प्रधानमंत्री के सुझाव पर अगर अमल होता तो शायद बच सकती थीं सैकड़ों की ज़िंदगी

Bhopal. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने साफतौर पर कहा कि दूसरी लहर प्रशासनिक चूक का नतीजा है. इस चूक के कारण गुरुवार को भोपाल में 112 शवों का अंतिम संस्कार किया गया. भोपाल गैस कांड के बाद ऐसी स्थिति पहली बार देखी गई.

Source: News18 Madhya Pradesh Last updated on: April 16, 2021, 5:22 PM IST
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प्रधानमंत्री के सुझाव पर अगर अमल होता तो शायद बच सकती थीं सैकड़ों की ज़िंदगी
टेस्टिंग की अनदेखी हुई तो ट्रेकिंग और ट्रीटमेंट में भी चूक हो गई.
मध्यप्रदेश (MP) में कोरोना (Corona) का दूसरा पीक खतरे के निशान को पार कर चुका है. सरकारी तौर पर कोरोना के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा उजागर नहीं किया जा रहा है, लेकिन श्मशान घाट और कब्रिस्तान की तस्वीरें बता रही हैं कि हर दिन सैकड़ों लोग मर रहे हैं. पिछले सप्ताह आठ अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को चेताया था,उसमें मध्यप्रदेश भी शामिल है. प्रधानमंत्री मोदी की सलाह पर यदि राज्य ने अमल किया होता तो शायद स्थिति नियंत्रण से बाहर न होती.

प्रधानमंत्री का थ्री टी फार्मूला संक्रमण को रोक सकता है
जिन पांच राज्यों में पिछले साल की पीक से ज्यादा संक्रमित मरीज हो गए हैं, वे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, पंजाब और महाराष्ट्र हैं. मध्यप्रदेश की स्थिति लगातार नाजुक बनी हुई है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में कोरोना के एक्टिव मामले साठ हजार से ऊपर पहुंच चुके हैं. 21 मार्च को मध्यप्रदेश में कुल आठ हजार एक्टिव केस थे. इंदौर में सबसे ज्यादा संक्रमण है. पिछले साल भी इंदौर में ही संक्रमण तेजी से फैला था. अनुमान यह है कि मध्यप्रदेश में कोरोना का नया स्ट्रेन फरवरी माह के अंत में इंदौर में ही मिला था. मामला कथित तौर पर सामने आने के बाद भी जिला प्रशासन ने ट्रेकिंग नहीं की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 अप्रैल को मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में साफ तौर कहा कि राज्यों को थ्री टी फार्मूला गंभीरता से अपनाना चाहिए. इसके तहत उन लोगों में कोरोना टेस्टिंग की जाना थी, जिन्हें सामान्य सर्दी, बुखार है. कोरोना पॉजिटिव होने पर ट्रेकिंग और ट्रीटमेंट पर जोर देने की सलाह प्रधानमंत्री ने दी थी.

मध्यप्रदेश ने ट्रेकिंग में चूक की है?
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का जोर इस बात पर था कि ज्यादा से ज्यादा लोग मास्क उपयोग करें. इसके लिए उन्होंने अभियान भी चलाया. जबकि इस दौरान अकेले भोपाल में ही संक्रमण एक सप्ताह में 45 प्रतिशत से भी ज्यादा तेजी से बढ़ा. लोग मास्क लगाएं इसकी याद दिलाने के लिए गृह विभाग ने सभी कलेक्टरों को कहा कि वे सुबह ग्यारह बजे और शाम सात बजे सायरन बजाएं. पुलिस वाहन पर लगे सायरन के उपयोग के निर्देश भी दिए गए. पूरे प्रदेश में सायरन एक साथ बजे इसके लिए मोबाइल नेटवर्क टाइम से घड़ियां मिलाई गईं. लेकिन, सरकार ने टेस्टिंग को लेकर कोई अभियान नहीं चलाया.

