Opinion: उपचुनाव में टिकट के सौ बीमारों को कैसे खुश करेगी भाजपा?

मध्य प्रदेश में चौबीस विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव आम चुनाव से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं. उपचुनाव के नतीजों से शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार का भविष्य भी तय होना है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 2, 2020, 8:50 PM IST
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Opinion: उपचुनाव में टिकट के सौ बीमारों को कैसे खुश करेगी भाजपा?
भारतीय जनता पार्टी की कोशिश दिग्विजय सिंह को मुद्दा बनाने की है. (file photo)
मध्य प्रदेश में जिन चौबीस विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव ( Bypolls) होना है और वहां अपने कार्यकर्ताओं को प्रचार के लिए मनाना भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेसी उम्मीदवार से हारे भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) के नेता उपचुनाव में टिकट की अपनी दावेदारी को छोड़ना नहीं चाहते. दावेदारी ठोकने वाले नेताओं में पार्टी के कई दिग्गज चेहरे भी हैं. इन चेहरों में डॉ. गौरीशंकर शेजवार, अनूप मिश्रा, जयभान सिंह पवैया (Jaibhan Singh Pawaiya)और दीपक जोशी शामिल हैं. जबकि कांग्रेस की पूरी उम्मीद का केन्द्र भी टिकट की दावेदारी को लेकर भाजपा के भीतर उभरने वाला असंतोष ही है.

कांग्रेस के बागियों की राह में कई कांटे
मध्य प्रदेश में चौबीस विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव आम चुनाव से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं. उपचुनाव के नतीजों से शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार का भविष्य भी तय होना है. पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ कहते हैं कि वोटर इस बात को पसंद नहीं कर रहा है कि कुछ लोगों ने अपने निजी स्वार्थों के चलते सरकार गिरा दी. वह कहते हैं कि चुनाव में असली भाजपाई अपना भविष्य बचाने की चिंता जरूर करेगा. जिन स्थानों पर उपचुनाव होना हैं,उनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया फेक्टर बेहद महत्वपूर्ण है. 22 विधायकों ने सिंधिया के भरोसे ही कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए हैं. भारतीय जनता पार्टी ने उन सभी नेताओं को उपचुनाव में टिकट देने का निर्णय कर लिया है, जिनके कारण सत्ता मिली है. चुनाव मैदान में जाने से पूर्व इन नेताओं के समक्ष अपने उन विरोधियों को मनाने की है, जिनके खिलाफ तीन-तीन,चार-चार चुनाव लड़ चुके हैं. सिंधिया के गढ़ कहे जाने वाले ग्वालियर-चंबल अंचल में समस्या सबसे ज्यादा है. इस अंचल में ही भारतीय जनता पार्टी में भी कई दिग्गज नेता हैं. पिछले चुनाव में जयभान सिंह पवैया की हार प्रद्युमन सिंह तोमर से हुई थी. सिंधिया समर्थक पूर्व मंत्री तोमर अब भारतीय जनता पार्टी में आ गए हैं. उपचुनाव में तोमर को अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए पवैया का सहयोग लेना पड़ेगा. जबकि पवैया अपना विरोध प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा के समक्ष दर्ज करा चुके हैं. पवैया पार्टी में अपनी भूमिका को लेकर चिंतित हैं. उन्होंने अपनी पूरी राजनीति महल के खिलाफ की है. इसी तरह अनूप मिश्रा के सामने भी अपने राजनीतिक भविष्य को बचाने की चुनौती है. यद्यपि वे भितरवार से विधानसभा का चुनाव हार गए थे और लोकसभा टिकट भी कट गई थी. वे पिछला लोकसभा चुनाव मुरैना से जीते थे. अब वे मुरैना जिले की जोरा विधानसभा सीट पर अपना दावा जता रहे हैं. इस सीट पर चुनाव कांग्रेस विधायक बनबारी लाल शर्मा के निधन के कारण हो रहा है. हालांकि अनूप मिश्रा कहते हैं कि मैं टिकट का दावेदार नहीं हूं.

शेजवार को बेटे के भविष्य की चिंता
मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता डॉ.गौरीशंकर शेजवार ने विधानसभा के पिछले चुनाव में अपने पुत्र मुदित शेजवार को परंपरगत सीट सांची से टिकट दिलाई थी. खुद शेजवार ने अपने आपको चुनावी राजनीति से अलग कर लिया था. बेटे को आगे बढ़ा रहे थे. पिछले चार दशक से शेजवार का का मुकाबला प्रभुराम चौधरी से होता आया है. चौधरी कांग्रेस से चुनाव लड़ते थे और अब वे सिंधिया से साथ भाजपा में आ गए हैं. उनके भाजपा में आ जाने से शेजवार को अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य के आगे सवालिया निशान लगा दिखा रहा है. शेजवार ने अपना विरोध दर्ज कराया तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रभुराम चौधरी को गिले-शिकवे दूर करने उनके पास भेजा. शेजवार ने चौधरी से हुई अपनी मुलाकात पर कोई टिप्पणी नहीं की.

