छत्तीसगढ़, पंजाब से लेकर त्रिपुरा तक, क्या है कांग्रेस की परेशानी की वजह

मध्यप्रदेश से लेकर पंजाब तक कांग्रेस नेतृत्व का रवैया पार्टी की टूट अथवा विवाद का बड़ा कारण बना है. कांग्रेस पार्टी के उम्रदराज क्षत्रप भी नेतृत्व की परेशानी बढ़ाने वाले काम कर रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: August 27, 2021, 5:51 PM IST
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छत्तीसगढ़, पंजाब से लेकर त्रिपुरा तक, क्या है कांग्रेस की परेशानी की वजह

आखिर कांग्रेस पार्टी का मर्ज क्या है? यह सवाल कई कारणों से महत्वपूर्ण हो जाता है. जिन राज्यों में क्षेत्रीय दलों का भाजपा से सीधा टकराव हो रहा है, वहां कांग्रेस नेतृत्व का रवैया विपक्षी एकता की राह में रुकावट बन रहा है. वहीं, कांग्रेस अपने हाथ की सत्ता भी लगातार गंवाती चली जा रही है. मध्यप्रदेश से लेकर पंजाब तक कांग्रेस नेतृत्व का रवैया पार्टी की टूट अथवा विवाद का बड़ा कारण बना है. कांग्रेस पार्टी के उम्रदराज क्षत्रप भी नेतृत्व की परेशानी बढ़ाने वाले काम कर रहे हैं.


इंदिरा गांधी की हत्या के बाद से लगातार कमजोर हो रही कांग्रेस

पार्टी में गुटबाजी और विवाद हर दौर में देखने में आए हैं. कांग्रेस में टूट भी हुई. आखिरी बड़ी टूट के बाद जो कांग्रेस सामने है, वह इंदिरा गांधी के वफादारों की कांग्रेस मानी जाती रही है. आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी ने पार्टी में उनके विरोधियों के मुंह बंद कर दिए थे. इससे पहले, कांग्रेस के विभाजन का घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा करने लगा था कि कांग्रेस पार्टी के महत्वपूर्ण फैसले इंदिरा गांधी अकेले लेना चाहती थीं. यह कई मौकों पर सामने भी आया था.



अस्सी के शुरूआती दशक में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी का स्वर्णिम काल भी माना जा सकता है. उत्तर-दक्षिण की राजनीति में कोई बड़ी चुनौती कांग्रेस पार्टी के सामने नहीं आई. इंदिरा गांधी अपने समकालीन नेताओं को साधती थीं, और उनके पुत्र संजय गांधी युवा बिग्रेड के नेता थे. नब्बे के दशक तक कांग्रेस पार्टी के भीतर हर राज्य में एक से अधिक ऐसे कद्दावर नेता थे, जो चुनाव नतीजों को प्रभावित रखने की क्षमता रखते थे. नारायण दत्त तिवारी, विश्वनाथ प्रताप सिंह उत्तर प्रदेश में कई साल महत्वपूर्ण चेहरा रहे.


दक्षिण के हर राज्य में भी यही स्थिति थी. मौजूदा दौर में अविभाजित आंध्र प्रदेश के वजनदार नेता वी हनुमंत राव भी कांग्रेस की स्थिति पर चिंतित हैं. तेलंगाना अब उनकी राजनीति के केंद्र में हैं. तेलंगाना कांग्रेस में अन्य दलों से आए नेताओं का प्रभाव बढ़ने से राव चिंतित हैं. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को हाल ही में उन्होंने एक पत्र भी लिखा है.


राजीव गांधी के दौर में बने कई शक्ति केंद्र

संजय गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी का राजनीति में प्रवेश हुआ. लेकिन, वे संजय गांधी का विकल्प नहीं बन पाए. 1984 के लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत के बाद भी राजीव गांधी पार्टी में असंतोष को नहीं थाम पाए थे. उनकी सरकार गिराने की कोशिश भी असंतुष्टों ने की थी. इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस पार्टी का पतन तेजी से हुआ. अधिकांश राज्यों की सत्ता कांग्रेस के हाथ से निकलकर क्षेत्रीय दलों के हाथों में जाने लगी थी. कांग्रेस का नेतृत्व जमीनी राजनीति से भी दूर होता दिखा.