मास्क के लिए जरूर अभियान चला
मुख्यमंत्री सड़क पर उतरे. अपने घर में पत्नी और बेटों को भी मास्क पहनाया. टेस्टिंग की अनदेखी हुई तो ट्रेकिंग और ट्रीटमेंट में भी चूक हो गई. मुख्यमंत्री चौहान यह तय कर चुके थे कि वे लॉकडाउन किसी भी सूरत में नहीं करेंगे. आज मध्यप्रदेश के आधे से ज्यादा जिले लॉक डाउन में हैं. कोरोना कर्फ्यू का आदेश कलेक्टरों ने जारी किए हैं. मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के मीडिया विभाग के उपाध्यक्ष भूपेन्द्र गुप्ता कहते हैं कि सरकार संक्रमण का पूर्व अनुमान लगाने में पूरी तरह से असफल रही है. गौर-ए तलब है कि अन्य राज्य सरकारों की तरह ही मध्यप्रदेश ने भी यह मान लिया था कि अब कोरोना की वापसी नहीं होगी. राज्य में संक्रमण की दर 22 प्रतिशत पहुंच गई है. पहली लहर में 11.2 प्रतिशत थी.कोविड सेंटर बंद होने से ट्रीटमेंट में देरी
कोरोना संक्रमण के देखते हुए दिसंबर तक विधानसभा का सत्र स्थगित किया जाता रहा. इसके बाद भी सरकार ने प्रदेश भर के कोविड सेंटर एक जनवरी से बंद कर दिए. अन्य अस्पतालों ने संक्रमण फैलने के डर से कोविड मरीजों को भर्ती करना बंद कर दिया. सरकार ने प्राइवेट लैब को सैंपल जांच के लिए भेजना भी बंद कर दिया था. मार्च में में जब पानी सिर से ऊपर बहने लगा तो सरकार ने सभी जिला अस्पतालों में चालीस प्रतिशत बिस्तर कोविड मरीजों के लिए आरक्षित रखने के लिए कहा. लेकिन,तब तक संक्रमण का प्रसार राज्य के छोटे कस्बों में भी हो चुका था. केन्द्र सरकार के दिशा निर्देशों के तहत कंटेनमेंट जोन में सौ प्रतिशत टेस्टिंग की जाना थी. इसकी अनदेखी भी सामने आई है.

अफसरों की कार्यशैली में अनुभव की सीख नहीं दिखी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफतौर पर कहा कि दूसरी लहर प्रशासनिक चूक का नतीजा है. इस चूक के कारण गुरुवार को भोपाल में 112 शवों का अंतिम संस्कार हुआ. भोपाल गैस कांड के बाद ऐसी स्थिति पहली बार देखी गई. मध्यप्रदेश में संक्रमण से बचाव में प्रशासनिक चूक को कई स्तर पर देखा गया. पिछले साल के पीक में भी इंदौर और भोपाल जैसे बड़े शहरों में ऑक्सीजन की कमी सामने आई थी. कोरोना संक्रमण से निपटने की जिम्मेदारी राज्य में उन्हीं अफसरों के पास है जिन्होंने पिछले साल आईं समस्याओं का सामना किया था. ऑक्सीजन ब्लैक में बेचे जाने के मामले भी सामने आए थे. इसके बावजूद सरकार ने ऑक्सीजन के स्टॉक लेकर कोई महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाए. भारत सरकार के सार्थक पोर्टल पर सभी राज्य सरकारों को ऑक्सीजन की उपलब्धता की जानकारी अनिवार्य रूप से दर्ज कराना होती है. राज्य में ऑक्सीजन का संकट खड़ा हो गया है, इसकी खबर सरकार को कुछ संक्रमितों की मौत हो जाने के बाद हुई. जब संकट बढ़ा तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को रेल मंत्री पीयूष गोयल और पेट्रोलियम एवं इस्पात मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से गुहार लगाना पड़ी. श्री प्रधान ने छत्तीसगढ़ के भिलाई स्टील प्लांट से गैस की आपूर्ति सुनिश्चित की. घंटों तक तो सरकार यह तय नहीं कर पाई कि छत्तीसगढ़ से ऑक्सीजन भोपाल और राज्य के अन्य जिलों में कैसे पहुंचेगी. मुख्यमंत्री ने रेल मंत्री गोयल से आग्रह किया कि संभव हो तो ऑक्सीजन से भरा ट्रक मालगाड़ी के जरिए मध्यप्रदेश पहुंचाया जाए. इससे समय बचेगा.

मध्यप्रदेश भाजपा के प्रवक्ता आशीष अग्रवाल कहते हैं केन्द्र और राज्य दोनों ही सरकारें अपने-अपने स्तर पर सुविधाएं उपलब्ध करा रही हैं. राज्य के अपर मुख्य सचिव मोहम्मद सुलेमान ने ऑक्सीजन की कमी पर कहा संक्रमण बढ़ने के बीच ऑक्सीजन संग्रह करने की प्रवृत्ति बढ़ी है. संक्रमित हो रहे सभी लोगों को ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं है. इसके बावजूद भारी मांग के पीछे आशंका यह है कि लोग इसका स्टॉक कर रहे हैं. सुलेमान ने स्पष्ट किया कि कोरोना संक्रमित होते ही रेमडेसिविर इंजेक्शन की जरूरत नहीं होती है. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.) 
ब्लॉगर के बारे में
दिनेश गुप्ता

दिनेश गुप्ता

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.

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First published: April 16, 2021, 5:17 PM IST
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