

मराठी भाषा पर ज्योतिरादित्य सिंधिया की अच्छी पकड़ है. महाराष्ट्र की सीमाएं छिंदवाड़ा से लगी हुई हैं. छिंदवाड़ा में व्यापार भी नागपुर के बाजार से चलता है. मराठी भाषा काफी प्रचलन में है. आदिवासी इलाका है. भाजपा ने लोकसभा चुनाव में नकुल नाथ के खिलाफ अपना उम्मीदवार आदिवासी वर्ग के नाथन शाह को मैदान में उतारा थ. सिंधिया के छिंदवाड़ा में सक्रिय होने से भाजपा को नकुल नाथ की राजनीति पर लगाम कसने में आसानी होगी. नकुल नाथ की तुलना में सिंधिया का चेहरा लोकप्रिय है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
दिनेश गुप्ता

दिनेश गुप्ता

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.

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First published: July 28, 2021, 11:07 pm IST
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