राजीव गांधी की हत्या के बाद क्षत्रपों की महत्वाकांक्षाओं ने नए नेतृत्व को उभरने भी नहीं दिया. इस दौरान मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह सबसे ताकतवर नेता माने जाते थे. उनके नेतृत्व में ही सोनिया गांधी को सक्रिय राजनीति में लाने की मुहिम चलाई गई थी. उन दिनों प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पीवी नरसिंहराव और सीताराम केसरी अध्यक्ष थे. राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री एवं कांग्रेस अध्यक्ष थे, तब अर्जुन सिंह पार्टी के उपाध्यक्ष थे. राजीव गांधी की हत्या के बाद अर्जुन सिंह प्रधानमंत्री पद के मजबूत दावेदार के तौर पर उभरे थे.


अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने की घटना के मामले में अर्जुन सिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव सरकार की नीयत पर भी सवाल उठाए थे. घटना पर मुस्लिम समुदाय से माफी मांगने की मांग भी अर्जुन सिंह की ओर से उठाई गई.


गैर राजनीतिक प्रधानमंत्री से सुरक्षित रहा दबदबा

सोनिया गांधी के नेतृत्व में वर्ष 2004 में लगभग आठ साल बाद कांग्रेस सरकार में लौटी थी. सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं बनीं. डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने. हालांकि, इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि यूपीए-एक और यूपीए-दो की सरकार पर्दे के पीछे सोनिया गांधी चलाती थीं. डॉ मनमोहन सिंह अर्थशास्त्री हैं. राजनीति से उनका कोई वास्ता नहीं रहा. इस कारण पार्टी को जो राजनीतिक लाभ सरकार से मिलना चाहिए वह नहीं मिला.


राहुल गांधी के राजनीति में प्रवेश करने के बाद कांग्रेस पार्टी के भीतर बड़े परिवर्तन की जो उम्मीद बनी थी, वह उनके रवैये के कारण रोज नए विवादों को जन्म देती रही. आंध्र प्रदेश में जगन रेड्डी को लेकर जो रवैया नेतृत्व का रहा, वह अब में हिंदी पट्टी में भी देखने को मिल रहा है


कांग्रेस की मजबूती चिंता का विषय नहीं





राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष नहीं हैं. लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. सोनिया गांधी पार्टी की कार्यवाहक अध्यक्ष हैं. लेकिन, राहुल गांधी पहले की तरह फैसले ले रहे हैं. पार्टी में प्रियंका गांधी भी सत्ता का एक केंद्र बनती जा रही हैं. कांग्रेस के युवा चेहरों में असंतोष की वजह भी नेतृत्व का उपेक्षापूर्ण रवैया है. ऐसा माना जा रहा है कि इंदिरा गांधी की तरह सोनिया-राहुल पार्टी पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए राज्यों में गुटबाजी को बढ़ावा दे रहे हैं. लेकिन, संतुलन नहीं बना पा रहे, इस कारण सरकारें भी जा रही हैं और नेता भी पार्टी छोड़कर जा रहे हैं.



त्रिपुरा से लेकर छत्तीसगढ़ तक कांग्रेस में उठापटक मची हुई है. असम से सांसद रहीं महिला कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सुष्मिता देव ने पार्टी छोड़ दी है. त्रिपुरा के कांग्रेस अध्यक्ष रहे पीयूष कांति ने भी इस्तीफा दे दिया. पंजाब कांग्रेस का मसला भी पूरी तरह से सुलझ भी नहीं पाया. नवजोत सिंह सिद्धू ने कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद मुख्यमंत्री कैप्‍टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ मुहिम चला रखी है.


कहीं मध्यप्रदेश की राह पर तो नहीं छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में सरकार के नेतृत्व का विवाद कहीं न कहीं राहुल गांधी के फार्मूले से जुड़ा हुआ माना जा रहा है. वर्ष 2018 में कांग्रेस ने तीन राज्यों की सरकार में वापसी की थी. दो राज्य मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस मठाधीशों के हाथों से बाहर नहीं आ सकी. राजस्थान में अशोक गहलोत के कारण सचिन पायलट को राजनीतिक वनवास भोगना पड़ रहा है. ऐसा लगता है सोनिया-राहुल की रणनीति विवाद को बनाए रखने में ज्यादा है. मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा.


कांग्रेस की सरकार भी चली गई. इसके बाद पार्टी का नेतृत्व कमलनाथ ही कर रहे हैं. यह इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि मौजूदा राजनीति में सोनिया-राहुल को इंदिरा-राजीव युग के भरोसेमंद लोग ही उपयोगी लग रहे हैं. छत्तीसगढ़ में सरकार बनी तो दो मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव को ढाई-ढाई साल का मौका देने का फार्मूला बना. सिंहदेव अब अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. राहुल गांधी दोनों के बीच शक्ति परीक्षण करा रहे हैं.



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
दिनेश गुप्ता

दिनेश गुप्ता

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.

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First published: August 27, 2021, 5:46 PM IST
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