कमजोर कांग्रेस पर जितिन प्रसाद की चोट से प्रियंका का नेतृत्व बना निशाना

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का रवैया पार्टी के युवा नेताओं की परेशानी की बड़ी वजह रहा है. राहुल गांधी के कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा और जितिन प्रसाद का कांग्रेस में भविष्य हमेशा सवालों के घेरे में रहा है

Source: News18 Madhya Pradesh Last updated on: June 9, 2021, 5:06 PM IST
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कमजोर कांग्रेस पर जितिन प्रसाद की चोट से प्रियंका का नेतृत्व बना निशाना
बीजेपी में शामिल हुए जितिन प्रसाद कांग्रेस के g 23 नेताओं में शामिल थे.
जितिन प्रसाद के दलबदल के जरिए भारतीय जनता पार्टी ने एक तीर से कई निशाने साध लिए हैं. अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होना है. भारतीय जनता पार्टी जितिन प्रसाद के जरिए एक तरफ ब्राह्मणों को साधना चाहती है, यह एक अकेला कारण नहीं है. भाजपा के पास कई ब्राह्मण चेहरे पहले से ही हैं. भाजपा ने जितिन प्रसाद के जरिए प्रियंका गांधी के यूपी मिशन को भी कमजोर किया है. कांग्रेस नेतृत्व की राजनीतिक रणनीति से जितिन प्रसाद की नाइत्तफाकी रही है. जितिन प्रसाद जी 23 के सदस्य रहे हैं.

जितिन की मजबूत पारिवारिक पृष्ठभूमि
ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद में कुछ समानताएं हैं. सिंधिया की तरह ही जितिन प्रसाद के पिता जितेन्द्र प्रसाद कांग्रेस के मजबूत नेता रहे हैं. सिंधिया अपने पिता माधवराव सिंधिया के निधन के बाद वर्ष 2002 में पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए थे. जितिन प्रसाद वर्ष 2004 में सांसद बने. इससे पहले वे युवक कांग्रेस में सचिव के तौर पर राजनीति शुरू कर चुके थे. उत्तर प्रदेश की जातीय राजनीति में जितिन प्रसाद ने अपने आपको ब्राह्मण नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है. पिछले दिनों जितिन प्रसाद ने जब परशुराम जयंती पर बधाई का ट्वीट किया तो कांग्रेस पार्टी में उनके विरोधियों ने आपत्ति भी की. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस दलित और अल्पसंख्यक वोट बैंक पर फोकस कर रही है. कांग्रेस में जितिन प्रसाद का विरोध उस वक्त से तेज हुआ है, जब उनका नाम जी 23 के सदस्य के तौर पर सामने आया. ज्ञातव्य है कांग्रेस के 23 नेताओं ने सोनिया गांधी को एक पत्र लिखकर पार्टी को नया नेतृत्व देने की मांग की थी. इस मांग के बाद जितिन प्रसाद के खिलाफ उनके ही गढ़ शाहजहांपुर लखीमपुर की कांग्रेस कमेटियों ने प्रस्ताव पारित किए. पार्टी से निकालने की मांग भी की. जितिन प्रसाद राजनीति में आने से पहले प्राइवेट सेक्टर में काम करते थे. वो कांग्रेस के उन गिने-चुने नेताओं में रहे हैं, जिन्हें पहली बार सांसद बनने के बाद ही केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिल गई थी. वे पहली बार वर्ष 2008 में इस्पात राज्य मंत्री बने. सिंधिया की तरह ही जितिन प्रसाद को गांधी परिवार के करीबी नेताओं में माना जाता है. यद्यपि उनके पिता जितेन्द्र प्रसाद की गांधी परिवार से दूरी पी व्ही नरसिंह राव के कार्यकाल में देखी गई थी.

प्रियंका गांधी के लिए मुश्किल भरा होगा मिशन उत्तर प्रदेश
पिछले लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी ने प्रियंका गांधी के चेहरे का प्रयोग उत्तर प्रदेश में किया था. प्रियंका गांधी के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी महासचिव के तौर पर उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई थी. लेकिन, प्रियंका गांधी का चेहरा कोई करिश्मा लोकसभा चुनाव में नहीं दिखा पाया. उनका साथ सिंधिया के लिए भी चुनाव में नुकसान का बड़ा कारण बना. जितिन प्रसाद के पार्टी छोड़ने के बाद प्रियंका गांधी के लिए कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जोड़कर रखना किसी चुनौती से कम नहीं होगा. उत्तर प्रदेश में पार्टी पहले ही अपने जनाधार को खो चुकी है. प्रियंका गांधी गुटबाजी को भी समाप्त नहीं कर पाई हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अगले साल होना हैं. लोकसभा चुनाव की हार के बाद से प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं.

जितिन प्रसाद के संकेतों को नहीं समझ सकी कांग्रेस
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का रवैया पार्टी के युवा नेताओं की परेशानी की बड़ी वजह रहा है. राहुल गांधी के कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा और जितिन प्रसाद का कांग्रेस में भविष्य हमेशा सवालों के घेरे में रहा है. सिंधिया के पार्टी छोड़ने से यह बात स्थापित हुई कि पुत्र मोह के कारण सोनिया गांधी कांग्रेस में उजले चेहरे वाली नई पीढ़ी को आगे नहीं आने देना चाहतीं. सचिन पायलट की नाराजगी को भी कांग्रेस नेतृत्व अब तक दूर नहीं कर सका. पायलट की मंत्रिमंडल में भी वापसी नहीं हो पाई है. उनके भाजपा में शामिल होने की चर्चाएं लगातार बनी रहती हैं. चर्चा यह भी है कि वसुंधरा राजे सिंधिया की सहमति के इंतजार में पायलट का मामला लटका हुआ है. उत्तर भारत में कांग्रेस का भविष्य युवा चेहरों पर ही टिका हुआ था. भारतीय जनता पार्टी ने इन चेहरों को अपने पाले में लाकर अगले लोकसभा चुनाव के लिए अपनी जमीन और मजबूत कर ली. जितिन प्रसाद पार्टी छोड़ने के संकेत लगातार दे रहे थे. अप्रैल में अपने फेसबुक पेज पर शंखनाद करते दिखाई दिए. उन्होंने पोस्ट में लिखा था कि प्राचीन काल से लेकर महाभारत काल तक...और तब से लेकर अब तक, शंखनाद प्रतीक रहा है नूतन व सकारात्मक सृजन का.बंगाल की रणनीति से विचलित हुए थे जितिन प्रसाद
जितिन प्रसाद पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के प्रभारी थे. लेकिन,उन्होंने यह नहीं पता था कि इस राज्य में पार्टी की नीति क्या है? पार्टी वामपंथियों के साथ है या ममता बनर्जी का सहयोग भाजपा के खिलाफ कर रही है. सोनिया गांधी और राहुल गांधी का भरोसा जितिन प्रसाद से ज्यादा अधीर रंजन चौधरी पर देखने को मिला था. पार्टी ने वाम दलों के उस निर्णय का भी विरोध नहीं किया, जिसमें उन्होंने इंडियन सेक्यूलर फ्रंट को सीटों में हिस्सेदार बनाया था. जितिन प्रसाद ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में भी कहा था कि पार्टी उचित रणनीति न होने के कारण हारी. जितिन प्रसाद के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद कांग्रेस नेतृत्व को हिंदी पट्टी में नुकसान की भरपाई आसान नहीं होगी. (डिस्क्लेमेयर-ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
दिनेश गुप्ता

दिनेश गुप्ता

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.

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First published: June 9, 2021, 3:59 PM IST
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