मुरैना जिले में हैं सबसे ज्यादा पांच उपचुनाव
विधानसभा के सबसे ज्यादा पांच उपचुनाव मुरैना जिले में हैं. इस जिले आपसी गुटबाजी के अलावा जातिगत समीकरण भी काफी महत्व रखते हैं. इस जिले से विधायकी छोड़ने वाले एदल सिंह कंसाना कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के समर्थक माने जाते थे. भारतीय जनता पार्टी में उनकी मदद मुख्यमंत्री शिवराज सिुंह चौहान ही कर रहे हैं. कंसाना सुमावली से चुने गए थे. सिंधिया के लिए इस क्षेत्र में विधानसभा की चारों सीटों को जीताना चुनौती भरा होगा.
जौरा में भाजपा के पूर्व विधायक सूबेदार सिंह रजौधा टिकट मांग रहे हैं. सिंधिया अपने समर्थक को टिकट देना चाहते हैं. जौरा में टकराव इसलिए भी ज्यादा हो रहा हैं क्योंकि यहां की सीट विधायक के निधन से खाली हुई है. मुरैना जिले में विधानसभा की कुल छह सीटें हैं.


चुनाव से पहले डैमेज कंट्रोल की तैयारी
चुनाव आयोग द्वारा राज्यसभा चुनाव की रूकी हुई प्रक्रिया को पुन: शुरू किए जाने के बाद इस बात की संभावना है कि विधानसभा उपचुनाव की घोषणा भी जल्द कर दी जाएगी. संवैधानिक प्रावधन के अनुसार विधानसभा के रिक्त स्थानों पर चुनाव कराए जाने की प्रक्रिया छह के भीतर पूरी करनी होती है. लॉकडाउन के कारण जौरा में चुनाव निर्धारित अवधि में नहीं कराए जा सके हैं. यहां के विधायक बनबारी लाल शर्मा का निधन 21 दिसंबर को हुआ था और जून में यहां निर्वाचन की प्रकिया पूरी हो जाना चाहिए थी. इसी तरह आगर मालवा से भाजपा के विधायक रहे मनोहर ऊंटवाल का निधन इसी साल तीस जनवरी को हुआ था. अगले माह के अंत तक यहां भी चुनाव की प्रक्रिया पूर्ण कर लेनी चाहिए, लेकिन यह संभव दिखता नहीं है. संभावना इस बात की है कि सितंबर अंत तक चुनाव करा लिए जाएंगे. इससे पहले भारतीय जनता पार्टी अपने आतंरिक असंतोष पर पर काबू पा लेना चाहती है. पार्टी अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा और संगठन महामंत्री सुहास भगत नाराज नेताओं को बुलाकर बात कर रहे हैं. मुलाकात के बाद मीडिया के सामने नेता किसी भी तरह की नाराजगी से इंकार करने का बयान भी दे रहे हैं. लेकिन जमीन पर स्थिति नियंत्रण में दिखाई नहीं दे रहरी है. ग्वालियर में पार्टी के जिला अध्यक्ष की नियुक्ति को मुद्दा बनाकर नेता विरोध करते नजर आए. पार्टी ने कमल मखीजानी को अध्यक्ष बनाया है. इनका विरोध करने वालों में केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर के समर्थक भी शामिल हैं. नियुक्ति के विरोध में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को भी पत्र लिखा गया है. जबकि तुलसी सिलावट के भारतीय जनता पार्टी में आने से इंदौर जिले की राजनीति भी बदली है. सिलावट के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले राजेश सोनकर को पार्टी ने भाजपा का शहर अध्यक्ष नियुक्त कर उन्हें साधने की कोशिश की है,तो दीपक जोशी को संभालने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय को सौंपी गई है.

विधानसभा के आम चुनाव में दीपक जोशी कांग्रेस के मनोज चौधरी से चुनाव हारे थे.मनोज चौधरी अब भाजपा में हैं. दीपक जोशी, पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कैलाश जोशी के पुत्र हैं और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के विरोधी माने जाते हैं.


नाराज नेताओं को मनाने लाल बत्ती का विकल्प
ज्योतिरादित्य सिंधिया का अपने समर्थकों के साथ भारतीय जनता पार्टी में आ जाने से अंदरूनी राजनीति में भी कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. नाराज नेताओं को मनाने के लिए कई तरह की दलीलें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं द्वारा दी जा रहीं हैं. एक दलील यह भी दी जा रही है कि उपचुनाव में विपरीत परिणाम आने का मतलब होगा हाथ में आई सत्ता खो जाना. मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के संवाद प्रमुख लोकेन्द्र पाराशर कहते हैं कि भाजपा में विचारों का आदान-प्रदान चलता रहता है. इसका तात्पर्य यह नहीं है कि लोग नाराज हैं और उन्हें मनाया जा रहा है. पाराशर कहते हैं कार्यकर्ता चुनाव का महत्व जानता है. भाजपा नाराज नेताओं का साधने के लिए निगम-मंडल का अध्यक्ष बनाने पर भी विचार कर रही है. पार्टी संगठन में भी जिम्मेदारी दिए जाने पर विचार चल रहा है. विष्णु दत्त शर्मा के अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी की नई कार्यकारिणी का गठन भी लंबित है. संभावना यह है कि मंत्रिमंडल और प्रदेश कार्यसमिति का गठन साथ-साथ कर लिया जाएगा.

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First published: June 2, 2020, 8:47 PM IST
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